ग्रहों के शुभ फल प्राप्ति के लिए क्या उपाय करें

ग्रहों के शुभ फल प्राप्ति के लिए क्या उपाय करें  

ग्रहों के शुभ फल प्राप्ति के लिए क्या उपाय करें? प्रश्न: नव ग्रहों के षुभाषुभ, बलाबल एवं विभिन्न स्थितियों के आधार पर द्वादष लग्नों के लिए किये जाने वाले उचित व सटीक उपाय क्या हैं? विस्तार सहित वर्णन करें। अन्य उपायों की तरह ज्योतिषीय उपाय को भी दो भागों में विभक्त कर अध्ययन किया जा सकता है- पहला निरोधात्मक तथा दूसरा आरोग्यात्मक। निरोधात्मक उपाय उस उपाय को कहते हैं, जिसे अपनाने से किसी अशुभ फल या दुर्घटना से बचा जा सके अथवा यदि कोई अशुभ फल या दुर्घटना घटित भी हो चुकी हो तो उससे होने वाली विशेष क्षति से बचा जा सके। किसी महासंकट की संभावना के पूर्व महामृत्यंुजय का जप अथवा नारायण कवच का पाठ करना या करवाना ऐसा ही उपाय है। लग्नेश, राशीश, भाग्येश तथा पंचमेश से जुड़े रत्न धारण करने से भावी संकटों से रक्षा हो सकती है। कृष्णमूर्ति पद्धति की मान्यता है कि एकादश भाव के स्वामी, उपस्वामी, अवरस्वामी से जुड़े रत्न धारण से न केवल आकांक्षाओं की पूर्ति होती है, बल्कि भावी संकटों से भी रक्षा भी होती है। आरोग्यात्मक उपाय उस समय अपनाए जाते हैं, जब कोई जातक या जातका प्रतिकूल दशा या भुक्ति से गुजर रही हो या प्रतिकूल गोचर के प्रभाव में हो। यदि कोई जातक या जातका एक ही साथ प्रतिकूल दशा, भुक्ति और प्रतिकूल गोचर से भी गुजर रही हो तो उसकी पेरशानी बढ़ जाती है। इस परेशानी को दूर करने हेतु जो उपाय किए जाएंगे, उसे हम आरोग्यात्मक उपाय कहेंगे। आरोग्यात्मक उपाय का सावधानीपूर्वक निर्धारण करना आवश्यक है। इस तरह का उपाय देवोपासना द्वारा अथवा मंत्र जप द्वारा या दान-पुण्य आदि द्वाराकिया जाता है। यह निर्विवाद सत्य है कि बगैर सटीक डायग्नो के सटीक इलाज असंभव है। पीड़ादायक ग्रहों से संबंधित रत्न धारण करना पीड़ा को उत्प्रेरित करना होगा। इन पीड़ादायक ग्रहों की शांति हेतु देवोपासना, मंत्र जप, दान-पुण्य, व्रत तथा पवित्र जीवन-यापन आदि का सहारा लेना ही उचित होगा। नवमेश को प्रमुख रूप से भाग्येश माना गया है। लग्नेश तथा पंचमेश को पूरक भाग्येश कहा जाता है। यदि भाग्येश भी षष्ठेश, अष्टमेश, द्वादशेश या तृतीयेश हो तो उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए, बल्कि देवोपासना द्वारा भाग्यवृद्धि का उपाय करना उचित होगा। भाग्य स्थान में स्थित राहु, केतु अथवा अन्य पापी ग्रहों की शांति भी देवोपासना, मंत्र जप आदि द्वारा करनी चाहिए। लग्न, पंचम या नवम भाव में स्थित शुभ ग्रह भाग्य में वृद्धि करते हैं। लग्न, पंचम या नवम भाव में स्थ्ति पापी ग्रह यदि स्वराशि या उच्च राशि में हों अथवा वे योगकारक हों तो भाग्य में बाधक नहीं होते हैं, अन्यथा वे बाधक होते हैं। ऐसे बाधक ग्रहों की शांति देवोपासना, मांत्रोपचार आदि द्वारा करनी चाहिए। दाम्पत्य बाधा उपाय: ज्योतिष शास्त्र में जन्म लग्न से सप्तम भाव तथा सप्तमेश दाम्पत्य जीवन का द्योतक माना गया है। दाम्पत्य जीवन का कारक शुक्र पुरुष तथा स्त्री दोनों के लिए समान है। सप्तमेश मारकेश भी होता है। अतः सप्तमेश से संबंधित ग्रह देवता का पूजन और मंत्र-जप अपनाना ही श्रेयस्कर है। इसी तरह सप्तम भाव में स्थित पापी तथा पृथकताकारक ग्रहों अथवा सप्तम भाव पर दृष्टि डालने वाले ऐसे ग्रहों के कुप्रभाव को क्षीण करने हेतु देवोपासना व मंत्रोपचार ही उचित है। अष्टम भाव में मंगल, राहु, शनि तथा सूर्य की स्थिति दाम्पत्य सुख में बाधक होती है।। इन ग्रहों की शांति देवोपासना व मंत्रोपचार द्वारा करनी चाहिए। सप्तम भाव से एकादश भाव अर्थात् लग्न से पंचम भाव तथा उसके स्वामी का बली होना दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए विशेष महत्व रखता है अतः पंचमेश से संबंधित रत्न धारण करने तथा पंचमेश से संबंधित देवता की उपासना, व्रत, दान-पुण्य आदि करने से निश्चय ही दाम्पत्य जीवन तथा सप्तम भाव संबंधित अन्य प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति संभव है। कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार, निर्मित जन्मकुंडली में पंचम भाव के स्वामी, उपस्वामी, पंचमेश तथा पंचमेश के नक्षत्र स्वामी के रत्न के धारण करने तथा उनसे संबंधित देवताओं की उपासना करने से दाम्पत्य में वृद्धि होती है। रोग-व्याधि उपाय: जन्म कुंडली में लग्न हमारे शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य और आत्मबल का नियंत्रक होता है। लग्न पीड़ित हो, लग्नेश पीड़ित, अस्त, अशुभ भाव में हो, लग्न पापकर्तरी योग में हो तो जातक में रोगों तथा कष्टों का सामना करने की क्षमता कम होती है अर्थात् रोग-व्याधि उसे सहज ही सताने लगते हैं। अतः विद्वान लोग लग्नेश से संबंधित रत्न धारण करके लग्न को बलवान बनाने तथा रोगकारक ग्रहों की शांति पूजा-पाठ, मंत्र जप दान पुण्य कराकर रोग को शिथिल करने का उपाय बताते हैं। यह भी मान्यता है कि लग्नेश, जन्मराशीश तथा नक्षत्रेश के रत्न धारण करने से रोग