शनि की कहानी शनि की ज़ुबानी

शनि की कहानी शनि की ज़ुबानी  

व्यूस : 21437 | नवेम्बर 2011
शनि की कहानी शनि की जुबानी के. के. निगम मुझे शनैश्चराय सौराय, कृष्णाय आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। अंग्रेजी में मुझे सैटर्न, फारसी में केवान तथा अरबी में जुहल कहा जाता है। ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मेरा जन्म हुआ है। मेरे पिता सूर्य हैं तथा माता का नाम छाया है। यमराज में छोटे भाई तथा यमुना मेरी बहन है। मेरा आधिपत्य मकर एवं कुंभ राशि पर है तथा पुष्य, अनुराधा एवं उŸाराभाद्रपद मेरे नक्षत्र हैं। मेरा रंग काला, नेत्र सुंदर, आकृति दीर्घ, नपुसंक लिंग एवं पैर से विकलांग (लंगड़ा) हूं। मेरी प्रकृतिवात व कफ है। मैं काले वस्त्र धारण करता हूं इसी के साथ-साथ वृद्ध, तमोगुणी, शिशिर ऋतु पर आधिपत्य रखता हूं। पश्चिम दिशा का स्वामी, शूद्र वर्णा एवं श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधि हूं। मैं शमसान एवं शराब खाना आदि स्थानों पर क्रीड़ा करता हूं, रात्रिबली हूं मेरा वार शनिवार है तथा गिद्ध पर सवारी करता हूं। मेरा रस कसैला एवं धातु लोहा है। मैं नैसर्गिक रूप से पापी ग्रह हूं। मुझे कुंडली में 6वें एवं 12वें तथा 10वें, 8वें भाव का कारकत्व प्राप्त है तथा मैं अपने बैठे स्थान से तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव पर दृष्टिपात करता हूं। इसी के साथ-साथ तुला राशि में 20 अंश तक उच्च का एवं मेष राशि में 20 अंश का नीच रहता हूं। मेरी राशि पृष्ठोदयी एवं निवास उसर भूमि है। मैंने जब भगवान शिव की आराधना की थी तब, उन्होंने मुझे दण्डनायक ग्रह घोषित कर न्यायाधीश की पदवी दी थी तथा नवग्रहों में स्थान प्राप्त किया था। यही कारण है कि मैं मनुष्य हो या देव, पशु हो या पक्षी, राज हो या रंक उनके कर्मानुसार उन्हें मिलने वाले दण्ड भी निर्धारण कर निर्णय देता हूं, फिर चाहे व्यक्ति का वह दुष्कर्म इस जन्म का हो या पूर्व जन्म का हो। आज कलियुग में भी न्यायपालिका द्वारा चोरी अपराध आदि की सजा देने का प्रावधन है। यह व्यवस्था समाज की अपराधिक प्रवृŸिा को रोकने के लिए ली गई है, जिससे स्वच्छ समाज का निर्माण हो सके तथा अपराध की पुनरावृति न हो, इसलिए मनुष्यांे के कर्मों के अनुसार मैं उन्हें पुरस्कार एवं दण्ड आदि देता हूं। कृपया आप लोग मुझे गलत न समझें। उपरोक्त चरित्र मेरा पौराणिक एवं ज्योतिषीय है। अब मेरा वैज्ञानिक स्वरूप भी जान लीजिए: मैं सौरमंडल में सबसे सुंदर ग्रह हूं। सौरमंडल में गुरु के बाद मैं स्थित हूं। मैं भूमि से एक तारे के समान दिखाई देता हूं। मेरे पूर्वी पश्चिमी व्यास की अपेक्षा दक्षिणोŸार व्यास लगभग 12000 किमी. कम है। अर्थात मैं गोल न होकर चपटा हूं। मेरा व्यास लगभग 120000 किमी. से भी ज्यादा है जो पृथ्वी के व्यास से 9 गुणा अधिक है। मैं अपने पिता सूर्य से 140 करोड़, 80 लाख किमी. की दूरी पर स्थित हूं। इस दूरी के कारण ही सूर्य का बहुत कम प्रकाश मुझ तक पहुंच पाता है। इसलिए सामान्यतः मेरे यहां अंधेरा ही रहता है। मेरे यहां भाव और वायु प्रवाह अधिक होने के कारण यह वातावरण प्राणियों के लिए अनुकूल नहीं है, इसलिए वहां जीवन नहीं है। मेरे यहां का वातावरण धूल के कणों और गैस के बादलों से भरा रहता हूं। मेरा एक दिन पृथ्वी के एक सौर मास के बराबर होता है और पृथ्वी के ढाई वर्ष के बराबर मेरा एक सौर मास होता है। इस दौरान मैं कई बार वक्री और मार्गी होता हूं। मेरे चारो ओर नील, वलय, कंकड़ नाम के तीन वलय हैं जो यमुनाकाल में मुझसे अलग रहते हुए भी मेरे साथ घूमते हैं, जिससे मेरी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। विज्ञान के अनुसार मेरे अलावा अन्य किसी भी ग्रह के पास वलय नहीं है। मेरे 10 चंद्रमा हंै मैं सब ग्रहों में न्यूनतम भार वाला ग्रह हंू। मैं गुरु से ठंडा तथा आकार में छोटा हूं। नवम्बर 1980 में पृथ्वी वासियों ने वाॅयेजर-1 उपकरण मेरे पास भेजा था। जिसने मेरे वलयों को मापा था जोकि कणों से बने हुये हैं, इन कारण् ाों का व्यास उसने कुछ सेंटीमीटर से 8 मी. तक पाया था। मेरे ऊपर तेज हवाएं चलती हैं जिनका वेग 1760 कि.