व्यक्ति की कुंडली उसके जीवन का प्राकृतिक प्रतिबिंब होती है। इसके विश्लेषण से उसके जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि उसकी शिक्षा कैसी होगी, वह व्यापार करेगा या नौकरी या फिर कोई अन्य काम, उसके मित्र कैसे होंगे, परिवार के सदस्यों के साथ उसके संबंध सौहार्दपूर्ण रहेंगे या कटुतापूर्ण आदि। यहां प्रस्तुत है कुंडली के उस पक्ष का विश्लेषण जिसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि जातक का विदेश यात्रा योग है या नहीं। जातक के लग्न में कोई चर अर्थात मेष, कर्क, तुला या मकर होने पर उसकी क्रियाशीलता के कारण उसकी प्रवृत्ति भ्रमणशील होती है और वह अपने जन्म स्थान से दूर परदेश या विदेश में जाकर जीवन यापन करता है। इसके विपरीत लग्न में स्थिर राशि होने पर वह जन्म स्थान पर ही रहना व कार्य करना पसंद करता है। किंतु द्विस्वभाव राशि हो, तो उसमें मिश्रित प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार विदेश यात्रा का फलकथन करते समय लग्न, लग्नेश एवं लग्नस्थ ग्रहों की प्रकृति के साथ साथ तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम, अष्टम तथा द्वादश भावों का सही विश्लेषण एवं अध्ययन करना चाहिए। लग्न: यदि लग्न में कोई चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो और वह पूर्ण अंश की हो, तो जातक की विदेश यात्रा की प्रबल संभावना रहती है। लग्न आत्मबल व आत्मविश्वास का कारक है और चर राशि क्रियाशीलता की कारक होती है। जब लग्न में चर राशि हो, तो केंद्र और सप्तम भाव में भी चर राशियां होंगी। तृतीय भाव: भाव 3 से विदेश की छोटी-छोटी यात्राओं का अनुमान लगाया जाता है। यह भाव पराक्रम, साहस, उद्यम, लघु यात्रा, व्यापार तथा आजीविका का कारक है। भाव 3 व 7 में स्थित ग्रह नवम पंचम योग बनाते हैं, जो विदेश यात्रा का शुभ योग होता है। चतुर्थेश की स्थिति के आकलन से भी विदेश यात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है। पंचम भाव: पंचम व नवम भावों का एक दूसरे से गहरा संबंध होता है नवम-पंचम योग शुभ कारक होता है। इस योग के जातक की विदेश जाने की प्रबल इच्छा होती है। यह भाव कल्पना शक्ति का द्योतक भी है। कल्पना शक्ति जातक की इच्छा शक्ति में वृद्धि करती है। सप्तम भाव: भाव 7 दैनिक व्यवसाय, व्यापार, उद्योग, वाणिज्य, पत्नी, पर्यटन व यात्रा के साथ-साथ कामुकता तथा रोमांस व स्त्री वर्ग का कारक है। यह भाव जातक में विदेश जाकर व्यवसाय, धन लाभ, पर्यटन, रोमांस की इच्छा जाग्रत करता है। साथ ही इस भाव का लग्न से सीधा दृष्टि एवं सम स्वभाव राशि का संबंध भी होता है। केंद्र भावों में सम स्वभाव की राशियां लग्न, चतुर्थ व सप्तम भाव में होती हैं जो विदेश यात्रा योग को बल देती हैं- यदि इन भावों में चर या द्विस्वभाव राशियां हों। अतः भाव 7 में स्थित राशि और ग्रह की स्थिति से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जातक विदेश में स्थायी रूप से निवास करेगा या अस्थायी रूप से। इसके साथ ही भाव 7 में स्थित ग्रह व राशि दोनों भाव 3 से नवम, पंचम योग तथा भाव 12 से षडाष्टक योग बनाते हैं। भाव 7 का भाव 12 से षडाष्टक योग यह दर्शाता है कि जातक का अपने स्वजनों, परिजनों, मित्रों