मानव का आभामंडल एवं उर्जा विज्ञान का रहस्य

मानव का आभामंडल एवं उर्जा विज्ञान का रहस्य  

संपूर्ण ब्रह्याण्ड में एक अद्भुत और अलौकिक शक्ति विद्यमान है जो कि सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ पर समान रूप से अपना प्रभाव डालती है। अलौकिक चमत्कारी शक्तियां संसार के प्रत्येक मनुष्य में अदृष्य रूप में विद्यमान रहती है जो कि आत्मविष्वास का दूसरा रूप है। संसार की प्रत्येक जड़-चेतन, सजीव-निर्जीव पदार्थ में सर्वव्याप्त उस अज्ञान शक्ति का प्रभाव दूसरी अन्य वस्तुओं पर अवष्य ही परिलक्षित होता है। जिस प्रकार चंुबक लोहे को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। सृष्टि के समस्त पदार्थ उस सर्वव्यापक और अलौकिक चेतना की शक्ति औरा आभामण्डल के करिष्मे से एक-दूसरे को परस्पर प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिक इस ब्रह्याण्डीय ऊर्जा को आभामण्डल का नाम देते हैं। संसार के समस्त प्राणियों और ब्रह्याण्ड के समस्त ग्रह-नक्षत्र, समुद्र, सितारों में व्याप्त विद्युत चुंबकीय आभामण्डल की आकर्षण शक्ति के मध्य किसी न किसी प्रकार का घनिष्ठ संबंध अवष्य है। मूल रूप से अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि सर्वव्यापक अतींद्रिय शक्तियां आभामण्डल मनुष्य के मन को प्रभावित करती है। निर्विकार, वासनारहित, कामनारहित दृढ़संकल्पी और सतोगुणी मनुष्य ही अपने औरा आभामण्डल पूर्णतः विकास करके अलौकिक शक्तियों को प्राप्त कर सकता है। अवचेतन मन ही समस्त आभामण्डल की अद्भुत शक्तियों का केंद्र और कोषागार है। संपूर्ण ब्रह्यांड में अलौकिक शक्तियों आभामण्डल का अस्तित्व विद्यमान है और मानव के लिए उन समस्त शक्तियों पर पूर्णतः नियंत्रण स्थापित कर लेना कोई असंभव कार्य नहीं है। प्रत्येक मनुष्य में अन्तःषक्ति होती है और इन्हीं अन्तः शक्तियों को विकसित करके वह अखिल बह्यांड में बह रही अलौकिक चमत्कारी शक्ति आभामण्डल की धारा से संपर्क स्थापित करके उससे अंष प्राप्त करके अलौकिक शक्तियों का स्वामी बन सकता है। वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान के पष्चात यह सिद्ध किया है कि मनुष्य का मात्र एक शरीर ही नहीं होता है अपितु इस भौतिक शरीर के अतिरिक्त प्रकाषमय और ऊर्जावान एक शरीर और होता है जिसे सूक्ष्म शरीर अथवा आभामण्डल औरा कहते हैं। अपने इष्ट देव की मूर्ति या पोस्टर सभी मनुष्य अपने घर या कार्यस्थल पर अवश्य रखते हैं। इन मूर्ति या पोस्टर में जो भी देव हैं उनके मस्तिष्क के बराबर पीछे की ओर सप्तरंगीय ऊर्जा तरंगे निष्कासित होती रहती है व एक गोलीय चक्र सा प्रतिबिंब रहता है वही उनका आभामण्डल या औरा चक्र होता है। यह आभामण्डल जीव मात्र- मनुष्य, जीव-जंतु, पषुआंे, पेड़-पौधे, पदार्थों के इर्द-गिर्द एक प्रकाष पुंज रहता है। प्रत्येक मनुष्य का अपना एक आभामण्डल या औरा होता है। जिसके कारण से ही दूसरे अन्य मनुष्य उससे प्रभावित होते हैं। यह आभा मनुष्य के संपूर्ण शरीर से सतरंगी किरणों के रूप में अंडाकार रूप में उत्सर्जित होती रहती है। यह दिव्य प्रकाष युक्त आभा हमें नंगी आंखांे से दिखाई नहीं देता है। एक