मी. प्रतिघंटा तक होता है। मेरी महिमा अपरंपार है जब मैं तुला, कुंभ या मकर राशि में विचरण करता हूं तो उस अवधि में किसी का जन्म हो तो रंक घर में पैदा होने के बावजूद उसे राजा बना देता हूं। यदि जातक के जन्म के समय मैं मिथुन, कर्क, कन्या या धनु अथवा मीन राशि पर स्थित होता हूं तो सामान्य फलदायक होता हूं। मेष, सिंह तथा वृश्चिक राशियांे में विचरण करते समय जन्म लेने वाले जातक प्रतिकूल फल प्राप्त करते हैं हस्तरेखा शास्त्र में मध्यमा अंगुली के नीचे एवं गुरु एवं सूर्य पर्वत के बीच में स्थित रहता हूं तथा अंकशास्त्र में प्रत्येक माह की 8, 17, 26 तिथियों का स्वामी हूं। अपवाद को छोड़ दिया जाये तो जातक के जीवन में 3 बार मेरी साढ़ेसाती प्रभावित करती है। आपने यह तो सुना ही होगा कि प्रभु जिसको उसके कर्मों के अनुसार फल देना चाहते हैं, उसकी बुद्धि का पहले ही हरण कर लेते हैं, मेरा भी यही सिद्धांत है कि जिस व्यक्ति को मुझे दण्ड उसके द्वारा किये गये दुष्कर्मों का देना होता है तो मैं उसकी बुद्धि का हरण कर लेता हूं या अन्य की बुद्धि का नाश करके ऐसे कारण उत्पन्न कर देता हूं कि मनुष्य वैसा ही हो जाये। लीजिये इस संबंध में आपको कुछ पौराणिक वृतांत बताता हूं। राजा हरिश्चंद्र की परेशानी: राजाहरिश्चंद्र को मेरी दशा में दर-दर ठोकरें खानी पड़ी थीं। रावण की दुर्गति: प्रकांड पंडित रावण भी पराक्रम तीनों लोकों में फैला हुआ था। मेरी दशा में रावण घबरा गया। अपने बचाव के लिए मुझ पर आक्रमण करने पर उतारू हो गया तथा शिव से प्राप्त त्रिशूल से उसने मुझे घायल कर अपने बंदी ग्रह में उल्टा लटका दिया। लंका को जलाते समय हनुमान जी द्वारा मुझे उल्टा लटकता देखकर उन्होंने मुझे बंधन मुक्त किया जिसके प्रतिकार में मैंने हनुमान जी से मेरे योग्य सेवा बताने का अनुरोध किया तो हनुमान जी ने कहा कि तुम मेरे भक्तों को कष्ट मत देना। तब से लेकर अब तक मैं हनुमान जी के भक्तों को कष्ट नहीं पहुंचाता हूं। अंत में राम-रावण युद्ध में मैंने उसके परिवार सहित उसको नष्ट करने में अपनी कुदृष्टि का भरपूर प्रयोग किया। क्योंकि मेरी दृष्टि प्रलयंकारी होती है। परिणाम स्वरूप श्रीराम की विजय हुई। महाराणा विक्रमादित्य पर मेरी जब महादशा आई तो चित्र ही ............ निगल गया/तथा उन्हें तेली के घर में कोल्हू चलाना पड़ा। पांडवों का वनवास: जब पांडवों की जन्मकुंडली में दशा आई तो मैंने ही द्रोपदी की बुद्धि को भ्रमित करके कौरवों को कड़वे वचन कह लाये, परिणाम स्वरूप पांडवों को वनवास भोगना पड़ा। यदि आप पृथ्वी वासी चाहते हैं कि मैं आप लोगों से प्रसन्न रहूं तो आप निम्न उपाय करें मैं आप लोगों का विश्वास दिलाता हूं कि अपनी दशा-महादशा, गोचर, अशुभ भाव आदि में बैठने के फल साढ़ेसाती ढैया आदि के फल में न्यूनता रखूंगा। छायादान करें। भोजन में काली मिर्च एवं नमक का प्रयोग करें। श्रमिक वर्ग एवं असहाय, विकलांग व्यक्तियों को भोजन कराएं। शनिवार को सूर्यास्त के बाद आटे से बना दीपक पीपल वृक्ष के नीचे जलाएं। शनिवार को हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें। मादक वस्तुओं का प्रयोग न करें। वर्ष 12 बार पीपल की जड़ में सूखे नारियल में बूरा एवं पंचमेवा भरकर दबाएं। शनि की होरा में कोई भी खाद्य पदार्थ ग्रहण न करें। ज्योतिषी से परामर्श करके मेरा रत्न नीलम धारण करें। पत्रिका लग्न में मैं अकारक हंू तो नीलम के स्थान पर बिना जोड़ का लोहे का छल्ला प्रदान पहनें। काले कपड़े में आठ सौ ग्राम लकड़ी के कोयले व एक नारियल रखकर अपने ऊपर से उतार कर जल में लगातार आठ शनिवार प्रवाहित करें। मेरे 108 नामों का जप करें या शनिअष्टक का पाठ करें। मुझको प्रसन्न करने के अन्य और भी बहुत से उपाय हैं, परंतु यदि उपरोक्त वर्णित उपाय कर लें तो मैं शांत हो जाता हूं।

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शनि विशेषांक  नवेम्बर 2011

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