शनि ग्रह के क्या-क्या उपाय हैं?

शनि ग्रह के क्या-क्या उपाय हैं?  

शनि पाप ग्रह है। यह सूर्य का पुत्र यम तथा यमुना का भाई है। मनुष्य को उसके पूर्व पाप का दंड देने के लिए वह अपने हाथ में (अपने भाई यम की भांति) लोहे का दंड धारण किए हुए है। शनि को ”कालपुरुष“ का दुख माना गया है। इसके भयंकर प्रकोप से राजा भी रंक हो जाता है। शनि प्रीत्यर्थ किए जाने वाले विविध उपाय: शनि ग्रह की पीड़ा से ग्रस्त जातकों को विभिन्न उपायों का सहारा लेकर शांति कार्य करना चाहिए, तभी वे शनि बाधा से मुक्त हो सकते हैं और सुख शांति पूर्वक अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। शनि की महादशा हो या शनि की अंतर्दशा या शनि की साढ़ेसाती अथवा अढैया शनि के शान्त्यर्थ नीचे लिखी बातों अथवा युक्तियों को अपनाने से शनि ग्रह जनित कष्टों से बचा जा सकता है। - शिवलिंग का पूजन-अर्चन और रुद्राभिषेक करना। - हनुमान जी को चोला चढ़ाना और सुंदरकांड, हनुमान चालीसा तथा हनुमानाष्टक का पाठ करना। - भैरव चालीसा, भैरवाष्टक, भैरव-स्तोत्र, अष्टोत्तर शतनाम का पाठ करना। - शनि चालीसा का नित्य पाठ, शनि स्तोत्र का पाठ, शनि के मंत्रों का जपादि करना। - शुभ मुहूत्र्त में शनि यंत्र बनाकर धारण करना। यंत्र को ताबीज में भरकर काले धागे में पहनना। - शनिवार को कहीं से काला कुत्ता लाकर पालना, उसके गले में काला बेल्ट बांधना और दूध पिलाना। - शनिश्चरी अमावस्या को सरसों के तेल से शनिदेव का अभिषेक करना। - माता महाकाली के मंदिर में शनिवार को काले आसन पर बैठकर काली सहस्रनाम का पाठ करें। - शीतऋतु में ठंड से ठिठुरते हुए किसी गरीब व्यक्ति या भिखारी को काला कंबल भेंट करना। - कम से कम उन्नीस शनिवारों की संध्या बेला में पीपल वृक्ष की जड़ में तिल के तेल का दीप जलाना। - काले घोड़े की नाल की अथवा मल्लाह की पार उतारनी नाव की कील निर्मित अंगूठी पहनना। - शनिवार को लोहे के बर्तन में अथवा टीन के कटोरीनुमा ढक्कन में सरसों का तेल भरकर उसमें मुंह देखकर दान करना। - स्वर्ण धातु में नीलम रत्न धारण करना अथवा नीली या लाजवर्त की अंगूठी बीच की उंगली में पहनना। - शनि मंत्र का जप करते समय सदैव रुद्राक्ष की माला का ही प्रयोग करना। - शनिवार को काले वस्त्र, काले रंग का छाता, काली उड़द दाल, काला तिल दान करना। - शनिवार को शनि और भैरव मंदिरों में क्रमशः शनि चालीसा, भैरव चालीसा और वितरित करना। - सप्तमुखी रुद्राक्ष धारण करना। - हनुमत कृपा से भरपूर चैदहमुखी रुद्राक्ष धारण करना। - भैरव या शनि मंदिर में शनिवार को भंडारा करना। - शनिवार को एक तरफ घी और दूसरी तरफ तेल चुपड़ी रोटी काले कुत्ते को पीड़ामुक्त होने तक खिलाना। - काले रंग की पाली हुई मछलियों को ले जाकर आजादी से जीने के लिए किसी जलाशय में छोड़ आना। - शनिवार को काले रंग की चिड़िया खरीदकर उसे दोनों हाथ आसमान में उड़ा देना। - शनिवार को बंदरों के बसेरा वाले वृक्ष के चारों ओर भुने चने बिखेरना (साथ में सहयोगी या लाठी हो)। - सात शनिवार सवा किलो सतनाजा लेकर भैंस की डेरी या चरागाह जाकर किसी भैंसे को खिलाकर घर लौट आना। - दारु हल्दी के जल से 23 शनिवार को स्नान करना। - बैगन के रंग के वस्त्र धारण और वितरित करना। - अशुभ शनि जनित धन की हानि रोकने हेतु शनिवार से कौओं को दाना डालना आरंभ करना। - शनिकृत रोगों से निपटने के लिए प्रत्येक शनिवार भिखारियों को 1900 ग्राम तक उड़द दान में देना। - शनिवार को हनुमान जी को तेल चढ़ाना। - ब्राह्मण को संकल्प के साथ बछड़े सहित श्यामा गौ का दान करना। - पूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ 23 शनिवार संध्याकाल सरसों के तेल से शनि यंत्र का अभिषेक करना। - लघु आकार का स्वर्ण पालिश युक्त शनि यंत्र धूम्रवर्ण गणपति एवं काली के पाकेट साइज चित्र के साथ ऊपरी जेब में रखना। - दशहरा के दिन से शमी वृक्ष का पूजन आरंभ कर अगले दशहरे के दिन समाप्त करना। - दशरथ जी वाले शनि स्तोत्र का पाठ (मूल हो तो उत्तम) - साढ़ेसाती शनि की दशा में शनि सहस्रनाम का शनिवार के दिन पाठ करना। - शनिवार दोपहर काली गाय को गुड़, रोटी या भैंसे को दाना, चारा, पानी या रीछ को भोजन देना। - शनिवार को खुले