रघुनन्दन का कृतज्ञता ज्ञापन

रघुनन्दन का कृतज्ञता ज्ञापन  

व्यूस : 4303 | आगस्त 2009
रघुनंदन का कृतज्ञता ज्ञापन श्रीराम ने जब यह जाना कि यदि हनुमान अनुनय-विनय करके संजीवनी को न लाते, तो लक्ष्मण का सचेत होना कठिन था, तब विशेष कृतज्ञता का भाव दर्शाते हुए उन्होंने हनुमानजी से कहा, ‘‘हे आंजनेय! तुम्हारे किस-किस उपकार का मैं स्मरण करूं। तुमने मुझपर जितने उपकार किए हैं। उन पर ध्यान जाता है, तो मन यही कहता है कि मैं जीवन पर्यंत तुमसे उऋण नहीं हो सकता’’, अचानक श्रीराम को ऐसा कहते सुनकर हनुमान जी विस्मित हो गए। कंठ अवरुद्ध हो जाने से वे कुछ बोल नहीं सके। बस, अपलक नेत्रों से श्रीराम के मुख-कमल की ओर देखते रह गए। उनके नेत्रों से यही भाव झलक रहा था कि प्रभो! आप यह क्या कह रहे हैं? हनुमान जी की उस अर्थपूर्ण दृष्टि पर ध्यान न देकर श्रीराम कहते रहे, ‘‘अभी तुम्हारे उपकार समाप्त कहां हुए हैं पवन कुमार। तुम्हारी सहायता की आवश्यकता मुझे पग-पग पर पड़ेगी। यह तो सभी जानते हैं कि महर्षि वाल्मीकि त्रिकालज्ञ हैं। उन्होंने ऋषि-समुदाय के समक्ष यह बात कही है कि श्रीहनुमत्सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करने पर ही राम सीता को प्राप्त कर सके और विभीषण को लंका का निष्कंटक राज्य देने में समर्थ हुए। उनका वचन असत्य नहीं हो सकता। अतः हे सर्व आराध्य, परम देव, हनुमान! मैं तुम्हारे सहस्र नामों का पाठ अवश्य करूंगा।’’ अब अनुमान जी से अधिक नहीं सुना गया। वे हाथ जोड़कर श्रीराम के सम्मुख खड़े हो गए और अत्यंत कातर भाव से बोले, ‘‘बस कीजिए प्रभो। मेरा गुण-गान बंद कर दीजिए। मुझे मानसिक वेदना हो रही है दीनानाथ! आपने मुझ वानर को हृदय से लगाकर अलौकिक आनंद प्रदान किया है। इस कृपा-पर्वत के सामने मेरे किए हुए सारे कार्य एक रज-कण के समान भी नहीं हैं।’’ ‘‘तो क्या मैंने जो कहा, वह असत्य है?’’ ‘‘मुझ में इतनी योग्यता कहां स्वामी, जो मैं आप जैसे सर्वगुण-निधान से तर्क कर संकू। आपने महर्षि वाल्मीकि के कथन की चर्चा की थी। अतः मैं भी उनकी कही हुई एक बात को दोहराने की धृष्टता करूंगा। चित्रकूट-निवास के पूर्व जब आप तीनों उनके दर्शनार्थ गए थे और अपने रहने के लिए किसी उचित स्थान की बात पूछी थी, तब उन्होंने जो कहा था, वही सत्य है। महर्षि के वचन थे कि हे राम! चिदानंदमय होते हुए भी संतों और देवताओं का हित करने के लिए मनुष्य शरीर धारण किया है। अतः अपनी भगवŸाा भूलकर एक संसारी मनुष्य की भांति बात कहते और कर्म करते हैं। आप इस नीति का पालन करते हैं कि जो व्यक्ति नाटक में जो रूप धारण करे, उसे उस रूप के अनुरूप ही अभिनय करना चाहिए। भगवान वाल्मीकि ने यही कहा था?’’ कुछ मुस्कराते हुए श्रीराम बोले, ‘‘अच्छा केसरीनंदन। अब मैं तुम्हारे गुणों का गान नहीं करूंगा। उन्हें मन में ही रखूंगा। हां तुम्हें कई कार्य करने हैं।’’ ‘‘आदेश दीजिए, सेवक आज्ञा-पालन के लिए उद्यत है।’’ ‘‘तो पहला कार्य यह हो कि इस संजीवनी पर्वत-खंड को जहां से लाए हैं, वहीं इसे ले जाकर फिर स्थापित कर दो दूसरा कार्य यह करना है कि वैद्यराज सुषेण को घर सहित सुखपूर्वक लंका पहुंचाना है। इन्हें तनिक भी असुविधा या कष्ट नहीं होना चाहिए।’’ हाथ के संकेत से श्रीराम ने कुछ दक्षिणा देने की बात भी हनुमान जी को समझा दी। ‘‘और तीसरा कार्य?’’ हनुमान जी ने पूछा। ‘‘तीसरा यह कि पहले वाले दोनों कार्य एक साथ करते हुए सदैव तुम मेरे निकट रहोगे। अब एक क्षण के लिए भी तुम मुझसे दूर नहीं रहोगे।’’ ‘‘ये सभी कार्य एक ही समय में?’’ हनुमान जी कुछ विस्मित हुए। ‘‘आश्चर्य में क्यों पड़ गए हनुमान। अपने ‘एकोहम् बहुस्यामः, संकल्प को स्मरण करो। उसके प्रभाव में तीन क्या, तीन कोटि कार्य एक ही समय में हो सकते हैं। तुम एक होकर भी अनेक हो।’ ‘‘आपके आदेश का पालन तो अक्षरशः हो जाएगा भगवान्, किंतु आपने फिर मेरा गुण-गान आरंभ कर दिया।’’ ‘‘ओहो, भूल हो गयी। अच्छा, फिर ऐसा नहीं होगा।’’ सहसा हनुमान जी ‘जय श्रीराम’ कहकर वहां से लुप्त हो गये और अंतरिक्ष में पंहुचकर तीन रूपों में प्रकट हुए। एक ने संजीवनी पर्वत-खंड उठाकर आकाश में गमन किया। दूसरे ने सुषेण से घर की शैय्या पर लेट जाने की प्रार्थना की। सुषेण वैद्य सबाक यथोचित अभिवादन करके घर की शैय्या पर सुखपूर्व लेट गये। तब हनुमान जी का दूसरा रूप बड़ी सावधानी से घर को उठाकर लंका में उनके निवास की ओर चला और तीसरे रूप से हनुमान ही श्री राम के सम्मुख दास की भांति हाथ जोड़कर खड़े रहे। जब हनुमान जी ने लंका जाकर सुषेण का घर यथास्थान पर स्थापित कर दिया, तब वैद्यराज अपनी शैय्या से उठकर द्वार पर आए। हनुमान जी को बाहर खड़ा देखकर उन्होंने नम्रतापूर्वक विनय की, ‘‘भीतर पधारिए कपीश्वर! आपके पदार्पण से मेरा घर पावन हो जाएगा।’’ हनुमान जी ने कहा, ‘‘वैद्य प्रवर! आपने अपने कुश उपचार से श्री लक्ष्मण जी को नवजीवन प्रदान किया है। इसके लिए केवल प्रभु श्रीराम ही नहीं, वरन् हम सभी सेवक आपके कृतज्ञ तथा ऋणी हैं। स्वामी ने आपके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए मुझे आदेश दिया है कि इसके लिए मैं आपको मुंह मांगी दक्षिणा दूं। अतः बताइए, आपको क्या चाहिए?’’ सुषेण प्रसन्न मन से बाले, ‘‘दक्षिणा तो मुझे उसी समय मिल गयी, जब लक्ष्मण जी उठ खड़े हुए और बोलने लगे। एक वैद्य एक की वास्तविक दक्षिणा यही है कि उसका रोगी स्वस्थ हो जाए। अब रही बात कृतज्ञता की, सो यह भी उचित नहीं है, क्योंकि मैं स्वयं श्रीराम के दर्शन करके धन्य हो गया और मेरा जीवन सफल एवं सार्थक हो गया।’’ ‘‘यह आपकी सज्जनता और उदार भक्ति-भावना है। किंतु मेरा अनुमान है कि आप इसलिए दक्षिणा नहीं मांग रहे हैं, क्योंकि आप मेरे दोनों हाथ खाली देख रहे हैं और मेरे पास कोई गठरी भी नहीं है। विश्वास रखिए सुषेण जी, आप जो मांगेंगे, मैं वही दूंगा। ‘‘आपकी सर्व समर्थता पर मुझे पूरा विश्वास है भक्तराज! आपकी सिद्धियों का परिचय तो मुझे तभी मिल गया था, जब मैंने देखा कि संजीवनी की अपेक्षा आप विशाल पर्वत-खंड ही उखाड़कर ले आए।’’ ‘‘तो फिर संकोच क्यों? मांग लीजिए दक्षिणा वैद्यराज।’’ ‘‘अच्छी बात है, आप आग्रह करते हैं, तो मैं मांग रहा हूं। मेरे मन में कुछ जिज्ञासाए हैं। यदि आप कृपा करके मेरे प्रश्नों का उŸार दे देंगे, तो मैं समझ लूंगा कि मुझे अमूल्य दक्षिणा मिल गयी।’’ ‘‘अच्छा, यही सही, पूछिए।’’ कुछ गंभीर होकर हनुमान जी ने कहा। ‘‘मेरा पहला प्रश्न यह है कि संध्या हो जाने के बाद आप यहां से मुझे राम-दल में ले गये। वहां मैंने लक्ष्मण जी की परीक्षा की और द्रोणगिरि से संजीवनी लाने को कहा। आप तत्काल चल पड़े। फिर जैसा मुझे ज्ञात हुआ है कि रावण की आज्ञा से मायावी राक्षस कालनेमि ने मुनि रूप से माया-निर्मित आश्रम में आपको रात भर रोके रखने का प्रयत्न किया। किंतु सरोवर की मकरी ने आपको सारा भेद बता दिया। तब दुष्ट कालनेमि को मारकर आप बढ़े। द्रोणगिरि पर संजीवनी के साथ आपका कुछ वाद विवाद हुआ। वे आने को तैयार हुई, तो रावण के आदेश से दूसरे मायावी राक्षस ने उस स्थल की सभी वनस्पतियों को प्रकाशित कर दिया। तब आप उस पूरे पर्वत-खंड को ही उखाड़ कर ले चले। अयोध्या के ऊपर पहंुचने पर भरत जी ने बाण मारकर आपको नीचे गिरा लिया। वहां आपका काफी समय बीता। फिर आप लंका आए। मैंने संजीवनी का प्रयोग करके लक्ष्मण जी की मूच्र्छा दूर की। अंत में आप मुझे यहां ले आए। मैं देख रहा हूं कि अभी रात्रि का तीसरा पहर भी समाप्त नहीं हुआ। मेरे मन में यह भाव उथल-पुथल मचाए हुए है कि इतने कम समय में इतने सारे कार्य कैसे पूरे हो गये? इस रहस्य को आप मुझे समझा दीजिए। राम-दल से जाने और आने के बीच की घटनाएं। आपने ही अपने मित्रों को सुनायी थीं, मैंने भी सुन लीं।’’ हनुमान जी ने प्रसन्नता पूर्वक कहना आरंभ किया, ‘‘सुषेण जी पहले मैं आपको यह बता दूं कि संजीवनी दिव्य ओषधियां हैं। इनकी इच्छा और आज्ञा के बिना कोई इन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। प्रभु श्रीराम का दर्शन करने की उत्कट इच्छा संजीवनी के मन में जागह हुई, इसीलिए वे आने को उद्यत हुईं। उनकी आज्ञा मिलने के बाद ही मैं उन्हें लंका में ला सका। अब समय संबंधी आपकी शंका की बात बता दूं। मैं कहां-कहां किस कार्य विशेष में उलझा रहा, इस संबंध में आपको केवल लौकिक घटनाओं की जानकारी है। कुछ अलौकिक घटनाएं भी घटित हुई, जिनको आप नहीं जानते, क्योंकि उनका वर्णन मैंने श्रीरामदल में अपने सखाओं के सम्मुख नहीं किय।’’ सुषेण बीच में ही बोल पड़े, ‘‘महात्मन्! आपने तो मेरे मन में बहुत बड़ा कुतूहल उत्पन्न कर दिया। पहले उन अलौकिक घटनाओं को ही सुनाने की कृपा करें, समय का रहस्य बाद में समझाएं।’’ ‘‘अच्छी बात है, सुनिए। आप सुनने के अधिकारी हैं, इसीलिए सुना रहा हूं। संजीवनी के साथ मेरा संवाद, फिर शबरी के आश्रम से बेर की पŸिायां लाकर उन्हें सिंचित करना और इससे भी पहले का कालनेमि-प्रसंग-यह सब तो आप जानते हैं। इसके बाद अलौकिक घटनाएं घटती हैं। पर्वत-खंड उठाने के पूर्व मैंने श्रद्धा-भक्ति के साथ द्रोण गिरि की परिक्रमा की और दिव्य वाद्यों की मधुर ध्वनि सभी ओर गूंज गयी। मैंने शीश उठाकर ऊपर दृष्टि की, तो अंतरिक्ष में सीता माता के दर्शन हुए। वे वरद मुद्रा में थीं। मैं आश्चर्य कर ही रहा था कि मां सीता जी जगह मेरे प्रभु श्रीराम वनवासी रूप में दिखाई देने लगे। फिर उनकी जगह श्री लक्ष्मण जी प्रकट हो गये। मैं विस्मय में डूबा हुआ था, तभी मैंने देखा कि वहां भगवान शंकर अर्द्धनारीश्वर रूप में विराजमान हैं। मैं चकित हो गया। कुछ संयत होने पर मैंने सभक्ति उन्हें प्रणाम किया। तब उन्होंने मुझे आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया। तत्पश्चात् शिवजी की महाशक्ति, मूल प्रकृति, जगज्जनी, आदि शंकरी, भुवनेश्वरी, भगवती पार्वती जी ने मुझे अनेक दुर्लभ वरदान दिए तथा अपने मस्तक पर लगे सिंदूर में से थोड़ा सिंदूर लेकर विजयश्री के रूप में मेरे मस्तक पर तिलक लगा दिया। मैं कृतार्थ हो गया। उन्होंने सिंदूर को सदा के लिए मेरे जीवन से संबंद्ध कर दिया। मैं कृतार्थ हो गया। उन्होंने सिंदूर को सदा के लिए मेरे जीवन से संबंद्ध कर यिा फिर मुझे समय का ध्यान हुआ। विलंब हो जाने की आशंका से कुछ भयभीत होकर, समय जानने के लिए मैंने नक्षत्रों पर दृष्टि जमायी तो पता चला कि समय तो अभी वही है, जो लंका से चलने पर था। तब आप ही की भांति मेरे मनमें री प्रश्न उठा कि इतने कार्य हो जाने पर समय अभी वही का वही कैसे है? सर्वज्ञ आद्याशक्ति ने मेरे मन का भाव जानकर मुझे काल (समय) का रहस्य समझाया। वह मैं आपको बाद में समझाऊंगा, अभी कुछ और अलौकिक घटनाएं बतानी हैं।’’ ‘‘हे दिव्य विभूति! आप परम भाग्यशाली हैं, जो ऐसी-ऐसी महाशक्तियों कृपा करके आपको दर्शन दिये। आपके सम्पर्क में कुछ समय रहकर मैं भी धन्य हो गया। अब आप शेष अलौकिक घटनाएं भी मुझे सुनाइए।’’ ‘‘अवश्य सुनाऊंगा। हां, तो समय-रहस्य समझा कर सर्वेश्वरी आद्याशक्ति ने आगे का कार्य सम्पन्न करने का आदेश मुझे दिया और भगवान शंकर सहित अंर्तध्यान हो गयीं। तब जैसे ही मैंने पर्वत-खंड उठाने का उपक्रम किया, वैसे ही मेरी मातुरी अंजनी की वात्यल्यमयी ध्वनि मुझे सुनाई पड़ी। मुझे आशीर्वाद देती हुई वे प्रकट हो गयीं। दीर्घ अंतराल के पश्चात् मां को देखने के कारण मैं भाव-विह्नल हो गया। उन्होंने बैठकर दोनों हाथ पसारे, तो मैं शिशु की भांति उछलकर उनकी गोद में जा बैठा। मां बड़े प्यार-दुलार से, मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी। कुछ देर बाद मुझे अपने कर्तव्य का ध्यान आया, तो मैं उठकर खड़ा हो गया। मेरे मन में इच्छा हुई कि मैं मां को कुछ अर्पण करूं। इच्छा होते ही चारों ओर से बहुरंगी, सुगंधित, दिव्य पुष्प झर-झर कर मेरी दाहिनी ओर एकत्र होने लगे। क्षण भर में पुष्पों का ढेर खड़ा हो गया। मैंने एक-एक करके मां को तीन पुष्पांजलि अर्पित की, जिन्हें आगे बढ़कर उन्होंने आंचल में ले लिया और बोलीं कि वे उन्हें तीन स्थानों पर (श्री सालासर बालाजी, श्री मेंहदीपुर बालाजी, श्री वडाला बालाजी) में स्थापित करेंगी, जिनका प्रचार-प्रसार कलियुग में कुछ आगे चलकर अधिक होगा। संयोग से तीनों पुष्पांजलियों में मेरा एक-एक केश भी टूटकर मिल गया था। फिर उन्होंने मुझे यह आदेश दिया कि में सम्पूर्ण विश्व को पुष्पांजलि दूं और सबके ऋण से मुक्त हो जाऊं। जिन-जिन को पुष्पांजलि देनी थी, उनके नाम सुनिए। सर्वप्रथम अपने पूज्य पिता पवन देव के 49 स्वरूपों को, त्रिदेवों को आद्याशक्ति को, सभी महाशक्तियों को, मूल प्रकृति को, पांच महाभूतों को, दैत्य दानव-राक्षसों को, नागों को, ऋषि-मुनियों को, वेद-शास्त्रों को, कला-विधाओं को तथा समग्र रूप में सब जीवनों को एवं समस्त वृक्ष-वनस्पतियों को पुष्पांजलि प्रदान करने की आज्ञा मां ने मुझे दी। मेरे स्वीकार करने पर मां अदृश्य हो गयी।’’ ‘‘परम पूजनीय माता अंजनी आप-जैसी दिव्यात्मा को पुत्र रूप में पाकर यथार्थतः पुत्रवत हो गयीं उन्हें मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।’’1 ‘‘फिर क्या हुआ?’’ ‘‘फिर मैं सब कुछ भूलकर एक-एक को पुष्पांजलि देने लगा। सभी देवी- देवता-ग्रह आदि प्रत्यक्ष प्रकट होकर पुष्प ग्रहण करते थे। एक विचित्र बात यह थी कि बिना मेरे बोले, प्रत्येक देवी-देवता का पुष्प अर्पण मंत्र, बीज सहित, आकाश में उच्चरित होने लगता था। सब ने मुझे सहर्ष आशीर्वाद और वरदान दिये। बाद में सब देवताओं ने अपने-अपने पुष्प पवनदेव को देखकर प्रार्थना की कि इन्हें सर्वत्र बिखेर दीजिए। उन्होंने वैसा ही किया। जिस देश-प्रांत में वे दिव्य पुष्प गिरे, वहां क्या चमत्कार हुआ, यह तथ्य कालांतर में सबको विदित हो जाएगा। सब ग्रहों ने अपने पुष्प ग्रह राज सूर्य देव को दे दिये। वे दिव्य पुष्पों की गंध से उन्मादित होकर कुछ देर तक