पुंसवन संस्कार

पुंसवन संस्कार  

विजय प्रकाश शास्त्री
व्यूस : 16356 | मई 2014

पुंसवन संस्कार-(दूसरा संस्कार) पुंसवन संस्कार ‘भावी सन्तति स्वस्थ, पराक्रमी व पुत्र हो’- इस प्रयोजन से गर्भ के संस्कार के रूप में किया जाता है। पुत्र अभिलाषा न होने पर भी धर्मसिन्धु के अनुसार यह संस्कार प्रत्येक गर्भ का होना चाहिए। समय ‘अथ पुंसवनम्। पुरा स्यन्दत इति मासे द्वितीये तृतीये वा’। यह पारस्कर गृह्य सूत्र वचन है। गर्भ उचित रीति से आगे बढ़े- इस आकांक्षा से यह संस्कार किया जाता है। प्रायः यह धारणा है कि यह संस्कार सन्तान ‘पुत्र’ हो इस इच्छा से किया जाता है। परन्तु यज्ञानुष्ठान की रचना इसलिये की गई है कि सन्तान इच्छानुसार वीर्यवती हो। माता की इच्छा मन पर अवष्य प्रभाव डालती है। जहां तक औषधि का सम्बन्ध है श्री अत्रिदेगुप्त विद्यालंकार लिखते हैं कि बरगद की कोंपल (या नरम दाढ़ी), सहदेवा, विष्वेदेवा इसमें से किसी एक को दूध में बारीक पीसकर इनका रस अपने हाथ से स्त्री के नासापुट में तीन, चार, पांच बूंद डालें।

पुत्र की इच्छा से दक्षिणा नासापुट में और कन्या की इच्छा से वाम नासापुट में दूसरे या तीसरे महीने के जिस दिन, प ुष्य-प ुनर्व स ु-म ृगषिरा-हस्त-म ूल और श्रवणादि पुल्लिंग नाम वाला कोई नक्षत्र हो, उस दिन गर्भिणी को उपवास, पश्चात् आचमन प्राणायामक कर देष-काल का संकीर्तन करता हुआ निम्नलिखित संकल्प पढ़ेः- संकल्प- अस्यां भार्यायामुत्पत्स्यमानगर्भस्य बैजिकगार्भिक-दोष परिहारार्थं पुंरूपत्वसम्पत्तये च श्रीपरमेष्वरप्रीत्यर्थं पुंसवनमहं करिष्ये। तन्निर्विघ्नसमाप्तये च गणपतिपूजनं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं वसोर्धारा आयुष्यमन्त्रजपं नान्दीश्राद्ध ं च करिष्ये। सामान्य विधि सामान्यपूजनविधि-प्रकरण में बतलाई रीति से गणेषादि पूजन करें। संक्षिप्त होम विधि से होम के अन्त में आरती से पहले निम्न विषेष विधि करेंः- औषधि प्रयोग संस्कार के दिवस से पूर्व रात्रि में बड़ वृक्ष की (वटारोह) जटाओं और उस के शुंग (नये पत्तों के ऊपर की फुनगियों को एक पक्ष में इन दोनों को तथा दूसरे पक्ष के अनुसार) कुषाओं के अग्रभाग और सोमलता (सोमलता के अभाव में ब्राह्मी औषधि) इन चारों को जल में पीसकर रस निकाल कर रखें।

वह रस इस समय निम्न मन्त्र पढ़कर पति पत्नि के दाहिने नासिका रन्ध्र में प्रविष्ट करावेः- ऊँ हिरण्यागर्भः समवत्र्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम। ऊँ अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्य विष्वकर्मणः समवत्र्तताग्रे। तस्य स्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मत्र्यस्च देवत्वमाजानमग्रे।। गर्भाभिमन्त्रण पश्चात् पति-पत्नि के उदर की ओर हाथ बढ़ाकर निम्न मन्त्र बोलें:- ऊँ सुपर्णोऽसि गरुत्माँ स्त्रिवृत्ते षिरो गायत्रं चक्षुर्बृहद्रथन्तरे पक्षौ स्तोम आत्मा छन्दा स्यंगानि यजू षि नाम। साम ते तनू र्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गुरुत्मान् दिवं गच्छ स्वः पतः। आरती आदि के पश्चात् पुंसवन कर्म की अंगपूर्ति के निमित्त संकल्पानुसार विद्वान् और ब्राह्मणों को भोजन करावें। उनको दक्षिणा आदि से सम्मानित कर आषीर्वाद ग्रहण कर विदा करें और देवता-विसर्जन करें। पुंसवन के पश्चात् पुंसवन संस्कार का उद्देष्य हम ऊपर बता आये हैं। परन्तु केवल संस्कार करने से ही इसके सम्पूर्ण उद्देष्य की पूर्ति सम्भव नहीं है। सन्तान की उत्पत्ति पर्यन्त गर्भ एवं गर्भिणी की समुचित रक्षा एवं देख-भाल की आवष्यकता है। इसके लिए अनेक शास्त्रों में नियम व धर्म बताये गये हैं। उनका यथोचित् पालन करते रहने का व्रत लेना और पालन करना भी इस संस्कार का उद्देष्य है। विवाह के पश्चात् नवदम्पत्ति के साथ-साथ सम्पूर्ण परिवार की यह आकांक्षा होती है कि घर में शीघ्र ही नये मेहमान का आगमन हो अर्थात् संतान का जन्म हो।