सिर-पैर अर्थात बिना जूता चप्पल आदि के शनि मंदिर/भौरव, हनुमान मंदिर दर्शन करने जाना। - लोहे का त्रिशूल महाकाल शिव, महाकाल भैरव या महाकाली मंदिर में शनिवार को अर्पित करना। - शनिवार की रात दोनों हाथों एवं पैरों की उंगलियों के नाखूनों में सरसों का तेल लगाना। - सोमवार को ¬ नमः शिवाय जपते हुए तुलसी, शहद, दूध, दही, गंगाजल या कूप जल से शिवलिंग को नहलाना। - सिद्ध शनि मंदिर जाकर लगातार सात शनिवारों को शनि-पूजन करना। - शिव तांडव स्तोत्र, युधिष्ठिर कृत शनि स्तोत्र, शनि कवच और अमोघ शिव कवच का पाठ कना। - सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः। मंदचारः प्रसन्नात्मा पीड़ा हरतु मे शनिः मंत्र से शनि की प्रार्थना करना। - सोमवार को शिवालय में पूजनोपरांत रुद्राक्ष की माला से एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जप करना। - शनि पुष्य नक्षत्र में बिच्छू व शमी की जडें़ काले कपड़े में लपेटकर दाहिनी भुजा में धारण करना। - शनिवार को हनुमान जी के मंदिर में सिंदूर एवं चमेली का तेल चोला हेतु अर्पित करें। - प्रति शनिवार अपने भोजन का कुछ भाग बचाकर कौओं को खिला देना। - शारीरिक व्याधि शमन हेतु ¬ नमः शिवाय इस षडाक्षर मंत्र का जप निरंतर करते रहना। - शनि पीड़ा काल में रुद्राष्टक का हर शनिवार को प्रातः पाठ करना। - शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव को गुग्गल की धूप देना। - शनि पीड़ा निवारण के लिए शनि के दान-पदार्थों का शनिवार को सुपात्र को दान देना। - शनि पीड़ा शमनार्थ काली जी की निम्न स्तुति का मानसिक-स्तवन करना। ”काली काली महाकाली कालिके परमेश्वरी। सर्वानन्दकरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।“ - शनिवार का व्रत निष्ठापूर्वक करना। यह व्रत शुक्लपक्ष के प्रथम शनिवार से किया जा सकता है। व्रतों की संख्या 7,19,25,33,51 हो सकती है। इस दिन भोजन सूर्यास्त से 2 घंटे बाद करना चाहिए। इस दिन काली बछिया को, जिसके सींग न हो, घास खिलाना ऋणग्रस्त व्यक्ति के लिए शुभ माना गया है। शनिवार को बजरंगबली श्री हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए। श्री सुंदरकांड व हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए तथा हनुमान जी के सामने सरसों या चमेली के तेल का दीपक जलाना चाहिए। अंतिम व्रत के दिन उद्यापन में संक्षिप्त हवन करना चाहिए। हवन में शमी वृक्ष की लकड़ी का उपयोग करना चाहिए। लाल किताब द्वारा शनिदोष निवारण के टोटके - दैनिक जीवन में झूठ का सहारा न लें। - वांसुरी में शक्कर भर कर उसे एकांत स्थान में दबा दें। - काली गाय को तेल की जलेबी खिलाएं। - आर्थिक नुकशान से बचने के लिए एवं शनि पीड़ा को दूर करने के लिए रोज कौओं को रोटी के टुकड़े खिलाएं। रोटी पर सरसों का तेल चुपड़ कर गायों और कुत्तों को खिलाएं। - शनि अशुभ होने पर लोहा, काला नमक, काला सुरमा धारण करें। - बंदरों को गुड़ तथा चने खिलाएं। - कुएं में दूध डालें एवं सर्प को दूध पिलाएं। - चांदी का एक चैकोर टुकड़ा हमेशा अपने पास रखें। - भैरव जी का पूजन करें और उन्हें शराब चढ़ाएं। - सरसों का तेल या शराब बहते पानी में प्रवाहित करें। - नीच शनि वाले लोग शनिवार को तेल, शराब, उड़द, मांस एवं अंडा इत्यादि का सेवन न करें। उस दिन उड़द, तेल, लोहे की वस्तु, काला वस्त्र आदि दान करें। - यदि विवाह में शनि बाधक हो, तो काली साबुत उड़द एवं लोहे की वस्तु दान करें। - यदि शनि विपरीत चल रहा हो तो सफेद वस्त्र में काले तिल बांधकर पानी में प्रवाहित करें। तिल व गुड़ की रेवड़ियां बांटें। - शनि के सभी प्रकार के दुष्फल टालने के लिए सरसों के तेल से भरा घड़ा नदी के तली की गाड़ें, जिसके ऊपर से पानी बहता रहे। - शनि के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए रोज भोजन करते समय परोसी गई थाली में से एक हिस्सा गाय को, एक हिस्सा कुत्ते को और एक हिस्सा कौए को खिलाएं। शनि बाधा मुक्ति के प्रमुख उपाय: दान: काले तिल, छिलका लगी हुई उड़द की दाल, जो देखने में काले रंग के होती है, काला कपड़ा, काले चमड़े के जूते, काले रंग का छाता, लोहा या लोहे का बना चिमटा, आदि किसी निर्बल, असहाय, कंगाल वृद्ध को