कांवड़ियों का अतिप्रिय वैधनाथ धाम

कांवड़ियों का अतिप्रिय वैधनाथ धाम  

कांवड़ियों का अतिप्रिय वैद्यनाथ धाम डा. भगवान सहाय श्रीवास्तव शैवों एवं शाक्तों की नगरी और बाबाधाम नाम से मशहूर देवघर संसार प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। देवघर यानी देवों का घर। देवघर स्थित रावणेश्वर महादेव द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस शिवलिंग को सिद्धपीठ की मान्यता प्राप्त है एवं कामना लिंग के रूप में यह प्राचीनकाल से प्रसिद्ध है। कांवरिया महात्म्य:मर्यादा पुरूषोत्तम राम और लंकापति रावण दोनों ने देवघर में शिव को कांवर चढ़ायी थी। तब से आज तक यह परंपरा जारी है। कहा जाता है कि भगवान शंकर को कांवर चढ़ाने से अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है। भोलेनाथ के प्रति आस्था, श्रद्धा और विश्वास का संगम देखना हो तो अजगैबीनाथ से बाबा धाम तक का एक बार सफर अवश्य करें। बाबा के प्रति समर्पित ऐसे-ऐसे भक्त रास्ते में मिलेंगे, जिन्हें देखकर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाबा भोले शंकर की महिमा अपरम्पार है। 5 कि.मी. की दूरी तय भी नहीं करने वाले श्रद्धालु 105 किमी. का सफर बड़े इत्मीनान के साथ पूरा कर लेते हैं। नदी, नाले, पहाड़ पत्थर भी इन्हें नहीं रोक पाते हैं। कहते हैं कि लूले, लंगड़े, यहां तक कि बिना पैरों वाले भक्त भी बाबा की कृपा से बैसाखी लेकर पूरी यात्रा तय कर लेते हैं। श्रावण मास के प्रथम दिन से मास पर्यन्त लाखों लाख शिवभक्त कांवरिया गेरूआ वस्त्र धारण कर, 105 किमी. दूर सुल्तानगंज में उत्तर वाहिनी गंगा से पावन जल लेकर देवघर तक दुर्गम पदयात्रा करते हैं और देवाधिदेव महादेव को जल अर्पण कर उनका आशीष ग्रहण करते हैं। यात्रा मार्ग के दर्शनीय पुण्य स्थल बाबा बासुकी नाथ - देवघ्र से 2 किमी. दूर राधा एवं कृष्ण का भव्य मंदिर है। त्रिकुट पहाड़ - देवघर से 24 किमी. पश्चिम में अवस्थित यह स्थान अपने पहाड़ी मंदिर के लिए विख्यात है। मसानजोर डैम - दुमका से 31 कि.मी. दूर मसान जोर मयूराक्षी नदी पर बना एक अति रमणीक डैम है। मलूटी: यह प्राचीनकाल का शिव मंदिर युक्त एक विख्यात पावन स्थल है। तपोवन: देवघर से 12 किमी. पूर्व दिशा में स्थित यह स्थान अपनी गुफा और पहाड़ी मंदिर के लिए सुविख्यात है। वैद्यनाथ मंदिर: ़बाबा वैद्यनाथ का मंदिर विशाल प्रांगण के मध्य है। इस मंदिर के चतुर्दिक सम्प्रति 22 मंदिर हैं। वैद्यनाथ मंदिर के धाम पाश्र्व (उत्तर) में दैत्यनाशिनी दक्षिणकाली की मूर्ति है। दक्षिण पाश्र्व में (दक्षिण) उग्रतारा है जो सन्ध्या देवी नाम से अभिहित है। सम्मुख (पूर्व) में त्रिपुर सुंदरी एवं दुर्गा के विग्रह हैं, जो पार्वती मंदिर के नाम से विख्यात है। पश्चिम में शत्रु मर्दिनी बगलामुखी देवी हैं। इस प्रकार चतुर्दिक शक्ति से मंडित शक्तिपीठ पर विष्णु द्वारा स्थापित यह लिंग वामाचारी एवं दक्षिणाचारी दोनों प्रकार के साधकों के लिए सिद्धिदायक और मनोवांछित फलदायक है। प्रांगण के किनारे से चारों ओर विभिन्न विग्रहों के मंदिर वैद्यनाथ मंदिर की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। ऐसा लगता है मानों सभी देवता हाथ जोड़ वैद्यनाथ की स्तुति कर रहे हैं। मंदिर प्रांगण में प्रवेश हेतु शिव-गंगा से स्नान करके आने से ‘सिंहद्वार’ उत्तरी द्वार है। बाजार एवं स्टेशन से आने पर पूर्व से पूरब दरवाजा तथा पश्चिमी द्वार से मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया जाता है। तीर्थ का पूरा फल तब तक प्राप्त हुआ नहीं माना जाता जब तक कि यात्रीगण वैद्यनाथ लिंग क्षेत्र का परिभ्रमण नहीं कर लेते हैं। इस प्रकार वैद्यनाथ धाम सभी हिंदू भक्तों का परम पुनीत तीर्थ स्थल है। प्रतिवर्ष संपूर्ण श्रावण मास में शिवरात्रि, अनन्त चतुर्दशी, भाद्र पूर्णिमा, और बसंत पंचमी के विशेष अवसरों पर भक्तगण तीस कोस दूर से भगवती भागीरथी का पुण्य जल लाकर वैद्यनाथ शिवजी को अर्पित करते हैं। कैसे पहुंचें: निकटतम रेलवे स्टेशन (देवघर से 8 किमी. की दूरी पर) हावड़ा-दिल्ली मेन लाइन पर। निकटतम एयरपोर्ट-रांची 385 किमी., पटना- 270 कि.मी.। सड़क मार्ग: रांची से देवघर वाया हज़ारी बाग जुआ-चकाई-जसीडीह - (320 किमी.) पटना से देवघर वाया लखीसराय-जमुई-चकाई-जसीडीह (300 कि.मी.) कोलकाता से देवघर वाया रामपुर हाट-दुमका-वासुकीनाथ (400 किमी)।



कांवरिया विशेषांक  आगस्त 2012

फ्यूचर समाचार पत्रिका के कावंरिया विशेषांक में शिव पूजन और कावंर यात्रा की पौराणिकता, पूजाभिषेक यात्रा, कावंर की परंपरा, विदेशों में शिवलिंग पूजा, क्या कहता है चातुर्मास मंथन, कावंरियों का अतिप्रिय वैद्यनाथ धाम, शनि शांति के अचूक उपाय, सर्वोपयोगी कृपा यंत्र, रोजगार प्राप्त करने के उपाय, आदि लेखों को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, विवादित वास्तु, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, लाल किताब, ज्योतिष सामग्री, नंदा देवी राज जात, क्यों होता है अधिकमास, रोग एवं उपाय, श्रीगंगा नवमी, रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी व्रत, धार्मिक क्रिया कलापों का वैज्ञानिक आधार, सम्मोहन, मुहूर्त विचार, पिरामिड एवं वास्तु, सत्यकथा, सर्वोपयोगी कृपा यंत्र, आदि विषयों पर गहन चर्चा की गई है।

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