दाराकारक Û जिस राशि में दाराकारक बैठा हो उस राशि की दशा या अंतर्दशा में शादी हो सकती है। Û दाराकारक और दृष्टि: जिस राशि को दाराकारक देख (जैमिनी दृष्टि) रहा हो उस राशि की दशा या अंतर्दशा में शादी हो सकती है। Û दाराकारक से द्वितीय, सप्तम, अष्टम या द्वादश में जो राशि हो उस राशि की दशा या अंतर्दशा में भी शादी हो सकती है। आत्माकारक Û जिस राशि में आत्माकारक बैठा हो उस राशि की दशा या अंतर्दशा में शादी हो सकती है। Û आत्माकारक और दृष्टि: जिस राशि को आत्माकारक देख (जैमिनी-दृष्टि) रहा हो उस राशि की दशा या अंतर्दशा में भी शादी हो सकती है। Û आत्माकारक और भाव: आत्माकारक से द्वितीय, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश भाव में जो राशि हो उस की दशा या अंतर्दशा में भी शादी हो सकती है। उपपद , दाराकारक और आत्माकारक के तृतीय या एकादश भाव में स्थित राशि की दशा या अंतर्दशा में शादी हो सकती है। अगर तृतीय भाव में स्थित राशि की दशा या अंतर्दशा में शादी होती है तो किसी रिश्तेदार के सहयोग से होगी। अगर एकादश भाव में स्थित राशि की दशा या अंतर्दशा में होती है तो पत्नी या पति नौकरी करने वाली/वाला होगी। यहां कुछ कुंडलियों का विश्लेषण प्रस्तुत है। 1. प्रथम उदाहरण में, जातक का जन्म 8.8.1965 में हुआ। जातक की शादी 17.9.1988 में हुई। जिस समय जातक की शादी हुई उस समय वृश्चिक महादशा और मीन की अंतर्दशा चल रही थी। लग्न ः 5°33श् सूर्य ः 22°22श् चंद्रमा ः 10°41श् मंगल ः 29°12श् बुध ः 4°41श् गुरु ः 0°31श् शुक्र ः 23°24श् शनि (व) ः 22°31श् राहु ः 18°50श् उपपद: मीन राशि दाराकारक: गुरु आत्माकारक: मंगल वृश्चिक महादशा में मीन की अंतर्दशा जून, 1988 से अप्रैल, 1989 तक थी। इस कुंडली में उपपद तृतीय भाव है जिसमें मीन राशि है। वृश्चिक मीन राशि अर्थात उपपद से नवम भाव है। इस प्रकार महादशा और अंतर्दशा दोनों उपपद के नियम की पुष्टि करता है। इस कुंडली में दाराकारक गुरु है जो षष्ठ भाव मिथुन राशि में विराजमान है। अंतर्दशा राशि मीन पर दाराकारक गुरु की दृष्टि है। परंतु महादशा वृश्चिक पर दाराकारक का किसी प्रकार से संबंध नहीं हो पा रहा है। इस कुंडली में आत्मकारक मंगल है जो नवम भाव में कन्या राशि में बैठा है। महादशा वृश्चिक कन्या राशि से तृतीय स्थान में बैठा है । पहले ही कहा जा चुका है कि दशा या अंतर्दशा तृतीय भाव में स्थित राशि हो तो शादी रिश्तेदार के सहयोग या रिश्तेदार के साथ होती है। अंतर्दशा मीन है जो आत्मकारक मंगल (जैमिनी दृष्टि) उसे देख रहा है। इस प्रकार महादशा और अंतर्दशा दोनों आत्माकारक के नियमों की पुष्टि करती हंै। 