मुख पर चिह्न द्वारा जन्म समय व लग्न का परीक्षण

मुख पर चिह्न द्वारा जन्म समय व लग्न का परीक्षण  

व्यक्ति की शक्ल-सूरत, चाल-ढाल, रंग-रूप इत्यादि को देखकर उसके स्वभाव, चरित्र और जीवन के संबंध में ठीक-ठीक बहुत कुछ जान लेना, आकृति द्वारा भूत, भविष्य एवं वर्तमान-कथन की परंपरा भारत की सबसे प्राचीन परंपराओं एवं चमत्कारी विद्याओं में से एक है। यह अनजान चेहरे को देखकर उसके भूत, भविष्य एवं वर्तमान के बारे में बताने की विद्या है। व्यक्ति का जैसा स्वभाव और चरित्र होता है, उसकी आकृति भी वैसी ही होती है तथा आकृति को देखकर व्यक्ति के बारे में जान लेना अंग-विद्या-विशारद का कार्य है। मस्तक पर चिह्नों के द्वारा जन्म लग्न का निर्धारण किसी जातक के माथे पर यदि स्पष्ट अंकुश के समान निशान हो तो उसे मेष का चिह्न माना जाता है। वृषभ लग्न को चार अंक के समान तथा कोण से युक्त सीधी दो रेखाओं वाला मिथुन का चिह्न माना गया है। सात अंक को जोड़ा उल्टे रूप से ऊपर-नीचे दिखता हो तो उसे कर्क का चिह्न बताया जाता है। ऋकार की मात्रा से जुड़े हुए पैरों वाला वृत्ताकार निशान हो तो उसे आचार्यों ने सिंह का चिह्न प्रकट किया है। स्वच्छ व सीधा यपी के समान रूपवाला कन्या का चिह्न विद्वानों ने कहा है। जिसके निचले भाग में एक टेढ़ी रेखा हो तथा ऊपर वाले भाग में रोमरहित धब्बाकार का निशान हो तो उसे तुला का चिह्न कहते हैं। यम के स्वरूप वाला वृश्चिक का निशान माना गया है। जिसका रूप खजूर वृक्ष की शाखा के समान या धनुषाकार चिह्न हो तो उसे धनु लग्न माना है। मकर के लिए वीपी के समान रूप वाला चिह्न कहा गया है। दो जलीय रेखाओं वाला कुंभ का चिह्न माना गया है। छत्तीस के अंक समान रूपवाला निशान मीन लग्न का कहा गया है। मेषादि राशियों के निशान जानकर मानवगणों का शुभाशुभ फल का विचार करना चाहिए। भारतीय लक्षण शास्त्र उतना ही प्राचीन है, जितनी मानवीय सभ्यता प्राचीन है। अंगविद्या, शरीर लक्षण शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र इत्यादि इसी के विभिन्न नाम हैं। इस शाखा के भी प्रवर्तक महर्षि पराशर व समुद्र ऋषि माने जाते हैं। कहा जाता है कि समुद्र व शिवपुत्र कार्तिकेय या स्कंद ने इस विद्या को प्रकट किया था तथा बाद में अन्यान्य महर्षियों के बौद्धिक संरक्षण में यह विद्या वाराहमिहिर, वेदव्यास, वाल्मीकि, मनु, गर्ग, पराशर, भोजराज, दुर्लभराज, जिनविजय, मेघविजय इत्यादि अनेक आचार्यों द्वारा पाल-पोस कर नए-नए सामयिक अनुसंधानात्मक तथ्यों का समावेश करते हुए प्रचारित हुई। यह शाखा भारतीय ज्योतिष, जो वेदों जितना ही प्राचीन है तथा आज तक जिसका निरंतर प्रवाह मानव कल्याण के चिरन्तन लक्ष्य की सिद्धि हेतु समर्पित है, का ही अंग है। यह ज्योतिष से बाहर की चीज बिल्कुल नहीं है। आंखों के द्वारा जातक के जन्म-समय का निर्धारण: भारतीय मनीषियों ने आंखों के माध्यम से व्यक्ति के जन्म-काल को पकड़ने की चेष्टा की है। ‘‘सामुद्रिक शास्त्र’’ में इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है: जिस व्यक्ति का नेत्र काले वर्ण वाला प्रतीत हो, उसका जन्म-समय रात्रि के द्वितीय प्रहर का कहना चाहिए और जो उसकी अपेक्षा