नाभि चढ़ना : एक वास्तविक समस्या

नाभि चढ़ना : एक वास्तविक समस्या  

अविनाश सिंह
व्यूस : 109166 | अकतूबर 2011

नाभि का अपने स्थान से हट जाना, मानव शरीर में अस्वस्थता पैदा कर, कई प्रकार की शारीरिक व्याधियां उत्पन्न करता है, जिनका समाधान नाभि को पुनः यथास्थान पर ला कर ही होता है, औषधियों से नहीं। इस रोग को नाभि खिसकना, नाभि चढ़ना, धरण का टलना आदि नामों से जाना जाता है।

शिशु रूप में जब मानव गर्भावस्था में होता है, तब नाभि ही एकमात्र वह मार्ग होता है, जिसके माध्यम से वह अपनी सभी महत्त्वपूर्ण क्रियाओं, जैसे सांस लेना, पोषक तत्वों को ग्रहण करना तथा व्यर्थ और हानिकारक पदार्थों का निष्कासन करता है। जन्मोपरांत शिशु के गर्भ से बाहर आते ही सबसे पहला कार्य उसकी नाभि और मां के प्लेसेंटा का संबंध विच्छेदन करना तथा शिशु की नाभि-रज्जू को कस कर बांधना होता है।


जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें !


उदर और आंतों से संबंधित रोगों में, जैसे कब्ज और अतिसार आदि का जब सभी प्रकार के निरीक्षण करने पर भी रोग के कारण मालूम न हों, मल-परीक्षण करने से भी किसी जीवाणु का पता न चले, रोगी में पाचक रस, पित्त और पुनःसरण गति सामान्य हो, लेकिन उसके उदर के शारीरिक परीक्षण में नाभि पर धमनी की तीव्र धड़कन महसूस न हो कर उससे कुछ हट कर प्रतीत होती हो, जबकि सामान्य अवस्था में यह धड़कन नाभि के बिल्कुल मध्य में महसूस होती है और इसके अतिरिक्त रोगी के दोनों स्तनों के केंद्र की नाभि के मध्य से दूरी एक समान न हो कर अलग-अलग होती हो, रोगी के हाथ की दोनों कनिष्ठा अंगुलियों की लंबाई भी समान न हो कर कुछ छोटी-बड़ी मालूम होती हो, जबकि सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति में कनिष्ठा अंगुलियों की लंबाई एक समान ही होती है, तो कुछ विशेष प्रयासों के द्वारा जब नाभि के केंद्र को उसके केंद्र में पुनः स्थापित कर दिया जाता है, तो रोगी को, बिना किसी औषधि उपचार से, इन रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

प्रमुख लक्षण: नाभि चढ़ना, नाभि खिसकना, धरण का टलना आदि नामों से जाने जाने वाले रोग का सबसे प्रमुख लक्षण तो यही है कि नाभि अपने केंद्र में न हो कर उसके आसपास होती है, जिसके कारण आंत में मल सामान्य गति से आगे नहीं बढ़ता और आंत में अस्थायी अवरोध आ जाने से व्यक्ति को कब्ज रहने लगती है, अंतड़ियों में मल जमा होने लगता है। इसी कारण नाभि का स्थान स्पर्श करने से कठोर प्रतीत होता है।

आंतों में मल के अधिक जमाव से नाभि स्पंदन कुछ मध्यम होता जाता है और रोगी के पेट में भारीपन तथा धीमा दर्द रहने लगता है। कभी-कभी आंत में अवरोध के बजाय उनके अपने विस्थापन, या किसी अन्य अंग के दबाव से आंत में तीव्र उत्तेजना उत्पन्न होने लगती है, जिससे छोटी आंत की पुनःसरण गति तथा बृहत आंत की समूह गति तीव्र हो जाती है। मल पर्याप्त समय तक अंतड़ियों में रुक नहीं पाता है। उसके पोषक पदार्थों एवं जल अंश का अवशोषण न हो पाने से रोगी को मरोड़ के साथ दस्त आने लग जाते हैं। ऐसी स्थिति में आंतें कठोर तो प्रतीत नहीं होतीं, किंतु, उनमें तरल भरा होने के कारण, नाभि की स्पंदन की एक तरंग सी कई स्थानों पर महसूस होता है।