शोध के अनुसार व्यक्ति में आत्मबल का इस आभामंडल से सीधा संबंध है। इस आभामंडल औरा में कमी व वृद्धि के अनुसार व्यक्ति के आत्मबल में भी न्यूनाधिकता आती रहती है। इस दिव्य प्रकाषयुक्त आभामंडल को वैज्ञानिक यंत्रों से स्पष्ट रूप से देखा व फोटोग्राफ लिया जा सकता है तथा इसे नापा जा सकता है। आभामण्डल के फोटोग्राफ ‘‘पोली फोटोग्राफी ‘‘ से लिए जा सकते हैं जिसे किरलोन फोटोग्राफी कहते हैं। जिस प्रकार से वस्त्राच्छादित होने के बावजूद मनुष्य के भीतरी अंगों का चित्र एक्सरे द्वारा किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार से मनुष्य किरलोन फोटोग्राफी में एक विषेष प्रकार का कैमरा द्वारा मनुष्य के शरीर से उत्सर्जित प्रकाष किरणों आभामण्डल या ओरा चक्र अर्थात् सूक्ष्म शरीर का चित्र खींचा जा सकना भी संभव हो गया है। इस कैमरे की फोटोग्राफी के चित्र में मनुष्य की प्रभामण्डल का स्पष्ट दर्षन किया जा सकता है। ये सात रंग कभी भी एक जैसी स्थिति में नहीं रहते हैं। जैसे प्रत्येक मनुष्य व जीव का डी.एन.ए. अलग होता है ठीक उसी प्रकार से आभामण्डल या औरा भी अलग होता है। आभा मंडल की सात रंगों की स्थिति कहीं ज्यादा गहरी कहीं हल्की उसकी मोटाई कहीं कम-ज्यादा, कहीं नियमित-अनियमित एवं इंसान की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है। व्यक्ति के सुख व प्रसन्नता के समय आभा मण्डल औरा भी अधिक पुष्ट हो जाता है वहीं व्यक्ति के कष्ट व परेषानी में आभामण्डल कम हो जाता है। इस दिव्य प्रकाष पूंज औरा से व्यक्ति के आने वाले समय में कौन सी बिमारी होने वाली है इसे पूर्व ही जाना जा सकता है और जानकर समय से पहले ईलाज कर उस रोग से बच सकते हंै। एक शोध में पाया गया है कि व्यक्ति के रोगी होने पर आभा मण्डल सुप्त अवस्था में रहता है। आने वाले समय में डायग्नोसिस का सबसे अच्छा तरीका आभामण्डल से विष्लेषण साबित होगा। जैसा कि यह स्पष्ट है कि सभी सजीव व निर्जिव पदार्थ का भी अपना आभा मण्डल होता है। हमारे शरीर के समान ही मकान, दुकान, फैक्ट्री, आॅंफिस, व्यवसाय स्थल का भी आभामण्डल होता है। उपरोक्त सभी तत्त्वों के आभामण्डल को हम सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा तरंगों के रूप में देखते हैं। आप ने भी अपने आस-पास देखा होगा कि किसी एक दुकान, मंदिर या आॅंफिस में लोगों की लाइन लगी रहती है, तथा किसी मंत्री या नेता के पीछे लोगों की भीड़ उमड़ती है, वहीं दूसरी ओर पूरे दिन में दो-पांच व्यक्ति आते हैं आखिर ऐसा क्यों? इसका परोक्ष कारण उस स्थान, या व्यक्ति की आभा या औरा मजबूत है जिसके कारण वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। औरा आभामण्डल के कारण व्यक्ति की प्रसिद्धि फैलती है। औरा या आभामण्डल मजबूती के लिए व्यक्ति पूजा-पाठ, अनुष्ठान, यज्ञ, स्टोन, आदि का उपयोग करते देखे गये हैं। कई बार देखा गया है कि घरों में ऐसे असाध्य रोग या बीमारी आ जाती है जिसका डाॅक्टरों के पास कोई इलाज भी नहीं होता है। मेडिकल जांच में बीमारी पकड़ में नहीं आती है। व्यापार में प्रगति नहीं हो पाती है। दुर्धटना आदि होती रहती है। मानव जीवन की इन सभी समस्याओं का