थोड़ा सा ही काला वर्ण प्रतीत हो तो कुछ कम या अधिक एक घड़ी का जन्म-समय समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्र भंवरे के समान गहरा, काला जामुनी वर्ण वाला प्रतीत हो व तारा समेत काला वर्ण दिखाई पड़ता हो तो उस व्यक्ति का जन्म-समय रात्रि की दो घड़ी या तीन घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्रों का तारा पटल चारों तरफ सफेद होकर प्रतीत होता हो या केवल नीलवर्ण होकर सफेद ही दिखता हो तो उस व्यक्ति का जन्म-समय मध्यरात्रि के चार या पांच घड़ी का कहना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्र बिल्ली की आंखों के समान दिखते हों तो उस व्यक्ति का जन्म समय रात्रि में सात या आठ घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्र की तारामणि ही नीलवर्ण की प्रतीत होती हो या केवल मणिभाग हो, मिश्रित वर्ण वाला दिखता हो तो उस व्यक्ति का जन्म समय रात्रि में आठ या नौ घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्र बिल्ली के समान दिखते हों तथा आंख का निचला भाग रक्त वर्ण (लाल) होकर दिखता हो उस व्यक्ति का जन्म समय नौ या दस घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के पूर्ण नेत्र काले वर्ण के प्रतीत हों या नेत्रों के समीप छोटे-छोटे चिह्न दिखते हों तो उस व्यक्ति का जन्म-समय रात्रि में दस या ग्यारह घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति के नेत्र लाल या काले दिखते हों तो उस व्यक्ति का जन्म समय ग्यारह बारह घड़ी का समझना चाहिए। जिस व्यक्ति का नेत्र कुछ हरा सा प्रतीत होता है तो उसका जन्म बारह घड़ी का समझना चाहिए। जिसका आधा नेत्र हरा या आधा काला वर्ण होकर दिखता हो उसका जन्म समय प्रातः एक या दो घड़ी का समझना चाहिए। जिसके नेत्रों में टिकी हुई पुतली आधी नीलवर्ण होकर श्वेत, पीली या हल्की भूरी प्रतीत हो तो उसका जन्म समय प्रातः छः या सात घड़ी समझना चाहिए। जिसके नेत्रों की तारामणि नील या हरित वर्ण की प्रतीत होती हो तो उस व्यक्ति का जन्म-समय दोपहर (अपराह्न) पांच या छः का समझना चाहिए। विशेष: नेत्रों के माध्यम से जन्म समय का उपरोक्त परिमापन काफी हद तक सही बैठता है। अनुसंधान से यह तथ्य सामने आता है कि आंखों के श्वेत पटल का भी चंद्रमा से गहन संबंध है जिस प्रकार जातक के मन का संबंध चंद्रमा से होता है। शुक्ल पक्ष एवं शुभ-श्वेत चांदनी में जन्मे जातक का आंख श्वेत पटल एकदम दूध के समान प्रतीत होता है उसकी दंतावली धवलित होती है जबकि कृष्ण पक्ष में जन्मे व्यक्ति की आंखों का श्वेत पटल एकदम शुभ्र-स्वच्छ नहीं होता है। जन्मपत्रिका में यदि चंद्र दूषित है तो अवश्य ही जातक की आंखों का श्वेत पटल दूषित होगा एवं उसकी दंतावली भी खराब होगी। शरीर पर प्रकट चिह्नों द्वारा जन्म लग्न का परीक्षण भगवान श्रीरामचंद्र जी का सीता सहित ध्यान करके फलकथन उचित है, क्योंकि इष्ट कृपा के बिना कोई भी कुछ कहने लायक नहीं हो सका है। विद्वजन यदि सूक्ष्म रीति से विचार करना चाहें तो भाल से लेकर ठोड़ी-पर्यन्त स्थल को तीन भागों में विभक्त करें। प्रथम भाग दस अंश का, द्वितीय भाग बीस तथा तीस अंश का तृतीय भाग। इस भांति शरीर