अपनी कुंडली में सभी दोष की जानकारी पाएं कम्पलीट दोष रिपोर्ट में


रोगी में अतिसार वाली यह अवस्था यदि अधिक समय तक बनी रहे, तो उसके कारण रोगी के शरीर में विभिन्न पोषक तत्त्वों और जल का अभाव नजर आने लगता है। नाभि प्रदेश में स्थित आंत के किसी भाग के विस्थापन से कई बार उदर में स्थित किसी महत्वपूर्ण अंग को रक्त की आपूर्ति करने वाली रक्त धमनी, अथवा रक्त शिरा पर दबाव पड़ने से वह दबने लग जाती है। ऐसा होने पर उस अंग विशेष की रक्त की पूर्ति घट जाने से उस अंग की कार्यप्रणाली प्रभावित होने लग जाती है तथा तत्संबंधित रोगों का जन्म होता है। यदि उन अंगों से रक्त की निकासी प्रभावित होती है और उन अंगों की विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण उत्पन्न हुए व्यर्थ पदार्थ, रक्त के साथ वापिस न जा कर, उन्हीं अंगों में संचित होने लग जाते हैं। इससे उन अंगों का आकार बढ़ने लगता है और, कई प्रकार के विकार उत्पन्न हो कर, तत्संबंधी रोगों को जन्म देते हैं।

कारण: नाभि खिसकने के कई कारण हैं, जैसे आचानक चलते समय ऊंची-नीची जगह पर पांव पड़ना, शरीर को संतुलित किये बिना जल्दबाजी में वजन उठाना, ऊंचाई से छलांग लगाना, स्कूटर, कार, बस आदि में सफर करते समय वाहन का कई बार उछलने से झटका लगना। पेट में किसी प्रकार का आघात होना। स्त्रियों में कई बार गर्भावस्था में नाभि पर आंतरिक दबाव से भी नाभि अपने स्थान से हट जाती है।

उपचार: आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली के अतिरिक्त किसी अन्य चिकित्सा पद्धति ने इसे मान्यता प्रदान नहीं की है। लेकिन जब विशेष प्रकार की तकनीकों से इन रोगों में स्थायी लाभ मिलते देखा जाता है, तब इस रोग की कल्पना को स्वीकार करना पड़ता है।

नाभि को अपने स्थान पर पुनःस्थापित करने के लिए भारत में सैकड़ों विधियां प्रचलित हैं। इनमें से कुछ परीक्षित विधियां इस प्रकार हैं: प्रातः काल एक चम्मच आंवले का चूर्ण, एक गिलास गुनगुने पानी से, अथवा गुनगुने पानी में एक नींबू निचोड़ कर पी लें। यदि शौच विसर्जन की हरकत हो, तो शौच के लिए जाएं, अथवा एक-दो किलोमीटर सैर करने के लिए किसी खुले स्थान, बाग-बगीचे में जाएं। लगभग एक घंटे के उपरांत किसी भी चीज, जैसे पेड़ की शाखा, को दोनों हाथों से पकड़ कर लटक जाएं। लटकने पर पैर जमीन से एक फुट ऊंचें रहें और लटके-लटके पैरों को जोर से चार-पांच बार झटका दंे और पैरों को पूरी शक्ति से जमीन की तरफ खीचते हुए तानें। ऐसा कर के, नीचे उतर कर, लेट जाएं और लेटे-लेटे अपने पेट पर स्वयं के हाथों से, या किसी से मालिश करवाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को नाभि पर रखें तथा हल्के दबाव के साथ हाथों को दोनों तरफ फैलाते हुए पसलियों के पास लाएं। फिर, हाथों को बिना हटाए, पसलियों के मध्य जोड़ें तथा हल्के दबाव के साथ सीधे नाभि की तरफ ले जाएं। इस विधि से नाभि अपने स्थान पर स्थित हो जाती है।


