कान : श्रवण शक्ति के स्त्रोत

कान : श्रवण शक्ति के स्त्रोत  

कान श्रवण शक्ति के स्त्रोत आचार्य अविनाश सिंह कर्ण (कान) शरीर का वह प्राकृतिक यंत्र है, जिससे हमारी सुनने की क्रिया संपन्न होती है। कान उन पांच ज्ञानेंद्रियांे में से एक है, जो हमें संसार के साथ संपर्क में रखते हुए विभिन्न सांसारिक चीजों के बारे में जानकारी देती है। श्रवण शक्ति प्रदान करने वाली कर्णेंद्रिय सुचारू रूप से काम करती हो, तो उसकी ओर व्यक्ति ज्यादा ध्यान नहीं देता। लेकिन इस इंद्रिय में कोई खराबी आ जाने पर उसके बहुत गंभीर परिणाम होते हैं। आयुर्वेद में कर्ण रोगों के लिए मुख्यतः मनुष्य को दोषी ठहराया है। अनुचित एंव अहितकारक ध्वनि को सुनने की आदत से मानव की कर्णेंद्रिय बुरी तरह प्रभावित होती है। धीरे-धीरे उसकी श्रवण शक्ति कम होती हुई नष्ट हो जाती है। कर्ण रोगों में मुख्यतः (1) कर्णस्राव, (2) बहरापन (बधिरता), (3) कर्णशूल (कान का दर्द) हैं। कर्णस्राव कर्णस्राव का अर्थ है कान का बहना। वास्तव में यह काफी पुराना रोग है। आयुर्वेद ग्रंथों में इस रोग के विषय में पर्याप्त जानकारी दी गयी है। आयुर्वेद में कर्णस्राव तीन प्रकार के होते हंै। पहल े पक्र ार म ंे वात विकार क े कारण कर्णस्राव में पतला एवं सफेद स्राव होता है। दूसरे प्रकार का कर्णस्राव पित्त विकार के कारण होता है। इसमें लाल-पीले रंग का द्रव स्रावित होता है। तीसरे प्रकार का कर्णस्राव कफ विकार के कारण होता है। इसमें स्राव गाढ़ा, सफेद तथा खुजली युक्त होता है। कर्णस्राव के अन्य कई कारण होते है, जैसे सिर पर चोट लगना, कान में पानी चला जाना, कान में फोड़े-फुंसियां होना, कान के पर्दे में छिद्र या सूजन हो जाना, कान में कैंसर होना। खसरा, काली खांसी आदि संक्रामक रोगों से भी यह रोग होता है। वैसे तो यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, मगर बाल्यावस्था में यहा रोग अधिक देखने को मिलता है। बहरापन बहरापन (बधिरता) श्रवण शक्ति खोना, अर्थात सुनने की शक्ति कम होना, या पूरी तरह खो देना है। यह दोष मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैंः जन्मजात, बचपन में उत्पन्न होना एवं बुढ़ापे में उत्पन्न होना। जन्मजात कारणों में बच्चों का समय पूर्व पैदा होना, प्रसव के समय चोट या कोई आनुवंशिक कारण हैं। जन्मजात बधिरों को जीवन में हर स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे मरीजों का सामान्य ज्ञान एवं मानसिक स्तर भी सामान्य की अपेक्षा कम होते हैं। बचपन में होने वाली बधिरता के कारणों में संक्रमण हैं, जैसे ः वायरल, सिफिलिस, तपेदिक, दिमाग में ट्यूमर आदि। ऐसे में रोगी हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है, जिससे उसके मानसिक एवं शारीरिक विकास रुक जाते हैं। बुढ़ापे की बधिरता में उम्र बढ़ने के साथ-साथ व्यक्ति के श्रवण तंतु सूख जाते हैं और बधिरता आ जाती है। ऐसे में मरीज को अपनी बात कहने एवं समझाने में कोई कठिनाई नहीं होती। पर दूसरों की बात को समझना इनके लिए दुष्कर होता है। अचानक आयी बधिरता से व्यक्ति को मानसिक परेशानी एवं