दांत: स्वास्थ्य और सौंदर्य के दाता

दांत: स्वास्थ्य और सौंदर्य के दाता  

दांत: स्वास्थ्य और सौंदर्य के दाता आचार्य अविनाश सिंह दांत जीवन भर साथ दें, इसके लिए प्रतिदिन दांतांे की भली भांति देखभाल आवश्यक है। अगर दांतों की सफाई सही तरह में नही होगी, तो दांतांे में भोजन के कण सड़ने लगेंगे और उनसे दुर्गंध आने लगेगी, जिससे रोग पैदा हो जाएंगे और दांत साथ छोड़ दंेगे। किसी ने ठीक कहा है, कि दांत गये स्वाद गया; अर्थात दांतांे के माध्यम से ही भोजन का पूर्ण आनंद लिया जा सकता है। आयु के अनुसार दांत दो तरह के होते हैंः दुग्ध दांत: ये अस्थायी दांत गिनती में बीस होते हैं- दस ऊपर के जबड़े में और दस नीचे के जबड़े में और जबड़े के दायें और बायें पांच-पांच दांत होते हैं, जिनमें दो छेदक, एक श्वदंत, दो चर्वण दंत होते हैं। जन्म के बाद सात मास के बाद पहला दांत निकलता है और दो वर्ष की आयु तक सभी दुग्ध दांत निकल आते हैं। पक्के दांत: ये गिनती में बत्तीस होते हैं। ये स्थायी दांत सोलह ऊपर के और सोलह निचले जबड़े में होते हैं। दोनों जबड़ों के दायंे-बायें आठ-आठ दांत होते हैं, जिनमें दो छेदक, एक खदंत, दो पूर्व चर्वण, तीन चर्वण हैं। बारह वर्ष की आयु तक सभी पक्के दांत निकल आते हैं, किंतु तीसरा चर्वण दांत सत्रह से पच्चीस वर्ष की आयु में निकलता है। दांत की मुख्य तीन परतें होती हैंः दंत वल्क: यह दांत का बाहरी भाग है, जो मानव शरीर का सबसे ठोस और सख्त पदार्थ है और भोजन चबाने में सहायक होता है। दंत धातु: यह दंत वल्क के नीचे की परत है, जिसमें हड्डीनुमा तत्व होता है। दंत रक्त शिराएं: ये दंत धातु के नीचे होती हंै। इनमें रक्त शिराएं और स्नायु तंत्र का जाल होता है, जो दांतों में दर्द या ठंडे-गर्म की अनुभूति करवाता है। दांतांे की जड़ें मसूडो में होती हैं, जो दांतों को मजबूती से जकड़े रखते हैं तथा हिलने-डुलने नहीं देते। दांतों के रोग: दांतों के रोगों का मुख्य कारण दांतांे की सफाई का अभाव है। दांतों की भली भांति सफाई और देखभाल होती रह,े तो दांतों में भोजन के कण जमा नहीं होते और दंत रोग नहीं होते। सफाई न होने से दांतों में सड़न पैदा होती है, जिससे कीटाणु पैदा होते हैं, जो दांतों की जड़ांे को धीरे-धीरे खोखला बना देते हैं, जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं। दांतांे की जड़ंे गल जाती हैं और दांतांे की ऊपरी परत दंत वल्क खत्म होने लगती है और दंत रक्त शिराएं कमजोर हो जाती है,ं जिससे दांतांे में दर्द होता है, ठंडा-गर्म खाने-पीने में तकलीफ होती है और धीरे-धीरे दांत साथ छोड़ देते हैं। दांतों के रोगो में सबसे भयंकर और हानिकारक रोग है ‘पायरिया’। पायरिया में पहले मसूडों में हल्की ठंडक होती है, जिससे मसूडांे के किनारों से पीप निकलने लगती है। फिर दांतांे की शक्ति क्षीण होने लगती है, मसूडों से रक्त भी आने लगता है। तीसरी अवस्था में रोग अपना उग्र रूप धारण कर लेता है। पीप पेट में जाने लगती है, जिससे और भी कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। पान, ज़र्दा तंबाकू का सेवन करने वालों को पायरिया जल्द हो जाता है। उपचार नीला थोथा और सफेद कत्था दोनों को बराबर मात्रा में लें और इन्हें तवे में भून कर, अच्छी तरह मिला कर, महीन पीस लें। इसे दिन में दो-तीन बार अंगुली से मसूड़ांे पर लगा कर, थोड़ी देर सिर झुका कर, मसूड़ांे की मालिश करें और बाद में कुल्ला कर मुंह साफ करने से मसूड़ों की सूजन-सड़न, दर्द और दुर्गंध आना खत्म हो जाते हंै। लौंग और नमक को पीस कर, चूर्ण बना कर, दांतों पर लगाने से दांतों का हिलना रुक जाता है। पीपल की छाल का चूर्ण बना कर दांतों और मसूड़ों की मालिश करने से दांतों का हिलना तथा दर्द ठीक होते हैं। लौंग, इलायची और खस के तेल को मिला कर दांतांे तथा मसूडों पर लगाने से पायरिया में आराम मिलता है। जले हुए आंवले में थोड़ा सेंधा नमक मिला कर, सरसों के तेल के साथ मसूडों और दांतांे की मालिश से पायरिया रोग दूर होता है। नीम की पत्तियां, काली मिर्च, काला नमक रोजाना सेवन करने चाहिएं। इससे रक्त साफ होता है और पायरिया में आने वाला पीप खत्म हो जाता है जिससे यह रोग ठीक होता है। समुद्र झाग तथा तिल मिला कर खाने में मसूडों की