शिव और शनि

शिव और शनि  

शिव और शनि पं. सुनील जोशी जुन्नरकर सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः। मंदचारः प्रसन्नात्मा पीड़ा दहतुमेशनिः।। सष्टि के प्रारंभ में शनि अत्यतं दीन-हीन और उपेक्षित थे। न व ग ्र ह परिवार में उन्हें भृत्य (नौकर) का स्थान प्राप्त था। वैदिक काल में सभी लोग सूर्य की उपासना करते थे। नैसर्गिक पाप प्रकृति के कारण उनकी कोई ख्याति नहीं थी। राजपुत्र होने पर भी उनका कोई सम्मान नहीं था। इस अपमान से दुखी शनि ने शिव आराधना प्रारंभ की.....। शनि की कर्तव्यनिष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यशस्वी होने का वरदान दिया। उसी शिव भक्ति के प्रताप से आज संसार में शनि के प्रति भक्ति बढ़ती जा रही है। वर्तमान में जितनी पूजा शनिदेव की हो रही है, उतनी किसी अन्य ग्रह की नहीं होती। शनि शिव को अत्यंत प्रिय है, इसलिए ऊपर लिखित मंत्र (स्तोत्र) में उन्हें शिवप्रिय कहा गया है। शनि ग्रह की आकृति भी शिवलिंग की भांति दिखाई देती है क्योंकि उपासक में उपास्य के गुण आ जाते हैं। प्रारब्ध कर्मों का शुभाशुभ फल तो सभी ग्रह देते हैं, किंतु भगवान शिव ने शनिदेव को विशेष तौर पर संचित पाप कर्मों का फल प्रदान करने का अधिकार दिया है इसलिए वे दंडाधिकारी कहलाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में तमोगुण की प्रधानता वाले क्रूर ग्रह शनि को दुख का प्रदाता (कारक) कहा गया है। वे देव, दानव और मनुष्य आदि को त्रास देने में समर्थ हैं, शायद इसीलिए उन्हें दुर्भाग्य देने वाला शैतान माना जाता है। किंतु वास्तव में शनि देव शैतान नहीं बल्कि देवता हैं। मनुष्य के दुख का कारण तो उसके अपने कर्म हैं, शनि तो निष्पक्ष न्यायाधीश की भांति बुरे कर्मों के आधार पर वर्तमान जन्म में दंड का प्रावधान करते हैं। फिर व्यक्ति को पूर्वकृत अशुभ कर्मों का दंड देने में शनि निमित्त मात्र हैं, दोष तो व्यक्ति के कर्मों का होता है। शनि द्वारा पीड़ित व्यक्ति को सर्वोच्च न्यायाधीश शिव शंभु के महामृत्युंजय मंत्र का जप कर पीड़ा से मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिए। साढ़ेसाती का वैज्ञानिक विवेचन जिस प्रकार प्रत्येक ग्रह गोचरवश, जन्मस्थ चंद्र से सापेक्ष स्थिति के अनुसार अपना-अपना शुभाशुभ फल देता है, उसी प्रकार शनि भी गोचरीय भ्रमण करते हुए जन्मस्थ चंद्र के सापेक्ष अपना शुभाशुभ फल देते हंै। तीसरे, छठे या 11 वें स्थान में स्थित शनि शुभ फल प्रदान करते हंै। किंतु चंद्र राशि से 12वें, पहले या दूसरे स्थान पर जब शनि गोचर करते हैं तो साढ़े सात वर्ष का यह समय शनि की साढ़ेसाती दशाकालांश के नाम से जाना जाता है। नक्षत्र दशा और दिन दशा के अतिरिक्त शनि की गोचर दशा को भी फलित ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस गाचे रीय दशा का े ही शनि की साढसे़ ाती या ढैया के नाम से जाना जाता है। साढ़ेसाती और ढैया दशा कालांश में शनि जन्म कुंडली (लग्न चक्र) में अपनी स्थिति, दृष्टि तथा युति का फल जातक को प्रदान करते हंै। साढ़ेसाती में जन्मकालीन चंद्र अपने शत्रु ग्रह शनि से युत होता है, यह ग्रहण नामक एक अशुभ योग है। चंद्र एक सौम्य ग्रह है, उसका पापी ग्रह शनि से युत होना दोषपूर्ण होता है। अतः जन्मस्थ चंद्र से गोचर के शनि की युति साढ़ेसाती का प्रमुख कारण है। साढ़ेसाती का शुभाशुभ फल गोचर का शनि सिर्फ तीन राशियों वृषभ, तुला और कुंभ में ही शुभ फल देता है, शेष नौ राशियों में अशुभ फल देता है। वृषभ, तुला, मकर या कुंभ राशि के जातकों को साढ़ेसाती अधिक अशुभता प्रदान नहीं करती है। जन्मस्थ शनि शुभ हो, तो साढ़ेसाती कल्याणकारी सिद्ध होती है। कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन या मेष राशि के जातकों के लिए साढ़ेसाती सर्वाधिक कष्टप्रद होती है। मिथुन एवं कन्या राशि वालों के लिए साढ़ेसाती मध्यम फलदायी होती है।



शिव शक्ति   जुलाई 2007

शिव कौन है ? शक्ति बिना शव है शिव , शिव शक्ति के स्त्रोत, वेदों में शिव का स्वरूप, श्विया पूजन का महात्मय, कालजयी महामृत्युंजय मन्त्र, शिव और तन्त्र शास्त्र का सम्बन्ध, तंत्र शास्त्र शिव प्रणीत है और तीन भावों में विभक्त हैं- आगम, यामल और मुख्य

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