से वियोग या अलगाव होगा। वह पत्नी तथा बच्चों से भी दूर रहेगा। अष्टम भाव: अष्टम भाव भी विदेश यात्रा योग में विशेष महत्व रखता है। भाव 9 भाव 12 से नवम पंचम योग बनाता है। अष्टम भाव भाग्य स्थान से द्वादश तथा व्यय स्थान से नवम है। इन में स्थित शुभ ग्रह महत्वपूर्ण विदेश यात्रा योग बनाते हैं किंतु अशुभ ग्रह विपरीत योग बनाते हैं जिसके फलस्वरूप जातक को जेल भी जाना पड़ सकता है। नवम भाव: यह भाव प्रारब्ध, वैभव, भाग्य वृद्धि, स्वप्नों, लंबी यात्राओं, विदेश यात्राओं तथा स्थान परिवर्तन का कारक है। अतः भाग्य स्थान की विदेश यात्रा योग बनाने में भूमिका अहम होती है। भाव 5 से भाव 9 का तथा लग्न से तीनों भावों का परस्पर नवम पंचम योग विदेश यात्रा के लिए शुभकारक होता है। द्वादश भाव: भाव 12 वियोग, दुख, व्यय, निवेश, विदेश, आदि का कारक है जिस कारण जातक का अपने परिवार, मित्रों, समाज, जन्म स्थान, मातृभूमि से संबंध विच्छेद होता है। जातक विरह की अग्नि में जलता रहता है किंतु धन की उसकी लालसा तीव्र होती है और धन कमाता भी है तथा बचत भी करता है। यह भाव रोमांस व मनोरंजन का कारक भी है। इस भाव में विदेश यात्रा योग का विश्लेषण इस प्रकार है: Û यदि चतुर्थेश द्वादश भाव में स्थित हो, तो भाव 4 व भाव 12 का परस्पर नवम-पंचम योग विदेश यात्रा कराता है। जातक स्थायी रूप से विदेश में वास करता है। Û यदि सूर्य अष्टमस्थ हो, तो उसका भाव 12 से नवम पंचम योग होगा तथा वह भाव 9 से द्वादश होगा। अतः जातक अनेक विदेश यात्राएं करेगा। सूर्य की भाव 2 पर दृष्टि जातक को कुटुंब से दूर करेगी। Û यदि सूर्य सप्तम भावस्थ हो और चर राशि में हो तथा बुध, गुरु, शुक्र द्वितीय भावस्थ हों, तो जातक उम्र भर विदेश में जीविकोपार्जन करता है। सूर्य एक अलगाववादी ग्रह भी है, वह वितृष्ण पैदा कर जातक को पत्नी से दूर करता है। वह भाव 2 से षडाष्टक योग बनाता है। Û यदि लग्नेश भाग्यस्थ हो या चतुर्थेश त्रिक भाव 6, 8 अथवा 12 में स्थित हो, तो जातक विदेश यात्राएं करता रहता है। यदि भाग्येश लग्नस्थ हो या चतुर्थेश का अष्टमेश या द्वादशेश से युति, दृष्टि या नव पंचम योग बनाता हो, तो जातक विदेश यात्रा से धन लाभ प्राप्त करता है। Û यदि गृरु षष्ठम भावस्थ हो, तो जातक विदेश में स्थायी रूप से निवास करता है। गुरु का लग्न से षडाष्टक योग तथा भाव 12 पर सप्तम दृष्टि हो, तो विदेश यात्रा होगी। Û यदि गोचर में राहु लग्न या भाव 12 अथवा भाव 10 में आ जाए और अन्य ग्रह व भाव भी अनुकूल हों, तो जातक का अकस्मात विदेश यात्रा योग बन जाता है। ऐसा जातक तस्करी भी कर सकता है। Û यदि कर्मेश द्वादश भावस्थ हो, तो विदेश यात्रा का योग बनता है। यदि भाग्येश लग्नस्थ हो तथा चतुर्थेश का अष्टमेश या द्वादशेश से संबंध बने, तो विदेश यात्रा अवश्य होगी। Û यदि लग्नेश तथा द्वादश भाव का संबंध हो जैसे परिवर्तन योग या दोनों में शनि की सम राशि कुंभ व मकर या भाव 12 पर लग्नेश की दृष्टि हो या लग्नेश व द्वादशेश की चर राशि में युति हो, तो जातक विदेश तो जाता है परंतु उसकी मान हानि, तिरस्कार या जेल यात्रा का योग भी बनता है।


ज्योतिष योग और फलादेश तकनीक विशेषांक  अप्रैल 2007

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.