2. दूसरे उदाहरण में, जातक का जन्म 27.3.1973 को हुआ। शनि ः 21°43श् बुध ः 21°31श् चंद्रमा ः 15°09श् सूर्य ः 12°54श् गुरु ः 12°39श् शुक्र ः 09°26श् मंगल ः 06°44श् उपपद: तुला राशि आत्माकारक: शनि दाराकारक: मंगल जातक की शादी कुंभ दशा और मकर की अंतर्दशा में हुई। दशा कुंभ की अंतर्दशा मकर नवंबर, 1996 से जनवरी, 1997 तक है। अब महादशा कुंभ को देखें तो उपपद की दृष्टि कुंभ पर पड़ रही है। अंतर्दशा मकर पर उपपद से किसी प्रकार का संबंध नहीं हो रहा है। दाराकारक मंगल है। महादशा कुंभ दाराकारक मंगल से द्वितीय भाव में है जो दाराकारक के तृतीय नियम की पुष्टि कर रहा है। दाराकारक मंगल मकर राशि में बैठा है जो दाराकारक खंड के प्रथम नियम की पुष्टि कर रहा है। अब आत्माकारक की दृष्टि से विश्लेषण करंे। महादशा कुंभ पर आत्माकारक शनि की दृष्टि नहीं पड़ रही है, परंतु अंतर्दशा मकर पर आत्माकारक की दृष्टि पड़ रही है। 3. अब हम तीसरा उदाहरण लेते हैं। जातक का जन्म 21.2.1958 में हुआ है। जातक की शादी 27.9.1986 को हुई थी। शादी के समय महादशा मीन और अंतर्दशा भी मीन थी। लग्न ः 6°39श् सूर्य ः 9°20श् चंद्रमा ः 14°24श् मंगल ः 19°42श् बुध ः 1°23श् गुरु (व) ः 8°20श् शुक्र ः 7°39श् शनि ः 1°0श् राहु ः 9°45श् शादी के समय दशा: मीन/मीन उपपद: कन्या राशि दाराकारक: शनि आत्माकारक: मंगल उपपद: इस कुंडली में उपपद चतुर्थ कन्या में है। शादी दशा मीन और अंतर्दशा मीन में हुई है। उपपद की दृष्टि मीन राशि पर पड़ रही है तथा मीन राशि कन्या राशि से सप्तम भाव है। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों ही उपपद के नियम की पुष्टि करती हंै। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक शनि है जो धनु राशि में बैठा है। दाराकारक शनि की दृष्टि दशा और अंतर्दशा मीन पर पड़ रही है। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों पर दाराकारक के नियमों की पुष्टि हो रही है। आत्माकारक: इस कुंडली में आत्माकारक मंगल है जो धनु राशि में दाराकारक शनि के साथ बैठा है। आत्माकारक भी दशा और अंतर्दशा राशि मीन को देख रहा है। इस प्रकार दोनों दशाएं आत्माकारक के नियमों को पुष्टि कर रही हंै। 4. अब हम चैथा उदाहरण लेते हैं। जातक का जन्म 15.7.1976 को हुआ है। जातक की शादी 12.12.1996 को हुई। चर दशा के अनुसार शादी के समय दशा कन्या की और अंतर्दशा मीन की थी। लग्न ः 12°17श् सूर्य ः 29°36श् चंद्रमा ः 18°1श् मंगल ः 11°39श् बुध ः 29°30श् गुरु ः 1°16श् शुक्र ः 7°8श् शनि ः 11°3श् राहु ः 16°13श् उपपद: छठा घर, वृष राशि दाराकारक: गुरु आत्माकारक: सूर्य उपपद: इस कुंडली में उपपद छठे भाव में है। दशा कन्या पर उपपद की न तो दृष्टि पड़ रही है और न ही उपपद से द्वितीय, सप्तम, अष्टम, नवम या द्वादश भाव है। अंतर्दशा मीन उपपद से एकादश भाव में है। अगर उपपद या दाराकारक या आत्माकारक से एकादश भाव की राशि के दशा या अंतर्दशा में शादी होती है तो पत्नी और पति दोनों नौकरी वाले होते हैं। