विवादित वास्तु

विवादित वास्तु  

प्रश्न: भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान का यदि उत्तर-पूर्व का भाग कटा हुआ हो तो यह किस प्रकार की समस्याओं को जन्म दे सकता है? इसके दोष को ठीक करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? उत्तर: वास्तु में उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान्य कोण का भाग सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। वास्तु की मान्यता के अनुसार वास्तुपुरूष का मुख इस कोण अथवा भाग में अवस्थित होता है। स्पष्ट है कि यदि मुख अथवा मस्तिष्क ही ठीक से कार्य नहीं करेगा तो संपूर्ण शरीर ही निष्क्रिय रहेगी अथवा सामान्य रूप से कार्य नहीं करेगा। यही स्थिति भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की भी होती है। उत्तर-पूर्व का भाग कटा होने से ऐसे भवन में निवास करने वाले लोगों अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान होने की स्थिति में यहां काम करने वाले कर्मचारियों तथा मालिक को निम्नलिखित परेशानियों एवं कष्टों का सामना करना पड़ता है। 1. भवन का ‘की पाइंट’: उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान्य कोण किसी भी भूखंड अथवा भवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र होता है। यदि यह भाग कटा होता है अथवा इस भाग में किसी भी प्रकार का दोष होता है तो यह हर प्रकार के संकट एवं परेशानी का कारण बनता है। इस प्रकार का भवन चाहे वह निवास स्थान हो अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान, यहां के निवासी अथवा कर्मचारियों को हर प्रकार की शारीरिक, आर्थिक मानसिक, पारिवारिक कष्टों एवं परेशानियों से जूझना पड़ता है। 2. सुख, समृद्धि एवं उन्नति में रूकावट: उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान्य कोण में कटाव निवास स्थान अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की सुख समृद्धि एवं उन्नति के मार्ग में बाधक बन जाता है। अथक मेहनत एवं परिश्रम के बावजूद भी लोग उन्नति नहीं कर पाते, हमेशा कर्ज तथा ऋण में डूबे रहते हैं। व्यापार एवं व्यवसाय में अकारण नुकसान झेलना पड़ता है तथा यदि नौकरी कर रहे हैं तो बिना उचित कारण के निलंबन अथवा नौकरी छूट जाने जैसी परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। 3. पवित्रता एवं सात्विकता में कमी: उत्तर-पूर्व भाग कटे होने वाले भवन में निवास करने वाले अथवा ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने वाले लोगों की पवित्रता एवं सात्विकता में कमी आ जाती है तथा लोगों के मन में हमेशा गलत विचार आते रहते हैं। लोगों की प्रवृत्ति हिंसात्मक तथा लड़ाई-झगड़ा करने वाला हो जाता है। 4. आर्थिक कष्ट: यह भाग कटा होने पर धनागमन काफी कम हो जाता है, अकारण अनावश्यक व्यय होते हैं तथा निवेश अथवा व्यवसाय में किसी न किसी तरह से नुकसान होते रहते हैं। व्यक्ति अर्थाभाव के कारण ऋणग्रस्त हो जाता है। 5. स्वास्थ्य कष्ट: उत्तर-पूर्व के भाग से ही सकारात्मक एवं जीवनदायी ऊर्जा का प्रवेश घर अथवा किसी भवन में होता है। यदि यही भाग दोषपूर्ण होगा तो निवासी निस्संदेह इस ऊर्जा के लाभ से वंचित रहेंगे जिसका परिणाम यह होगा कि लोगों का स्वास्थ्य हमेशा प्रभावित रहेगा तथा लोग किसी न किसी बीमारी का शिकार होते रहेंगे। 6. यश एवं प्रसिद्धि में कमी: उत्तर-पूर्व का भाग कटा होने से यहां के निवासियों को लाख कोशिशों एवं योग्यता के बावजूद भी मान-सम्मान एवं यथोचित प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती है। लोग हमेशा हर दृष्टिकोण से संघर्ष करते नजर आते हैं जिससे वे हमेशा मानसिक तनाव में रहते हैं। 7. विवाह में विलंब: यह भाग कटा होने से विवाह योग्य पुरूष एवं महिला के रिश्ते कोशिशों के बावजूद भी तय नहीं हो पाते, होते भी हैं तो बराबरी के नहीं होते अथवा अकारण अंतिम समय में टूट जाते हैं। 8. संतानोत्पत्ति में बाधा: यदि यह भाग कटा होता है तो संतान के ईच्छुक दंपत्तियों को संतान पैदा होने में बाधा उपस्थित होती है, विलंब होता है अथवा संतान होती ही नहीं। काफी कोशिशों के बाद यदि संतान होते भी हैं तो अधिक पुत्रियां पैदा होती हैं। पुत्र संतान के लिए लोग तरसते रह जाते हैं। 