अंजीर को लैटिन में ficus-carica कहते हैं और अंग्रेजी में "FIG" । अंजीर के वृक्ष गर्म प्रदेशों में पाये जाते हैं। मूल उत्पत्ति एशिया से मानी जाती है। अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, कश्मीर व पूना में अधिक पैदा होते हैं। अंजीर पीपल व बरगद की ही परिवार का है। जिस जमीन में चूना का अंश अधिक होता है वहां अंजीर की पैदावार अधिक व अच्छी होती है। इसके वृक्ष की उंचाई 10 से 15 फुट, पत्ते गोल, बड़े व कटे किनारे वाले होते हैं। पत्ते तोड़ने से दूध निकलता है जो आंखों की मोतियाबिंद के लिए अच्छा होता है। अंजीर के वृक्ष पर वर्ष में दो बार फल आते हैं। एक बार जून-जुलाई और दूसरी बार फरवरी-मार्च में फल आता है। विदेशों से माला जैसी गूंथी अंजीर भारत में आती है। भारत में महाराष्ट्र में पूना, कर्नाटक में श्रीरंगपट्टनम, उत्तर प्रदेश में लखनऊ, कश्मीर, बंगलूर तथा मैसूर, गुजरात के कुछ हिस्सों में इसके पौधे लगाए जाते हैं। पौधे लगाने के दो वर्ष बाद फल आते हैं। पोषक तत्व: अंजीर में नमी, प्रोटीन, चिकनाई और कार्बोहाईड्रेट्स तत्व होते हैं। कैल्शियम, फाॅस्फोरस, लोहा, खनिज और विटामिन ‘ए’ ‘बी’ ‘सी’ काफी मात्रा में पाए जाते हैं। सूखी अंजीर में पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व शर्करा है। अंजीर को कई तरीकों से खाया जाता है। गुण-धर्म: अंजीर में कई रोग निवारक गुण हैं। हृदय रोगों में उपयोगी, शिरो रोगों में पथ्यकर, नाक से खून गिरना बंद करता है। शीतल है, वातकारक है। सूखे अंजीर में मधुमेह व श्वास रोग नाशक गुण हैं। अंजीर सभी सूखे मेवों से अधिक लाभदायक है, कांतिदायक है। बलगम (कफ) को पिघलाता व बाहर निकालता है। पुरानी खांसी में लाभदायक है, ज्वर नाशक है। पथरी, लकवा, प्यास व जिगर के रोगों को ठीक करता है। शारीरिक, मानसिक तनाव दूर कर शरीर को स्फूर्ति और शक्ति प्रदान करता है। आयुर्वेदिक उपयोग व उपचार - रक्त शुद्धि: सूखी अंजीर और बादाम दूध में उबालकर शर्क मिलाकर नित्य प्रातः खाने से रक्त शुद्धि होती है। - बवासीर: दो अंजीर पानी में भीगो दें और रोजाना सुबह खाएं। साथ में पानी भी पी जाएं बवासीर की शिकायत दूर हो जाएगी। - रात को भीगी हुई अंजीर का पानी सुबह और सुबह भीगी हुई अंजीर का पानी शाम को पीना चाहिए। दमा: दमा के इलाज में अंजीर लाभदायक सिद्ध हुई है। इसके सेवन से कफ बाहर आता है और रोगी को आराम मिलता है। जुकाम खांसी में भी अंजीर लाभदायक है। नपुंसकता: अंजीर को दूध में उबालकर खाने-पीने से शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। नपुंसकता दूर होती है। यह एक उत्तम टाॅनिक है। स्त्रियों के लिए: जो स्त्रियां गर्भवती हैं तथा जो गर्भ धारण करना चाहती हैं उन्हें अंजीर का किसी भी रूप में सेवन करना चाहिए। अपच: अंजीर को खाने से स्थायी कब्ज दूर होती है। सूखी अंजीर कब्ज में लाभकारी है क्योंकि इसमें म्यूसिन की मात्रा अधिक होती है। सूखी अंजीर रातभर पानी में भिगोएं तथा सुबह नाश्ते में इसका सेवन करें। इसके सेवन से मल साफ हो जाता है। अंजीर के छोटे-छोटे बीज पाचन शक्ति बढ़ाते हैं। दुबलापन: चालीस दिन तक पांच अंजीर, दस ग्राम सौंफ के साथ कूटकर मिला कर सुबह खाने से दुबलापन दूर होता है और शरीर भरने लगता है। मोतियाबिंद: अंजीर का दूध आंखों में डालने से मोतियाबिंद रोग ठीक होने लगती है। कील-मुंहासे: अंजीर का दूध मुंहासों पर लगाने से मुंहासे बैठ जाते हैं। इसके साथ अंजीर खाने से रक्त शुद्ध होता है और मुंहासे ठीक हो जाते हैं। रक्त की कमी: अंजीर का सेवन प्रतिदिन करें पानी में भिगो कर या सूखी किसी भी रूप में, सुबह नाश्ते के साथ या शाम खाली पेट, इससे रक्त की कमी दूर होती है नवीन रक्त की उत्पत्ति होती है। गले के रोग: अंजीर का काढ़ा बनाकर गरारे कर सकते हैं या घूंट-घंूट करके पीने से गले का दर्द, खराश आदि ठीक हो जाते हैं। सफेद दाग: अंजीर का दूध सफेद दागों पर लगाने से सफेद दाग ठीक हो जाते हैं और त्वचा में कुदरती रंगत आती है। अंजीर के दूसरे उपयोग: अंजीर का लोग कई प्रकार से सेवन करते हैं। कुछ लोग फलों के साथ अंजीर खाते हैं तो दूसरे लोग दूध के साथ। अंजीर को केक और जैम में भी प्रयोग किया जाता है। कुछ लोग हलवे में भी अंजीर के टुकड़े डालते हैं। सावधानियां: अंजीर को खाने से पहले अच्छी तरह धो लेना चाहिए। अंजीर का सूखा हुआ छिलका सख्त होता है। पानी में भिगोने से मुलायम हो जाता है आसानी से पच जाता है। जिस पानी में अंजीर भिगोए जाएं उस पानी को पीना लाभदायक होता है क्योंकि अंजीर के पोषक तत्व पानी में आ जाते हैं। इसे बेकार समझ कर फेंकें नहीं। मधुमेह रोगी को सूखी अंजीर के सेवन से बचना चाहिए, हमेशा अंजीर को भिगोकर खाने से लाभ होगा।


वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2014

फ्यूचर समाचार के वास्तु विषेषांक में अनेक रोचक व ज्ञानवर्धक लेख जैसे भवन और वास्तु, वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप, वास्तु शास्त्र के मूलभूत तत्व, वास्तु शास्त्र व दाम्पत्य जीवन, उद्योग धन्धे क्यों बन्द हो जाते हैं?, फ्लैट/प्लाॅट खरीदने हेतु वास्तु तथ्य, अनुभूत प्रयोग एवं सूत्र, वास्तु सम्मत सीढ़ियां भी देती हैं सफलता, घर में क्या न करें?, विभिन्न दिषाओं में रसोईघर, वास्तुदोष समाधान, वास्तु संबंधी कहावतें, वास्तु दोष दूर करने के सरल उपाय, पंचतत्व का महत्व तथा स्वास्थ्य संबंधी वास्तु टिप्स। इसके अतिरिक्त वास्तु पर हुए एक शोध कार्य पर लिखा गया सम्पादकीय, करियर परिचर्चा, सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार: शादी के सात वचन, सत्य कथा, हैल्थ कैप्सूल, पावन स्थल में बांसवाड़ा का प्राचीन मां त्रिपुरासुन्दरी मन्दिर, ज्योतिष व महिलाएं तथा ग्रह स्थिति एवं व्यापार, पंचपक्षी के रहस्य, मंत्र व तंत्र साधना का स्वरूप, कर्णबेधन संस्कार, गृह सज्जा एवं वास्तु फेंगसुई आदि लेखों को समायोजित किया गया है।स्थायी स्तम्भ विचार गोष्ठी के अन्तर्गत ‘पिरामिड का वास्तु में प्रयोग’ विषय पर विभिन्न विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। आषा है फ्यूचर समाचार के पाठकों को यह विषेषांक विषेष पसंद आयेगा।

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