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक गुरु है जो उपपद की राशि में बैठा है। उपपद की तरह ही दाराकारक सिर्फ अंतर्दशा मीन को एकादश भाव (दाराकारक से) को प्रभावित करता है। आत्माकारक: इस कुंडली में आत्माकारक सूर्य है जो सप्तम भाव मिथुन राशि में विराजमान है। आत्माकारक सूर्य दशा और अंतर्दशा दोनों पर दृष्टि डाल रहा है। इस प्रकार आत्माकारक का नियम भी सत्य साबित हो रहा है। 5. अब यहां पांचवां उदाहरण प्रस्तुत है। जातक का जन्म 4.12.1957 को हुआ। जातक की शादी 27.3.1977 को हुई। शादी के समय दशा मेष की और अंतर्दशा कन्या की थी। लग्न ः 5°59श् सूर्य ः 18°57श् चंद्रमा ः 17°47श् मंगल ः 24°6श् बुध ः 9°27श् गुरु ः 1°6श् शुक्र ः 5°1श् शनि ः 22°58श् राहु ः 17°9श् उपपद: तृतीय भाव कन्या राशि दाराकारक: गुरु आत्मकारक: मंगल उपपद: जातक की शादी मेष की दशा में हुई। मेष राशि उपपद कन्या से अष्टम भाव पड़ता है। इससे उपपद का नियम सत्य साबित हो रहा है। उपपद कन्या राशि में है और कन्या राशि की अंतर्दशा में शादी हुई है। इस प्रकार यह स्थिति भी उपपद के नियम को सत्य साबित कर रही है। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक गुरु है जो चतुर्थ भाव तुला राशि में बैठा है। दशा मेष राशि की है जो तुला राशि से सप्तम भाव पड़ती है। तुला राशि से द्वादश भाव कन्या राशि है जिसकी अंतर्दशा में शादी हई। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों ही दाराकारक के नियम को सत्य साबित कर रही हंै। आत्मकारक: इस कुंडली में आत्मकारक मंगल है जो चतुर्थ भाव तुला राशि में बैठा है। दशा मेष और अंतर्दशा कन्या दोनों आत्माकारक के नियम सत्य साबित कर रही हंै। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों ही उपपद, आत्माकारक और दाराकारक के नियमों को सत्य साबित कर रही हंै। 6. अब छठा उदाहरण देखें। जातक का जन्म 17.11.1968 को हुआ। जातक की शादी 22.5.1990 को हुई। शादी के समय दशा मकर की और अंतर्दशा धनु की थी। लग्न ः 27°14श् सूर्य ः 1°20श् चंद्रमा ः 16°9श् मंगल ः 11°18श् बुध ः 19°56श् गुरु ः 6°46श् शुक्र ः 9°10श् शनि ः 26°19श् राहु ः 15°19श् उपपद: द्वितीय भाव, वृश्चिक राशि दाराकारक: सूर्य आत्माकारक: शनि (व) उपपद: उपपद द्वितीय भाव में है। दशानाथ मकर पर उपपद की दृष्टि है। अंतर्दशा धनु उपपद से द्वितीय भाव में है। इस प्रकार उपपद का नियम सत्य साबित हो रहा है। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक सूर्य है जो द्वितीय भाव में बैठा है। दशानाथ पर दाराकारक की दृष्टि है और अंतर्दशा धनु दाराकारक से द्वितीय भाव में है। