अष्टम भावस्थ शनि और मृत्यु

अष्टम भावस्थ शनि और मृत्यु  

अष्टम भाव रहस्यमय है और इसके कुछ कारकत्व भी रहस्य से जुड़े हैं। शनि तो रहस्यमय है ही। अष्टम भाव का कारक भी शनि ही है। अष्टम भाव में ही 22वां द्रेष्काण होता है। शनि यदि अष्टम भावस्थ हो तो उसकी दृष्टियां दशम, द्वितीय व पंचम भावों पर रहती हैं। अतः व्यवसाय व उसके कार्य क्षेत्र, शिक्षा, धन, मृत्यु तथा संतान आदि का ज्योतिषीय विश्लेषण करते समय अष्टमस्थ शनि की स्थिति, युति, दृष्टि व स्वामित्व के अनुसार शुभ-अशुभ का विश्लेषण करना चाहिए। अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि का भी इन्हीं आधारों पर अध्ययन करना चाहिए। मृत्यु भाव अष्टम भाव में शनि की उपस्थिति को ज्योतिर्विदों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से देखा व परखा है। अष्टम भाव देह नाश का भाव है और शनि यम का भाई और मृत्यु का कारक है। ऐसे में स्वाभाविक है कि दो दारुण गुणों की युति अत्यंत दुःखद परिणाम देगी। शास्त्रीय ज्योतिष में किसी भी आचार्य ने अष्टमस्थ शनि को शुभ नहीं माना है। परंतु इसके विपरीत यह भी तो कहा जा सकता है कि पापत्व लिए शनि जब अशुभ अष्टम भाव में स्थित होकर उसे पीड़ित करे तो अष्टम भाव के अशुभत्व का नाश होगा। अष्टम भाव जातक की मृत्यु का भाव होता है, पति या पत्नी का मारक स्थान होता है, पिता (नवम भाव) का द्वादश भाव (क्षय, व्यय) होता है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अष्टमस्थ शनि का मृत्यु से संबंध जानने के लिए निम्न कुंडलियों का ज्योतिषीय अध्ययन किया गया है: कुंडली -1 जन्म दिवस: 14.12.57, समय: 15ः02ः37, स्थान: दिल्ली जातक का जन्म मेष लग्न में हुआ है। अष्टम भाव में पितृकारक सूर्य, शनि तथा लग्नेश मंगल की युति है। मंगल का नक्षत्रेश बृहस्पति तथा सूर्य और शनि का नक्षत्रेश बुध है। जातक के पिता की मृत्यु 2003 में बृ.-बु. की दशा में हुई। पिता का कारकत्व नवम भाव से देखते हैं। नवमेश बृहस्पति है और बुध उसमें बैठा है। मंगल व शनि (नक्षत्रेश बृहस्पति व बुध) संयुक्त रूप से पिता के कारक सूर्य को पीड़ित कर रहे हैं। नवम भाव से दूसरा भाव दशम है और इसका स्वामी शनि पिता के लिए मारकेश हो जाता है। नवम से सप्तम भाव का स्वामी बुध और अष्टम भाव का स्वामी चंद्र है। अतः ये भी पिता के लिए मारकेश बन जाते हैं। चंद्र षष्ठ भाव में बुध की राशि में स्थित है। मारकेश शनि पितृ भाव से (नवम भाव) द्वादश भाव में है। बृहस्पति का नक्षत्रेश शनि के साथ है; बुध का नक्षत्रेश शुक्र नवम से दूसरे भाव में शनि की राशि में है। बृहस्पति सप्तम भाव में राहु से पीड़ित है। पिता के मारक स्थानों पर कोई शुभ दृष्टि नहीं है। पिता की मृत्यु के समय शनि का गोचर बुध की मिथुन राशि पर नवम से सप्तम भाव (पिता का मारक स्थान) पर था। कुंडली -2 जन्म दिवस: 30.7.1956, समय: 23ः08, स्थान: मछलीपट्टनम जातक मेष लग्न में जन्मा है। पिता