मंत्र सार

मंत्र सार  

व्यूस : 541 | नवेम्बर 2004

मननात् त्रायत इति मंत्रः, मनन त्राण धर्माणो मंत्राः। मन को शक्ति प्रदान कर के समस्त भयों से रक्षा करने वाले शब्दों को ‘मंत्र’ कहते हैं। मन’शब्द से मन को एकाग्र करना, ‘त्र’ शब्द से त्राण (रक्षा) करना जिसका धर्म है, वे मंत्र कहे जाते हैं।

मंत्र ही समस्त जातकों को मंत्रणा प्रदान करता है। मंत्र ही मन को समृद्ध एवं शांत बनाता है। मंत्र के अभिमंत्रण से किसी भी व्यक्ति, वस्तु, या स्थान को सुरक्षित रखा जा सकता है। वर्णमाला के ‘अ’ से ले कर ‘क्ष’ तक 50 अक्षरों को मातृका कहा गया है। मातृका शब्द का अर्थ माता, अथवा जननी होता है। अतः समस्त वाङ्मय की यह जननी है। संसार का व्यवहार शब्दों के द्वारा होता है। इसलिए शब्द शक्ति सर्वोपरि मानी गयी है।

ऋग्वेद के अनुसार मंत्र की पराश्रव्य ध्वनि वायु मंडल को बहुत प्रभावित करती है। मंत्र शक्ति क्रियात्मक ध्वनि तरंगों का पुंज है। मंत्र की तरंगें मस्तिष्क तथा ब्रह्मांडीय वातावरण को प्रभावित करती हैं।

मंत्रों की 3 जातियां मानी गयी हैं: पुरुष, स्त्री एवं नपुंसक। जिन मंत्रों के अंत में वषट्, या फट् का उपयोग होता है, वे पुरुषसंज्ञक हैं। स्वाहा, अथवा वौषट होने पर स्त्रीसंज्ञक तथा हुं एवं नमः अंत वाले मंत्र को नपुसंकसंज्ञक माना गया है। वशीकरण, उच्चाटन एवं स्तंभन में पुरुष मंत्र, क्षुद्र कर्म एवं रोगों के नाश के लिए स्त्रीसंज्ञक मंत्र एवं अभिचार में नपुंसक मंत्रों का प्रयोग सिद्धप्रद होते हैं।

1 अक्षर के मंत्र को ‘पिंड’ संज्ञा, 2 अक्षर को कर्तरी, 3 से 9 अक्षरों तक के मंत्र को ‘बीज’ मंत्र, 10 अक्षर से 20 अक्षर तक को ‘मंत्र’, 20 से अधिक अक्षर के मंत्रों को संज्ञा ‘माला’ माना गया है। इन्हीं नाद शक्तियों के पृथक-पृथक प्रभाव से मंत्र के जपकर्ता को लाभ होता है। जिस तरह किसी बीज में सूक्ष्म रूप से वृक्ष का सर्वांग छिपा होता है, जिसे प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता है, उसी प्रकार छोटे से मंत्र में उसके अनेक गुण प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखे जा सकते हैं।

अभीष्ट सिद्धि के लिए समस्त मंत्रों को बतायी गयी संख्या में जप, पाठ आदि करना लाभप्रद होता है। यदि किसी मंत्र के प्रति जातक को संशय, भ्रांति हो, तो मंत्र के शुरुआत में ‘ह्रीं श्रीं क्लीं’ लगा कर जप-पाठ आदि करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी भी मंत्र के आदि एवं अंत में प्रणव ‘˙’ लगा कर जप-पाठ आदि करना सिद्धिदायक होता है। जिन मंत्रों का जप किसी विशेष कार्यसिद्धि के लिए होता है, उनके लिए न्यास, विनियोग, संकल्प, उत्कीलन, शापोद्धार आदि आवश्यक होते हैं, यद्यपि निष्काम भावना के जप में न ही विशेष नियम-संयम का प्रावधान है, न ही संकल्पादि की आवश्यकता; अर्थात निष्काम भावना से यथाशक्ति यथासंख्यात्मक जप-पाठ किया जाता है।


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समस्त मंत्रों के उद्भवकत्र्ता शिव को मंत्रों का जनक माना जाता है। अतः किसी भी मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला पर करें, तो बेहतर परिणाम सम्मुख आएंगे। ज्योतिष के प्रांगण में भी मंत्रों का महत्व सर्वोपरि है। जब किसी जातक की कुंडली में किसी ऐसे ग्रह की कमजोरी देखी जाती है, जिस ग्रह का रत्न धारण नहीं हो सकता है, तो ऐसी स्थिति में मंत्र जप ही लाभ प्रदान करता है।

औषधि मणि मंत्राणां ग्रह-नक्षत्र तारिका। भाग्य काले भवेत्सिद्धिः, अभाग्यं निष्फलं भवेत्।।

औषधि, मणि, या मंत्र तब कार्य करते हैं, जब ग्रह-नक्षत्र आदि शुभ होते हैं। अशुभ काल में सभी निष्फल हो जाते हैं; अर्थात, यदि समय सही चल रहा हो, तो मंत्र अवश्य शुभ फल देते हैं।

मंत्र चिकित्सा अनेक असाध्य रोगों के लिए भी उचित मानी गयी है। जिन रोगों का निदान दुर्लभ होता है, अथवा विषघटी, गंडमूल, विष कन्या तथा अनेक प्रकार के दोषों का उपाय, अन्य उपायों की अपेक्षा, मंत्र द्वारा उत्तम माना गया है।

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दीपावली, दशहरा, शिव रात्रि, नव रात्रि, सूर्य एवं चंद्र ग्रहण आदि विशिष्ट पर्वों में मंत्र जप का महत्व एवं फल अधिक होता है। मंत्र शक्ति की वृद्धि के लिए मंत्र का पुरश्चरण (नियमित एवं निश्चित संख्यात्मक जप) करना चाहिए; अर्थात् जब तक कोई जातक अमुक मंत्र का निश्चित पुरश्चरण नहीं करता है, तब तक वह मंत्र उसे पूर्ण फलीभूत नहीं होता है। अतः किसी मंत्र का पुरश्चरण कर लेने से उसमें असीमित शक्ति जागृत हो जाती है।

प्रत्येक अक्षर, अथवा शब्द का जन्म तो होता है, परंतु उसका विलय नहीं होता है। इसी लिए शब्द को ब्रह्म माना गया है। यदि यही अक्षर शुद्ध सात्विक तथा धर्म एवं आध्यात्म से जुड़े हों, तो ये अक्षर, अथवा शब्द ‘मंत्र’ बन कर, ब्रह्मांड में अमरता प्राप्त कर के, युगो-युगों पर्यंत अपना प्रभाव संपूर्ण विश्व को प्रदान करते रहते हैं।

शब्द के इसी प्रभाव के कारण मंत्रों को सर्वोपरि माना गया है। श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक किया गया मंत्र जप, अथवा मंत्र पाठ जातक को निश्चय ही लाभ देता है।


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