होनी बड़ी बलवान

होनी बड़ी बलवान  

व्यूस : 2722 | सितम्बर 2006

हमारे समक्ष अनेक ऐसी कुंडलियां आती हैं जिनमें कुछ हमें काफी प्रभावित करती हैं और अक्सर हम उनके बारे में काफी कुछ सोचने को विवश भी हो जाते हैं। कुछ लोगों की कुंडलियां ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर मन व्यथित हो जाता है और हम सोचने को विवश हो जाते हैं कि विधाता ने उनकी ग्रह स्थिति ऐसी क्यों बनाई। लेकिन हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि होनी को कोई नहीं टाल सकता।

अक्सर लोग कहते हैं कि ज्योतिषियों का तो ग्रह कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते, क्योंकि उन्हें सब कुछ पहले से ही मालूम होता है। लेकिन यथार्थतः ऐसा नहीं होता। ग्रह चाल का प्रभाव सभी पर पड़ता है। हां ज्योतिष हमें उस प्रभाव को स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर देता है और जिस तरह वर्षा की संभावना होने पर हम अपने साथ छाता रखते हैं ताकि वर्षा से बच सकें, उसी तरह ज्योतीषीय उपाय अर्थात मंत्र, यंत्र एवं साधना द्वारा स्वयं को संतुलित रखते हुए भविष्य में होने वाली घटनाओं के प्रति सजग और उनके अनुकूल स्वयं को ढालने को तत्पर हो जाते हैं।

फलतः उनका प्रतिकूल प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम कष्टदायक लगता है। लेकिन हर व्यक्ति को काल चक्र की घटनाओं को झेलना ही पड़ता है और कई बार ग्रह चाल के अनुरूप हम न चाहते हुए भी अवांछित कार्य करने को विवश हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ योगेश के साथ हुआ। योगेश बचपन से ही तेज-तरार्र एवं साहसी था। उसे अपने दोस्तों के साथ मटरगश्ती करना बहुत अच्छा लगता और अधिक से अधिक समय वह उन्हीं के साथ व्यतीत करता। अपनी इस दिनचर्या में माता-पिता का हस्तक्षेप वह बिल्कुल पसंद नहीं करता।

अपने काॅलेज के चुनाव में उसने अपने एक दोस्त का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया और उसके प्रचार अभियान में रात दिन एक कर दिया। इस क्रम में उसे खाने पीने की सुध भी न रही। वह और उसके दोस्त बस हर कीमत पर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। परंतु दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का दबदबा भी कम नहीं था और उसका भी विद्यार्थी वर्ग पर अच्छा खासा प्रभाव था।

दोना उम्मीदवारों की टोलियों में आए दिन तूतू मैंमैं होती रहती और दोनों ही अपनी जीत के लिए कुछ न कुछ नया करने की फिराक में रहते। एक दिन योगेश को पता चला कि विरोधी पार्टी का एक लड़का उनकी पार्टी के कुछ लड़कों को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। यह सुन कर उसे बहुत गुस्सा आया और वह अपने दोस्त हमीद के साथ फौरन उस लड़के के पास पहुंचा। उस लड़के से काफी कहा सुनी हुई और उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया। परंतु अगले दिन फिर उन्हें पता चला कि विरोधी पार्टी के लोग उनके विश्वस्त लोगों के खिलाफ कोई गंभीर मामला लेकर प्राचार्य के पास जा रहे हैं।


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हमीद का खून खौल उठा और वह विकेट बैट लेकर फौरन उनके पास पहुंचा। पहले काफी बक झक होती रही, लेकिन फिर नौबत मार-पीट की आ गई और हमीद ने जोर से बैट से विरोधी पार्टी के एक लड़के के सिर पर प्रहार कर दिया जिससे उसका सिर फट गया और उसकी वहीं पर मृत्यु हो गई। नवयुवकों को काटो तो खून नहीं। पुलिस के आने पर योगेश ने बिना सोचे समझे हमीद को बचाते हुए बैट से मारने का इल्जाम अपने ऊपर ले लिया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इल्जाम अपने ऊपर लेते हुए योगेश ने शायद इसका परिणाम नहीं सोचा था।