निरोधक क्षमता में वृद्धि हो सकती है। पंचम भाव षष्ठ भाव से द्वादश पड़ता है। अतः पंचमेश का रत्न धारण करने से रोग का शमन संभव है। इसीलिए लग्नेश तथा पंचमेश के रत्नों की जोड़ी स्वास्थ्यवर्द्धक, रोगनाशक तथा समृद्धिकारक मानी गई है। लेकिन एक बात ध्यातव्य है कि यदि लग्नेश या पंचमेश में से कोई ग्रह विपत तारा, वध तारा, या प्रत्वर तारा का स्वामी हो अथवा उक्त किसी तारा में स्थित हो अथवा 22वें द्रेष्कान या 64वें नवांश का स्वामी हो तो उसकी शांति अनिवार्यरूपेण होनी चाहिए। एक बात यह भी विचारणीय है कि चाहे कोई भी परेशानी केवल रत्नोपाय से ठीक नहीं किया जाता है। उसके लिए प्रायश्चित एवं पवित्र आचरण आवश्यक है। दूसरे, रत्नोपाय सभी के बूते की बात नहीं है, क्योंकि महगे के कारण रत्न जन-साधारण के पहंुच से बाहर होते हंै। यदि महंगे रत्न से ही सटीक उपाय हो सकता है, तो इसका अर्थ है कि गरीबों के लिए ज्योतिष और भगवान नहीं हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। सभी जातक ईश्वर की संतान हैं। सभी को अपने कर्मों का भोग भोगना है। ईश्वर सभी को प्रायश्चित, पूजा-पाठ, कर्म, अकर्म का अवसर प्रदान करते हैं। यह बात भी उचित प्रतीत नहीं होता है कि जन्मांग के दोष को विशेष प्रकार के कर्मकांड से ही सुधारा जा सकता है। यदि ऐसा हो तो फिर यह उपाय रोज कमाने-खाने वालों के लिए नहीं है। जो ग्रह अनिष्ट कारक हैं, उनसे संबंधित वस्तुओं का दान कर, संबंधित वार का उपवास कर और संबंधित देवता की पूजा कर उस ग्रह के दुष्प्रभाव को कम कर सकते हैं। जो ग्रह अनिष्ट कारक नहीं हैं अर्थात् शुभ फल प्रदाता हैं, उनसे संबंधित रत्न धारण कर या संबंधित जड़ों या रंग की वस्तुओं का उपयोग करके शुभत्व की वृद्धि कर सकते हैं। जन्म लग्न से यह भी ज्ञत किया जाता है कि कौन सा ग्रह मारक या अधिक कष्ट देने वाला है। उस ग्रह की दशा अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा इत्यादि से विशेष सावधान रह सकते हैं। द्वादश लग्नों में जन्मे व्यक्तियों के संदर्भ इस प्रकार हैं। स मेष लग्न में उत्पन्न व्यक्ति के लिए शनि, बुध और शुक्र पाप फल और सूर्य तथा गुरु शुभ फल देने वाले ग्रह हैं। शुक्र मारकेश होने पर प्रबल मारक होता है। स वृष लग्न में उत्पन्न्ा व्यक्ति के लिए शनि राजयोग कारक तथा बुध अल्प शुभ होता है। गुरु, शुक्र, चंद्र तथा मंगल मारक होते हैं। स मिथुन लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए मंगल, गुरु और सूर्य अनिष्ट कारक होते हंै। इस लग्न वाले के लिए चंद्रमुख्य मारक ग्रह है, परंतु दाम्पत्य में लाभदायक होता है। स कर्क लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए शुक्र और बुध प्रतिकूल तथा चंद्र, मंगल और गुरु अनुकूल ग्रह हैं। इनमें मंगल पूर्ण योगकारक होता है। शनि इस लग्न के लिए मारक होता है, लेकिन सूर्य दाम्पत्य जीवन में लाभदायक होता है। स सिंह लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए बुध, शुक्र और शनि पाप फल तथा मंगल, गुरु और सूर्य शुभ होते हैं। शनि सप्तमेश होने के कारण मारक किंतु चंद्र व्ययेश होते हुए भी दाम्पत्य में शुभफल देने वाला होता है। स कन्या लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए मंगल, गुरु व चंद्र कष्टकारक और बुध एवं शुक्र शुभफल देने वाले होते हैं शुक्र बुध कारक हैं। शुक्र मारक भी है। सूर्य दाम्पत्य में लाभ दायक होता है। स तुला लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए गुरु, सूर्य और मंगल प्रतिकूल ग्रह हैं। शनि और बुध शुभफल देने वाले और चंद्र तथा बुध राजयोग कारक होते हैं। मंगल मारक तथा शुक्र सम फल दने े वाले हं।ै स वृश्चिक लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए शुक्र, बुध और शनि अनिष्टकारक, गुरु, चंद्र अनुकूल, सूर्य, चंद्र योगकरक, मंगल सम और शुक्र पापी एवं मारक ग्रह होता है। स धनु लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए शुक्र कष्टकारक मंगल, सूर्य अच्छे फल देने, सूर्य-बुध योगकारक, शनि मारक और गुरु सम और मारक प्रभाव वाला होता है। स मकर लग्न में जन्मे व्यक्ति के लिए मंगल, गुरु और चंद्र पाप फल देने वाले हैं। बुध, शुक्र शुभ एवं अनुकूल, शुक्र योगकारक, सूर्य सम एवं मंगल मारक हैं। इस लग्न में शनि स्वयं मारक नहीं होता। स कुंभ लग्न में उत्पन्न्ा व्यक्ति के लिए गुरु, चंद्र और मंगल अशुभ तथा शुक्र और शनि शुभ फल देने वाले ग्रह हैं। शुक्र राजयोग कारक ग्रह है। सूर्य सम एवं मंगल मारक हैं। इस लग्न में शनि स्वयं मारक नहीं होता। स मीन लग्न में उत्पन्न व्यक्ति के लिए शनि, शुक्र, सूर्य एवं बुध पापफल देने वाले ग्रह हैं। मंगल शुभफल देने वाला है। मंगल-गुरु योगकारक ग्रह हैं। मंगल (द्वितीयेश होने के कारण मारक होते हुए भी) मारक नहीं होता। बुध और शनि मारक होते हैं। निम्नानुसार उपाय कर अनिष्ट ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम किए जा सकते हैं। सूर्य: स प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पूजा