शनिवार को मध्याह्न काल में दान देने से शनि का खतरा टल जाता है और शुभ इच्छाएं पूर्ण होने लगती हैं। नीलम रत्न, स्वर्ण, भैंस, श्यामा गौ, कस्तूरी आदि मध्याह्नकाल में शनिवार को किसी ब्राह्मण को उससे शनि दान का संकल्प पढ़वाकर दक्षिणा देकर दानस्वरूप भेंट कर देना चाहिए। ”सर्वेषाम उपायानां दानं श्रेष्ठतम“ ऐसा विद्वानों का मत है। शनिवार को तेल मांगने वाले भिक्षुकों को शनि शमनार्थ तेल का दान केवल मध्याह्न काल में ही करना चाहिए। अन्य ग्रहों के समान शनि का भी दान-समय विद्वानों, ज्योतिष के मनीषियों, आचार्यों आदि ने पहले से ही निश्चित कर रखा है। अतः दान समय का विशेष महत्व है। जैसे शनिवार को कोई भिखारी आपके द्वार पर सुबह के समय तेल मांगने के लिए आ जाए और आप हंसी खुशी उसे तेल या रुपया पैसा अथवा कच्चा या पका अन्न भिक्षा में दे, दें तो अपना अहित ही करेंगे। आपको पुण्य लाभ नहीं मिलेगा, अपितु आई हुई लक्ष्मी और आने वाली लक्ष्मी दोनों ही भाग खड़ी होंगी। माला-धारण: शनि की महादशा, अंतर्दशा, ढ़य्या, साढ़ेसाती और जन्मकालिक शनि की नीचस्थ, शत्रुराशिस्थ, पापयुत, पापदृष्ट स्थिति आदि के अशुभत्व निवारण के लिए लाल चंदन या रुद्राक्ष की अभिमंत्रित माला धारण कर सकते हैं। पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ ¬ नमः शिवाय मंत्र को जपते हुए ये मालाएं धारण करने वाले जातक की अनिष्ट से रक्षा होती है और शांति मिलती है। एक बात विशेष ध्यान देने की यह है कि इन मालाओं को अशुद्ध एवं गंदे, साथ ही छूत वाले स्थान से दूर रखना चाहिए। मालाओं को सदैव शुद्ध तथा साफ रखना चाहिए। शयन के पूर्व माला उतारकर पवित्र स्थान में रखना चाहिए। दूसरे दिन सुबह पांच बार ¬ नमः शिवाय का पाठ कर स्नानोपरांत माला धारण कर लेना चाहिए। यह क्रिया नियमित रूप से करनी चाहिए। मालाओं को उतारते और धारण करते समय टूटने से बचाना चाहिए, क्योंकि उनका टूटकर गिर जाना और दानों का बिखर जाना महान अपशकुन है जिसका दुष्परिणाम धारक को भोगना ही पड़ता है। अतएव माला सदैव मजबूत धागे में ही गुथी हुई होनी चाहिए। माला द्रव्य लाभ कराती है। कहा जाता है कि माली हालत उसी की खराब होती है, जिसके गले में कोई माला ही न हो। पहनी जाने वाली माला से जप नहीं करना चाहिए। इसी तरह जिस माला से मंत्र जप करते हैं उसे कभी भी पहनना नहीं चाहिए। श्री रामदूत का स्तवन: लंका दहन के अवसर पर महाबली वीर श्री रामदूत हनुमान ने रावण की कैद से शनि देवता का उद्धार किया था। तभी से शनि देव ने अपना वार शनिवार हनुमान जी को दिया और उनसे कहा कि जो कोई शनिवार को आपकी पूजा करेगा उसे शनि दशा की पीड़ा नहीं सताएगी। इसलिए तभी से शनि शांत्यर्थ श्री हनुमान जी की शनिवार के दिन पूजा होती है। शनि देवता की कैसी भी कुदृष्टि क्यों न हो, हनुमन स्तवन करने वाले भक्त पर कभी भी किसी प्रकार से प्रभावित नहीं कर सकती। शनिवार को सुंदरकांड का पाठ करने वालों पर हनुमान जी की कृपा से शनि पीड़ा शांत हो जाती है। संकट कटै मिटे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलवीरा। शनि ग्रह जनित रोग निवारण में हनुमान बाहुक के पाठ से सहायता मिलती है। नित्य 8 बार हनुमानाष्टक का पाठ करने से सभी संकट कट जाते हैं। श्री शनि देव का स्तवन: शनि बाधा निदान हेतु पीड़ित शनि देवता की पूजा अर्चना का अपना विशेष स्थान है। जो अपने को कष्ट दे रहे हों उन्हें पूजा पाठ आदि के माध्यम से प्रसन्न करना ही अधिक अच्छा होता है, ताकि वे अपने क्रोध एवं क्रूरता को शांत करे जिससे जातक सुख-पूर्वक अपना जीवन यापन कर सकें। शनि की सौर मंडलीय ग्रहों में अनुचर का पद प्राप्त है। साढ़ेसाती/ढय्या में अनिष्ट फल देने में यह कोई कोताही नहीं बरतता। यह मनुष्य को शासक से सेवक बनाने में पूर्णतः सक्षम है। प्रसन्न होने पर यह ग्रह रंक से राजा बना सकता है। शनि को प्रसन्न करने के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत हैं। शनि मंत्र: गुरु के निर्देशानुसार निम्न मंत्रों के जप करने से कार्य की सिद्धि होती है। ¬ शं शनैश्चराय नमः (शास्त्रोक्त मंत्र) ¬ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः (पूजा आराधना मंत्र) ¬ ह्रीं श्रीं