निराशा अधिक होती है। अन्य कारणों में बार-बार सर्दी-जुकाम होना, कान से मवाद बहना, कुछ दवाइयों के अधिक इस्तेमाल, जैसे क्लोरोक्सीन, दर्द नाशक एस्प्रिन, एंटीबायटिक, जैसे क्लोरोमाइसेटिन, जेंटामाइसिन आदि। कान का दर्द आयुर्वेद के अनुसार कान का दर्द वायु विकार से उत्पन्न होता है। कानों की शिराओ में दूषित वायु अपना स्थान बना लेती है, जिससे कानों में विभिन्न प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है और दर्द भी होता है। कान के दर्द के अन्य कारण टांसिल की सूजन, सर्दी-जुकाम, श्रुतिसुरंगा नली में सूजन या अवरोध, कानों में मैल जम जाना या, पानी चला जाना, जोर से आघात लगना, मलेरिया, टाइफाइड जैसे रोगों में तेज बुखार भी हैं। उपचार बहरेपन के उपाय: ऋ एक चुटकी असली हींग, स्त्री के दूध में घिस कर, कान में डालने से बहरापन दूर होता है। ऋ आक के पीले पत्ते, जिनमें छेद न हो, आग पर गरम कर के, उन्हें मसल कर रस निकालें और इस रस को कान में दो-दो बूंद डालने से बहरेपन और कर्णस्राव में भी आराम मिलता है। ऋ मूली का रस, शहद, सरसों का तेल, बराबर मात्रा में मिला कर, दो-तीन बूंद कान में सुबह-शाम डालने से बहरेपन में आराम आता है। कर्णपीड़ा के उपाय: ऋ तुलसी के पत्तों का रस गुनगुना कर दो-दो बूंद प्रातः-सायं डालने से कान के दर्द में राहत मिलती है और बहरापन भी ठीक होता है। ऋ अदरक के रस में नमक एवं शहद मिला कर, गुनगुना कर, कानों में डालने से कान के दर्द में आराम आता है। ऋ प्याज का गुनगुना रस कान में डालने से कान के दर्द में आराम मिलता है। इससे बहरेपन एवं कर्णस्राव में भी लाभ होता है। कर्णस्राव (कान बहने) के उपाय: ऋ कान को साफ कर दो-दो बूंद स्पिरिट तीन चार दिन कान में डालने से कान का बहना ठीक होता है। ऋ सरसों का तेल एवं रतनजोत 10ः1 अनुपात में मिला कर पका कर कान में डालने से कर्णस्राव में आराम होता है। यह कान के दर्द एवं बहरेपन में भी लाभकारी है। ऋ स्त्री के दूध में रसौत एवं शहद मिला कर कान में डालने से कर्णस्राव स्थाई रूप से रुक जाता है। ऋ दो-दो बूंद चूने के पानी को कान में डालने से बच्चों के कर्णस्राव में आराम मिलता है। ज्योतिषीय कारण ज्योतिष के अनुसार तृतीय एवं एकादश भाव कुंडली में क्रमशः दायें एवं बायें कान का नेतृत्व करते हैं। ग्रहों में बुध ग्रह श्रवण शक्ति और वाक शक्ति का प्रतीक है। किसी भी जन्मकुंडली में जब बुध, तृतीय एवं एकादश भाव शुभ ग्रहों से प्रभावित रहते हैं, तो व्यक्ति की श्रवण शक्ति को बढ़ाते हैं और इसके विपरीत जब ये पाप एवं अशुभ ग्रहों से प्रभावित हो कर पीड़ित हो जाते हैं, तो श्रवण शक्ति को कम करते है। अगर ये बुरी तरह से प्रभावित हों, तो जातक जन्मजात अर्थात जन्म से ही बहरा होता है। जन्मजात बहरा व्यक्ति बोलने में भी असमर्थ रहता है, क्योंकि जब जातक ने शब्दों को सुना ही न हो, तो वह बोलेगा कैसे? इसी लिए बुध वाक शक्ति का भी प्रतीक माना गया है। सुनने और बोलने से जातक एक दूसरे से संपर्क बनाये रखता है और समाज में उसे विशेष स्थान प्राप्त होता है। विभिन्न लग्नों में ज्योतिषीय योग: मेष