के लिये नवम भाव देखते हैं जिसका स्वामी बृहस्पति है जो पंचम भाव में सिंह राशि में स्थित है। बृहस्पति पर मंगल की एकादश भाव से तथा शनि की अष्टम भाव से दृष्टि है जिससे इसकी शुभता नष्ट हो रही है। शनि-मंगल में राशि परिवर्तन है और ये दोनों बृहस्पति के नक्षत्र में हैं। पिता का कारक सूर्य चतुर्थ भाव में बुध के साथ युति में है और इस पर कोई शुभ दृष्टि नहीं है। चतुर्थ भाव नवम से आठवां है, अतः मारक भाव है। चतुर्थेश चंद्र है। नवम से द्वितीय भाव का स्वामी (दशमेश) शनि है जो अष्टम भाव में राहु के साथ स्थित है। अष्टमेश मंगल है। नवम भाव से सप्तमेश (तृतीयेश) बुध है जो चतुर्थ भाव में स्थित है। जातक के पिता की मृत्यु चं-श-श की दशा में 1.1.1987 को हुई। चंद्र नवम भाव से अष्टमेश है अतः मारकेश है। शनि नवम से द्वितीय भाव का स्वामी (दशमेश) होकर नवम भाव से द्वादश (अष्टम) में स्थित है, इसलिए क्षय कारक तथा मारक बन गया है। पिता की मृत्यु के समय चंद्र गोचर में नवम भाव पर तथा शनि अष्टम भाव पर था। कुंडली-3 जन्म दिवस 23.12.1989, समय: 15.20, स्थान: दिल्ली जातक का जन्म लग्न वृष है जिसका स्वामी शुक्र नवम भाव में शनि की राशि मकर में राहु से पीड़ित है। नवम भाव से ही पिता का लग्न लेते हैं। नवमेश शनि अष्टम भाव (नवम से द्वादश भाव) में सूर्य तथा बुध के साथ धनु राशि में स्थित है। नवम तथा अष्टम भाव पर कोई शुभ दृष्टि नहीं है। नवम भाव से सप्तमेश चंद्र है और अष्टमेश सूर्य है। चंद्र षष्ठ भाव में तथा सूर्य अष्टम भाव में बुध व शनि के साथ है। नवम भाव राहु-केतु अक्ष पर है। जातक के पिता की मृत्यु बृ-बु-श की दशा में हुई। बृहस्पति अष्टमेश होकर द्वितीय भाव में मिथुन राशि में है जिसका स्वामी बुध अष्टम भाव में शनि व सूर्य से पीड़ित है। बृहस्पति पर भी सूर्य व शनि की सीधी दृष्टि है। बुध व बृहस्पति राशि परिवर्तन योग में हैं और दोनों ही पीड़ित हैं। बुध नवम भाव के लिए षष्ठेश होकर नवम से द्वादश भाव में स्थित है। बृहस्पति नवम भाव से तृतीय तथा द्वादश भाव का स्वामी होकर नवम भाव से षष्ठ भाव में है। शनि नवमेश तथा नवमेश से दूसरे भाव का स्वामी हेाकर मारकेश बना और नवम से द्वादश भाव में बैठकर मुक्ति का प्रतीक हुआ। बृहस्पति का नक्षत्रेश राहु तथा शनि का नक्षत्रेश शुक्र दोनों नवम भाव में हैं और बुध का नक्षत्रेश सूर्य अष्टम भाव में सूर्य और शनि की युति में है। कुंडली-4 जन्म दिवस: 30.1.1882, समय 20.45, स्थान: हर्टले जातक का जन्म कन्या लग्न में हुआ। लग्नेश बुध षष्ठ भाव में शनि की राशि कुंभ में है जो जातक की शारीरिक अस्वस्थता दर्शाती है। लग्न पर मंगल की दृष्टि है। जातक का नवम भाव राहु-केतु अक्ष पर है और नवमेश शुक्र सूर्य के साथ पंचम भाव में मकर राशि में है जिस पर शनि की अष्टम भाव से दृष्टि है। अष्टम भाव में शनि नीच है और बृहस्पति के साथ युत है। नवम भाव से द्वितीयेश बुध षष्ठ भाव में है। नवम से सप्तमेश