ग्रहचक्रवर्तिने शनैश्चराय क्लीं ऐं सः स्वाहा। (अरिष्ट नाशक मंत्र) ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः (बीज मंत्र) ¬ शन्नोदेवी रभीष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्रवन्तुनः (वैदिक मंत्र) (शनि मंत्र की जप संख्या - 23000) अरिष्टकारक शनि ग्रह का जपानुष्ठान शनिवार मध्याह्न काल में आरंभ करना चाहिए। जप संख्या 23 हजार हो। दशांश हवन शमी वृक्ष की लकड़ी से करना चाहिए। यदि जप स्वयं न कर सकें, तो किसी योग्य, अनुभवी, कर्मकांडी ब्राह्मण से कराएं। समापन के उपरांत विप्र पूजा अन्न, धन, वस्त्र, भोजन, दान, दक्षिणा देकर करनी चाहिए। पूर्ण विधि-विधान के साथ मंत्रानुष्ठान करने पर क्रूर शनि कृत कष्टों का शमन हो जाता है एवं परम शांति मिलती है। शनि यंत्र धारण एवं स्थापन: शनिदेव का पूजन, पाठ-परायण अर्थात् चालीसा, स्तोत्र आदि के पाठ, शांति विषयक कृत्य आदि में शनि के यंत्र का अपना अलग महत्व है। यंत्र में संबंधित देवता ाअैर ग्रह का वास होता है, अतः ग्रह से संबंधित धातु अथवा मिश्र धातु से बने यंत्र की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा घर की पूजास्थली में की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर प्राण-प्रतिष्ठित यंत्र को अपनी कार्यस्थली आदि में भी स्थापित कर उसके दर्शन और पूजन नित्य कर सकते हैं। शनि पीड़ा की अवधि में शनि के शांति विधान में मंत्र जप के समय यंत्र की स्थापना करने से जप का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है और कष्ट की वेदना क्रमशः धीरे-धीरे कम होने लगती है। बीज-मंत्र युक्त एवं धनुषाकार यंत्र उत्तम होता है। शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार को सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पूर्व अष्टगंध या रक्तचंदन की स्याही और अनार की कलम से भोजपत्र पर इस यंत्र को तैयार कर ताबीज रूप में शनि बीज मंत्र से अभिमंत्रित कर धारण कर सकते हैं। इस हेतु चांदी या तांबे के ताबीज और काले धागे का इस्तेमाल करना चाहिए। 9 वर्ग वाले इस यंत्र में 7 से 15 तक के अंक प्रयुक्त होते हैं एवं यंत्र की प्रत्येक पंक्ति का योग हर तरफ से 33 ही आता है। श्री भैरव पूजन स्तवन: बं बं ह्रीं ¬ नमः श्री बटुक भैरवाय। साढ़ेसाती, ढय्या, दशांतर्दशा, गोचर आदि में जब शनि अरिष्ट फल देता है, तब शनि स्तवन के समान भैरव नाथ जी का स्तवन भी किया जाता है। भैरव काली के लाल हैं। ये नींबू, नारियल, सरसों तेल, अर्क, पुष्प, उड़द के बड़े और सोमरस के पान से जल्दी प्रसन्न होते हैं। शनि पीड़ा मुक्ति हेतु भैरवनाथ भगवान के दर्शन, पूजन, परिक्रमा करने होते हैं। ये भी आशुतोष शिव जी के समान थोड़े में ही प्रसन्न हो जाने वाले देवता हैं। शनिवार को लोग दर्शनार्थ भैरव मंदिर अवश्य जाते हैं। कहीं-कहीं उनके मंदिरों में रविवार को पूजन, अर्चन का विशेष महत्व है। ”रवि के दिन जन भोग लगावहिं। धूप दीप नैवेद्य चढ़ावहि।।“ भैरव चालीसा का पाठ, भैरवाष्टक का पाठ, भैरव अष्टोत्तर शत नाम का पाठ, कवच-पाठ आदि भैरव देव को प्रसन्न करने के सरल साधन हैं जिनसे शनि पीड़ा शांत होती है, शत्रुओं का नाश होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भैरव जी के अद्भुत चमत्कारिक आपदुद्धारक मंत्र का कम से कम एक माला जप नित्य करना चाहिए। भैरव जी का मंत्र इस प्रकार है: ¬ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ¬।। व्रत उपवास: भारतीय धर्म परंपरा में व्रतोपवास करने की प्रक्रिया अनादि काल से चली आ रही है, जिसका महत्व किसी से छिपा नहीं है। जहां एक ओर मनोकामना पूर्ति के लिए, सुख-सौभाग्य के लिए, अपने इष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए, पर्वोत्सव मनाने के लिए लोग व्रत धारण करते हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रह पीड़ा निवारण हेतु व्रत का संकल्प लेते हैं। शनि के लिए शनिवार का उपवास करना चाहिए। शनि व्रत 21, 31 या 51 की संख्या में किए जाते हैं। दिन में एक समय भोजन का त्याग करना ही उपवास कहलाता है। सूर्यास्त के पूर्व गणपति और अपने इष्टदेव का ध्यान करते हुए संबंधित देवता और ग्रह का पूजन करना