जब वेदना भी कराह उठी

जब वेदना भी कराह उठी  

कमल के जन्म के अवसर पर सुरेंद्र जी के परिवार में अत्यंत खुशियां मनाई गईं। उसके दादा दादी की खुशी का पारावार न था। सुरेंद्र जी अपने माता-पिता की अकेली संतान थे और आज इतने वर्ष बाद कमल का जन्म हुआ था। सुरेंद्र जी एक उच्च सरकारी पद पर आसीन थे और उनका स्थानांतरण काफी जल्दी-जल्दी होता रहता था। इसलिए कमल को दादा दादी की ममता एवं स्नेह प्राप्त हुआ और उन्हीं के घर उसकी परवरिश हुई। कमल बचपन से ही होनहार और पढ़ने लिखने का शौकीन था। अपने प्रथम प्रयास में ही उसने अपनी सी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। अत्यंत धूमधाम से उसका विवाह माधुरी से किया गया। माधुरी एक संभ्रांत परिवार की सुंदर और सुशील कन्या थी। विवाह के कुछ सालों बाद उनके दो पुत्र हुए और परिवार में अत्यंत खुशियां मनाई गईं। सुरंेद्र जी अपनी जिंदगी से बेहद संतुष्ट थे। बाकी बच्चे भी अच्छी तरह सेटल हो गए थे। उनके घर में कुछ निर्माण का कार्य चल रहा था एक दिन कमल सुबह-सुबह छत पर काम का मुआयना करने गया। बेख्याली कहें या भाग्य का खेल छत, का एक भाग जहां मुंडेर नहीं थी, एकदम से नीचे गिर पड़ा। तुरंत उसे अस्पताल ले जाया गया। कमल पूरे पांच महीने तक बत्रा अस्पताल में कोमा में रहा और उसे जीवित रखने के लिए वेंटीलेटर लगाया गया। उसके मेरुदंड के 6 पाॅइंट पर दबाव के कारण उसकी नाभि का हिस्सा बिल्कुल बेकार हो गया है। मस्तिष्क को कार्य करने में भी लगभग एक वर्ष लगा लेकिन नीचे का पूरा हिस्सा संज्ञाहीन होने से मानो उसकी जिंदगी खत्म हो गई। इस हादसे को बीते 5 वर्ष हो चुके हैं। आज उसका मस्तिष्क पूरी तरह सक्रिय है, वह सोच-समझ सकता है, किंतु उसके शरीर का निचला भाग संज्ञाशून्य है और उसके मलमूत्र पर भी उसका नियंत्रण नहीं है। उसकी इस कठिन घड़ी में उसके माता-पिता, पत्नी और बच्चों को भी उसके साथ बराबर मानसिक तनाव झेलना पड़ा। यदि कमल के जीवन के दृष्टिकोण से सोचें तो उसका जीवन उसे निरर्थक सा लगता है जबकि उसके माता-पिता और पत्नी को यह संतोष है कि वह उनके पास है। लेकिन इसके लिए उन्हें कितने कष्ट, कितनी वेदना सहनी पड़ रही है और कितना संयम रखना पड़ रहा है यह अंदाज लगाना बहुत मुश्किल है। संयम, विवेक, त्याग आदि की शिक्षा लेना तो बहुत सरल है परंतु स्वयं उन्हें लंबे समय तक निभा पाना वास्तव में एक दुष्कर कार्य है। माधुरी ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उसके जीवन में इस तरह की घटना हो सकती है। विवाह के कुछ वर्ष बाद की इस घटना ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था। कमल भी बेवजह अपना गुस्सा उस पर उतारता रहता है। वह खून के आंसू पी कर रह जाती। जहां उसका पति प्रेम एवं कर्तव्य उसे कमल की सेवा करने को प्रेरित करता वहीं मस्तिष्क कुछ और सोचता। एक अंधेरा सन्नाटा मानो उसके जीवन में छा गया था। उसकी व्यथा सुनने के लिए वहां कोई नहीं था। चूंकि माधुरी की सही जन्म तिथि नहीं मिल सकी इसलिए इस दुर्घटना का आकलन हम सुरेंद्र जी, कमल और उसके पुत्र की कुंडलियों से करेंगे। कमल के साथ जो दर्दनाक घटना घटी उसके ज्योतिषीय कारण के अतिरिक्त उसके परिवार के अन्य लोगों की ग्रह दशा भी उसके अनुरूप ही है। आइए सर्वप्रथम उसकी कुंडली पर विचार करते हैं। छठे भाव का संबंध शारीरिक अंगों के हिसाब से नाभि के नीचे के अंगों से भी है। इस भाव का स्वामी मंगल अपनी नीच राशि में स्थित है। साथ ही यह ग्रह इस भाव का कारक भी होता है। दूसरी ओर कुंडली के शुक्र ग्रह के बारहवें एवं सातवें भावों का स्वामी होने से प्रबल मारकेश है। वह भी छठे भाव में स्थित है। 14 मई 2001 को उसके साथ जब यह घटना घटी, उस पर शनि की महादशा चल रही थी। शनि ग्रह 29 अंश पर तथा मंगल के नक्षत्र में होने से कमजोर है। यह घटना ठीक उस समय घटी जब शनि में शनि की अंतर्दशा एवं शुक्र की प्रत्यंतर दशा चल रही थी। उसके पिता की कुंडली में उस समय शनि में सूर्य की अंतर्दशा चल रही थी। उनकी कुंडली में शनि ग्रह तृतीय भाव में अस्त है, साथ ही अष्टमेश सूर्य के साथ युत होने से अशुभ हो रहा है। इस शनि की संतान भाव पंचम स्थान पर पूर्ण दृष्टि पड़ रही है। लग्न गोचर में उस समय सूर्य एवं शनि चलित गोचर के अनुसार वृष राशि अर्थात उनके संतान भाव से गुजर रहे थे जिसके फलस्वरूप उनका संतान पक्ष सुखमय नहीं रहा। इसके अतिरिक्त सप्तमांश कुंडली में, जिससे संतान सुख का विशेष विचार किया जाता है, लग्नेश ग्रह सूर्य भी अष्टम स्थान में स्थित है, अतः संतान को भयंकर कष्ट हुआ। उसके बड़े पुत्र की कुंडली के अनुसार पितृ स्थान का स्वामी शुक्र ग्रह केंद्राधिपत्य दोष से युक्त है एवं शुक्र पर व्ययेश चंद्रमा की दृष्टि भी पड़ रही है, जिससे पितृ सुख की कमी एवं पिता की ओर से दुख होने का योग बन रहा है। उसकी कुंडली में भी इस घटना के समय पितृ स्थान में चलित गोचर के अनुसार शनि एवं सूर्य की अशुभ युति बन रही थी जिसके फलस्वरूप उसे अपने पिता की ओर से दुखी होना पड़ा। कमल को इस कष्ट से मुक्ति दिलाने में सहायक पाठकों के विचार अथवा उपाय आमंत्रित हैं।