कर एक लोटे में गुड़ मिश्रित जल में कंकु मु , हल्दी, चावल और पष्ु प रखकर सूर्य को अघ्र्य दें। स रविवार का उपवास रखें। सूर्य अस्त होने के बाद भोजन करें। रविवार को एक मुट्ठी ज्वार राम मंदिर में चढ़ाएं या गेहूं और गुड़ का दान करें। स उल्लिखित सूर्य मंत्र का जप करें। स सूर्य यंत्र को सोने अथवा तांबे की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ ”ां ”ीं ”ौं सः सूर्याय नमः’’ मंत्र का 7000 जपकर अभिमंत्रित करें और अनामिका में पहनें। चंद्र: स सोने से पहले चंद्र की पूजा करें एवं एक लोटे में दूध और जल लेकर चंद्र मंत्र से चंद्र को अघ्र्य दें। स सोमवार को सफेद वस्तु (चावल, शक्कर आदि) का दान करें। स एक छोटी कटोरी शक्कर भगवान शंकर के मंदिर में जाकर चढ़ाएं। स सोमवार को व्रत रखें। भगवान शंकर की आराधना करंे। स चंद्र मंत्र का जप करें और उसे चांदी की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ सों सोमाय नमः’’ मंत्र का 11000 जप करके अनामिका में पहनें। मंगल: प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर भगवान शंकर के मंदिर में उनकी पूजा-अर्चना करें और मसूर की दाल, देशी खांड, शहद अथवा तांबे का दान करें। गाय को मसूर की दाल और गुड़ खिलाएं। मंगलवार का व्रत रखंे और एक संध्या बगैर नमक का खाना खाएं साथ ही मंगल के उल्लिखित मंत्र का जप करें। मंगल यंत्र को सोने अथवा तांबे की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ अं अंगारकाय नमः’’ मंत्र के 10,000 जप से अभिमंत्रित करके अनामिका में पहनें। बुध: स गणपति भगवान को नियमित रूप से इक्कीस दूर्वा चढ़ाएं। स मंूग, फिटकरी, चांदी की गोली, पन्ना, हरा कपड़ा, बांस अथवा एक मुट्ठी साबूदाना भगवान विट्ठल के मंदिर में चढ़ाएं। स बुधवार को उपवास करें। स बुध के मंत्र का जप करें। स बुध यंत्र को चांदी की अंगूठी मेंखुदवाकर ‘‘¬ बुं बुधाय नमः’’ मंत्र का 8000 जप करके कनिष्ठिका में पहनें। गुरुुरु: स दŸा भगवान, साईं बाबा या अपने गुरु की पूजा अर्चना नियमित रूप से करें। माता-पिता की सेवा करें, क्योंकि प्रथम गुरु माता-पिता ही होते हैं। स गुरुवार को गाय को चने की दाल और गुड़ खिलाएं या भगवान के मंदिर में जाकर चढ़ाएं। स गुरुवार का उपवास करें। इस दिन सूर्यास्त के बाद चने की दाल से बनी वस्तु या पीले चावल का भोजन करें। स गुरु मंत्र का जप नियमित रूप से करें। स गुरु यंत्र को सोने की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ बृं बृहस्पतये नमः’’ मंत्र का 19000 जप करके तर्जनी में पहनें। शुक्र: स मां भगवती की आराधना नियमित रूप से करें एवं एक मुट्ठी चावल देवी को चढ़ाएं। स शुक्रवार को सफेद वस्तु जैसे चावल, ज्वार, चांदी अथवा प्लेटिनम का दान करें। स शुक्रवार का उपवास करें। अपने से बड़ी स्त्रियों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। स शुक्र मंत्र का जप करें। स शुक्र यंत्र को चांदी की अंगूठी मेंखुदवाकर ‘‘¬ शंु शुक्राय नमः’’ मंत्र के 11000 जप से अभिमंत्रित करके कनिष्ठिका में पहनें। शनि: स शनिदेव की आराधना नियमित रूप से करें और शनिवार को ग्यारह काले उड़द, थोड़ा सा तिल का तेल और साबुत नमक शनि भगवान को चढ़ाएं। स शनिवार का उपवास करें। स शनिवार को तेल, शराब, काला उड़द, लोहे, नारियल (श्रीफल) अथवा बादाम का दान करें। स हनुमान जी की आराधना करें। स शनि मंत्र का जप करें। स शनि यंत्र को चांदी की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ शं शनैश्चराय नमः’’ मंत्र के 23000 जप से अभिमंत्रित करके मध्याम में पहनें। राहु: स राहु के प्रभाव को कम करने के लिए चींटियों को घी, शक्कर व आटे को मिलाकर खिलाएं। नारियल का एक गोला लेकर ऊपर से थोड़ा काटकर उसमें खांडसारी शक्कर और देशी घी भर दें और चींटियों के बिल के पास गाड़ दें। स तांबे का सिक्का दान करें। सोमवार को नवग्रह मंदिर में सफेद तिल चढ़ाएं। चांदी की चेन गले में धारण करें। स राहु मंत्र का जप करें। स राहु यंत्र को चांदी की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ रां राहवे नमः’’ मंत्र का 18000 जप करके कनिष्ठिका में पहनें। केतेतेतु: स कुŸाा पालें कुŸाों की सेवा करें। रोटी खिलाएं। मंदिर में ध्वजा लगाएं। मरीजों को आॅक्सीजन गैस, दो रंग का कंबल या इमली का दान करें। स केतु यंत्र को चांदी की अंगूठी में खुदवाकर ‘‘¬ कें केतवे नमः’’ मंत्र के 7000 जप से अभिमंत्रित करके कनिष्ठिका में पहनें। ग्रहों के शुभ प्रभाव हेतु रत्न धारण विधि - सूर्य के लिए - रत्न: माणिक्य उपरत्न: लालतामड़ा, लाल हकीक धातु: स्वर्ण, तांबा अंगुली: अनामिका रŸाी: 3, 5 दिन: रवि, सोम, गुरु देवता: विष्णु ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: बेल की जड़ चंद्र के लिए - रत्न: मोती उपरत्न: शंख, मूंगा, दूधिया हकीक धातु: चांदी अंगुली: अनामिका रŸाी: 2, 4, 6,11 दिन: सोमवार देवता: सरस्वती ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: खिरनी या क्षीरिका की जड़ मंगल के लिए - रत्न: मूंगा उपरत्न: गारनेट, लाहकी, संग सितारा, लाल गोमेद धातु: स्वर्ण या तांबा अंगुली: अनामिका रŸाी: 6, 8, 10, 12 दिन: मंगलवार देवता: हनुमान ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: नागजिह्वा मूल या अनंत मूल बुध के लिए - रत्न: पन्ना उपरत्न: फिरोजा, हरा हकीक, मरगज, ओनेक्स धातु: स्वर्ण या कांसा अंगुली: कनिष्ठिका रŸाी: 3, 5, 6 दिन: बुधवार देवता: विष्णु ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: विधारा (वृद्धदारु) मूल बृहस्पति के लिए - रत्न: पुखराज उपरत्न: पीला मोती, सुनैला, पीला जिरकाॅन धातु: स्वर्ण अंगुली: तर्जनी रŸाी: 5, 6 दिन: बृहस्पतिवार देवता: ब्रह्मा ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: भारंगी (वमनेठी) मूल शुक्र के लिए - रत्न: हीरा उपरत्न: सफेद हकीक, स्फटिक, ओपल, सफेद पुखराज धातु: प्लेटिनम/चांदी अंगुली: मध्यमा या कनिष्ठिका रŸाी: 3, 5 दिन: शुक्रवार देवी: दुर्गा ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: गूमा मजीठ की जड़ शनि के लिए - रत्न: नीलम उपरत्न: नीला जिरकाॅन, कटैला, नीला तामड़ा, नीला रूपाइनल धातु: लोहा, पंच धातु अंगुली: मध्यमा रŸाी: 5, 6, 9, 12 दिन: शनिवार देवता: शिव और भैरव ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: अमलवेट (विच्छुत वेतसी) मूल/ शमी का जड़ राहु के लिए - रत्न: गोमेद उपरत्न: गोमेद रंग का हकीक धातु: अष्ट धातु, चांदी अंगुली: मध्यमा रŸाी: 7, 9 दिन: शनिवार देवता: अधिदेवता काल/प्रत्यधि देवता सर्प ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: श्वेत चंदन की जड़ (जो फूली-फूली न हो) केतु के लिए - रत्न: लहसुनिया धातु: पंच धातु, चांदी अंगुली: मध्यमा रŸाी: 7, 9 दिन: शनिवार, बुधवार देवता: अधिदेवता चित्रगुप्त/ प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा ग्रह शांति में वानस्पतिक प्रयोग: अश्वगंध की जड़ ग्रहों से संबद्ध रत्न को अनुकूल धातु में धारण करना चाहिए। जो जातक रत्न धारण नहीं कर सकते वे उपरत्न भी अनुकूल धातु के साथ ही धारण करें। पीड़ाकारक ग्रह के अनुकूल प्रभाव के लिए वानस्पतिक प्रयोग भी लाभदायक होता है। नोट: ग्रह शुभ भावस्थ होने पर दशांतर्दशा कोष्ठ में वर्णित लग्न राशि का रत्न धारण करें। जैसे शुभ भावस्थ हो तो भाव 4, 2 या 12 लग्न वाले जातक को माणिक्य धारण करना चाहिए। विशेष रोगादि निवारण हेतु दैवज्ञ से परामर्श के बाद रत्न धारण करें। अनिष्ट ग्रह के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए सूर्य के लिए - दान वस्तुएं: माणिक्य, गेहंू, गुड़ सवत्सा गौ, कमलपुष्प, लाल चंदन, लाल वस्त्र, सोना, तांबा, केसर, मूंगा, दक्षिणा। औषधि दान: मनसिल, बड़ी इलायची, देवदारु, केसर, शहद, कमल फूल, लाल फूल। वस्तु धारण: बेल पत्र की जड़, गुलाबी धागा आदि। दिन: रविवार चंद्र के लिए दान वस्तुएं: घी, श्वेत चावल, श्वेत वस्त्र, श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, चांदी, शंख, दधि, मोती, कपूर, दक्षिणा। औषधि दान: पंच गव्य, हाथी का मद, शंखजल, सीप, श्वेत कमल। वस्तु धारण: खिरनी की जड़, सफेद धागा। दिन: सोमवार मंगल के लिए दान वस्तुएं: मूंगा, भूमि, मसूर की दाल, लाल वृष, गुड़, लाल चंदन, लाल वस्त्र, लालपुष्प, स्वर्ण, ताम्र, केसर, कस्तूरी, दक्षिणा। औषधि दान: बेल, चंदन, बला, लाल फूल, इंगुर, इंद्रपुष्पी, मौलसिरी जटामासी। वस्तु धारण: अनंत की जड़, लाल धागा दिन: मंगलवार बुध के लिए दान वस्तुएं: कांस्य पात्र, हरित वस्त्र, मूंगा, पन्ना, गजदंत, घी, स्वर्ण, सभी पुष्प, कपूर, फल, षटरस, दक्षिणा। औषधि दान: गोबर, चंदन, चावल, फल, शहद, सीप, स्वर्ण। वस्तु धारण: विधारा की जड़, हरा धागा। दिन: बुधवार। गुरु के लिए दान वस्तुएं: चने की दाल, पीत वस्त्र, स्वर्ण, घी, पीत पुष्प, पुखराज, हल्दी, पुस्तक, मधु, लवण, शर्करा, भूमि, छत्र, दक्षिणा। औषधि दान: शहद, बड़ी इलायची, मनसिल। वस्तु धारण: नारंगी या केले की जड़, पीला धागा। दिन: गुरुवार शुक्र के लिए दान वस्तुएं: तंडुल, श्वेत चंदन, श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प, हीरा, रजत, घी, स्वर्ण, श्वेताश्व, दधि, श्वेत गौ, दक्षिणा। औषधि दान: बड़ी इलायची, मनसिल, फल, मूल, केसर। वस्तु धारण: सरफोके की जड़, सफेद धागा। दिन: शुक्रवार शनि के लिए दान वस्तुएं: माष, तेल, नीलम, तिल, काले वस्त्र, कुलथी, लोहा, काली गाय, जूते, कस्तूरी, दक्षिणा । औषधि दान: काले तिल, अंजन, लोध, बला, सौंफ, धान की खील। वस्तु धारण: बिच्छू की जड़, काला धागा। दिन: शनिवार राहु के लिए दान वस्तुएं: माषान्न, कस्तूरी, हेम नाग, गोमेद, नील वस्त्र, छुरी, तिल, तेल, लोहा, सूप, कंबल, सप्तधान्य, दक्षिणा। औषधि दान: लोध्र, कुश, तिल का पŸाा, मुस्ता, हाथी का मदजल, हिरन की नाभि का जल। वस्तु धारण: सफेद चंदन की जड़, नीला धागा। दिन: बुधवार केतु के लिए दान वस्तुएं: माषान्न, कंबल, वैदूर्य मणि, कस्तूरी, तिल, लोहा, बकरा, शस्त्र, सुवर्ण, कृष्ण पुष्प, सप्तधान्य, दक्षिणा। औषधि दान: लोध्र, कुश, तिल का पŸाा, मुस्ता, हाथी का मद जल, हिरन की नाभि का जल, बकरे का मूत्र। वस्तु धारण: अश्वगंधा की जड़, आसमानी धागा। दिन: गुरुवार