9. विकार के शिकार: यह भाग कटा होने पर यहां के निवासी उदर विकार, मधुमेह, पाचन क्रिया संबंधी रोग अथवा रक्त विकार आदि के सहज शिकार हो जाते हैं। 10. प्रेत बाधा: इस भाग में दोष होने से घर/भवन या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में प्रेत बाधा उत्पन्न हो जाती है। ऐसे जगह भूतहा बन जाते हैं तथा लोगों को अकेला रहने पर यहां असामान्य अनुभव प्राप्त होते हैं। 11. गलत निर्माण से परेशानी: इस कटे हुए भाग में यदि सीढ़ियां होती हैं तो निवासियों को मानसिक तनाव पैदा होता है। यदि उत्तर-पूर्व के भाग में कोई भारी निर्माण होता है तो निवासियों को अनिद्रा से संबंधित परेशानी हो जाती है। यदि इस कटे भाग में गंदगी रहती है तो यह विभिन्न बीमारियों एवं मानसिक तनाव का कारण बनता है। 12. सोचने समझने की क्षमता में कमी: यदि यह भाग बंद होता है तो सोचने समझने की क्षमता में अत्यधिक कमी आ जाती है, निर्णय लेने में हमेशा चूक होती है परिणामस्वरूप नुकसान एवं हानि का सामना करना पड़ता है। यदि इस भाग में जूते-चप्पल रखे जाते हैं तो लोगों को अपमानजनक परिस्थितियों का सामना हमेशा करना पड़ता है। दोष दूर करने के उपाय 1. उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान को सही कराना चाहिए। 2. तात्कालिक लाभ प्राप्त करने हेतु पूर्व व उत्तर की दीवार पर शीशा लगाना चाहिए, जिससे इस दोष का प्रभाव कुछ कम हो जायेगा। 3. ईशान (उ. पू.) भाग, अन्य सभी कोणों व दिशाओं से नीचा होना चाहिये तथा दोनों दिशाएं-उत्तर व पूर्व समान ऊंचाई या नीचाई पर होनी चाहिए। 4. ईशान भाग में पूजा स्थल या कक्ष बनाने से दोष में कमी आती है क्योंकि यहां सदैव सकारात्मक एवं धनात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे भी पवित्र व स्वच्छ रखें। 5. इस भाग को सदैव खुला, हल्का, खाली, बड़ा, समकोणिक, पवित्र व सुगंधमय रखना चाहिये ताकि घर में अधिकतम सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर सके। 6. इस भाग में जल से संबंधित विभिन्न स्रोत रखना शुभ रहता है। 7. यह कोण नीचा रखने से वर्षा का पूर्ण शुद्ध जल इसी ओर से बाहर निकलता है, जिससे यह भाग स्वच्छ व पवित्र हो जाता है। 8. यह स्थान बहुत संवेदनशील होता है। अतः यहां पर नित्य कपूर जलाना चाहिए। 9. ईशान भाग में बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें। 10. बर्फीले कैलाश पर्वत पर साधना वाले शिव का फोटो लगायें, जिनके मस्तक पर चंद्रमा (अर्द्ध) व लंबी जटा से गंगा जी (जल) निकल रही हों। 11. उत्तर-पूर्व भाग में भोजन की तलाश में उड़ते हुये पक्षियों का फोटो लगायें। 12. इस भाग में ब्रह्माजी, बृहस्पति देव/ग्रह, पीपल वृक्ष, अपने गुरु या साधु पुरूष का कोई फोटो लगायें। 13. इस भाग पर बड़ा शीशा भी लगाना शुभ रहता है। 14. अपने गुरुजनों का सम्मान व सेवा करें। इन्हें भूरी-पीली लाल गाय के बेसन के व्यंजन खिलायें। 15. धार्मिक पुस्तकों का दान करें। 16. इस भाग का एनर्जी (ऊर्जा) लेबल (क्षेत्र) बढ़ाने के लिये इस भाग में पिरामिड का प्रयोग भी उत्तम रहता है।


कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक  मार्च 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के कालसर्प योग एवं राहु विशेषांक में कालसर्प योग की सार्थकता व प्रमाणिकता, द्वादश भावों के अनुसार कालसर्प दोष के शांति के उपाय, कालसर्प योग से भयभीत न हों, सर्पदोष विचार, सर्पदोष शमन के उपाय, महाशिवरात्रि में कालसर्प दोष की शांति के उपाय, राहु का शुभाशुभ प्रभाव, कालसर्पयोग कष्टदायक या ऐश्वर्यदायक, लग्नानुसार कालसर्पयोग, हिंदू मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, होलीकोत्सव, गौ माहात्म्य, पंडित लेखराज शर्मा जी की कुंडली का विश्लेषण, व्रत पर्व, कालसर्प एवं द्वादश ज्योर्तिलिंग आदि विषयों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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