लग्न की कुंडली में बुध किसी भी भाव में मंगल के साथ हो और उस पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक के कानों में रोग उत्पन्न कर उसे बहरा बनाता है। वृष लग्न की कुंडली में चंद्र छठे भाव में बुध से युक्त हो, मंगल तृतीय स्थान पर हो और शनि नवम् स्थान में हो, तो जातक को कर्णस्राव से बहरा बना देता है। अगर जन्म समय गुरु-मंगल की दशा रहे, तो जातक जन्म से ही बहरा होता है। मिथुन लग्न की कुंडली में गुरु तृतीय स्थान पर हो, बुध-शुक्र छठे स्थान पर हो, मंगल द्वादश भाव में हो, शनि नवम् हो, तो जातक कान के रोग से पीड़ित रहता है। कर्क लग्न की कुंडली में बुध द्वादश भाव में हो, सूर्य एकादश, शनि छठे भाव में हो, मंगल आठवें हो और चंद्र सप्तम भाव में राहु-केतु से प्रभावित हो, तो जातक कर्ण के रोग से पीड़ित रहता हैं। सिंह लग्न की कुंडली में बुध छठे, शुक्र पांचवें हो, शनि लग्न में हो और मंगल आठवें स्थान पर हो, तो जातक कान के रोग से पीड़ित होता है। कन्या लग्न की कुंडली में मंगल आठवें स्थान में, सूर्य पंचम स्थान में, बुध-शनि छठे स्थान पर, गुरु एकादश स्थान पर हो, तो जातक बहरा होता है। तुला लग्न की कुंडली में गुरु-बुध दशम् भाव में हों, मंगल आठवें, शनि चतुर्थ भाव में, राहु तृतीय हो और शुक्र द्वादश भाव में होने से कान का रोग होता है। वृश्चिक लग्न की कुंडली में बुध-शनि छठे भाव में हो, और मंगल आठवें हो, शुक्र पंचम भाव में होने से जातक कर्ण रोग से पीड़ित होता है। धनु लग्न की कुंडली में शनि पांचवें, शुक्र-बुध सातवें हों, मंगल बारहवें भाव में हों, तो जातक बहरा होता है। मकर लग्न की कुंडली में चंद्र-गुरु छठे, बुध तृतीय, मंगल नवम, शनि लग्न में, सूर्य द्वितीय भाव में हो, तो जातक को कर्णस्राव होता है। कुंभ लग्न की कुंडली में मंगल छठे भाव में हो, बुध पंचम भाव में, शनि तृतीय भाव में, चंद्र एकादश में हो, तो जातक को कर्णस्राव कर्णपीड़ा एवं बहरापन होता है। मीन लग्न की कुंडली में शुक्र लग्न में बुध के साथ हो और शनि एकादश में हो, गुरु पंचम भाव में और मंगल आठवें स्थान पर हो, तो जातक को कान के रोग से पीड़ित रखता है। उपर्युक्त सभी योग चतिल कुंडली के आधार पर लिखें गए है। ग्रहों की दशा, अंतर्दशा एवं गोचर स्थिति के अनुसार रोग उत्पन्न करते हैं। प्रस्तुत कुंडली एक बालक की है जो जन्म से ही बहरा है। जातक का जन्म मेष लग्न में हुआ है। जन्म समय लग्नेश मंगल पंचम भाव में सूर्य से अस्त है तथा अष्मेश हो कर तृतियेश बुध को प्रभावित कर रहा है। शनि अष्टम् भाव में स्थित हो कर बुध पर पूर्ण दृष्टि लगाये है। बुध अस्त भी है। शनि चलित में नवें भाव में चले जाता है। जिस से वह तृतीय और एकादश भाव पर भी दृष्टि लगता है क्योंकि यह भाव दाहिने और बायें कान का नेतृत्व करते है, शनि से प्रभावित है। इस कुंडली में हमने देखा की बुध, तृतीय भाव, एकादश भाव एवं लग्नेश सभी शनि के दूषित प्रभाव में है। इसी कारण जातक जन्म से ही बहरा है।



शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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