उसके ऊपर धारा 302 का मुकदमा चला जिसमें परिवार की सारी संपत्ति बिक गई। करीब 4 साल तक मुकदमा चला और 4 साल बाद अत्यंत मशक्कत के बाद, जब घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी, योगेश को जेल से मुक्ति मिली। जेल में टीना ने, जो उसकी बचपन की सहपाठी थी, बहुत मदद की। टीना अपनी पढ़ाई पूरी कर वकील बन गई थी। उसने उसे जेल से बरी कराने में पूरा सहयोग दिया और जेल से छूटने के बाद परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ योगेश ने टीना के साथ अंतर्जातीय विवाह किया।

योगेश को जेल से तो मुक्ति मिल गई, पर परिवार का सुख नहीं मिला। वह टीना के साथ परिवार से अलग हो गया। कुछ ही साल में उसके माता पिता का देहांत हो गया और आर्थिक रूप से भी वह काफी परेशान रहा। जिस दोस्त की खातिर वह जेल गया, उसने कभी भी उसकी खैर खबर नहीं पूछी और न ही कभी उसकी मदद की। इसे किस्मत का खेल ही कहेंगे कि उसके ऊपर ऐसे कत्ल का इल्जाम लगा जो उसने किया ही नहीं था।

योगेश की कुंडली में ग्रहों की स्थिति से आइए देखें कि उसके जीवन में यह घटना क्यों घटित हुई। उसकी कुंडली में पराक्रम स्थान में स्वराशि का राहु तथा इस स्थान का कारक एवं साहस का प्रतीक ग्रह मंगल लाभ स्थान में स्थित है। फलतः योगेश बचपन से निडर एवं साहसी था। मित्रों का विचार ग्यारहवें भाव से किया जाता है। इस भाव का स्वामी शुक्र अपनी उच्च राशि में स्थित है और चूंकि मंगल शुक्र की राशि में है इसलिए उसमें अपने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने, इधर उधर दादागिरी करने जैसी प्रवृत्ति उत्पन्न हुई। सर्वार्थ चिंतामणि के अध्याय 7 श्लोक 45 में कहा गया हैः

दानाधिपेन संदृष्टे लग्ने तन्नाय केपि वा। तस्मिन्केन्द्र त्रिकोणस्थे महादान करो भवेत।। अर्थात लग्न पर नवमेश बृहस्पति की नवम दृष्टि होने से एवं लग्नेश के त्रिकोण में स्थित होने से महादानी योग बनता है। कुंडली में बृहस्पति की मित्र स्थान पर पूर्ण दृष्टि है, जिसके कारण योगेश ने अपने मित्र के लिए अपने जीवन के बहुमूल्य 4 वर्षों की आहुति दे दी। अष्टम भाव का सूर्य शत्रु शनि की राशि में शनि की दृष्टि में राहु से षडाष्टक होकर स्थित है, इसलिए राहु की महादशा में योगेश को बंधक दोष मिला।


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मन का कारक चंद्रमा सप्तम भाव में दोनों ओर से शनि एवं सूर्य से घिरा होने के कारण पापकर्तरी योग बना रहा है, इसलिए योगेश ने बिना सोचे समझे इतना बड़ा निर्णय ले लिया। सप्तम भाव के स्वामी चंद्रमा की पंचम भाव में स्थिति प्रेम विवाह को भी दर्शा रही है। कलत्र कारक शुक्र भाग्य स्थान में उच्च का होकर स्थित है, जिससे विवाह के पश्चात पत्नी के भाग्य का लाभ मिला।

ग्यारहवें भाव के स्वामी शुक्र की नीच ग्रह बुध एवं पाप ग्रह केतु के साथ युति तथा पाप ग्रह राहु की दृष्टि शुक्र पर होने के कारण उस दोस्त ने योगेश का कभी साथ नहीं दिया और न ही कोई संबंध रखा। कुटुंब स्थान के स्वामी सूर्य का अष्टम भाव में होना धन एवं कुटुंब तथा पिता के सुख के लिए अशुभ है। साथ ही माता का कारक चंद्रमा भी पाप प्रभाव में होने के कारण मातृ और पितृ सुख, कौटुंबिक हानि तथा आर्थिक परेशानी के योग बना रहा है।

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पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  सितम्बर 2006

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