प्र0- गौमुखी भूखंड किसे कहते है ? उत्तर- जो भूखंड आगे से संकरा एवं पीछे से चैड़ा हो उसे काकमुखी या गौमुखी भूखंड कहते हंै। यह भूखंड अच्छा फल देने वाला माना गया है। गौमुखी भवन वही शुभ होता है जिस का प्रवेश दक्षिण या पश्चिम दिशा से हो। चित्र में दिखाए गए गौमुखी भूखंड मंें उत्तर-पूर्व बढ़ा हुआ है। इस तरह के भूखंड पर बने मकान में रहने वाले को यश, प्रतिष्ठा, सुख-शांति, एवं समृद्धि प्राप्ति होती है। साथ ही समुचित विकास होता है। इस तरह के भवन में सोए हुए भाग्य जाग जाते हैं। ऐसा भूखंड भाग्य से मिलता है। इस तरह के भवन में वास करने वाले लोगों की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैली रहती है तथा उनकी सारी आकांक्षाएं पूरी होती हैं। प्र0- प्रत्येक गौमुखी भूखंड शुभफलदायक होता है ? उ0- प्रत्येक गौमुखी भूखंड अच्छा नहीं होता है। उत्तर-पूर्व से काटकर बना गौमुखी भवन शुभ फलदायक नहीं होता। घर में समृद्धि, सुख, शांति आदि की कमी बनी रहती है। दरिद्रता, दुर्घटनाएं आदि पीछा नहीं छोड़तीं। उसमें निवास करने वाले लोग बीमारियांे से ग्रस्त होते हैं। उक्त भूखंड अकस्मात दुर्घटना के कारक होते हैं। इन पर रहने वालों में आत्महत्या की प्रवृत्ति होती है तथा मुकदमों मंे उलझे रहते हैं। अतः ऐसे भूखंड पर भवन बनाने से पूर्व उसे दोषमुक्त करवा लेना चाहिए। कुछ अशुभ गौमुखी भूखंडों के चित्र यहां प्रस्तुत हैं। प्र0- व्याघ्रमुखी भूखंड किसे कहते है ? उ0- जो भूखंड आगे से चैड़ा एवं पीछे सेे पतला होता है उसे व्याघ्रमुखी भूखंड या छाजमुखी भूखंड कहते हैं। यह रोग, शोक एवं दुख देने वाला होता है। इस पर बने भवन में रहने वाले को मुसीबतें, आपदाएं आदि घेरे रहती हैं। गरीबी, कर्ज, शोक, दुख आदि साथ नहीं छोड़ते। साथ ही भाग्य सो जाता है। अतः इस तरह के भूखंड का इस्तेमाल सुधार किए बिना नहीं करना चाहिए। प्र0.- ईशान्य वृद्धि व्याघ्रमुखी भूखंड कैसा फल देता है ? उ0- ईशान्य वृद्धि (उत्तर-पूर्व) व्याघ्रमुखी भूखंड बने तो वह सुख, समृद्धि एवं शांति देेने वाला होगा। इस पर रहने वाले को यश, प्रतिष्ठा, मान सम्मान के साथ सभी सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही शारीरिक, आध्यात्मिक, आर्थिक एवं मानसिक विकास समग्र रूप से होता है। अतः जिस व्याघ्रमुखी भूखंड का ईशान्य बढा हुआ हो वह शुभ होता है, जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है। उत्तर-पश्चिम का बंद कोना मुकदमेबाजी का कारण पं. गोपाल शर्मा (बी.ई.) कुछ समय पहले पंडित जी जयपुर में एक व्यापारी से मिले। उन्होेंने बताया कि वह अपनी एक प्रापर्टी की वजह से परेषान है जिसे उन्होंने बैंक वालों से नीलामी में खरीदा था। जबसे इसे खरीदा है कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि वो इसे न तो ठीक कर पाते हैं और न ही इसमें षिफ्ट कर पा रहे हैं। खरीदने के बाद उन्हें पता चला कि इस घर के मालिक की पत्नी बहुत बीमार रहती थी और कुछ दिन पहले उसकी मृत्यु हो गई। उसका व्यापार भी बंद हो गया था और वह दीवालिया हो गया था। इसी संदर्भ में उन्होंने पंडित जी से इसका वास्तु परीक्षण करने को कहा। परीक्षण करने पर पाए गए वास्तु दोष: Û उत्तर-पष्चिम का कोना बंद था जो कि लड़ाई-झगड़े, मुकदमेबाजी एवं मानसिक तनाव का कारण होता है। दोस्त भी दुष्मन बन जाते हैं। Û उत्तर-पूर्व में सीढियां थी जो कि विकास में बाधक व आर्थिक परेषानियों का कारण होती है। Û दक्षिण-दक्षिण पूर्व का कोना कटा हुआ था जो कि घर की महिलाओं के लिए अति दुखदायी होता है एवं घर में शारीरिक व मानसिक समस्याएं बनाये रखता है। Û दक्षिण-पष्चिम में शौचालय घर के मालिक के स्वास्थ्य की हानि व अनावष्यक खर्चों का कारण होता है। Û उत्तर-पूर्व में जमीन के ऊपर पानी की बड़ी सी टंकी रखी हुई थी जो कि बच्चों के विकास में अवरोधक व तनाव का कारण होती है। सुझाव Û उत्तर-पष्चिम में बने शौचालय व स्नान घर को तोड़कर पष्चिम के बरामदे में बनाने को कहा गया तथा इस कोने को खुला रखने को कहा। Û पूर्व में बनी सीढ़ियों को उत्तर-पष्चिम में (बिना ऊपर छत बनाए) बनाने को कहा गया। Û दक्षिण, दक्षिण-पूर्व के कोने को अंदर की तरफ से तीन फुट की दीवार बनाकर सीधा करने को कहा गया। बढ़े हुए हिस्से को अच्छे से भरने को कहा गया जिससे स्लैब बन जाएगी जिसे सामान इत्यादि रखने के लिये इस्तेमाल कर सकते हैं। Û दक्षिण-पष्चिम में बने शौचालय को बंद करने को कहा गया और दक्षिण, दक्षिण-पष्चिम के कवर्ड बरामदे को स्टोर की तरह इस्तेमाल करने की सलाह दी गई ताकि यह कोना भारी हो सके। Û उत्तर-पूर्व में भूमिगत पानी की टंकी बनाने की सलाह दी गई जिससे घर में सुख समृद्धि बनी रहे। पंडित जी ने उन्हें आष्वासन दिया कि सभी सुझावों को कार्यान्वित करने के बाद उन्हें अवष्य लाभ होगा और वह अपने इस घर में सुखपूर्वक रह पायेंगे।


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