इसके साथ सभी की यह भी प्रबल कामना रहती है कि संतान के रूप में पुत्र का ही जन्म होना चाहिए। प्रथम संतान के रूप में परिवार में पुत्र का जन्म होता है तो उत्सव जैसा आनन्द प्राप्त हो जाता है। ऐसा लगता है कि मानो सभी की मनोकामना पूर्ण हो गयी हो इसलिए पुत्र के महत्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। परिवार में पुत्र जन्म के महत्व को प्राचीनकाल से ही स्वीकार किया गया है। पुत्र ही वंष परम्परा को आगे बढ़ाता है और वही परिवार के दायित्वों को वहन करने में सक्षम होता है। इस स्थिति को विद्वान मनुष्यों ने भी स्वीकार किया है और शास्त्रों में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। इसके साथ-साथ पुत्र द्व ारा ही पिता को मुक्ति की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख प्राप्त होता है कि ‘पुम्’ नामक नरक से जो रक्षा करता है, उसे पुत्र कहा जाता है। कुछ विद्वानों को मत है कि मृत्यु के पश्चात पुत्र द्वारा चिता को मुखाग्नि देने तथा अन्त्येष्टि आदि के पश्चात् ही मृतक की आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसा होने पर व्यक्ति को नरक की प्राप्ति नहीं होती और वह सीधा स्वर्ग को प्रस्थान करता है।

इसलिए नरक से बचने के लिए व्यक्ति पुत्र की कामना करता है। इस बारे में कहा गया है - पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रः अर्थात् पुम् नामक नरक से जो रक्षा करता है उसे पुत्र कहा जाता है। पुत्र संतान के बारे में कुछ विद्वानों ने इसकी व्याख्या अलग प्रकार से की है। उनका मानना है कि प्राचीन काल में हमारे देष के विभिन्न राज्यों को अनेक प्रकार के युद्धों को झेलना पड़ा है। युद्ध को जीतने के लिए सैनिकों की आवष्यकता रहती है। दीर्घावधि तक अनेक युद्ध लड़े गये, इसमें हजारों, लाखों व्यक्तियों को अपने प्राण गंवाने पड़े। इसके उपरान्त भी तब पुरुषों की संख्या में कभी कमी नहीं होती थी। इसका कारण यह माना गया कि तब प्रत्येक परिवार में पुत्र संतान की संख्या अधिक हुआ करती थी जिसके लिए विद्वान महर्षि पुंसवन संस्कार को कारण मानते हैं। उनके अनुसार तब पुत्र प्राप्ति के लिए पुंसवन संस्कार किया जाता था जिसके प्रभाव से निष्चित रूप से पुत्र संतान की प्राप्ति होती थी। इसके बारे में स्मृति संग्रह में कहा गया है- गर्भाद् भवेच्च पुंसुते पुंस्त्व रूपप्रतिपादनम् अर्थात् इस गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो इसलिए पुंसवन संस्कार किया जाता है। पुत्र संतान की अभिलाषा सर्वाधिक व्यक्ति करते हैं । इस अभिलाषा की पूर्ति के लिए ही शास्त्रों में पुंसवन संस्कार का उल्लेख प्राप्त होता है। गर्भ जब दो-तीन मास का होता है अथवा स्त्री में गर्भ के चिह्न स्पष्ट हो जाते हैं तभी पुंसवन संस्कार को सम्पन्न करने का विधान बताया गया है।

आष्वलायन-गृह्यसूत्र में इस संदर्भ में प्राप्त हुए उल्लेख के अनुसार गर्भाधान के तीसरे महीने में पुनर्वसु नक्षत्र में उपवास करते हुए पत्नी की हथेली में थोड़ा सा दही रखकर उसमें सेम के दो बीज तथा जौ का एक दाना डालकर पीना चाहिए। ऐसे में पति पूछता है कि क्या पी रही हो ? इस प्रष्न के उत्तर में पत्नी को पति से कहना चाहिए- पुंसवन। ऐसा तीन बार कहना चाहिए। दही पीते समय पत्नी को ईष्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि गर्भ में जो संतान है वह स्वस्थ, पराक्रमी और पुत्र ही होकर जन्म ले। इस प्रकार के भावों के प्रभाव से तथा पुंसवन संस्कार के द्वारा गर्भ के मांसपिण्ड में पुरुष के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। पुंसवन संस्कार का ही एक अन्य स्वरूप भी है जिसे अनवलोभन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार के करने से गर्भस्थ षिषु की रक्षा होती है। अर्थात् गर्भपात के कारण गर्भ में पलने वाला जीव नष्ट नहीं होता है। गर्भधारण के पश्चात् षिषु की रक्षा के लिए मांगलिक पूजन तथा हवन आदि किये जाते हैं। इसके पश्चात् जल एवं औषधियों की प्रार्थना का विधान है। पुराणों में भी पुंसवन संस्कार का उल्लेख प्राप्त होता है जिसमें पुंसवन नामक एक व्रत विषेष का विधान बताया गया है। यह व्रत एक वर्ष तक चलता है। इस व्रत को करने के लिए स्त्रियां अपने पति से आज्ञा प्राप्त करती हैं, इसके पश्चात् व्रत का संकल्प लेकर व्रत प्रारम्भ करती हैं। इस व्रत के महत्व के बारे में भागवत के छठे स्कंद में अध्याय 18-19 में बताया गया है कि महर्षि कष्यप की आज्ञा से दिति ने इन्द्र का वध करने की क्षमता वाले पुत्र की कामना से यह व्रत किया था।

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रत्न एवं रूद्राक्ष विशेषांक  मई 2014

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