Book Durga Saptashati Path with Samput


श्वसन में लेट कर, पेट पर नाभि के ऊपर जलता हुआ दीपक रख कर, एक लोटा, या गड़वी को उसपर उल्टा रख दें। थोड़ी देर में दीपक बुझ जाएगा और लोटा नाभि क्षेत्र की त्वचा पर चिपक जाएगा तथा त्वचा लोटे में उभर जाएगी। इससे भी नाभि यथास्थान पर आ जाती है।

अन्य उपचारों में रोग के लक्षणों के आधार पर चिकित्सा करें। हल्का व्यायाम, योगासन, या एक्युप्रेशर, कुशल चिकित्सक की देखरेख में, करें।

आहार चिकित्सा: आंतों की दुर्बलता से यह रोग बार-बार होता है। आंतों को सबल बनाने के लिए फल, सब्जियां भरपूर खाएं। फलो में संतरा, मौसमी, बेल, अनार, तरबूज, नाशपाती, सेब आदि का भरपूर उपयोग करें।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण: काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव नाभि का माना गया है। लेकिन अनुभव के अनुसार पंचम भाव में इसका स्थान पंचम भाव के अंतिम अंशों पर है, अर्थात् पंचम और षष्ठ भाव की संधि के निकट। इसलिए पंचम भाव, पंचमेश, पंचम भाव के स्थिर कारक गुरु के साथ-साथ लग्न और लग्नेश जब दुष्प्रभावों में रहते हैं, तो नाभि से संबंधित शारीरिक समस्याएं बनती हैं। इसी तरह सिंह राशि का अंतिम चरण भी नाभि का है, क्योंकि सिंह राशि के स्वामी सूर्य के दुष्प्रभावों में रहने से भी ऐसा रोग हो जाता है।

विभिन्न लग्नों में नाभि खिसकनाः

मेष लग्न: बुध पंचम भाव में, लग्नेश मंगल अष्टम भाव में, शनि से युक्त गुरु लग्न में, राहु नवम भाव में, सूर्य षष्ठ भाव में हों, तो नाभि संबंधी रोग होता है।

वृष लग्न: लग्नेश शुक्र दशम, या नवम भाव में बुध युक्त सूर्य से अस्त हो, अकारक गुरु पंचम भाव में हो, शनि तृतीय भाव में हो, मंगल द्वितीय भाव में हो, तो नाभि अपने स्थान से विचलित हो जाती है।

मिथुन लग्न: लग्नेश बुध, अकारक मंगल पंचम भाव में समान अंशों पर हों, पंचमेश शुक्र सप्तम भाव में एकादश भाव में बैठे गुरु से दृष्ट हो, सूर्य षष्ठ भाव में हो और केतु से युक्त, या दृष्ट हो, तो नाभि संबंधी विकार पैदा होते हैं।

कर्क लग्न: लग्नेश चंद्र सूर्य से अस्त हो, बुध पंचम भाव में राहु से युक्त हो, गुरु षष्ठ भाव में, पंचमेश मंगल अष्टम भाव में, शनि ग्यारहवें भाव में हो, तो नाभि से संबंधित विकार होते हैं।

सिंह लग्न: पंचमेश गुरु, सूर्य से अस्त हो कर, नवम दशम, या एकादश भाव में हो, शनि राहु से युक्त पंचम भाव में हो, मंगल षष्ठ भाव में हो, तो नाभि की व्याधि होती है।

कन्या लग्न: पंचमेश शनि अष्टम भाव में हो, लग्नेश बुध सूर्य से अस्त हो कर द्वितीय भाव में हो, मंगल पंचम भाव में हो, गुरु षष्ठ भाव में चंद्र से युक्त, या दृष्ट हो, तो नाभि में कष्ट होता है।

तुला लग्न: पंचमेश शनि, सूर्य से अस्त हो कर, दशम, या एकादश भाव में हो, लग्नेश शुक्र नवम भाव में हो, गुरु पंचम भाव में चंद्र से युक्त, या दृष्ट हो, तो जातक को नाभि संबंधी रोग होता है।