चाहिए। शनि व्रत में हनुमान की पूजा अर्चना का विशेष महत्व है। व्रत खोलने के लिए पूजन के समय शनिवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करना चाहिए। यह व्रत शुक्ल पक्ष में शुरू करना चाहिए। व्रत वाले दिन दूग्धाहार और फलाहार कर सकते हैं। खारे नमक के अतिरिक्त अन्य दूसरे नमकों को भोजन में हविष्यान्न के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। पूर्ण विधि विधान के साथ शनि व्रत का अनुष्ठान करने से अरिष्ट फल दूर होता है एवं अनुकूल फल की प्राप्ति होती है। कुछ सरल उपाय: शनि ही नहीं, किसी भी ग्रह के अनिष्ट फल से बचाव के लिए श्री हनुमान की उपासना बेहद प्रभावकारी मानी गई है। श्री हनुमान की उपासना सरल होने के साथ-साथ व्यय रहित भी है। बस आपको दिन या रात में कभी भी शुद्ध मन से तुलसीकृत श्री रामचरित मानस के सुंदरकांड का पाठ करना है। विधि इस प्रकार हैः सर्वप्रथम एक पाटे पर लाल वस्त्र बिछा दें। हो सके तो उसपर श्री हनुमान की मूर्ति या चित्र रखकर, साथ में जल, पुष्प एवं दीपक रखकर ज्योति प्रज्वलित करें। इसके उपरांत श्री हनुमान जी को पधारने का अनुरोध करें और सर्वप्रथम श्री रामचरित मानस के किष्किंधाकांड के अंतिम भाग का यह प्रसंग (सोरठा सहित) पढ़ें: अंगद कहइ जाऊं मैं पारा। जिय संसय कछु फिरती पारा। सोरठा: नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोया अधिक सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अध खगबधिक। इसके बाद श्रद्धा के साथ हुनमान जी को प्रणाम कर सुंदरकांड का पाठ करें। अंत में पुनः उपर्युक्त चैपाइयां पढ़कर संकट निवारण का अनुरोध करें। शनि की महादशा, साढ़ेसाती एवं ढय्या तथा कुंडली में अशुभ शनि के कष्टों का निवारण करने वाले कुछ सरल उपाय यहां प्रस्तुत है, जो अपने आप में विशिष्टिता लिए हुए हैं, बस आवश्यकता है इन्हें सच्चे मन एवं पूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ करने की। - शनिवार को सायंकाल उड़द की दाल के पकौड़े एवं इमरतियां कुत्ते को खिलाएं। - शनिवार को एक समय उपवास रखें। सरसों के तेल में छाया देखकर दान दें। - पीपल वृक्ष की जड़ में जल दें। - नाव की कील या काले घोड़े की उतरी नाल का छल्ला बिना आग में तपाए पीटकर बनवाएं, शनिवार को दूध गंगाजल में धोकर और धूप दिखाकर सायंकाल दाहिने हाथ की मध्यमा में धारण करें। - शनिवार को अपने हाथ की नाप के उन्नीस हाथ काले धागे की माला बनाकर पहनें। यह अनुभूत है, इसे अवश्य आजमाएं, परंतु शर्त है कि यह क्रिया करने से पहले किसी को भी इसकी जानकारी न दें, भले ही वह आपके घर का सदस्य ही क्यों न हो। - शनिवार को पीपल के वृक्ष के चारों ओर शनि मंत्र ¬ शं शनैश्चराय नमः का जप करते हुए सात बार कच्चा सूत लपेटें। - दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ शनि की पीड़ा को एकदम कम करता है, इसे शनिवार से प्रारंभ करके मात्र 40 दिन लगातार करें, फिर इसकी अनुभूति आपको स्वतः होने लगेगी। शनि के डर से इधर-उधर भटकने से अच्छा है, स्वयं ही शनि देव का यह प्रयोग तीन शनिवार घर पर ही संपन्न करके शनि कृपा प्राप्त करें। वर्तमान समय में शनिदेव की कृपा प्राप्ति का एक मात्र और सर्वश्रेष्ठ माध्यम है राजा दशरथकृत स्तुति एवं दशरथकृत तांत्रोक्त शनि यंत्र प्रयोग। इससे शनि शत्रु की जगह मित्र और सहायक हो सकते हैं और जातक को रंक से राजा बनने की सामथ्र्य प्रदान करते हैं। श्री दशरथकृत स्तुति एवं तांत्रोक्त यंत्र प्रयोग प्रयोग विधि: किसी भी शनिवार को सुबह या शाम सूर्यास्त के बाद शुद्ध होकर, काले कपड़े के आसन पर बैठकर अपने पूजा स्थल में 10ग10 इंच आकार का काला सुती वस्त्र बिछाकर इस पर अपने नाम से प्राण-प्रतिष्ठित शनि यंत्र को दीवार के सहारे स्थापित करें तथा सरसों के तेल का दीपक जलाएं व धुप करें। उसके बाद यंत्र के सम्मुख काली साबुत उड़द चढ़ाएं तथा तेल के दीपक में से सीधे हाथ के अंगूठे से तेल लेकर शनि यंत्र पर उसका हल्का सा टीका लगाएं। पूर्ण भक्ति भाव से शनि देव का स्मरण करते हुए दशरथकृत स्तुति का पाठ करें। पाठ समाप्ति के बाद शनि यंत्र को प्रणाम करके हट जाएं। दूसरे शनिवार को फिर स्तुति करें तथा तीसरे शनिवार