मंगल दशम भाव में है जो नवम का द्वितीय भाव है। नवम से अष्टमेश शनि अष्टम भाव में नीचस्थ होकर बृहस्पति के साथ है। जातक के पिता की मृत्यु बृ-शु दशा में हुई। बृहस्पति चतुर्थेश तथा सप्तमेश है, अतः दुहरे केंद्राधिपति दोष से युक्त है। बृहस्पति नवम भाव के व्यय स्थान अष्टम भाव में नीच शनि के साथ है। शुक्र नवमेश व द्वितीयेश होकर पंचम भाव में सूर्य से मकर राशि में युत है। अष्टमस्थ नीच शनि की दृष्टि दशम भाव पर है जो पिता का मारक स्थान है। उसकी पंचम भाव पर भी है जहां पितृकारक सूर्य बैठा है। दशम भाव से मंगल की दृष्टि चतुर्थ भाव पर है जो पिता के नवम भाव से अष्टम होने के कारण मारक स्थान है। मंगल की दृष्टि पंचम भाव में स्थित पिता के कारक सूर्य पर है। जातक की मृत्यु केतु-राहु-बृहस्पति की दशा में हुई। केतु नवम भाव में बृष राशि में है जिसका स्वामी शुक्र अष्टमस्थ नीच शनि की राशि में पंचम भाव में सूर्य से पीड़ित है। इस पर नीच शनि व मंगल (अष्टमेश तथा तृतीयेश) की दृष्टि है। शुक्र द्वितीयेश होने के कारण मारकत्व प्राप्त कर रहा है। जातक की कुंडली में राहु अष्टम से अष्टम (तृतीय) भाव में है अतः मारकत्व रखता है। बृहस्पति सप्तमेश-मारकेश होकर अष्टम भाव में नीच शनि से युत है। कुंडली -5 जन्म दिवस: 6.3.78, समय: 5.35, स्थान: मेरठ जातक का जन्म लग्न मकर है जिसपर षष्ठ भाव से मंगल की दृष्टि है और लग्नेश शनि वक्री होकर अष्टम भाव में सिंह राशि में स्थित है। इसपर द्वितीय भाव से सूर्य की दृष्टि है। कोई शुभ दृष्टि नहीं है। नवम भाव कन्या राशि है जहां राहु स्थित है और इसका स्वामी बुध सूर्य से पीड़ित होकर कुंभ राशि में द्वितीय भाव में स्थित है और अष्टमस्थ शनि से दृष्ट है। शुक्र (दशमेश), बृहस्पति (तृतीयेश) और मंगल (चतुर्थेश) नवम भाव के मारकेश हैं। शुक्र तृतीय भाव में केतु से युत है; बृहस्पति द्वादशेश व तृतीयेश होकर षष्ठ भाव में मंगल से युत है, और एकादशेश मंगल षष्ठ भाव में है। जातक के पिता की मृत्यु रा-रा-शु दशा में हुई। नवम भाव राहु-केतु अक्ष पर है और राहु इसमें स्थित है। राहु पर षष्ठ भाव से मंगल की दृष्टि है। मंगल नवम भाव से तृतीयेश भी है। पिता के लिए मारकेश शुक्र मारक स्थान नवम से सप्तम भाव में केतु के साथ स्थित है। शुक्र का नक्षत्रेश बृहस्पति है जो शुक्र स्थित राशि का स्वामी है। पितृकारक सूर्य और शनि की परस्पर दृष्टि है और राशि परिवर्तन है। कुंडली -6 जन्म दिवस: 28.9.29, समय: 22ः44ः59, स्थान: इन्दौर जातक का जन्म वृष लग्न में हुआ जिसमें बृहस्पति अष्टमेश व एकादशेश होकर स्थित है। लग्न पर षष्ठ भाव से मंगल की दृष्टि है। लग्नेश शुक्र चतुर्थ भाव में सिंह राशि में है। नवमेश शनि अष्टम भाव में लग्नेश की राशि में है और उस पर राहु की द्वादश भाव से दृष्टि है। नवम भाव से द्वितीयेश शनि, सप्तमेश चंद्र तथा अष्टमेश सूर्य है। ये सब पिता के लिए मारक हैं। चंद्र स्वगृही है और सूर्य पंचम