वास्तु के मूलभूत 51 सूत्र पं. जयप्रकाद्गा शर्मा (लाल धागे वाले) सफेद रंग की सुगंधित मिट्टी वाली भूमि ब्राह्मणों के निवास के लिए श्रेष्ठ मानी गई हैं। लाल रंग की कसैले स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, राजनेता, सेना व पुलिस के अधिकारियों के लिए शुभ मानी गई है। हरे या पीले रंग की खट्टे स्वाद वाली भूमि व्यापारियों, व्यापारिक स्थलों तथा वित्तीय संस्थानों के लिए शुभ मानी गई है। काले रंग की कड़वे स्वाद वाली भूमि अच्छी नहीं मानी जाती। यह भूमि शूद्रों के योग्य है। मधुर, समतल, सुगंधित व ठोस भूमि भवन बनाने के लिए उपयुक्त है। खुदाई में चींटी, दीमक, अजगर, सांप, हड्डी, कपड़े, राख, कौड़ी, जली लकड़ी व लोहा मिलना शुभ नहीं माना जाता है। भूमि की ढलान उत्तर और पूर्व की ओर हो तो शुभ होती है। छत की ढलान ईशान कोण में होनी चाहिए। भूखंड के दक्षिण या पश्चिम में ऊंचे भवन, पहाड़, टीले या पेड़ शुभ माने जाते हैं। भूखंड से पूर्व या उत्तर की ओर कोई नदी या नहर हो और उसका प्रवाह उत्तर या पूर्व की हो तो शुभ माने जाते हैं। भूखंड के उत्तर, पूर्व या ईशान में भूमिगत जल स्रोत, कुआं, तालाब एवं बावड़ी शुभ माने जाते हैं। भूखंड का दो बड़े भूखंडों के बीच होना शुभ नहीं होता है। भवन का दो बड़े भवनों के बीच होना शुभ नहीं होता। आयताकार, वृत्ताकार व गोमुखी भूखंड गृह वास्तु में शुभ होता है। वृत्ताकार भूखंड में निर्माण भी वृत्ताकार ही होना चाहिए। सिंह मुखी भूखंड व्यावसायिक वास्तु के लिए शुभ होता है। भूखंड का उत्तर या पूर्व या ईशान कोण में विस्तार शुभ माना जाता है। भूखंड के उत्तर और पूर्व में मार्ग शुभ माने जाते हैं। दक्षिण और पश्चिम में मार्ग व्यापारिक स्थल में लाभदायक माने जाते हैं। भवन के द्वार के सामने मंदिर, खंभा व गड्ढा शुभ नहीं माने जाते। आवासीय भूखंड में बेसमेंट नहीं बनाना चाहिए। बेसमेंट बनाना आवश्यक हो तो उत्तर और पूर्व में ब्रह्म स्थान को बचाते हुए बनाना चाहिए। बेसमेंट की ऊंचाई कम से कम 9 फीट और 3 फीट तल से ऊपर हा ताकि प्रकाश और हवा आ जा सके। कुआं, बोरिंग व भूमिगत टंकी वास्तु पुरुष के अतिमर्म स्थानों को छोड़कर उत्तर, पूर्व या ईशान में बना सकते हैं। भवन की प्रत्येक मंजिल में छत की ऊंचाई 12 फुट रखनी चाहिए। 10 फुट से कम तो नहीं होनी चाहिए। भवन का दक्षिणी भाग हमेशा उत्तरी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन का पश्चिमी भाग हमेशा पूर्वी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन में नैत्य सबसे ऊंचा और ईशान सबसे नीचा होना चाहिए। भवन का मुखय द्वार ब्राह्मणों को पूर्व में, क्षत्रियों को उत्तर में, वैश्य को दक्षिण में तथा शूद्रों को पश्चिम में बनाना चाहिए। इसके लिए 81 पदों का वास्तु चक्र बनाकर निर्णय करना चाहिए। द्वार की चौड़ाई उसकी ऊंचाई से आधी होनी चाहिए। बरामदा घर के उत्तर या पूर्व में ही बनाना चाहिए। खिड़कियां घर के उत्तर या पूर्व में बनाना चाहिए। खिड़कियां घर के उत्तर या पूर्व में अधिक तथा दक्षिण या पश्चिम में कम बनानी चाहिए। ब्रह्म स्थान को खुला, साफ तथा हवादार रखना चाहिए। गृह निर्माण में 81 पद वाले वास्तु चक्र में 9 स्थान ब्रह्म स्थान के लिए नियत किए गये हैं। चार दीवारी के अंदर सबसे ज्यादा खुला स्थान पूर्व में छोड़ें। उससे कम उत्तर में, उससे कम पश्चिम में, सबसे कम दक्षिण में छोड़ें। दीवारों की मोटाई सबसे ज्यादा दक्षिण में, उससे कम पश्चिम में, उससे कम उत्तर में, सबसे कम पूर्व में रखें। घर के ईशान कोण में पूजा घर, कुआं, बोरिंग, बच्चों का कमरा, भूमिगत वाटर टैंक, बरामदा, लिविंग रूम, ड्राइंग रूम, व बेसमेंट बनाया जा सकता है। घर की पूर्व दिशा में स्नान घर, तहखाना, बरामदा, कुआं, बगीचा व पूजा घर बनाया जा सकता है। घर की दक्षिण दिशा में मुखय शयन कक्ष, भंडार, सीढ़ियां व ऊंचे वृक्ष लगाए जा सकते हैं। घर के नैत्य कोण में शयन कक्ष, भारी व कम उपयोगी सामान का स्टोर, सीढ़ियां, ओवर हैड वाटर टैंक व शौचालय बनाये जा सकते है॥ घर की पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष, सीढ़ियां, अध्ययन कक्ष, शयन कक्ष, शौचालय व ऊंचे वृक्ष लगाए जा सकते हैं। घर के वायव्य कोण में अतिथि घर, कुंवारी कन्याओं का शयन कक्ष, रोदन कक्ष, लिविंग रूम, ड्राइंग रूम बनाये जा सकते हैं। घर का भारी सामान नैत्य कोण, दक्षिण या पश्चिम में रखना चाहिए। घर का हल्का सामान उत्तर, पूर्व व ईशान में रखना चाहिए। घर के नैत्य भाग में किरायेदार या अतिथि को नहीं ठहराना चाहिए। सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ होना चाहिए। (मतांतर से अपने घर में पूर्व दिशा में सिर करके सोना चाहिए, ससुराल में दक्षिण में सिर करके, परदेश में पश्चिम में सिर करके सोना चाहिए और उत्तर दिशा में सिर करके कभी नहीं सोना चाहिए।) दिन में उत्तर की ओर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए। घर के पूजा गृह में बड़ी मूर्तियां नहीं होनी चाहिए। दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य प्रतिमा, तीन देवी प्रतिमा, दो गोमती चक्र व दो शालिग्राम नहीं रखने चाहिए। भोजन सदा पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके ही करना चाहिए। सीढ़ियों के नीचे घर, शौचालय व रसोई घर नहीं बनाना चाहिए। धन की तिजोरी का मुंह उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। अष्ट दिशा एवं गृह वास्तु छः श्लोकी संपूर्ण गृह वास्तु के श्लोकों में कहा गया है : षोडशदिशा ग्रह वास्तु : ईशान कोण में देवता का गृह, पूर्व दिशा में स्नान गृह, अग्नि कोण में रसोई का गृह, उत्तर में भंडार गृह, अग्निकोण और पूर्व दिशा के बीच में दूध-दही मथने का गृह, अग्नि कोण और दक्षिण दिशा के मध्य में घी का गृह, दक्षिण दिशा और र्नैत्य कोण के मध्य शौच गृह, र्नैत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य में विद्याभ्यास गृह, पश्चिम और वायव्य कोण के मध्य में रति गृह, उत्तर दिशा और ईशान के मध्य में औषधि गृह, र्नैत्य कोण में सूतिका प्रसव गृह बनाना चाहिए। यह सूतिका गृह प्रसव के आसन्न मास में बनाना चाहिए। ऐसा शास्त्र में निश्चित है।


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