को शनि सामग्री अर्पण के बाद यंत्र को तिलक लगाएं। तीसरे शनिवार को पूजन संपन्न होने के बाद यंत्र के सम्मुख सामग्री की उसी काले कपड़े में पोटली बनाएं व उसी दिन या अगले शनिवार को पोटली को अपने सिर पर उलटी दिशा में सात बार घुमाकर बहते पानी में बहाएं। यंत्र को अपने पूजा स्थल में स्थापित करें। राजा दशरथ कृत शनि स्तुति: सूर्यपुत्र! नमस्तेस्तु सर्वभक्षाय वै नमः। देवासुरमनुष्याश्च पशुपक्षि सरीसृपाः।। त्वया विलोकिताः सर्वे देन्यमाशु व्रजन्ति ते। ब्रह्मा शक्रो हरिश्चैव ऋषयः सप्ततारकाः।। राज्य भ्रष्टाः पतन्त्येते त्वया दृष्टयाऽवलोकिताः। देशाश्च नगरग्रामा द्वीपाश्चैव तथा दुमाः।। त्वया विलोकिताः सर्वे विनश्यन्ति समूलतः। प्रसादं कुरू हे सौरे! वरदो भव भास्करे।। अनुवाद: हे सूर्यपुत्र शनिदेव! आपको नमस्कार है। आप सभी का विनाश करने वाले चमकते ग्रह हैं। देवता, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी, सर्प आदि प्राणी आपकी दृष्टि मात्र से दुखी हो जाते हैं। ब्रह्मा, इंद्र, विष्णु और सप्तर्षि, पर भी जब आपकी दृष्टि जाती है तो ये सभी अपने पदों से च्युत हो जाते हैं। देश, नगर, गांव, द्वीप तथा वृक्ष आदि भी आपकी दृष्टि पड़ने पर समूल नष्ट हो जाते हैं। अतः हे सूर्यपुत्र शनिदेव! हमारे ऊपर प्रसन्न होकर, हमे शुभ वर दें। साढ़ेसाती की स्थिति में राशियों के अनुसार उपायः विभिन्न राशियों के प्रत्येक चरण के अनुसार शनि की साढ़ेसाती की अशुभता को कम करने के उपाय निम्नलिखित हैं। मेष राशि प्रथम चरण में: - सूखे नारियल तथा बादाम का दान करें। - मिट्टी के बर्तन में सरसों का तेल भरकर जल में नीचे दबाएं। - शराब और मांस-मछली का सेवन न करें। द्वितीय चरण में: - गणेश जी की पूजा-आराधना करें। - बंदर पालें। - कन्या पूजन करें। - खुशी के अवसर पर मिष्ठान वितरण न करें। यथासंभव नमकीन वस्तुएं बांटें। तृतीय चरण में: - शनिवार को काली उड़द जल में प्रवाहित करें। - सर्प को दूध पिलाएं। - घोड़े की नाल का छल्ला दाहिने हाथ की मध्यमा में शनिवार को धारण करें। वृष राशि प्रथम चरण में: - शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं। - सूखे नारियल बहते जल में प्रवाहित करें। - घोड़े के नाल की अंगूठी धारण करें। - शराब का सेवन न करें। द्वितीय चरण में: - दूध से भीगी मिट्टी का तिलक लगाएं। - कुत्तों को मीठी रोटी खिलाएं। - वट वृक्ष को शनिवार को दूध डालें। तृतीय चरण में: - हनुमान जी के मंदिर में सिंदूर चढ़ाएं। - नित्य प्रति हनुमान चालीसा का पाठ करें। - हनुमान चालीसा बांटें। मिथुन राशि प्रथम चरण में: - शनि की उपासना करें तथा शनि यंत्र धारण करें। - सूखा नारियल जल में प्रवाहित करें। - सर्प को दूध पिलाएं। द्वितीय चरण में: - हनुमान चालीसा का पाठ करें। - शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं। - शनियंत्र धारण करें। तृतीय चरण में: - शराब का सेवन न करें। - नौका की कील का छल्ला धारण करें। - नौकरों के साथ उत्तम व्यवहार करें। कर्क राशि प्रथम चरण में: - चार सूखे नारियल नदी में प्रवाहित करें। - बच्चों को दोपहर के समय मीठी वस्तुएं खिलाएं। - नाव की कील धारण करें। द्वितीय चरण में: - कम से कम तीन काले कुत्तों को मीठी रोटी खिलाएं। - सुनसान स्थान में सूरमा दबाएं। - मांसाहार से बचें। तृतीय चरण में: - मजदूर का पालन करें। -बहते जल में शराब प्रवाहित करें। - शनि यंत्र धारण करें। सिंह राशि प्रथम चरण में: - हनुमान जी की उपासना करें। - काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें। द्वितीय चरण में: - शनिवार को मछलियों को आटे की गोलियां खिलाएं। - गणेश उपासना करें। - मिठाई न बांटें बल्कि नमकीन बांटें। तृतीय चरण में: - काली भैंस की नाल की अंगूठी धारण करें। - शराब तथा मांस-मछली का सेवन न करें। - उड़द बहती दरिया में प्रवाहित करें। - शनिवार तथा मंगलवार को हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं। कन्या राशि प्रथम चरण में: - मजदूरों से अच्छा व्यवहार करें। - कौए को रोटी खिलाएं। - भगवती दुर्गा की उपासना करें। - नंगे पैर मंदिर में जाएं। द्वितीय चरण में: - महामृत्युंजय का पाठ करवाएं। - अंधों