पितृ पक्ष में करें पितृ दोष निवारण

पितृ पक्ष में करें पितृ दोष निवारण  

पितृ पक्ष में करें पितृ दोष निवारण शैलेश प्रताप शास्त्री पितृ दोष का निवारण पितृ पक्ष में अर्थात उस समय किया जाता है जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा होता है। तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिंड आदि देकर पितृ दोष शांति करने से पितरों के आशीर्वाद से व्यक्ति का जीवन सफल हो जाता है और व्यक्ति की कुंडली में व्याप्त पितृ दोष का प्रभाव भी कम हो जाता है। पितृ दोष निवारण का अनुकूल समय पितृ पक्ष : पितृ (पितर) पूजा भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। 'श्रद्धया यत् क्रियते तत् श्राद्धम्' पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा द्वारा हविष्ययुक्त (पिंड) प्रदान करना ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध करने से पितर संतुष्ट होते हैं और वे अपने वंशजों को दीर्घायु, प्रसिद्धि, बल-तेज एवं निरोगता के साथ-साथ सभी प्रकार के पितृ दोष से मुक्ति प्रदान करने का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध पांच प्रकार के होते हैं- और्ध्वदैविक, सांवत्सरिक, एकोदिष्ट, पार्वण तथा काम्य। शास्त्रानुसार पितरों को प्रसन्न करने के लिए किये जाने वाले श्राद्ध को पितृज्ञ भी कहते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष को हम महालय श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाते हैं। भाद्रपद (भादों मास) की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक कुल सोलह तिथियां श्राद्ध पक्ष की होती है। इस पक्ष में सूर्य कन्या राशि में होता है। इसीलिए इस पक्ष को कन्यागत अथवा कनागत भी कहा जाात है। श्राद्ध का ज्योतिषीय महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक महत्व अधिक है क्योंकि यह हमारी धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। पितृलोक के स्वामी अर्यमा सभी मृत (आत्मा) प्राणियों को अपने-अपने स्थान पर श्राद्ध का अवसर प्रदान करते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा हो, तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिण्ड आदि उन्हें मिलता है। पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष की 16 तिथियों में प्रत्येक तिथि को पितर प्रातः सूर्योदय से सूर्यास्त तक अपने पुत्र-पुत्रों के प्रति आशान्वित होकर आते हैं एवं उनसे श्रद्धापूर्वक दिए दान की अपेक्षा रखते हैं। पदम् पुराण, बृहत्पराशर स्मृति, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मृत प्राणी का श्राद्ध उसकी मृत्यु-तिथि के दिन करना ही श्रेष्ठ है जिससे मृतात्मा को तृप्ति मिलती है। इसलिए अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनके (स्वर्गवास) की तिथि को ही करें। किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में किसी भी प्रकार से यदि सूर्य पीड़ित होता है, तो वह पितृशाप दोष का परिचायक है। पिता के स्थान-दशम् भाव का स्वामी 6, 8, 12 वें भाव में चला जाए एवं गुरु पापी ग्रह प्रभावित या राशि में हो साथ ही लग्न व पंचम के स्वामी पाप ग्रहों से युति करे तो ऐसी कुंडली पितृशाप दोष युक्त कहलाती है। पितृदोष की जानकारी कुंडली के बारहवें भाव से होती हैं। यदि यह भाव पाप प्रभाव में हो तथा इस भाव का स्वामी नीचगत होकर चतुर्थ भाव में पाप प्रभाव में हो तो पितृदोष बनता है। इस दोष के कारण असफलताएं मिलती हैं। यदि राहु पाप प्रभाव में या नीच अथवा शत्रु राशिगत होकर द्वादश भाव में शनि दृष्ट हो तो पितृदोष का कारण बनता है। इसी प्रकार द्वादश भाव में राहु या शनि जब गुरु या चंद्र की राशि में हों, तब भी यह स्थिति बनती है। जब किसी की जन्म पत्रिका नहीं हो तो इस दोष से जीवन में हताशा, असफलताएं, बार-बार दुर्घटनाएं, मानसिक विक्षिप्तता रोजगार विहीनता, धनाभाव, भय, शारीरिक व्याधि, दांपत्य क्लेश, चित्त विकृति एवं संतानाभाव इत्यादि होते हैं। इसके लिए पितृपक्ष में श्राद्ध कर पितृ दोष का निवारण करें। इस बार पितृपक्ष तेरह सितंबर से प्रारंभ हो रहा है। श्राद्धकर्त्ता को चाहिए कि वह श्राद्ध के दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें- ये हैं- गौ बलि, श्वान बली, काक बली, देवादि बली तथा पिपिलिकादि बली (चींटियों को)। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री तथा सूखे आंवले एवं मुनक्का का भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को सार्म्थ्यानुसार संखया में भोजन करायें। श्राद्ध केवल अपराह्न काल में ही करें, पूर्वाह्न तथा रात्रि में नहीं। श्राद्ध में तीन वस्तुएं पवित्र हैं- दुहिता- पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) तथा काले तिल। श्राद्ध में तीन प्रशंसनीय बातें हैं- बाह्य-अंतर की शुद्धि, क्रोध का त्याग तथा शीघ्रता नहीं करें। श्राद्ध-श्रद्धा से करें, दिखावा नहीं करें। इसे गुप्त रूप से एकांत में करें। पितृ दोष से श्रापित व्यक्ति पितृ अमावस्या के दिन श्रीमद्भागवत कथा का पाठ करवाएं-श्रवण करें। अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धा से एवं तर्पण विधि-विधान से आश्विन कृष्ण पक्ष में करें। श्राद्ध का फल-पुत्रानामायुस्तथाऽऽरोग् यमैश्वर्यमतुलं तथा। प्रानोति पंचमें कृत्वा श्राद्ध कामांश्च पुष्कलान्॥ पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पुत्र, आयु, आरोग्य, अतुल ऐश्वर्य और मनचाही इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।



पुनर्जन्म विशेषांक  सितम्बर 2011

पुनर्जन्म की अवधारणा और उसकी प्राचीनता का इतिहास पुनर्जन्म के बारे में विविध धर्म ग्रंथों के विचार पुनर्जन्म की वास्तविकता व् सिद्धान्त परामामोविज्ञान की भूमिका पुनर्जन्म की पुष्टि करने वाली भारत तथा विदेशों में घटी सत्य घटनाएं पितृदोष की स्थिति एवं पुनर्जन्म, श्रादकर्म तथा पुनर्जन्म का पारस्परिक संबंध

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