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samyapnae jate hain, jab koi jatak yajatka pratikul dasha ya bhukti segujar rahi ho ya pratikul gochar keprabhav men ho. yadi koi jatak yajatka ek hi sath pratikul dasha,bhukti aur pratikul gochar se bhi gujrrhi ho to uski pershani barh jatihai. is pareshani ko dur karne hetu joupay kie jaenge, use hamarogyatmak upay kahenge.arogyatmak upay ka savdhanipurvaknirdharan karna avashyak hai. is tarhka upay devopasna dvara athvamantra jap dvara ya dan-punya adidvarakiya jata hai.yah nirvivad satya hai ki bagairstik dayagno ke satik ilajasanbhav hai. piradayak grahon sesanbandhit ratn dharan karna pira koutprerit karna hoga. in piradayakagrahon ki shanti hetu devopasna, mantrajap, dan-punya, vrat tatha pavitrajivn-yapan adi ka sahara lenahi uchit hoga.nvmesh ko pramukh rup se bhagyeshmana gaya hai. lagnesh tatha panchmeshko purak bhagyesh kaha jata hai. yadibhagyesh bhi shashthesh, ashtamesh, dvadsheshya tritiyesh ho to uska ratn dharnnhin karna chahie, balki devopasnadvara bhagyavriddhi ka upay karna uchithoga. bhagya sthan men sthit rahu, ketuathva anya papi grahon ki shanti bhidevopasna, mantra jap adi dvara karnichahie. lagn, pancham ya navam bhav mensthit shubh grah bhagya men vriddhi kartehain. lagn, pancham ya navam bhav men sthtipapi grah yadi svarashi ya uchch rashimen hon athva ve yogkarak hon tobhagya men badhak nahin hote hain, anyathave badhak hote hain. aise badhak grahon kishanti devopasna, mantropchar adi dvarakrni chahie.dampatya badha upay: jyotish shastramen janm lagn se saptam bhav tathasaptamesh dampatya jivan ka dyotkmana gaya hai. dampatya jivan kakarak shukra purush tatha stri donon kelie saman hai. saptamesh markesh bhihota hai. atah saptamesh se sanbandhitagrah devta ka pujan aur mantra-japapnana hi shreyaskar hai. isi tarahasaptam bhav men sthit papi tathaprithktakarak grahon athva saptam bhavapar drishti dalne vale aise grahon kekuprabhav ko kshin karne hetu devopasnav mantropchar hi uchit hai.ashtam bhav men mangal, rahu, shanittha surya ki sthiti dampatya sukh menbadhak hoti hai..in grahon ki shanti devopasna vamantropchar dvara karni chahie.saptam bhav se ekadash bhav arthatlagn se pancham bhav tatha uske svamika bali hona dampatya jivan kisflta ke lie vishesh mahatva rakhtahai atah panchmesh se sanbandhit ratn dharnkrne tatha panchmesh se sanbandhit devtaki upasna, vrat, dan-punya adikrne se nishchay hi dampatya jivnttha saptam bhav sanbandhit anya prakarki manokamnaon ki purti sanbhav hai.krishnamurti paddhati ke anusar, nirmitajanmakundli men pancham bhav ke svami,upasvami, panchmesh tatha panchmesh kenakshatra svami ke ratn ke dharan karnettha unse sanbandhit devtaon kiupasna karne se dampatya men vriddhihoti hai.rog-vyadhi upay: janm kundli menlagn hamare sharirik tatha mansikasvasthya aur atmabal ka niyantrakhota hai. lagn pirit ho, lagnesh pirit,ast, ashubh bhav men ho, lagn papakartariyog men ho to jatak men rogon tathakashton ka samna karne ki kshamata kamhoti hai arthat rog-vyadhi use sahjhi satane lagte hain. atah vidvan logalagnesh se sanbandhit ratn dharan karkelagn ko balvan banane tatha rogkarakagrahon ki shanti puja-path, mantra japdan punya karakar rog ko shithilkrne ka upay batate hain. yah bhimanyata hai ki lagnesh, janmarashishttha nakshatresh ke ratn dharan karne serog nirodhak kshamata men vriddhi ho saktihai. pancham bhav shashth bhav se dvadshprta hai. atah panchmesh ka ratn dharnkrne se rog ka shaman sanbhav hai.isilie lagnesh tatha panchmesh ke ratnonki jori svasthyavarddhak, rognashkttha samriddhikarak mani gai hai. lekinaek bat dhyatavya hai ki yadi lagneshya panchmesh men se koi grah vipat tara,vadh tara, ya pratvar tara ka svami hoathva ukt kisi tara men sthit hoathva 22ven dreshkan ya 64ven navanshka svami ho to uski shantianivaryarupen honi chahie. ek batayah bhi vicharniya hai ki chahe koibhi pareshani keval ratnopay se thiknhin kiya jata hai. uske lieprayashchit evan pavitra acharan avashyakhai. dusre, ratnopay