कारण आभामण्डल में नकारात्मक ऊर्जा का अधिक संचार होना। यह नकारात्मक ऊर्जा भी दो तरह की होती है एक तो प्राकृतिक रूप से नकारात्मक ऊर्जा तथा दूसरी आपसी शत्रुता की भावना से किसी मेले तांत्रिक शमसानिक क्रिया द्वारा नकारात्मक ऊर्जा स्थापित करा दी जाती है। इसके कारण व्यक्ति व घर का आभामण्डल टूटता है और वह परिवार उपरोक्त परेषानी में आ जाता है। मानव जीवन की परेषानियों का कारण आभामण्डल है। मेरा यह अनुभव रहा है कि तंत्र विद्या ऊर्जा से सीधा संबंध रखती है। परंतु इस नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के लिए व्यक्ति को स्प्रिट एनर्जी अर्थात् आध्यात्मिक ऊर्जा, ईष्वरीय भक्ति, पूजा-पाठ, अनुष्ठान द्वारा आभामण्डल को मजबूत कर नकारात्मक ऊर्जा के दुष्प्रभाव को हटाया जा सकता है। भवन, आॅंफिस, दुकान, व्यक्ति के ऊपर नकारात्मक ऊर्जा व स्प्रिट एनर्जी आध्यात्मिक ऊर्जा व दिव्य प्रकाष युक्त आभामण्डल इन सभी ऊर्जा का पता में यंत्रों द्वारा ही जाना जा सकता है। आभामण्डल में स्प्रिट एनर्जी आध्यात्मिक सकारात्मक ऊर्जा व नकारात्मक ऊर्जा के अलावा एक अन्य तीसरी ऊर्जा हमारे स्वयं के आस-पास निर्मित होती है। हमारे जीवन में भौतिक सुख-सुविधा के साधनों में- मोबाईल, इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रोनिक्स साधन है ये एक विषेष मैग्नेटिक ऊर्जा का निर्माण कर विकिरण पैदा करते हैं। मोबाईल, फ्रीज, एसी, टी.वी., कंप्यूटर आदि अन्य सभी से नेगेटिव ऊर्जा निकलती है जो हमें नुकसान पहुंचाती रहती है। यह सत्य है कि आभामण्डल, स्प्रिट एनर्जी आध्यात्मिक ऊर्जा व नकारात्मक ऊर्जा से यह तीसरी मैग्नेटिक ऊर्जा का प्रभाव मन्द गति होने की वजह से हमें प्रतीत नहीं होता है। धीरे-धीरे इस ऊर्जा का प्रभाव हमारे शरीर व मन-मस्तिष्क पर होता रहता है। मैग्नेटिक ऊर्जा भी नकारात्मक ऊर्जा का भंडार है। परंतु इस नकारात्मक ऊर्जा को सही मायने में मार्ग परिवर्तन कर दे तो यह ऊर्जा भी सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है परंतु यह बहुत ही गहन शोध की क्रिया है। इनके अलावा भी घर, आॅंफिस, दुकान, फैक्ट्री में भी नकारात्मक ऊर्जा का एक कारण वास्तु दोष भी है। यदि भवन, आॅंफिस, व्यवसाय स्थल वास्तु के नियमों में नहीं है तो उससे भी नेगेटिव ऊर्जाओं का प्रभाव बना रहता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार केवल भवन से ही नकारात्मक ऊर्जा नहीं निकलती है भूमि से भी दोनों ही प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा निकलती रहती है। अतः वास्तु के मूलभूत नियमों द्वारा कई हद तक नकारात्मक ऊर्जा को रोका जा सकता है। तीसरी मैग्नेटिक ऊर्जा जो इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रोनिक्स संसाधनों से निकलने वाली ऊर्जा है उसको रोकना भी आवष्यक है और नहीं रोक सकते तो कई हद तक कम करना अति आवष्यक है। इंसान की व्यक्तिगत अच्छाई कर्मों से भी आभामण्डल विकसित होता है। यही कारण है कि अच्छे महापुरूषों, उच्चाधिकारियों, उद्योगपतियों, आर्थिक विष्लेषकों, अध्यात्मवेत्ताओं का आभा मण्डल 10 से 15 फीट तक पाए जाते हैं। वास्तव में मानव का