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों दाराकारक के नियम को सत्य साबित कर रहे हैं। आत्माकारक: इस कुंडली में आत्माकारक शनि है जो छठा भाव में बैठा है। दशानाथ मकर आत्माकारक से एकादश भाव में पड़ता है और अंतर्दशा धनु को आत्माकारक देख रहा है। मैं पहले कहा जा चुका है कि अगर दशा और अंतर्दशा उपपद दाराकारक और आत्माकारक से एकादश भाव में हो तो शादी हो सकती है। लेकिन पत्नी और पति दोनों नौकरी करने वाले होंगे। वैसा ही इस कुंडली के साथ है। इस प्रकार दशानाथ और अंतर्दशा दोनों ही आत्माकारक के नियम को सत्य साबित कर रहा है। 7. अब सातवें उदाहरण पर दृष्टि डालें। जातक का जन्म 11.10.1902 को हुआ। जातक की शादी 20.12.1914 को हुई। शादी के समय दशा तुला की और अंतर्दशा मकर की थी। लग्न ः 17°20श् सूर्य ः 17°24श् चंद्रमा ः 16°30श् मंगल ः 0°40श् बुध ः 10°20श् गुरु ः 14°58श् शुक्र ः 13°28श् शनि ः 28°52श् राहु ः 3°18श् उपपद: षष्ठ भाव दाराकारक: मंगल आत्माकारक: शनि उपपद: उपपद की दृष्टि दशा तुला और अंतर्दशा मकर पर पड़ रही है। इस प्रकार उपपद दशा और अंतर्दशा दोनों को प्रभावित कर रहे हैं। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक मंगल है जो सिंह राशि में बैठा है। दाराकारक मंगल की दृष्टि दशा तुला और अंतर्दशा मकर दोनों पर पड़ रही है। इस प्रकार दाराकारक दोनों को प्रभावित कर रहा है। आत्माकारक: इस कुंडली में आत्माकारक शनि है। आत्माकारक शनि से द्वितीय भाव में मकर है जो अंतर्दशा राशि है और दशा राशि तुला शनि से एकादश है। इस प्रकार आत्माकारक दानों को प्रभावित कर रहा है। 8. अब आठवां उदाहरण देखें। जातक का जन्म 8.7.1976 को हुआ। जातक की शादी 5.11.1996 को हुई। शादी के समय मिथुन की दशा और मेष की अंतर्दशा थी। लग्न ः 17°49श् सूर्य ः 23°6श् चंद्रमा ः 15°54श् मंगल ः 7°30श् बुध ः 14°53श् गुरु ः 0°2श् शुक्र ः 28°45श् राहु ः 16°48श् उपपद: तृतीय भाव, मेष राशि दाराकारक: गुरु आत्माकारक: शुक्र उपपद: उपपद से तृतीय भाव में मिथुन राशि है जो दशानाथ है। उपपद से तृतीय भाव में दशानाथ के होने से जातक की शादी किसी रिश्तेदार या रिश्तेदार के सहयोग से होगी। उपपद अंतर्दशा मेष में ही बैठा है। इस प्रकार उपपद दशा और अंतर्दशा दोनों को प्रभावित कर रहा है। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक गुरु है जो चतुर्थ भाव में बैठा है। दशानाथ मिथुन दाराकारक से द्वितीय भाव में है और अंतर्दशा मेष दाराकारक से द्वादश भाव में है। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों दाराकारक के नियमों के अनुसार प्रभावित हो रहा है। आत्माकारक: आत्माकारक शुक्र दशानाथ मिथुन में बैठा है और आत्माकारक शुक्र से एकादश मेष राशि है जो अंतर्दशानाथ है। इस प्रकार आत्माकारक भी दशा और अंतर्दशा राशियों को प्रभावित कर रहा है। 