झूमते रहे। फिर एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे। उनके स्वेद-कणों से सरोवर में अनेक प्रकार के मणि मणिकादि रत्न उत्पन्न हो गये। इससे वह सरोवर में अनेक प्रकार के मणि मणिकादि रत्न उत्पन्न हो गये। इससे वह सरोवर उत्नाकर कहा जाने लगा। बहुत समय बाद जब वह सागर में मिला, तो सागर को रत्नाकर की संज्ञा प्राप्त हो गयी। उर्वशी-रंभ ने दिव्य पुष्प किसी को न देकर अपने ही पास रखे। उर्वशी तो उमंग में झूमती ही रही, किंतु रंभा ने कुछ देर बाद एक दूसरे सरोवर में स्नान किया। उसके स्वेद-कणों से वहां मूंगा-मोती आदि उत्पन्न हो गये।’’ ‘‘यह सारा चमत्कार आपके द्वारा प्रदŸा दिव्य पुष्पों का है, प्रभो! इसके बाद?’’ ‘‘इसके बाद पर्वत-खंड उठाकर मैं आकश-मार्ग से चला। बीच में भरत द्वारा व्यवधान उत्पन्न करने का प्रसंग तो आप जानते हैं। उनसे आज्ञा पाकर जब मैं फिर लंका की ओर उड़ा तो आकाश में सूर्यदेव सहित सभी ग्रह सामने उपस्थित हो गये। वे मेरी अर्चना-वंदना करना चाहते थे। मैंने बचने का बहुत प्रयास किया, किंतु उनकी हठ के आगे मेरी एक नहीं चली। विवश होकर मुझे कुछ समय के एिल वहां भी रुकना पड़ा। अब आप समझ सकते हैं। सुषेण जी के इतने कामों में कितना समय बीता होगा।’’ ‘‘समझ गया भगवान्! इस हिसाब से आपको दो दिन बाद आना चाहिए था। अच्छा, अब आप मुझे वह काल-रहस्य समझाइए, जो भगवती आद्याशक्ति ने आपको समझाया था। ‘‘देखिए वैद्यराज, जहां तक समय की परिभाषा, सीमा तथा आयाम का प्रश्न है, ये बातें पंच भौतिक विश्व के लिए तो अनिवार्य हैं, किंतु जब कालातीत महशक्ति महाकाल (परमतत्व) से कुछ विनोद क्रीड़ा करने लगती है, तब देश-काल-वस्तु की परिभाषा आदि का अस्तित्व ही विलीन हो जाता है और उनकी सीमा असीमता की कोटि में जा पहंुचती है। इस महाशक्ति को आद्याशक्ति के नाम से भी जाना जाता है। इस मूल शक्ति के समझ पहुंचकर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर त्रिदेव भी अपना स्वरूप त्याग का आद्याशक्ति में समाहित हो जाते हैं।1 फिर प्रकृति के तत्वों की बात क्या करनी उस आद्याशक्ति के दिव्य स्थान पर सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, अग्नि, पवन, जल किसी की भी गति नहीं हैं उपनिषद में आता है। ‘‘यत्र लरे वायुर्वाति नाग्निर्दहति न च सूर्यः तपति न च नक्षत्राणि भांति।’’ ‘‘सब (कर्म भी) अपना-अपना गुण-धर्म वहां त्याग देते हैं। सूर्य-चंद्र के बिना ही वहां करोड़ों सूर्यों का प्रकाश निरंतर रहता है। ‘‘अब आप ही बताइए सुषेण जी, जहां महाशक्ति का ख्ेाल चल रहा हो, वहां बेचारे समय की क्या सामथ्र्य जो बीच में बाधा डाल सके। आप संभववत‘ नहीं जानते, मैं बताता हूं। श्रीराम के जन्म का उत्सव परम उल्लास के साथ अयोध्यावासी मना रहे थे। तब एक दिन पूरे एक महीने का हो गया था। सूर्यदेव एक मास तक अयोध्या के आकाश में डटे रहे। किसी को इसका पता नहीं चला, अतः आश्चर्य नहीं हुआ। आपको भी इस संबंध में आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ‘‘अब मेरे मन का आश्चर्य दूर हो गया ज्ञानशिरोमणि। आपने तर्क पूर्ण, ज्ञानमयी, संुदर व्याख्या तथा एक उदाहरण के द्वारा मेरी शंका का समुचित समाधान कर दिया। मेरा दूसरा प्रश्न यह है कि विचार करने पर श्रीराम और राक्षसराज रावण की परिस्थितियों में महान अंतर है, फिर भी परिणाम वैसा नहीं हो रहा है, जैसा होना चाहिए।’’ ‘‘आप अपनी बात को कुछ और स्पष्ट करें बैद्यभूषण।’’ ‘‘आप अपनी बात का तात्पर्य यह है कि एक ओर श्रीराम जी हैं, जो राजकुल के होते हुए भी लगभग 14 वर्षों से राज-लक्ष्मी-विहीन हैं, कई वर्षों से पत्नी-वियोग का दुख झेल रहे हैं, मनुष्यों की सुशिक्षित सेना भी उनके पास नहीं है और अपने राज्य से बहुत ही दूर हैं, तो भी एक महाशक्तिशाली, त्रिलोक विजयी, शत्रु का सामना वे धैर्य पूर्वक कर रहे हैं। दूसरी ओर रावण है, जो सर्व-साधना-सम्पन्न है, सम्पूर्ण तंत्र-मंत्र का ज्ञाता है, अतुलित स्वर्ण-भंडार का स्वामी है, वह तांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा स्वर्ण का निर्माण भी करता है। वह इतना शक्तिशाली है कि इंद्र, सूर्य, चंद्र, वरुण आदि समस्त देवगण और सिद्धियां उसके अधीन हैं और उसकी सहायता के लिए राक्षसों की विशाल चतुरंगिणी सेना तथा अद्वितीय वीर सदस्यों का बहुत ही बड़ा परिवार है, तो भी वह श्रीराम पर विजय नहीं पा रहा है। सफल समझी जाने वाली उसकी हर चाल विफल हो जाती है। इसका क्या रहस्य है? आप समझाने की कृ पा करें।’’ वैद्यराज क बात सुनकर हनुमान जी तनिक मुस्कराये, फिर बोले, ‘‘इसका उŸार ध्यान से सुनिए सुषेण जी। मेरे प्रभु श्रीरामजी की आध्यात्मिक स्थिति परमोच्च स्तर तक पहुंची हुई है। उन्होंने अनंत सृष्टि की स्वामिनी, परमाराध्या, भगवती आद्याशक्ति के साथ तदात्म्य स्थापित कर लिया है। किंतु रावण सभी वेद-शास्त्रों एवं तंत्र-मंत्रों का ज्ञाता होने पर भी अपने को उस स्तर तक नहीं पहुंचा सका। उसके मन में ऐसी अभिलाषा भी नहीं है। श्रीराम और रावण में यह प्रमुख अंतर है। दूसरी बात यह है कि स्वर्ण, सेना और शारीरिक शक्ति, ये सब लौकिक साधन हैं, जो स्थायी नहीं होते। इन सबसे कहीं अधिक श्रेष्ठ आत्मबल होता है, जो सत्य और धर्म का मार्ग अपनाने से प्रापत होता है। श्रीराम आत्मबल के धनी हैं, जबकि रावण में आत्मबल की बहुत कमी है, क्योंकि उसने असत्य और अधर्म का मार्ग अपना रखा है श्रीराम और रावण में यह दूसरा अंतर है। अब रही बात तांत्रिक प्रक्रिया द्वारा स्वर्ण-निर्माण की। सो