के अन्य भागों को समझकर विचार करना चाहिए। मेष जिस जातक-जातिका के ललाट-स्थल पर कहीं कोई स्वच्छ व साफ निशान देखा जाता है तो उस प्राणी का जन्म मेष लग्नगत दस अंशों के मध्य अर्थात पहले द्रेष्काॅण में कहना चाहिए। विशाल ललाट, मुख, बायां नेत्र, दाहिने नेत्र के निचले हिस्से या ऊपर के भाग, होठों के ऊपरी भाग या चेहरे के निचले हिस्से में किसी स्थान पर यदि मटर के समान या घने लोगों वाला कोई निशान दिखाई देता हो तो उस जातक का जन्म मेष लग्न के दस अंशों से लेकर बीस अंशों में समझना चाहिए। जिस मनुष्य के मुख के निचले हिस्से में, किंवा ठोड़ी के पास कोई निशान प्रतीत होता हो उस जातक का जन्म बीस अंश से तीस अंश के मध्य है। वृषभ यदि कंठ भाग में छोटा या बेर के समान कोई चिह्न दिखाई देता हो तो या लाल बिलाड़ के समान आकार वाला कोई निशान हो तो वृषभ लग्नगत दस अंशों के मध्य का जन्म समझना चाहिए। यदि कंठ के एक भाग विशेष में पूर्वोक्त निशान अथवा कोई अन्य निशान हो तो वृषभ लग्नगत द्वितीय द्रेष्काॅण में अर्थात दस से बीस अंशों के मध्य जन्म कहना चाहिए। यदि कंठ के ऊपरी हिस्से में टिका हुआ जल के बुदबुदे के समान या लाल फोड़े के समान दिखता हो, वृषभ लग्न के तृतीय द्रेष्काॅण यानि बीस से तीस अंशों के मध्य उस प्राणी का जन्म समझना चाहिए। मिथुन जिस जातक के दोनों कंधे या दाहिनी भुजा में किसी भी प्रकार का निशान दिखता हो तो उसका जन्म दस अंशों के बीच कहना चाहिए। यदि वाम (बाईं) भुजा या कंधों के पास कोई निशान हो तो मिथुन लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में उस जातक का जन्म समझना चाहिए अर्थात दस से बीस अंशों के मध्य उसका जन्म होगा। जिस जातक की दाहिनी भुजा के मध्य साफ-सुथरा चिह्न दिखता हो तो मिथुन लग्नगत बीस से पच्चीस अंशों के मध्य उस जातक का जन्म होगा तथा जिसकी बाईं भुजा के मध्य कोई भी विशिष्ट निशान हो तो पच्चीस से तीस अंश के मध्य उस जातक का जन्म समझना चाहिए। कर्क जातक के वक्ष स्थल में सीने के आस-पास यदि खरगोश के पैर के समान या फूल के समान सफेद निशान हो तो विद्वजन को उस प्राणी का जन्म कर्क लग्न के प्रथम द्रेष्काॅण में समझना चाहिए। यदि स्तनों के पास वाले भाग में बेर के समान या पुष्प के समान कोई निशान हो तो कर्क लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में दस से लेकर बीस अंशों के मध्य उसका जन्म समझना चाहिए। जिसके स्तनों के निचले हिस्से में पुष्प या बेर के समान चिह्न हो तो तृतीय द्रेष्काॅण बीस से तीस अंश के मध्य उसका जन्म होगा। सिंह यदि बाएं भाग में एवं वक्ष स्थल के ऊपर टिका हुआ विशुद्ध निशान अतीव चमकता हो तो सिंह लग्न के पहले द्रेष्काॅण में उस प्राणी का जन्म कहना चाहिए। यदि वक्ष स्थल के निचले हिस्से में उपरोक्त निशान या अन्य कोई निशान हो तो सिंह लग्न के दूसरे द्रेष्काॅण में उस जातक का जन्म बताना चाहिए। वक्ष स्थल के पाश्र्वभाग में यदि मटर के समान कोई छोटा सा अथवा भद्दा सा चिह्न हो तो तीसरे द्रेष्काॅण अर्थात बीस से तीस अंशों के मध्य उस जातक का जन्म होगा। कन्या पेट के मध्य या स्तनों के निकट, काला, नीला या हरा सा बिंदु सम निशान दिखता हो तो उस