sabhi ke bute kibat nahin hai, kyonki mahge ke karanaratn jan-sadharan ke pahanuch se bahrhote hanai. yadi mahange ratn se hi satikaupay ho sakta hai, to iska arth haiki garibon ke lie jyotish aurbhgvan nahin hain. lekin aisa nahin hai.sbhi jatak ishvar ki santan hain.sbhi ko apne karmon ka bhog bhognahai. ishvar sabhi ko prayashchit,puja-path, karm, akarm ka avasarapradan karte hain. yah bat bhi uchitapratit nahin hota hai ki janmang kedosh ko vishesh prakar ke karmakand sehi sudhara ja sakta hai. yadi aisaho to fir yah upay rojkmane-khane valon ke lie nahin hai.jo grah anisht karak hain, unsesanbandhit vastuon ka dan kar, sanbandhitvar ka upvas kar aur sanbandhitdevta ki puja kar us grah ke dushprabhavko kam kar sakte hain. jo grahanisht karak nahin hain arthat shubhafal pradata hain, unse sanbandhit ratnadharan kar ya sanbandhit jaron ya rangki vastuon ka upyog karke shubhatvaki vriddhi kar sakte hain. janm lagn seyah bhi gyat kiya jata hai ki kaunsa grah marak ya adhik kasht denevala hai. us grah ki dasha antardasha,pratyantar dasha ityadi se vishesh savdhanarah sakte hain. dvadash lagnon men janmevyaktiyon ke sandarbh is prakar hain.s mesh lagn men utpann vyakti kelie shani, budh aur shukra pap falaur surya tatha guru shubh fal dene valegrah hain. shukra markesh hone par prablmarak hota hai.s vrish lagn men utpanna vyakti kelie shani rajyog karak tatha budhalp shubh hota hai. guru, shukra, chandrattha mangal marak hote hain.s mithun lagn men janme vyakti kelie mangal, guru aur surya anisht karkhote hanai. is lagn vale ke lie chandramukhyamarak grah hai, parantu dampatya menlabhdayak hota hai.s kark lagn men janme vyakti kelie shukra aur budh pratikul tatha chandra,mangal aur guru anukul grah hain. inmenmangal purn yogkarak hota hai. shaniis lagn ke lie marak hota hai,lekin surya dampatya jivan menlabhdayak hota hai.s sinh lagn men janme vyakti kelie budh, shukra aur shani pap falttha mangal, guru aur surya shubh hotehain. shani saptamesh hone ke karan markkintu chandra vyayesh hote hue bhi dampatyamen shubhafal dene vala hota hai.s kanya lagn men janme vyakti kelie mangal, guru v chandra kashtakarkaur budh evan shukra shubhafal dene valehote hain shukra budh karak hain. shukra markbhi hai. surya dampatya men labh daykhota hai.s tula lagn men janme vyakti kelie guru, surya aur mangal pratikulagrah hain. shani aur budh shubhafal denevale aur chandra tatha budh rajyog karkhote hain. mangal marak tatha shukra samafal dane e vale han.ais vrishchik lagn men janme vyakti kelie shukra, budh aur shani anishtakarak,guru, chandra anukul, surya, chandra yogakarak,mangal sam aur shukra papi evan marakagrah hota hai.s dhanu lagn men janme vyakti kelie shukra kashtakarak mangal, surya achchefal dene, surya-budh yogkarak, shanimarak aur guru sam aur marak prabhavvala hota hai.s makar lagn men janme vyakti kelie mangal, guru aur chandra pap faldene vale hain. budh, shukra shubh evan anukul,shukra yogkarak, surya sam evan manglmarak hain. is lagn men shani svayanmarak nahin hota.s kunbh lagn men utpanna vyakti kelie guru, chandra aur mangal ashubh tathashukra aur shani shubh fal dene vale grahhain. shukra rajyog karak grah hai. suryasam evan mangal marak hain. is lagn menshni svayan marak nahin hota.s min lagn men utpann vyakti kelie shani, shukra, surya evan budh papfldene vale grah hain. mangal shubhafal denevala hai. mangl-guru yogkarak grahhain. mangal (dvitiyesh hone ke karnmarak hote hue bhi) marak nahin hota.budh aur shani marak hote hain.nimnanusar upay kar anisht grahonke ashubh prabhav kam kie ja saktehain.surya:s pratidin suryoday se purva uthkrpuja kar ek lote men gur mishrit jalmen kanku mu , haldi, chaval aur pashu parakhakar surya ko aghrya den.s ravivar ka upvas rakhen. suryaast hone ke bad bhojan karen. ravivarko ek mutthi jvar ram mandir menchrhaen ya gehun aur gur ka dan karen.s ullikhit surya mantra ka japkren.s surya yantra ko sone athva tanbeki anguthi men khudvakar ‘‘¬ ”an ”in ”aunsah suryay namah’’ mantra ka 7000 japkrabhimantrit karen aur anamika men pahnen.chandra:s sone se pahle chandra ki puja karenevan ek lote men dudh aur jal lekrchandra mantra se chandra ko aghrya den.s somvar ko safed