एक बार की बात है, शिवप्रिया माता पार्वती एक सरोवर के तट पर गयीं। सरोवर का जल अत्यन्त निर्मल और स्वच्छ था। उसमें स्वर्ण-वर्ण के कमल खिले थे। भगवती उमा ने पहले तो जल-विहार किया, फिर उसके रमणीय तट पर उन्होंने स्वच्छ एवं सुमिष्ट जल पीने की ईच्छा की। उसी समय उन्होंने देखा कि पद्मपत्र में जल लेकर छः कृत्तिकाएँ अपने घर जाने वाली ही हैं। ‘देवियांे ! पद्मपत्र में रखा हुआ जल मैं भी पीना चाहती हँू।’ कृत्तिकाओं ने स्नेहासिक्त स्वर में माता पार्वती से निवेदन किया- ‘तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न होने वाला पुत्र हममें भी मातृभाव रखे और हमारा भी पुत्र माना जाए। वह त्रैलोक्यविख्यात पुत्र हमारा रक्षक हो।’ ‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ शिवा ने तत्क्षण वचन दे दिया। कृत्तिकाएँ अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उन्होंने कमल-पत्र में रखा हुआ स्वच्छ सलित थोड़ा उमा को भी दिया। भगवती पार्वती ने कृत्तिकाओं के साथ उक्त मधुर जल का पान किया। त्रिनेत्र की प्राणवल्लभा पार्वती के जल पीते ही तुरंत उनकी दाहिनी कोख से एक रोग-शोक-निवारक परम तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। तिमिरारि के तुल्य उसके शरीर से प्रभापुन्ज का प्रसार हो रहा था। वह अग्नितुल्य तेजस्वी बालक स्वर्ण के समान गौरवर्ण था। उसके मनोहर कर-कमलों में तीक्ष्ण शक्ति, शूल और अंकुश सुशोभित थे। वह बालक कुत्सित दैत्यों के संहार के लिये प्रकट हुआ था, इस कारण ‘कुमार’ उसकी संज्ञा हुई। वह कृत्तिका-प्रदत्त जल से शाखाओं सहित प्रकट हुआ था। वे कल्याणमयी शाखाएँ छहों मुखों के रूप में विस्तृत थीं, इन्हीें कारणों से वह विशाख, षण्मुख, स्कन्द, षडानन और कार्तिकेय आदि नामों से प्रख्यात हुआ। वह कान्तिमान् शिशु अग्नि के समान प्रकाशित हो रहा था। उसके शरीर की आकृति दिव्य थी। वह देखने में बहुत ही प्रिय जान पड़ता था। वह दिव्य सरकण्डे के वन में जन्म ग्रहण करके अपनी कान्ति से सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा है, इससे उनके हृदय में स्नेह उमड़ आया और वे सौहार्दवश अपने स्तनों का दूध पिलाकर उसका पोषण करने लगीं। इसी से चराचर प्राणियों सहित त्रिलोकी में वह कात्र्तिकेय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह ‘स्कन्द’ कहलाया और गुहा में वास करने से ‘गुह’-नाम से विख्यात हुआ।’ लोकपितामह ब्रह्मा, क्षीरोदधिशायी विष्णु, शचीपति इन्द्र और भगवान भुवनभास्कर आदि समस्त देवताओं ने चन्दन, माला, सुन्दर धूप, खिलौने, छत्र, चँवर, भूषण और अंगराग आदि के द्वारा कुमार षड्वदन का सेनापति के पद पर अभिषेक किया। भगवान् श्रीविष्णु ने उन्हें सब प्रकार के आयुध प्रदान किये। धनाधिपति कुबेर, अग्नि और वायु ने क्रमशः दस लाख यक्षों की सेना, तेज और वाहन अर्पित किये। सुर-समुदाय ने कुमार कात्र्तिकेय को अनन्त पदार्थ समर्पित किये। तदन्तर देवताओं ने घुटने टेककर स्कन्द की स्तुति-प्रार्थना की। ‘देवताओं ! आप लोग शान्त होकर बताइये कि मैं आपकी कौन-सी ईच्छा पूरी करूँ?’ देवताओं की स्तुति से संतुष्ट होकर कुमार ने उनसे कहा- ‘यदि आप के मन मेें चिरकाल से कोई असाध्य कार्य भी करने की ईच्छा हो तो कहिये।’ ‘कुमार! तारक नामक प्रख्यात असुरराज सुर-समुदाय का सर्वनाश कर रहा है।’ देवताओं ने अत्यन्त मधुर वाणी में निवेदन किया- ‘वह अत्यन्त बलवान्, अजेय, क्रूर, दुराचारी एवं क्रोधी भी है। हमलोग उस असुर से भयभीत और त्रस्त हैं। अतएव आप उक्त दुर्दमनीय तारकासुर का वध कीजिये। यही एक कार्य शेष रह गया है।’ ‘तथास्तु!’ दुःखी देवताओं के वचन सुनते ही षडानन ने कह दिया और भू-कण्टक तारकासुर का वध करने के लिये वे देवताओं के पीछे-पीछे चल पड़े। कात्र्तिकेय का आश्रय प्राप्त हो जाने पर सुरेन्द्र ने अपना एक दूत भयानक आकृति वाले अजेय तारकासुर के पास भेजा। ‘असुरराज! देवराज इन्द्र ने संदेश दिया है।’ दूत ने तारकासुर के पास जाकर कहा- ‘वे देवगण तुमसे युद्ध करने आ रहे हैं तुम अपनी प्राणों की रक्षा के लिये जो भी प्रयत्न करना चाहो, कर लो।’ ‘निश्चय ही दूत को कोई आश्रय प्राप्त हो गया है।’ दूत के चले जाने पर असुर राज ने विचार किया- ‘अन्यथा वे ऐसी बात नहीं कर सकते थे।’ ‘ऐसा कौन वीर पुरुष है, जिसे मैंने अब तक परास्त नहीं किया है।’ तारकासुर पुनः विचार कर ही रहा था कि उसे वन्दियों के द्वारा बालक विशाख का स्तवन सुनायी पड़ा। ‘तुम्हारा वध बालक के द्वारा होगा।’ दैत्यराज तारक को पितामह का वर स्मरण हो आया। वह भयभीत हो गया, तथापि उसने शस्त्र धारण किया और अपनी दुर्दमनीय सेना के साथ कुमार के सम्मुख डट गया। ‘बालक! तू युद्ध क्यों चाहता है?’ तारकासुर ने अनुपम रूप-लावण्य-सम्पन्न कुमार को देखकर कहा-‘जा, कन्दुक खेल। तू निरा बच्चा है। युद्ध बलात् तेरे सिर पर लाद दिया गया है। यह तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय हुआ है। अभी तुझे समझ नहीं है। जा, घर चला जा।’ ‘तारक! यहाँ शास्त्रार्थ नहीं करना है।’ कुमार ने स्पष्ट शब्दों में तारकासुर से कहा-‘भयंकर संग्राम में शस्त्रों के द्वारा ही अर्थ की सिद्धि होती है। तुम मुझे शिशु समझकर मेरी अवहेलना न करो। विषधर का नन्हा बच्चा भी मार डालने में समर्थ होता है। बाल सूर्य की ओर भी दृष्टिपात करना कठिन होता है। इसी प्रकार मैं भी दुर्जय हँू। तुम मुझे पराजित नहीं कर सकोगे।’ कात्र्तिकेय का कथन पूर्ण नहीं हो पाया था कि धर्म-विध्वंसी असुर ने उनके ऊपर वज्रतुल्य मुग्दर का प्रहार किया, किंतु कुमार ने उसे अपने अमोघ तेज वाले चक्र से बीच में ही नष्ट कर दिया। असुर ने अपने जिन-जिन भंयकर अस्त्रों का प्रहार किया, वे सभी कुमार के द्वारा नष्ट हो गये। फिर पार्वती कुमार ने दैत्य पर अपनी भयानक गदा फंेकी। उसकी चोट से पर्वताकार दैत्य तिलमिला उठा। ‘निश्चय ही यह बालक असाधारण एवं दुर्जय शूरवीर है।’ गदाघात से व्याकुल तारक ने मन-ही-मन सोचा- ‘अब निस्संदेह मेरी मृत्यु समीप आ गयी है।’ मृत्यु-भय से भीत अजेय तारक काँप उठा। उसके ललाट पर स्वेद-कण झलकने लगे। उसकी यह दशा देखकर कालनेमि आदि दैत्यपतियों ने अत्यन्त वेग से कुमार पर आक्रमण कर दिया। किंतु अमित तेजस्वी एवं परम पराक्रमी कात्र्तिकेय तनिक भी विचलित नहीं हुए। दैत्यों के भयानक प्रहार और विभीषिकाएँ उन्हें स्पर्श तक नहीं कर सकी। उन्होंने दैत्यपतियों के समस्त अस्त्र-शस्त्रों को विदीर्ण कर दिया, किंतु दैत्य उनके भयानक प्रहार का निवारण करने में असमर्थ थे। कात्र्तिकेय के अस्त्रों की निरन्तर वर्षा से दैत्य-सेना क्षत-विक्षत हो गयी। धरती पर जैसे रक्त की सरिता प्रवाहित हो गयी और सर्वत्र दैत्य-वीरों के रुण्ड-मुण्ड दिखने लगे। बड़ा भयानक दृश्य था। रुद्र पुत्र कात्र्तिकेय के अस्त्रों की अनवरत वर्षा से दैत्य-दल विचलित ही नहीं, व्याकुल हो गया। अधीर होकर कालेनेमि आदि भयानक देवशत्रु युद्ध छोड़कर पलायित हुए। दैत्य-वाहिनी चतुर्दिक् भागी जा रही थी और किन्नरगण परम पराक्रमी कुमार के विजय-गीत गाने लगे। यह देखकर महाशूर तारक क्रोध से उन्मुत्त हो गया। उसने स्वर्ण-कान्ति से सुशोभित अद्भुत गदा से कुमार पर भीषण प्रहार किया और इतने तीक्ष्ण शरों की वर्षा की कि कात्र्तिकेय-वाहन मयूर रक्त से लथपथ हो भाग खड़ा हुआ। ‘दुष्ट दैत्य, खड़ा रह’ कुमार ने अत्यन्त कुपित होकर तारक से कहा। ‘अब मैं तेरी जीवन-लीला समाप्त कर रहा हँू। तू कुछ देर और अपने नेत्रों से इस संसार को देख ले।’ कुमार ने क्रुद्ध होकर महान् तारकासुर पर अपनी शक्ति का प्रहार किया। शक्तिमूर्ति पार्वती पुत्र कात्र्तिकेय की वह अमोघ शक्ति केयूर की खनखनाहट के साथ चली और सुर-शत्रु तारक के वज्र-तुल्य वक्ष में बड़े वेग से प्रविष्ट हो गयी। तारक का हृदय विदीर्ण हो गया। उस अमित बलशाली अजेय दैत्य का विशाल निर्जीव शरीर धरती पर गिर पड़ा। तारक-वध से धरती का पातक कट गया। सभी सुखी हुए। देवगण विपत्ति निवारक परमोपकारी महेश्वर-पुत्र कात्र्तिकेय का स्तवन करने लगे। उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही। वे आनन्द-मग्न होकर हँसते हुए उछलने-कूदने तथा नृत्य करने लगे। उन्होंने अमित तेजस्वी कुमार की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उन्हें अनेक वर प्रदान किये। इस प्रकार हर्षित और पुलकित देवगण सर्वथा निश्चिन्त होकर अपने-अपने लोकों के लिये प्रस्थित हुए।


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