9. अब नौवां उदाहरण देखें। जातक का जन्म 3.1.1947 को हुआ। जातक की शादी 10.7.1967 को हुई। शादी के समय दशा कुंभ और अंतर्दशा मिथुन थी। लग्न ः 25°8श् सूर्य ः 18°32श् चंद्रमा ः 18°36श् मंगल ः 19°24श् बुध ः 6°36श् गुरु ः 27°35श् शुक्र ः 4°14श् शनि ः 14°9श् राहु ः 18°24श् उपपद: तृतीय भाव, धनु राशि दाराकारक: शुक्र आत्माकारक: गुरु उपपद: दशानाथ कुंभ उपपद से तृतीय भाव में है और अंतर्दशा मिथुन उपपद से सप्तम भाव में है और अंतर्दशा मिथुन पर दृष्टि भी है। इस प्रकार उपपद का नियम दशा और अंतर्दशा पर लागू हो रहा है। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक शुक्र द्वितीय भाव में है। दाराकारक शुक्र का किसी प्रकार का संबंध दशानाथ कुंभ से नहीं है। परंतु दाराकारक की दृष्टि अंतर्दशा मिथुन राशि पर पड़ रही है। आत्माकारक: आत्माकारक गुरु कुंभ राशि पर पड़ रही है और मिथुन राशि भी आत्माकारक से नवम भाव में बैठी है। इस प्रकार आत्माकारक दशा और अंतर्दशा दोनों को प्रभावित कर रहा है। 10. अब दसवां उदाहरण देखें। जातक का जन्म 13.10.1963 मंे हुआ। जातक की शादी 25.2.1994 को हुई। शादी के समय दशा कन्या की और अंतर्दशा कुंभ की थी। लग्न ः 5°9श् सूर्य ः 25°51श् चंद्रमा ः 7°32श् मंगल ः 27°48श् बुध ः 10°32श् गुरु ः 20°27श् शुक्र ः 7°37श् शनि ः 23°10श् राहु ः 22°11श् उपपद: दशम भाव, कन्या राशि दाराकारक: चंद्रमा आत्माकारक: मंगल उपपद: उपपद स्वयं कन्या राशि में बैठा है जो दशानाथ है। परंतु अंतर्दशा कुंभ के साथ किसी भी प्रकार का संबंध (उपपद के तीन नियम से) नहीं हो पा रहा है। दाराकारक: इस कुंडली में दाराकारक चंद्रमा है जो नवम भाव में बैठा है। दशानाथ कन्या दाराकारक से द्वितीय भाव में और अंतर्दशा कुंभ दाराकारक से सप्तम भाव में है। इस प्रकार दाराकारक का प्रभाव दशा और अंतर्दशा दोनों पर पड़ रहा है। आत्माकारक: इस कुंडली में आत्माकारक मंगल है जो एकादश भाव में बैठा है। आत्माकारक मंगल से दशानाथ कन्या द्वादश भाव में है और अंतर्दशा कुंभ पर आत्माकारक की दृष्टि पड़ रही है। इस प्रकार दशा और अंतर्दशा दोनों पर आत्माकारक का प्रभाव पड़ रहा है। यहां पाठकगण एक बात को बताना कि अगर उपपद, आत्माकारक और दाराकारक से दशा और अंतर्दशा तृतीय भाव में पड़ती हों तो उस राशि की दशा और अंतर्दशा में शादी हो सकती है, परंतु यह किसी रिश्तेदार से या रिश्तेदार के सहयोग से होगी। उपपद, आत्माकारक और दाराकारक से एकादश भाव की राशि की दशा और अंतर्दशा में शादी हो सकती है परंतु ऐसी स्थिति में पत्नी और पति दोनों नौकरी करने वाले होंगे। अगर तीनों खंडों (उपपद, दाराकारक और आत्माकारक) का प्रभाव दशा और अंतर्दशा पर पड़ता हो तो शादी की 90ः ,किन्हीं दो खंडों का प्रभाव रहने पर 70ः संभावना रहती हैै जबकि सिर्फ एक खंड के प्रभाव से शादी नहीं हो सकती है। पाठकगण सबसे पहले विंशोत्तरी दशा से शादी का समय निकालें और उसके बाद चर दशा से। दोनों दशाओं से जो एक समय निकलता है उस समय शादी अवश्य होगी।


उच्च फलादेश तकनीक विशेषांक  अप्रैल 2005

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