की सेवा करें। - आम बांटें। तृतीय चरण में: - बहती दरिया में शराब प्रवाहित करें। - शराब और मांस-मछली से सदा दूर रहें। तुला राशि प्रथम चरण में: - हनुमान चालीसा का पाठ करें। - कौए को रोटी डालें। - सूखा नारियल जल में प्रवाहित करें। द्वितीय चरण में: - काला कुत्ता पालें। - शनि यंत्र धारण करें। तृतीय चरण में: - शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं। - नाव की कील की अंगूठी मध्यमा में पहनें। - उड़द के दाने बहती दरिया में प्रवाहित करें। वृश्चिक राशि प्रथम चरण में: - शनिवार का व्रत करें। - परस्त्री से संबंध न करें। - शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं। द्वितीय चरण में: - बंदर पालें। - काले चने तथा गुड़ बांटें। - अंधे आदमी की सेवा करें। तृतीय चरण में: - हनुमान चालीसा का पाठ करें। - नशीले पदार्थों का सेवन न करें। - मजदूर की सेवा करें। धनु राशि प्रथम चरण में: - कन्याओं की पूजा करें। - भैंसे को उड़द खिलाएं। द्वितीय चरण में: - शनि उपासना करें - नारियल के खोपरे में तिल एवं गुड़ भरकर मिट्टी में दबाएं। तृतीय चरण में: - सूर्योदय से पूर्व मुख्य द्वार के पास कच्ची जमीन पर शराब गिराएं। - शराब एवं मांस का सेवन न करें। - काले घोड़े की नाल की अंगूठी धारण करें। मकर राशि प्रथम चरण में: - भैंसा पालें। - नंगे पांव मंदिर जाएं। - शनि स्तोत्र का पाठ करें। द्वितीय चरण में: - काल कुत्ता पालें। - अंधे व्यक्ति की सेवा करें। तृतीय चरण में: - शनि यंत्र धारण करें। - हनुमान मंदिर में सिंदूर चढ़ाएं। कुंभ राशि प्रथम चरण में: - महामृत्युंजय का पाठ करें। - शनिवार का व्रत करें। द्वितीय चरण में: - मछलियों को आटे की गोलियां डालें। - नारियल के खोपे में तिल, शक्कर तथा घी डालकर कीड़ों के पास दबाएं। तृतीय चरण में: - काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें। - भैरव जी की उपासना करें। - शनिवार का व्रत रखें। मीन राशि प्रथम चरण में: - बादाम दान करें। - नारियल का दान करें। - हनुमान की उपासना करें। द्वितीय चरण में: - अंधे व्यक्ति की सेवा करें। - वट वृक्ष की जड़ में दूध डालें। तृतीय चरण में: - नंगे पांव मंदिर जाया करें। - प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें। - पीपल के नीचे दीपक जलाएं। - पीपल पर कच्ची लस्सी चढ़ाएं। द्वादश भावों में शनि की अशुभता निवारण के उपाय - अगर प्रथम भाव में शनि हो, तो घर में बंदर पालें। माथे पर दूध या दही का तिलक लगाएं। शनिवार को सरसों के तेल का दान करें। - अगर द्वितीय भाव में शनि हो, तो मस्तक पर तेल न लागाएं। शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। उड़द के आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को डालें। - अगर तृतीय भाव में हो, तो काला कुत्ता पालें। मकान के अंत में एक अंधेरा कमरा बनाएं। अपने मकान का मुख्य द्वार उत्तर की तरफ बनाएं। - चतुर्थ भाव में शनि हो, तो मजदूर की सेवा करें। सर्प को दूध पिलाएं। काले वस्त्र धारण न करें। रात्रिकाल में दूध सेवन न करें। - पंचम भाव में शनि हो, तो बुध का उपाय करें। अड़तालीस वर्ष से पूर्व मकान न बनवाएं। सौंफ, गुड़, शहद, तांबा और चांदी नए लाल वस्त्र में बांधकर अंधेरे कमरे में रखें। - छठे भाव में शनि हो, तो सरसों का तेल मिट्टी के पात्र में डाल कर उसमें मुंह देख कर तालाब में मिट्टी के नीचे दबा दें। - सातवें भाव में शनि हो, तो काली गाय की सेवा करें। परस्त्री गमन न करें। जल में गुड़ डालकर शनिवार का पीपल की जड़ में डालें। - अष्टम भाव में शनि हो, तो चांदी का चैकोर टुकड़ा सदैव अपने पास रखें। शराब का सेवन न करें। यदि शनि अशुभ हो, तो आठ सौ ग्राम कच्चा दूध सोमवार के दिन बहते पानी में प्रवाहित करें। - नवम भाव में शनि हो, तो गुरु की पूजा करें। मकान के ऊपर कूड़ा-करकट अथवा व्यर्थ की वस्तुएं न रखें। - दशम भाव में शनि हो, तो गणेश जी की पूजा करें। अंधे व्यक्ति की सेवा करें। पीले रंग का वस्त्र धारण करें। - एकादश भाव में शनि हो, तो परस्त्री गमन न करें। मकान के मुख्य द्वार पर शराब या सरसों का तेल जमीन पर गिराएं। घर में चांदी की ठोस ईंट रखें। शनिवार का व्रत