दिशाओं में छिपी समृद्धि

दिशाओं में छिपी समृद्धि  

व्यूस : 1620 | दिसम्बर 2010

वास्तु शास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा में अलग-अलग तत्व संचालित होते हैं और उनका प्रतिनिधित्व भी अलग-अलग देवताओं द्वारा होता है। वह इस प्रकार हैं-

Û उŸार दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता है। इससे जागरुकता और तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता है। इससे जागरुकता और बुद्धि तथा ज्ञान प्रभावित होते हैं।

Û पूर्व दिशा के देवता इन्द्र हैं जिन्हें देवराज कहा जाता है। वैसे आमतौर पर सूर्य को ही इस दिशा का स्वामी माना जाता है, जो प्रत्यक्ष रूप से संपूर्ण विश्व को रोशनी और ऊर्जा दे रहे हैं। लेकिन वास्तु अनुसार इसका प्रतिनिधित्व देवराज करते हैं। जिससे सुख-संतोष तथा आत्म विश्वास प्रभावित होता है।

Û दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) के देवता अग्नि देव हैं जो अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे पाचन शक्ति तथा धन और स्वास्थ्य आदि प्रभावित होेते हैं।

Û दक्षिण दिशा के देवता यमराज हैं जो मृत्यु देने के कार्य को अंजाम देते हैं जिन्हें धर्मराज भी कहा जाता है। इनकी प्रसन्नता से धन, सफलता, खुशियां व शांति प्राप्ति होती है।

Û दक्षिण-पश्चिम दिशा के देवता नैऋति हैं जिन्हें दैत्यों का स्वामी कहा जाता है जिससे आत्म शुद्धता और रिश्तों में सहयोग तथा मजबूती एवं आयु प्रभावित होती है।

Û पश्चिम दिशा के देवता वरुण देव हैं जिन्हें जलतत्व का स्वामी कहा जाता है, जो अखिल विश्व में वर्षा करने और रोकने का कार्य संचालित करते हैं जिससे सौभाग्य, समृद्धि एवं पारीवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है।

Û उŸार-पश्चिम के देवता पवन देव हैं जो हवा के स्वामी हैं जिससे सम्पूर्ण विश्व में वायु तत्व संचालित होता है। यह दिशा विवेक और जिम्मेदारी, योग्यता, योजनाओं एवं बच्चों को प्रभावित करती है। वास्तुशास्त्र में पांच तत्वों को पूर्ण महत्व दिया है जैसे घर के ब्रह्म स्थान का स्वामी है आकाश तत्व, पूर्व दक्षिण का स्वामी अग्नि, दक्षिण-पश्चिम का पृथ्वी, उŸार-पश्चिम का वायु तथा उŸार-पूर्व का अधिपति है जलतत्व। अपने घर का विधिपूर्वक परीक्षण करके यह जाना जा सकता है कि यहां रहने वाले परिवार के सदस्य किस तत्व से कितना प्रभावित हैं, गृह-स्वामी तथा अन्य सदस्यों को किस तत्व से सहयोग मिल रहा है तथा कौन सा तत्व निर्बल है। यह भी मालूम किया जा सकता है कि किस सदस्य की प्रवृŸिा किस प्रकार की है।

अंत में यह निर्णय लेना चाहिए कि किस सदस्य को किसकी पूजा करनी अधिक फलीभूत होगी। किस अवसर या समस्या के लिए किस प्रकार की पूजा अनुष्ठान किया जाए यह भी वास्तु परीक्षण करके मालूम किया जा सकता है।

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