काल सर्प योग के स्वप्न

काल सर्प योग के स्वप्न  

व्यूस : 2098 | मार्च 2006
कुछ जातकों के स्वप्नों का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि वे काल सर्प दोष से पीड़ित हैं। तदुपरांत उनकी कुंडलियों को देखने पर पता चला कि उनके सभी ग्रह राहु-केतु के बीच में हैं, अथवा केवल चंद्र या मंगल के बाहर होने के कारण आंशिक काल सर्प दोष है। ये स्वप्न इस प्रकार हैं: - सोते हुए सर्प को अपने शरीर पर आते देख कर घबड़ा कर जाग पड़ना। - सांपों का जोड़े एक साथ हाथ या पैर में लिपटे और यदि वे डस लंे, तो काल सर्प योग लाभदायक एवं शीघ्र धन-संपत्ति देने वाला होगा। - पानी पर तैरता सांप देखना काल सर्प योग का सूचक है। - स्वप्न में सांप उड़ता हुआ दिखाई देना भी काल सर्प दोष का द्योतक है। - अनगिनत सर्पों का दिखना घातक काल सर्प का प्रतीक है। इष्ट देवता का पूजन करें, तभी वे शांत होंगे। - यदि काला नाग कुंडली मारे दिखे, तो यह लग्न के 4 घरों से संबंधित काल सर्प योग का द्योतक है। - यदि सर्प किसी पशु पर झपटे, तो काल सर्प का शुभ संकेत है। इससे धन आता है। - सर्प-नेवले की लड़ाई दिखाई दे तो यह काल सर्प योग परिवार एवं रिश्तेदारों में कलह कराता है। - फुफकारता हुआ और फन उठाए सर्प दिखाई दे, तो मृत्युतुल्य कष्ट मिलता है। यदि सर्प पद्म हो, तो शीघ्र धन दिलाता है। इन स्वप्नों को देखें, तो नाग पंचमी को या शुक्ल पक्ष में आश्लेषा नक्षत्र वाले दिन, चांदी के प्रतीकात्मक नाग-नागिन के जोड़े को, शिव मंदिर में पूजा करने के बाद, बहती नदी में बहा दें। इससे अशुभ प्रभाव समाप्त होता है, सुख-शांति मिलती है और मन की अशांति दूर होती है। शांति का अमोघ उपाय सर्प सूक्त ल सर्प योग से पीड़ित व्यक्तियों को चाहिए कि किसी शिवालय में शिवलिंग पर ऐसा तांबे का सर्प किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन चढ़ाएं जो स्थायी रूप से रह सके, यदि नाग पंचमी का दिन हो, तो श्रेष्ठ रहेगा। तत्पश्चात शिव जी एवं उक्त सर्प का विधिवत पूजन कर के, सर्प सूक्त का 5 बार पाठ करें। प्रत्येक मास की दोनों पंचमियों को सर्प सूक्त का पाठ अनिवार्य रूप से करें। उक्त प्रयोग से काल सर्प योग के कारण आ रही बाधाएं-आपदाएं धीरे-धीरे समाप्त होती जाएंगी और भाग्योदय, ऋण मुक्ति, सुखमय दाम्पत्य जीवन, स्वास्थ्य लाभ, धनागमन, संतान संबंधी सुख, विवाह आदि में सफलताएं तथा शुभ प्रभाव प्राप्त हो सकेंगे। सर्प सूक्त ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग पुरोगमाः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। इंद्रलोकेषु ये सर्पाः वासुकि प्रमुखादयः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। कद्रवेयाश्च ये सर्पाः मातृभक्ति परायणा। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताःमम सर्वदा।। इंद्रलोकेषु ये सर्पाः तक्षका प्रमुखादयः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। सत्यलोकेषु ये सर्पाः वासुकिना च रक्षिता। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। मलये चैव ये सर्पाः कर्कोटक प्रमुखादयः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये साकेत वासिता। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। सर्वग्रामेषु ये सर्पाः वसंतिषु संच्छिता। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा। ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पाप्रचरन्ति च। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। समुद्रतीरे ये सर्पाः सर्पाः जलवासिनः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।। रसातलेषु ये सर्पाः अनंतादि महाबलाः। नमोस्तुतेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीताः मम सर्वदा।।

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