प्राणी का जन्म दस अंशों के बीच प्रथम द्रेष्काॅण में समझना चाहिए। स्तन या पेट के निचले भाग में, लाल, नीला या काले रंग का बिंदु युक्त कोई चिह्न हो तो कन्या लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में उस जातक का जन्म होगा। पेट या टुंडी (नाभि के नीचे भाग में कोई भी निशान दिखता हो तो उसका जन्म कन्या लग्नगत बीस से तीस अंशों के मध्य होगा। तुला तोंद या कमर में लोमयुक्त और कोमल कोई छोटा सा चिह्न हो तो उस जातक का जन्म तुला लग्न के दस अंशों के मध्य प्रथम द्रेष्काॅण में जानना चाहिए। यदि उपरोक्त निर्मल चिह्न वाम भाग या नाभि के निचले हिस्से में हो तो उस मनुष्य का जन्म तुला लग्नगत द्वितीय द्रेष्काॅण में समझना चाहिए। उदर के प्रांतभाग में श्यामल या घने लोमोंवाला कोई निशान हो तो उस व्यक्ति का जन्म तुलालग्न के तृतीय द्रेष्काॅण में बताना चाहिए। वृश्चिक कमर के बाएं हिस्से में कोई निर्मल सा चिह्न हो तो उस जातक का जन्म वृश्चिक लग्न के प्रथम द्रेष्काॅण में कहना चाहिए। कमर के दायंे भाग में कोई छोटा सा मटर के समान चिह्न हो तो उस व्यक्ति का जन्म वृश्चिक लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण अर्थात दस से बीस अंशों के मध्य होगा। गुदा के निचले भाग में मटर के समान निर्मल सा कोई निशान प्रतीत हो तो उस प्राणी का जन्म वृश्चिक लग्नगत तृतीय द्रेष्काॅण में बताना चाहिए। धनु बाईं जांघ में जल के बुदबुदे के समान कोई निशान हो तो उस व्यक्ति का जन्म धनु लग्न के प्रथम द्रेष्काॅण में कहना चाहिए। दायीं जंघा पर उपरोक्त निशान हो तो उस मनुष्य का जन्म धनु लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में होगा। दोनों जंघाओं के ऊपरी हिस्से में कोई भी निशान स्पष्ट दिखता हो तो धनु लग्नगत बीस से तीस अंश अर्थात तृतीय द्रेष्काॅण में होगा। मकर दायंे घुटने के ऊपरी हिस्से में ऊंचाई रहित तारे के समान कोई चिह्न हो तो उस प्राणी का जन्म मकर लग्न के प्रथम द्रेष्काॅण में समझना चाहिए। बाएं घुटने के ऊपरी भाग में उपरोक्त कोई चिह्न हो तो उस प्राणी का जन्म मकर लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में बताना चाहिए। यदि जानुओं के निचले भाग में पूर्वोक्त कोई निशान हो तो उस व्यक्ति का जन्म मकर लग्नगत तृतीय द्रेष्काॅण में होगा। कुंभ दाहिनी जंघा के ऊपरी भाग में फैला हुआ उच्चतारहित कोई चैड़ा सा निशान हो तो उस जातक का जन्म कुंभ लग्न के प्रथम द्रेष्काॅण में समझना चाहिए। बाईं जांघ के ऊपरी भाग में पूर्वोक्त कोई निशान हो तो जातक का जन्म कुंभ लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में होगा। मीन बाएं पैर के ऊपरी भाग में ऊंचाई रहित चैड़ा मांस में लगा हुआ कोई चिह्न हो तो जन्म मीन लग्नगत दस अंशों के मध्य प्रथम द्रेष्काॅण में बताना चाहिए। दाएं पैर के ऊपरी भाग में उपरोक्त कोई निशान हो तो मीन लग्न के द्वितीय द्रेष्काॅण में उस जातक का जन्म होगा। दोनों पैरों के निचले हिस्से में साफ सुथरा कोई चिह्न हो तो उस मनुष्य का जन्म मीन लग्न के तृतीय द्रेष्काॅण में बीस से तीस अंश का समझना चाहिए।


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