vastu (chaval,shakkar adi) ka dan karen.s ek choti katori shakkar bhagvanshankar ke mandir men jakar charhaen.s somvar ko vrat rakhen. bhagvanshankar ki aradhna karane.s chandra mantra ka jap karen aur usechandi ki anguthi men khudvakar ‘‘¬ sonsomay namah’’ mantra ka 11000 japkrke anamika men pahnen.mangala:pratidin subah jaldi uthkrbhgvan shankar ke mandir men unkipuja-archana karen aur masur ki dal,deshi khand, shahad athva tanbe ka dankren. gay ko masur ki dal aur gurkhilaen. manglvar ka vrat rakhane auraek sandhya bagair namak ka khana khaensath hi mangal ke ullikhit mantra kajap karen.mangal yantra ko sone athva tanbeki anguthi men khudvakar ‘‘¬ anangarkay namah’’ mantra ke 10,000 japse abhimantrit karke anamika men pahnen.budha:s ganpti bhagvan ko niyamitrup se ikkis durva charhaen.s manug, fitkri, chandi ki goli,panna, hara kapra, bans athva ekmutthi sabudana bhagvan vitthal kemandir men charhaen.s budhvar ko upvas karen.s budh ke mantra ka jap karen.s budh yantra ko chandi ki anguthimenkhudvakar ‘‘¬ bun budhay namah’’ mantraka 8000 jap karke kanishthika menphnen.guruuru:s daÿa bhagvan, sain baba yaapne guru ki puja archana niyamitrup se karen. mata-pita ki sevakren, kyonki pratham guru mata-pita hihote hain.s guruvar ko gay ko chane kidal aur gur khilaen ya bhagvan kemandir men jakar charhaen.s guruvar ka upvas karen. isdin suryast ke bad chane ki dal sebni vastu ya pile chaval ka bhojnkren.s guru mantra ka jap niyamit rupse karen.s guru yantra ko sone ki anguthi menkhudvakar ‘‘¬ brin brihaspataye namah’’ mantraka 19000 jap karke tarjani men pahnen.shukra:s man bhagvti ki aradhnaniyamit rup se karen evan ek mutthichaval devi ko charhaen.s shukravar ko safed vastu jaisechaval, jvar, chandi athva pletinmka dan karen.s shukravar ka upvas karen. apnese bari striyon ke charan sparsh karashirvad len.s shukra mantra ka jap karen.s shukra yantra ko chandi ki anguthimenkhudvakar ‘‘¬ shanu shukray namah’’ mantrake 11000 jap se abhimantrit karkeknishthika men pahnen.shni:s shanidev ki aradhna niyamitrup se karen aur shanivar ko gyarhkale urad, thora sa til ka telaur sabut namak shani bhagvan kochrhaen.s shanivar ka upvas karen.s shanivar ko tel, sharab, kalaurad, lohe, nariyal (shrifl) athvabadam ka dan karen.s hanuman ji ki aradhna karen.s shani mantra ka jap karen.s shani yantra ko chandi ki anguthimen khudvakar ‘‘¬ shan shanaishcharay namah’’mantra ke 23000 jap se abhimantritkrke madhyam men pahnen.rahu:s rahu ke prabhav ko kam karne kelie chintiyon ko ghi, shakkar v ateko milakar khilaen. nariyal kaek gola lekar upar se thorakatakar usmen khandsari shakkar aurdeshi ghi bhar den aur chintiyon ke bilke pas gar den.s tanbe ka sikka dan karen. somvarko navagrah mandir men safed til charhaen.chandi ki chen gale men dharan karen.s rahu mantra ka jap karen.s rahu yantra ko chandi ki anguthi menkhudvakar ‘‘¬ ran rahve namah’’ mantra ka18000 jap karke kanishthika men pahnen.ketetetu:s kuÿaa palen kuÿaon ki seva karen.roti khilaen. mandir men dhvaja lagaen.mrijon ko aeksijan gais, do rangka kanbal ya imli ka dan karen.s ketu yantra ko chandi ki anguthi menkhudvakar ‘‘¬ ken ketve namah’’ mantra ke7000 jap se abhimantrit karkeknishthika men pahnen.grahon ke shubh prabhav hetu ratnadharan vidhi -surya ke lie -ratna: manikyauparatna: laltamra, lal hakikdhatu: svarn, tanbaanguli: anamikarÿai: 3, 5din: ravi, som, gurudevta: vishnugrah shanti men vanaspatik prayog: belki jarchandra ke lie -ratna: motiuparatna: shankh, munga, dudhiya hakikdhatu: chandianguli: anamikarÿai: 2, 4, 6,11din: somvardevta: sarasvatigrah shanti men vanaspatik prayog: khirniya kshirika ki jarmangal ke lie -ratna: mungauparatna: garnet, lahki, sangsitara, lal gomeddhatu: svarn ya tanbaanguli: anamikarÿai: 6, 8, 10, 12din: manglvardevta: hanumanagrah shanti men vanaspatik prayog:nagjihva mul ya anant mulbudh ke lie -ratna: pannauparatna: firoja, hara hakik,maragaj, oneksadhatu: svarn ya kansaanguli: kanishthikarÿai: 3, 5, 6din: budhvardevta: vishnugrah shanti men vanaspatik prayog: vidhara(vriddhadaru) mulbrihaspati ke lie -ratna: pukhrajauparatna: pila moti, sunaila, pilajirkaendhatu: svarnaanguli: tarjanirÿai: 5, 6din: brihaspativardevta: brahmagrah