रुद्राक्ष एवं सन्तान गोपाल विशेषांक  मई 2006

ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रु कणों से हुई है। ज्योतिष में प्रचलित अनेक उपायों में से रुद्राक्ष का उपयोग ग्रहों की नकारात्मकता एवं इनके दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है ताकि पीड़ा को कमतर किया जा सके। अनेक प्रकार के रुद्राक्षों को या तो गले में या बांह में धारण किया जाता है। रुद्राक्ष अनेक प्रकार के होते हैं। इनमें से अधिकांश रुद्राक्षों का नामकरण उनके मुख के आधार पर किया गया है जैसे एक मुखी, दो मुखी, तीन मुखी इत्यादि। इस विशेषांक में रुद्राक्ष के अतिरिक्त सन्तान पर भी चर्चा की गई है। इस विशेषांक के विषय दोनों है। इसमें रुद्राक्ष एवं संतान दोनों के ऊपर अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मिलित किया गया है जैसे: रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं महत्व, अनेक रोगों में कारगर है रुद्राक्ष, सन्तान प्राप्ति के योग, कैसे जानें कि सन्तान कितनी होंगी, लड़का होगा या लड़की जानिए स्वर साधना से, सन्तान बाधा निवारण के ज्योतिषीय उपाय, इच्छित सन्तान प्राप्ति के सुगम उपाय, सन्तान प्राप्ति के तान्त्रिक उपाय आदि। इन आलेखों के अतिरिक्त दूसरे भी अनेक महत्वपूर्ण आलेख अन्य विषयों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व की भांति स्थायी स्तम्भ भी संलग्न हैं।

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