वृश्चिक लग्न: बुध पंचम भाव में, सूर्य चतुर्थ में, लग्नेश मंगल दशम, या ग्यारहवें भाव में हों, शनि षष्ठ भाव में, या अष्टम भाव में हो, राहु लग्न में हो, तो जातक को नाभि विकार होता है।


Know Which Career is Appropriate for you, Get Career Report


धनु लग्न: शुक्र-चंद्र पंचम भाव में हों, गुरु अष्टम भाव में सूर्य से अस्त अंजीर एक मीठा, मुलायम, गूदेदार तथा स्वास्थ्यवर्द्धक फल है। इसका गूदा मीठा होता है और बीज छोटे होते हैं। इसके कई आकार और रंग होते हैं। इसमें नमी, प्रोटीन, चिकनाई और कार्बोहाइड्रेट् तत्त्व होते हैं। सूखी अंजीर में पोषक तत्व अधिक होते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व शर्करा है। अंजीर में अनेक रोगनाशक गुण होते हैं, जो, बीमारी से आयी कमजोरी को दूर कर, सामान्य स्वास्थ्य प्राप्त करने में सहायता करते हंै। यह, शारीरिक और मानसिक तनाव दूर कर, शरीर को स्फूर्ति और शक्ति प्रदान करता है। अंजीर को दूध में उबाल कर पीने से शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है। यह एक उत्तम शक्तिवर्द्धक औषधि है। जिनके होंठ फूल जाते हैं और जीभ पर छाले हो जाते हैं, उन्हें अंजीर के सेवन से लाभ होता है। यह हृदय रोगों में उपयोगी है और नाक से खून गिरना बंद करता है। सूखे अंजीर में मधुमेह और श्वास रोगनाशक गुण हैं। अंजीर सब सूखे मेवों से अधिक लाभदायक है। यह चेहरे की कांति बढ़ाता है, बलगम को पिघला कर बाहर करता है। वह पुरानी खांसी में हो, बुध सप्तम भाव में, राहु लग्न में, पंचमेश मंगल द्वितीय भाव में हांे, तो जातक को नाभि से संबंधित विकार होता है।

मकर लग्न: पंचमेश शुक्र अस्त हो कर त्रिक भावों में, गुरु पंचम भाव में मंगल से युक्त, या दृष्ट हो, लग्नेश शनि सूर्य से षष्ठ, सप्तम, या अष्टम हो, तो जातक को नाभि से संबंधित रोग होता है।

कुंभ लग्न: लग्नेश शनि लग्न में हो और किसी ग्रह से दृष्ट, या युक्त नहीं हो, गुरु षष्ठ भाव और पंचम भाव की संधि के निकट हो कर षष्ठ भाव में हो, पंचमेश बुध त्रिक भावो में सूर्य से अस्त हो, षष्ठेश चंद्र पंचम भाव में हो, तो जातक को नाभि से संबंधित रोग होता है।

मीन लग्न: लग्नेश गुरु लग्न में अपने ही नक्षत्र में हो, पंचमेश चंद्र सूर्य से अस्त हो कर षष्ठ भाव में हो, बुध-शुक्र पंचम भाव और शनि के नक्षत्र में हों, तो जातक को नाभि से संबंधित रोग विकार होता है। रोग, संबंधित ग्रह की दशा, अंतर्दशा और गोचर के प्रतिकूल रहने से उत्पन्न होता है। जबतक संबंधित ग्रह प्रभावी रहेगा, तबतक रोग देगा। उसके उपरांत रोग से राहत मिलेगी।

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

दीपावली विशेषांक   अकतूबर 2011

futuresamachar-magazine

दीपावली पर्व की प्राचीनता, इतिहास व् धर्म, विभिन्न देशों दीपावली जैसे अन्य प्रकाश पर्व, दीपावली ऋतु पर्व धार्मिक पर्व के रूप में, दीपावली पूजन: कब और कैसे?

सब्सक्राइब


.