भाव में वक्री बुध के साथ स्थित है। जातक के पिता की मृत्यु बु-श की दशा में हुई। बुध द्वितीयेश और पंचमेश होकर स्वराशि में पंचम भाव में वक्री है तथा सूर्य से युत है। सूर्य पिता का कारक है और बुध वक्री है। पंचम भाव नवम से नवम है तथा उस पर अष्टम भाव से शनि की पूर्ण दृष्टि है। अष्टम भाव नवम भाव का द्वादश भाव है अतः शनि पिता के लिए मुक्ति कारक हुआ। शनि नवम भाव का द्वितीयेश भी है। कुंडली -7 जन्म दिवस: 27.10.31, समय: 19ः06, स्थान: मथुरा जातक का जन्म लग्न वृष है जिसमें उच्च चंद्र स्थित है। लग्न पर सप्तम भाव से स्वगृही मंगल (वृश्चिक राशि) की दृष्टि है। जातक मंगली प्रभाव रखता है। लग्नेश शुक्र षष्ठ भाव में स्वगृही है तथा सूर्य और बुध से युत है। बृहस्पति उच्च होकर तृतीय भाव में है। सप्तम भाव जीवन साथी का कारक माना गया है। इसमें स्वगृही मंगल स्थित है। सप्तम से द्वितीयेश बृहस्पति है, तृतीयेश शनि सप्तम से द्वितीय भाव में बृहस्पति की राशि धनु में स्थित है। सप्तम भाव से सप्तमेश शुक्र है जो षष्ठ भाव में है। सप्तम से अष्टमेश बुध है जो षष्ठ भाव में सूर्य के साथ है। जातक के पति का देहांत श-बृ की दशा में दिल का दौरा पड़ने से हुआ। सप्तमेश तथा सप्तम भाव पर राहु की पाप दृष्टि है। अष्टम-मांगल्य भाव में नवमेश शनि है। लग्न और लग्नेश भी पीड़ित हैं, लग्न ही चंद्र लग्न भी है। लग्न तथा विवाह कारक शुक्र का पीड़ित होना वैधव्य का सूचक है। सप्तम भाव से तृतीयेश शनि सप्तम से द्वितीय भाव पति के मारक स्थान में है। सप्तम से अष्टमेश बुध भी पीड़ित है। बुध तथा शुक्र सूर्य के साथ सप्तम से द्वादश भाव में हैं। मंगल तथा शनि की दृष्टि सप्तम से चतुर्थ भाव पर है जो पति का हृदय स्थान है। शनि तथा बृहस्पति परस्पर षडाष्टक स्थिति में हैं जो शुभ नहीं है। कुंडली -8 जन्म दिवस: 1.4.1889, समय: 1ः13, स्थान: नागपुर जातक का जन्म धनु लग्न में हुआ जहां बृहस्पति स्वगृही होकर केतु से पीड़ित है। जातक के द्वितीय भाव का स्वामी शनि अष्टम भाव में कर्क राशि में है। तृतीय भाव का स्वामी भी शनि है और इसमें सप्तमेश बुध स्थित है। सप्तम भाव में राहु बैठा है। अष्टम भाव में कर्क राशि में शनि स्थित है और द्वितीय भाव पर दृष्टि दे रहा है। अष्टम भाव पर मंगल की भी दृष्टि है। इस प्रकार अष्टम भाव पर शनि व मंगल का दुहरा प्रभाव है। जातक की मृत्यु चं-शु-मं की दशा में हुई। चंद्र अष्टमेश है जहां मंगल से दृष्ट शनि स्थित है। शुक्र षष्ठेश है और पंचम भाव में मंगल से पीड़ित है। मंगल द्वादशेश है, अष्टम भाव से शनि से दृष्ट है और केतु के नक्षत्र में है। गोचर में शनि-बृहस्पति का दुहरा गोचर पंचम भाव पर था जहां द्वादशेश मंगल बैठा है। शुक्र और मंगल का गोचर सप्तम भाव पर था। कुंडली -9 जन्म दिवस: 1.5.1896, समय: 3ः00, स्थान: बांग्लादेश जातक का जन्म मीन लग्न में हुआ जहां शुक्र उच्च होकर स्थित है। लग्न पापकर्तरी योग में है परंतु