रखें। - द्वादश भाव में शनि हो, तो मकान के पीछे की तरफ खिड़की या दरवाजा न बनवाएं। बारह बादाम काले कपड़े में बांधकर लोहे के पात्र में बंद करके सदैव कायम रखें। असत्य न बोलें। शनि का यंत्र धारण करें। शनि के प्रमुख सिद्ध पीठ शनि के नीचे लिखे मंदिरों में शनि की आराधना करने से शनि के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। सिंगणापुर: यह स्थान पुणे से 100 किलोमीटर एवं शिरडी के स्थान से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। शनि देव की मूर्ति काले पत्थर के शिला के रूप में एक सिमेंट के चबूतरे पर अवस्थित है। यहां शनि देव स्वयं प्रकट हुए थे। इनका चमत्कार विश्वविख्यात है। पूजा सामग्री में तेल काला तरग, आक की माला, प्रसाद, नारियल, लोहे की नाल आदि होते हैं, जिन्हें शनि के चरणों से स्पर्श कराकर घर ले आते हैं। यहां दुकानदार लुंगी या भगवा वस्त्र देते हैं, जिसे पहन कर नहाते हैं और गीले वस्त्र पहने ही शनि की पूजा करते हैं। नंगे सिर ही दर्शन करने का विधान। सूतक, पातक या रजो दर्शन हो, तो दर्शन करना वर्जित है। स्त्रियां चबूतरे पर नहीं जा सकतीं, चबूतरे पर पुरुष ही जा सकते हैं। शनि महाराज को तेल स्नान कराने से व दर्शन करने से ही सामान्य पीड़ा दूर हो जाती है। असामाजिक तत्वों करतूतें असफल हो जाती हैं। यही कारण है कि यहां 5 कि.मी. तक के क्षेत्र में घरों में ताले नहीं लगाए जाते। कोकिला वन में स्थित सिद्ध शनि मंदिर: यह मंदिर व्रज धाम उत्तर प्रदेश में काशी से 5 कि.मी. दूर नंद गांव से 1 कि.मी. पहले स्थित है। कथा है कि यहां भगवान श्री कृष्ण ने शनि को दर्शन देकर आशीर्वाद दिया था कहा जाता है कि इस कोकिला मंदिर की परिक्रमा करने और शनि का पूजन करने वाले को शनि पीड़ा नहीं देते। यहां हर शनिवार को मेला लगता है। परिक्रमा करते समय शनि के बीज मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः या राजा दशरथकृत सिद्ध स्तोत्र का पाठ करते हुए 24 परिक्रमा करनी चाहिए। वहां छापा पात्र का दान अवश्य करें। काले कपड़े में काले तिल और उड़द बांध कर डकौत को देने चाहिए। शुक्रवार को चने भिगोकर शनिवार को उसका प्रसाद बांटने से शनि महाराज खुश होकर कष्टों का निवारण करते हैं। ग्वालियर स्थित शनैश्चराय मंदिर: ग्वालियर से 30 किलोमीटर दूर एक पर्वत है। इसी पर्वत पर फेंका था हनुमान जी ने लंका में शनि को रावण के कारागार से मुक्त कर इस प्रसंग में एक कथा है। हनुमान जी ने लंका को जलाया, पर लंका पूरी तरह जली नहीं। तब हनुमान जी ने शनि से कहा कि आप अपनी दृष्टि से लंका को जला दें। हनुमान शनि को ऊंचे पर्वत पर ले गये। वहीं पर शनि ने अपनी दृष्टि से लंका को जला डाला और रावण देखता रह गया। फिर हनुमान ने शनि से कहा कि आपका यहां रहना उचित नहीं। मैं अपने बल पर आपको भारतवर्ष में फेंक रहा हूं और जहां आप गिरेंगे वहीं लोग आपकी पूजा करेंगे। यहां हर शनिवार, विशेषतः शनैश्चरी अमावस्या के दिन विशेष मेला लगता है। लोग शनि की प्रतिमा से लिपटते हैं। शनिवार को बंदरों को केले व चने खिलाते हैं। शनि की पूजा करते हैं। अपने पुराने वस्त्र, जूते वहीं छोड़कर, नये वस्त्र धारण करते हैं। दिल्ली में चांदनी चैक स्थित शनि मंदिर: यह कांच का बड़ा सुहावना मंदिर है। इस शनि मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा शास्त्र विधि से हुई है। अन्य ग्रहों की मूर्तियां भी यहां स्थापित हैं। यहां शनिवार को लोग तेल का दीपक जलाते हैं। यहां सवा किलो चने का प्रसाद बांटना चाहिए। ऐसा करने से शनि के कष्टों से छुटकारा मिलता है। असोल शनि धाम: यह शनि मंदिर गांव असोला में दिल्ली स्थित महरौली में छतरपुर से 5 किलोमीटर दूर असोला गांव में स्थित है। शनि की मूर्ति अष्टधातु से बनी है। एक में शनि महाराज गिद्ध पर सवार हैं और दूसरी मूर्ति में भैंसे पर। यह शनि शक्तिपीठ आज लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां हर शनिवार या शनि अमावस्या को श्रद्धालु शनि की मूर्ति पर तेल, उड़द और काला वस्त्र चढ़ाते हैं। लोगों को शनि की साढ़ेसाती के कारण मिलने वाले कष्टों का निवारण होता है।


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