आभामण्डल का सीधा संबंध उसके कर्मों से जुड़ा हुआ है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, अहंकार छः मनुष्य के शत्रु हैं। व्यक्ति द्वारा इन छः कर्मों में संलग्न होने से आभामण्डल क्षीण या कम होता जाता है। आभामण्डल की ऊर्जा तरंगंे टूट जाती है तथा आभामण्डल के कमजोर होते ही व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। एक साधारण इंसान का औरा या आभामण्डल 2 से 3 फीट तक माना जाता है। आभामण्डल का आवरण इस माप से नीचे जाने पर व्यक्ति मानसिक व भौतिक रूप से विकृत हो जाता है या टूटने लगता है। इस स्थिति में उसका आत्म बल भी कम हो जाता है। व्यक्ति की यह स्थिति जीवन में कष्ट या दुःख वाली कहलाती है। मृत व्यक्ति का औरा 0.5 या 0.6 रह जाता है। दिव्य आभामण्डल में नित्य अभिवृद्धि के लिए हमारे धार्मिक साहित्य वेद-पुराणों में पूजा-पाठ, इष्ट अराधना, अनुष्ठान, यज्ञ तथा त्राटक योग के अभ्यास द्वारा व्यक्ति अपने गिरते हुए औरा या आभामण्डल में वृद्धि कर सकता है। आभामण्डल में वृद्धि का कर्म नित्य रहना चाहिये। मेरे शोध के अनुसार प्रातः काल नित्य 15 मिनट तक ओमकार का ध्यान या नाद योग करने से औरा मजबूत होता है। धार्मिक तीर्थ स्थल, नियमित पूजा पाठ, इष्ट अराधना, मंत्रोचार, योग, प्राणायाम, कपालभाती, आसन, सत्संग आदि से सकारात्मक ऊर्जा से आभा मण्डल का विकास किया जा सकता है। गायत्री मंत्र या अन्य मंत्र ध्वनि के उच्चारण या श्रवण मात्र से आभामण्डल में वृद्धि होती है। संध्या काल में मंदिर में आरती के समय भाग लेने से वहां शंख, गरूड़ गंटी तथा मंत्रोचार ध्वनि से मन व आत्म शांति मिलती है। उस शांति से तात्पर्य आभामण्डल में वृद्धि का होना। वही गलत साहित्य, बुरी संगति, पाष्चात्य नाच-गाने, फास्ट फुड, मदिरा पान, विचार व वातावरण से विपरित आहार से आपके आभा मण्डल का ह्रास होता है। प्रत्येक मनुष्य के पास आभामण्डल के अतिरिक्त एक भावमण्डल भी होता है यह भावमण्डल हमारी चेतना है और तेजोमय शरीर को सक्रिय बनाती है तब वह किरणों का विकिरण संकरता है और ये विकिरण व्यक्ति के चारों ओर वलयाकार घेरा सा बना देते हैं संजिसे आभामण्डल या औरा कहते हैं। मनुष्य का जैसा भावमण्डल होता है वैसा ही उसका आभामण्डल होता है। यह आभामण्डल उस भावमण्डल के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। साधना के बल पर औरा या आभामण्डल को जागृत करके उस शक्ति का विकास कर उसकी ऊर्जा शक्ति को अपने अंदर संचित मानव शरीर और मन पर एकाग्रचितता व नियंत्रण करने की क्षमता करने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त विधि प्राणायाम तथा त्राटक योगाभ्यास है। त्राटक, प्राणायाम, कपालभांति, ध्यान, आसन, समाधि और साधना के द्वारा मनुष्य अपने शरीर में समस्त प्रकार की अन्तः अलौकिक चमत्कारी अदृष्य शक्तियों को पुनः जागृत करके अपने आत्मविश्वास एवं आभामंडल दोनों को विकसित कर सकता है।


विवाहित जीवन विशेषांक  अप्रैल 2011

शोध पत्रिका के इस अंक में ज्योतिष, हस्तरेखा, रमल व मेदिनीय ज्योतिष आदि पर कई अनुसंधान उन्मुख लेख हैं।

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