दुर्गंध ठीक हो जाती है। फिटकरी को नमक के साथ मिला कर दांतों और मसूडों की मालिश से मसूडे मजबूत होते हैं। लौंग का तेल दांतों के खोह पर लगाने से दर्द ठीक होता है। अमृत धारा और दालचीनी का तेल दांतो के खोह पर लगाने से दर्द ठीक होता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण: ज्योतिषीय दृष्टिकोण से शनि-राहु दांतों में दर्द और रोग उत्पन्न करते हैं। दांतों की तीन मुख्य परतों में पहली और दूसरी परत, अर्थात दंत वल्क और दंत धातु, इनका नेतृत्व सूर्य करता है, क्योंकि दंत वल्क ठोस पदार्थ है और दंत धातु हड्डीनुमा है। तीसरी परत में रक्त शिराएं होती हैं। इनमें रक्त संचारित होता है, इसलिए इनका नेतृत्व चंद्र और मंगल करते हंै। सूर्य, चंद्र, मंगल जब शनि-राहु से ग्रस्त एवं पीड़ित होते हैं, तो दंत रोग होता है। काल पुरुष की कुंडली में द्वितीय भाव मुख का है। इससे दांतांे की सुंदरता का अनुमान लगाया जाता है। इसलिए द्वितीय भाव भी अगर शनि-राहु से युक्त और पीड़ित हो, तो दंत रोग या दांतों की सुंदरता पर असर पड़ता है। लग्न और लग्नेश के भी शनि-राहु से युक्त और दृष्ट होने से दंत रोग हो सकते हंै। जातक तत्व के अनुसार दंत रोग के रोग इस प्रकार हंै द्वितीयेश षष्ठेश के साथ हो कर नैसर्गिक अशुभ ग्रह से युक्त हो, तो दंत रोग होते हैं। केतु द्वितीय स्थान पर हो, तो दांत ऊंचे होते हैं, अर्थात् दांत लंबे तथा बाहर की ओर होते हैं। सप्तम भाव में अशुभ ग्रह शुभ ग्रह की दृष्टि से रहित हो, तो जातक दांतों के किसी न किसी रोग से पीड़ित होता है। राहु लग्न में, या पंचम में हो, तो दंत रोग होते हंै। मेष या वृष राशि लग्न या द्वितीय भाव से संबंध बनाये और अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो दंत संबंधी रोग होते हैं। विभिन्न लग्नों में दंत रोगों का योग मेष लग्न: राहु और बुध द्वितीय भाव में, सूर्य-शनि लग्न में हों और लग्नेश त्रिक भावों में हो, तो दांत संबंधी रोग होते हंै। वृष लग्न: चंद्र और केतु द्वितीय भाव में, गुरु षष्ठ या अष्टम् भाव में, शनि अष्टम् में, लग्नेश एकादश या द्वादश भाव में हों, तो दंत विकार होते हैं। मिथुन लग्न: सूर्य और राहु पंचम भाव में, मंगल एकादश भाव में, लग्नेश षष्ठ भाव में होने से दांतों में रोग उत्पन्न होते हैं। कर्क लग्न: राहु षष्ठ भाव में, लग्नेश एकादश भाव में, सूर्य एवं शनि पंचम में हो, तो दंत रोग होते हैं। सिंह लग्न: राहु या केतु लग्न में हों, सूर्य त्रिक भाव में शनि से युक्त या दृष्ट हो, तो दंत रोग होते हंै। कन्या लग्न: द्वितीयेश मीन राशि में शनि से युक्त हो, लग्न में मंगल की दृष्टि हो, लग्नेश केतु से युक्त तथा दृष्ट हो, तो दंत रोग होते हंै। तुला लग्न: लग्नेश अष्टम, शनि द्वितीय भाव में, सूर्य केतु से युक्त तथा दृष्ट हो, गुरु लग्न तथा लग्नेश को देखता हो, तो दांत में रोग पैदा होते हैं। वृश्चिक लग्न: मंगल और शनि षष्ठ भाव में, बुध लग्न में हांे और सूर्य द्वादश भाव में, राहु अष्टम भाव में होने से दंत रोग होते हंै। धनु लग्न: लग्नेश षष्ठेश के साथ द्वितीय भाव में शनि से दृष्ट हो, राहु लग्न में हो, तो जातक दंत रोग से पीड़ित होता है। मकर लग्न: शनि पंचम भाव में, सूर्य और केतु द्वितीय भाव में, चंद्र सप्तम में होने से दंत संबंधी विकार होते हंै। कुंभ लग्न: शनि अष्टम भाव में, गुरु षष्ठ भाव में, द्वितीय भाव एवं द्वितीयेश राहु या केतु से दृष्ट हो, तो दंत पीड़ा से जातक पीड़ित होता है। मीन लग्न: शुक्र द्वितीय भाव में, सूर्य-चंद्र लग्न में राहु से दृष्ट और युक्त हों, शनि पंचम् तथा अष्टम् भाव में हो, तो दंत संबंधी रोग उत्पन्न होते हंै। उपर्युक्त सभी योग चलित कुंडली पर आधारित हैं। जब संबद्ध ग्रह की दशा-अंतर्दशा प्रभावित होगी और गोचर ग्रह प्रतिकूल रहेगा, तो दंत रोग होने की संभावना हो जाती है।



शनि कष्टनिवारक हनुमान विशेषांक   सितम्बर 2009

शनि कष्टनिवारक श्री हनुमान विशेषांक आधारित है- शनि ग्रह एंव हनुमान जी के आपसी संबंधों, हनुमान जी के जन्म एवं जीवन से संबंधित कथाएं, हनुमान जी के तीर्थ स्थान, यात्रा एवं महत्व, हनुमान जी से संबंधित पूजाएं, पूजा विधि एवं महत्व.

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