सुषेण जी! मेरे प्रभु की रुचि इसमें नहीं है, क्योंकि उनके राज-कोष में स्वर्ण का अभाव नहीं है। एक क्षण के लिए मान लीजिए कि उनकी रुचि है और उन्होंने स्वर्ण का निर्माण किया, तो उस स्वर्ण का उपयोग वे अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कदापि नहीं करेंगे। वह स्वर्ण परोपकार तथा प्रजा के हित में व्यय होगा। किंतु रावण स्वर्ण का निर्माण अपने लाभ के लिए तथा अपने अहं की तुष्टि के लिए करता है। श्रीराम और रावण का यह तीसरा अंतर है। संभवतः अव आप समझ गये होंगे कि सर्वसाधना-सम्पन्न होने पर भी रावण श्रीराम पर प्रभावी क्यों नहीं हो रहा है।’’ गदगद कंठ से सुषेण ने कहा, ‘‘जय हो ज्ञानमूर्ति प्रभो! आपने मेरे प्रश्नों का सटीक उŸार देकर मेरे मन का अज्ञान-अंधकार दूर कर दिया।’’ सहसा हनुमानजी का रूप वैद्यों के परमाराध्य, भगवान धन्वन्तरि के रूप में परिवर्तित हो गया। फिर तो सुषेण ने भाव-विह्नल होकर उनके चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और उनकी वंदना की। श्रीधन्वन्तरि जी ने कहा, ‘‘सुषेण! तुमने राज-भय त्याग कर रावण के शत्रु की चिकित्सा की और रोगी को स्वस्थ कर दिया। अतः मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हें यह वरदान देता हूं कि तुम्हारे आह्नान करने पर संजीवनियां आ जाएंगी और तुम्हें पूरा सहयोग देंगी। साथ ही मेरा यह घोषणा है कि जो भी वैद्यय भय तथा लोभ त्याग कर सच्चे मन से रोगी की चिकित्सा करेगा, उसका रोगी अवश्य स्वस्थ हो जाएगा।’’ इतना कहने के बाद धन्वन्तरिजी फिर हनुमान जी के रूप में बदल गये। अब हनुमान जी बोले, ‘‘सुषेणजी! मैं आपको स्वर्ण निर्माण की सरल रीति बताता हूं, जो ध्वनि-शक्ति पर आधारित है। ‘‘फिर हनुमानजी ने सुषेण को सामने बैठाकर समझाया कि कोई घटक किसी अन्य घटक में बदला जा सकता है या कोई भी धातु अन्य अभिलाषित धातु में परिवर्तित की जा सकती है। इसके लिए आवश्यक यह है कि अमुक विधि से अमुक राग-स्वर में आदेश दिया जाए।’’1 हनुमानजी और धन्वन्तरि जी को एक ही रूप में देखकर हर्षातिरेक के कारण सुषेण जी कुछ बोल नहीं पा रहे थे। तब हनुमान जी ने कहा, ‘‘वैद्यराज! रावण कैसा भी हो, किंतु उसका पितृकुल अत्यंत पाव तथा श्रेष्ठ है। मेरी इच्छा है कि मैं जाकर उसके पिता विश्रवा मुनि और पितामह महर्षि पुलस्त्य के दर्शन करूं। इस संबंध में आपकी क्या सम्पति है?’’ सुषेण बोले, ‘‘भगवन! आपने क्या जानकर मुझसे पूछा? मैं तो समझता हूं कि आप जो सोचेंगे, जो कहेंगे और जो करेंगे, वह उचित और परम मंगकारी होगा।’’ हनुमान जी ने‘’ जय श्रीराम’ का उद्घोष किया ओर महर्षि पुलस्त्य के आश्रम में जाने के लिए वहां से विलुप्त हो गये।

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