shanti men vanaspatik prayog: bharangi(vmnethi) mulshukra ke lie -ratna: hirauparatna: safed hakik, sfatik,opal, safed pukhrajdhatu: pletinm/chandianguli: madhyama ya kanishthikarÿai: 3, 5din: shukravardevi: durgagrah shanti men vanaspatik prayog: gumamjith ki jarshni ke lie -ratna: nilmauparatna: nila jirkaen, kataila, nilatamra, nila rupainldhatu: loha, panch dhatuanguli: madhyamarÿai: 5, 6, 9, 12din: shanivardevta: shiv aur bhairavagrah shanti men vanaspatik prayog:amlvet (vichchut vetsi) mul/ shamika jarrahu ke lie -ratna: gomedauparatna: gomed rang ka hakikdhatu: asht dhatu, chandianguli: madhyamarÿai: 7, 9din: shanivardevta: adhidevta kala/pratyadhidevta sarpagrah shanti men vanaspatik prayog: shvetchandan ki jar (jo fuli-fuli n ho)ketu ke lie -ratna: lahsuniyadhatu: panch dhatu, chandianguli: madhyamarÿai: 7, 9din: shanivar, budhvardevta: adhidevta chitragupta/pratyadhidevta brahmagrah shanti men vanaspatik prayog:ashvagandh ki jaragrahon se sanbaddh ratn ko anukul dhatumen dharan karna chahie. jo jatakaratn dharan nahin kar sakte ve uparatnabhi anukul dhatu ke sath hi dharnkren. pirakarak grah ke anukul prabhavke lie vanaspatik prayog bhilabhdayak hota hai.not: grah shubh bhavasth hone pardshantardasha koshth men varnit lagn rashika ratn dharan karen. jaise shubh bhavasthaho to bhav 4, 2 ya 12 lagn valejatak ko manikya dharan karnachahie. vishesh rogadi nivaran hetudaivagya se paramarsh ke bad ratn dharnkren.anisht grah ke dushprabhav ko durkrne ke liesurya ke lie -dan vastuen: manikya, gehanu, gurasavatsa gau, kamlpushp, lal chandan,lal vastra, sona, tanba, kesar, munga,dakshina.aushdhi dan: mansil, bariilaychi, devdaru, kesar, shahad, kamlful, lal ful.vastu dharn: bel patra ki jar,gulabi dhaga adi.din: ravivarchandra ke liedan vastuen: ghi, shvet chaval, shvetavastra, shvet chandan, shvet pushp, chandi,shankh, dadhi, moti, kapur, dakshina.aushdhi dan: panch gavya, hathi kamad, shankhajal, sip, shvet kamal.vastu dharn: khirni ki jar,safed dhaga.din: somvarmangal ke liedan vastuen: munga, bhumi, masur kidal, lal vrish, gur, lal chandan, lalavastra, lalpushp, svarn, tamra, kesar,kasturi, dakshina.aushdhi dan: bel, chandan, bala, lalful, ingur, indrapushpi, maulsirijtamasi.vastu dharn: anant ki jar, lal dhagadin: manglvarbudh ke liedan vastuen: kansya patra, haritavastra, munga, panna, gajdant, ghi, svarn,sabhi pushp, kapur, fal, shataras, dakshina.aushdhi dan: gobar, chandan, chaval,fal, shahad, sip, svarn.vastu dharn: vidhara ki jar, hara dhaga.din: budhvar.guru ke liedan vastuen: chane ki dal, pitavastra, svarn, ghi, pit pushp, pukhraj,haldi, pustak, madhu, lavan, sharkara, bhumi,chatra, dakshina.aushdhi dan: shahad, bari ilaychi,mansil.vastu dharn: narangi ya kele ki jar,pila dhaga.din: guruvarshukra ke liedan vastuen: tandul, shvet chandan, shvetavastra, shvet pushp, hira, rajat, ghi, svarn,shvetashva, dadhi, shvet gau, dakshina.aushdhi dan: bari ilaychi, mansil,fal, mul, kesar.vastu dharn: sarfoke ki jar,safed dhaga.din: shukravarshni ke liedan vastuen:mash, tel, nilam,til, kale vastra,kulthi, loha,kali gay, jute,kasturi, dakshina .aushdhi dan: kale til, anjan,lodh, bala, saunf, dhan ki khil.vastu dharn: bichchu ki jar, kaladhaga.din: shanivarrahu ke liedan vastuen: mashann, kasturi, hemnag, gomed, nil vastra, churi, til,tel, loha, sup, kanbal, saptadhanya,dakshina.aushdhi dan: lodhra, kush, til kapÿaa, musta, hathi ka madajal, hirnki nabhi ka jal.vastu dharn: safed chandan ki jar,nila dhaga.din: budhvarketu ke liedan vastuen: mashann, kanbal, vaiduryamni, kasturi, til, loha, bakra, shastra,suvarn, krishn pushp, saptadhanya, dakshina.aushdhi dan: lodhra, kush, til kapÿaa, musta, hathi ka mad jal, hirnki nabhi ka jal, bakre ka mutra.vastu dharn: ashvagandha ki jar,asmani dhaga.din: guruvar
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व्रत कथा विशेषांक   नवेम्बर 2008

सोमवार से शनिवार तक किये जाने वाले व्रत कथाएँ एवं उनका महत्व, व्रत एवं कथा करने की पूजन विधि एवं दिशा निर्देश, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, होली आदि जैसे वर्ष भर में होने वाले सभी विशेष व्रत कथाएँ और उनका महत्व, व्रत एवं कथाओं के करने से मिलने वाले लाभ

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