इस पर पंचम भाव से बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि है। लग्नेश बृहस्पति दशमेश भी है और पंचम भाव में बैठा है। इस पर अष्टम भाव से वक्री शनि की दृष्टि है। कुंडली में चार ग्रह उच्च हैं-शुक्र लग्न में, सूर्य द्वितीय भाव में, बृहस्पति पंचम भाव में व शनि अष्टम भाव में। द्वितीयेश मंगल द्वादश भाव में है, तृतीयेश व अष्टमेश शुक्र लग्न में तथा सप्तमेश बुध तृतीय भाव में है जो मारक है। जातक का देहावसान श-बु-शु की दशा में हुआ। शनि द्वादशेश होकर अष्टम भाव में है। बुध सप्तमेश होकर तृतीय भाव में शुक्र की राशि में है। शुक्र अष्टमेश व तृतीयेश होकर लग्न में है। कुंडली -10 जन्म दिवस: 12.8.1947, समय: 17ः00, स्थान: दिल्ली जातक का जन्म धनु लग्न में हुआ जिसपर सप्तम भाव से मंगल की दृष्टि है। लग्नेश बृहस्पति एकादश भाव में तुला राशि में है। द्वितीयेश शनि अष्टम भाव में सूर्य, बुध और शुक्र के साथ है। सप्तमेश बुध अष्टम भाव में तथा अष्टमेश चंद्र सप्तम भाव में राशि परिवर्तन योग में है। द्वादश भाव में केतु है तथा द्वादशेश मंगल सप्तम भाव में है। जातक की मृत्यु श-बृ-चं की दशा में गले के कैंसर से हुई। शनि अष्टम भाव में है और इसकी मारक स्थान द्वितीय भाव पर दृष्टि है और यह द्वितीयेश भी है। बृहस्पति लग्नेश है और एकादश भाव में शत्रु राशि में है। चंद्र मंगल से पीड़ित होकर सप्तम भाव में है। मृत्यु के समय गोचर में शनि सप्तम भाव पर और बृहस्पति, सूर्य, बुध तथा शुक्र अष्टम भाव पर थे। कुंडली -11 जन्म दिवस: 23.1.1897, समय: 11ः38, स्थान: कटक जातक मेष लग्न का है जिसपर पंचम भाव से बृहस्पति (नवमेश तथा द्वादशेश) की दृष्टि है। लग्नेश मंगल द्वितीय भाव में स्थित है और वृश्चिक राशि स्थित शनि (अष्टम भाव) से दृष्ट है। द्वितीयेश शुक्र है जो सप्तमेश भी है और कुंभ राशि में एकादश भाव में स्थित है। अष्टम भाव में शनि है जिसपर मंगल की दृष्टि है और मंगल ही अष्टमेश भी है। जातक की कथित मृत्यु बृ-मं की दशा में विमान दुर्घटना में हुई। बृहस्पति द्वादशेश है और उस पर द्वितीय भाव से मंगल की तथा अष्टम भाव से शनि की दृष्टि है। मंगल मारक भाव में है तथा अष्टमेश है। शनि दशम भाव का स्वामी है और दशम भाव ऊंचाई का है। इसमें सूर्य तथा राहु भी स्थित हैं। राहु, सूर्य और शनि पृथकतावादी हैं, शनि वायु तत्व का कारक है, अतः जातक की उच्च स्थान से गिरकर मृत्यु हुई। सूर्य पूर्व दिशा का अधिपति है और जापान का चिह्न है। इस अध्ययन में हमने पाया कि शनि अष्टम भाव में स्थित होकर यदि अशुभ प्रभाव में हो तो जातक अथवा उसके संबंधियों की मृत्यु का कारक हो सकता है। किंतु यह जरूरी नहीं कि अष्टमस्थ शनि मृत्यु का कारक हो ही, इसके शुभ परिणाम भी हैं। अष्टम शनि को आयुष्य कारक भी माना गया है।


कृष्णमूर्ति पद्धति, मेदिनीय ज्योतिष और वास्तु विशेषांक  जुलाई 2005

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