पानी की टंकी

पानी की टंकी  

प्रश्न: पानी की टंकी कहां तथा किस दिशा में अवस्थित होनी चाहिए? इनके अलग-अलग दिशाओं में गलत स्थान पर रहने से घर के लोगों को क्या परेशानियां हो सकती हैं? इसके लिये क्या उपाय तथा उपचार किये जा सकते हैं। उत्तर: पानी की टंकी हर घर एवं प्रतिष्ठान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस धरा पर जीवन जल पर ही आश्रित है। वास्तु शास्त्र के लिहाज से पानी के सभी स्रोतों के लिए हालांकि उत्तर-पूर्व (ईशान्य) की दिशा सर्वथा अनुकूल मानी गई है किंतु ओवरहेड टैंक के मामले में स्थिति थोड़ी भिन्न है। वास्तु शास्त्र में दक्षिण-पश्चिम (र्नैत्य कोण) को ओवरहेड टैंक के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वास्तु शास्त्र में ऐसी मान्यता है कि यदि जलस्रोतों का उचित नियमन एवं प्रतिष्ठापन किया जाय तो वह हर प्रकार से सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य एवं धन की अपार वर्षा करने वाली होती है। पंचतत्वों में भी जल को प्रधानता दी गई है। उसी के अनुरूप वास्तु में भी सही स्थान एवं दिशा में इसका प्रतिष्ठापन बहुत महत्व रखता है अन्यथा गृह स्वामी एवं परिवार के सदस्यों के साथ अनवरत समस्याएं अवश्यंभावी हैं। अपरिहार्य कारणों से लोग उचित स्थान पर इनकी व्यवस्था नहीं कर पाते हैं जिसके कारण उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां पानी की टंकी से तात्पर्य ओवर हेड टैंक से है, अतः हम यहां इसी की चर्चा करेंगे। ओवरहेड टैंक के लिए निम्नांकित दिशाओं का चयन किया जा सकता है। 1, दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य कोण) : दक्षिण-पश्चिम में ओवरहेड पानी की टंकी का होना सर्वोत्तम है। पानी की टंकी का इस दिशा में होना अत्यंत शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र में हमेशा र्नैत्य कोण को ऊंचा एवं भारी रखने की सलाह दी जाती है। पानी की टंकी र्नैत्य में अवस्थित होने से एक ओर तो भवन का यह भाग अपेक्षाकृत पहले से ऊंचा हो जाता है तो दूसरी ओर टंकी का वजन पड़ने से वह भारी हो जाता है। एक बात का यहां और ध्यान रखना आवश्यक है कि र्नैत्य दिशा के दीवार की ऊंचाई हमेशा टंकी की तुलना में अधिक हो। इससे एक ओर तो भवन को स्थिरता मिलती है तो दूसरी ओर इससे आय के नये स्रोत विकसित होते हैं तथा संसाधनों की वृद्धि होती है। र्नैत्य को भवन का नकारात्मक क्षेत्र भी माना जाता है। टैंक में पानी भरे रहने के कारण यह क्षेत्र और भारी हो जाता है जिससे घर में नकारात्मक एवं सकारात्मक ऊर्जा का संतुलन स्थापित होता है जो लाभप्रद साबित होता है। 2. उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) : यदि अपरिहार्य कारणों से र्नैत्य कोण में पानी की टंकी प्रतिष्ठापित करना संभव नहीं हो पाए तो वायव्य कोण में भी पानी की टंकी लगाई जा सकती है। यह भी शुभ फलदायी होता है। पंचतत्वों में जल एवं वायु को पारस्परिक मित्र की संज्ञा दी गई है। अतः किसी भी रूप में यह अशुभ फलदायी नहीं है। किंतु यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि टंकी के साथ वायव्य दीवार की ऊंचाई से र्नैत्य दीवार की ऊंचाई अधिक हो। इसमें किसी प्रकार की गड़बड़ी होने पर गृहस्वामी को नुकसान तथा घर की महिलाओं एवं बच्चों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। 3. पश्चिम: वैकल्पिक स्थिति में पश्चिम दिशा में कुछ सावधानियों के साथ टंकी स्थापित करने को स्वीकृति प्रदान की गई है। इसके लिए दक्षिणी दीवार को थोड़ा ऊंचा करना आवश्यक है। पश्चिम में छोटी टंकी एक-2’’ ऊंचे स्लैब पर रखना आवश्यक है। इन सावधानियों को दृष्टिगत रखना आवश्यक है। इन सावधानियों को दृष्टिगत रखे बगैर टंकी रखने से निम्नांकित परेशानियां उत्पन्न हो सकती है: a. गृह स्वामी एवं घर के पुरूषों के ऊपर झूठे मुकदमे। b. अनावश्यक अपमान का सामना c. मान-प्रतिष्ठा में कमी d. आर्थिक हानि e. दुर्घटना इन तीन दिशाओं को छोड़कर अन्य पांच दिशाओं एवं ब्रह्म स्थान में पानी की टंकी होना सर्वथा वर्जित है। इनके इन दिशाओं में गलत स्थान पर रहने से घर के लोगों को निम्न परेशानियां हो सकती हैं: 4. पूर्व: यद्यपि कि पूर्व दिशा को जल से संबंधित गतिविधियों के लिए उत्तम माना गया है, किंतु टंकी यहां प्रतिष्ठापित किए जाने से यह क्षेत्र ऊंचा एवं भारी हो जाएगा जबकि इस क्षेत्र को अपेक्षाकृत नीचा एवं हल्का होना चाहिए। टंकी के इस दिशा में अवस्थित होने पर निम्न समस्याएं उत्पन्न हो सकती है: Û व्यापार में नुकसान Û स्वास्थ्य में अत्यधिक उतार-चढ़ाव Û असामयिक निधन Û ऋणग्रस्तता Û पुत्र संतान की घर में कमी Û महिलाओं में बांझपन इत्यादि 5. उत्तर-पूर्व: उत्तर-पूर्व जलीय गतिविधियों के लिए वास्तुशास्त्र में सर्वश्रेष्ठ दिशा मानी जाती है। किंतु वास्तु शास्त्र के सिद्धांत के अनुसार इस दिशा की दीवार को सदैव सभी दिशाओं की दीवारों की तुलना में नीचा होना चाहिए। साथ ही इस दिशा का सबसे हल्का होना ही वास्तु सम्मत है। अतः इस दिशा में पानी की टंकी का प्रतिष्ठापन बहुआयामी परेशानियों को उत्पन्न करने वाला होता है। इससे निम्नांकित परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं: a- बच्चों को पढ़ाई में मन नहीं लगता। वे पढ़ाई में ध्यान संकेन्द्रित नहीं कर पाते। b- सकारात्मक ऊर्जा का घर में प्रवाह अवरूद्ध हो जाता है जिससे स्वास्थ्य संबंधी परेशानी उत्पन्न होती है। c- महिलाओं को गर्भधारण करने में समस्या उत्पन्न होती है, संतान उत्पन्न होने में समस्या होती है। Û गर्भकाल के दौरान महिलाओं का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता तथा कई बार प्रसव काल के दौरान उनकी मृत्यु हो जाती है। d- व्यापार एवं व्यवसाय में संकट एवं नुकसान। e- घर के लोगों के अपहरण हो जाने का खतरा। 6. उत्तर: उत्तर की दिशा जलीय गतिविधियों के लिए तो उपयुक्त है किंतु इसका भारी एवं ऊंचा होना अति नुकसानदायक है। इससे गृहस्वामी एवं अन्य सदस्यों को निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है: a- ऊर्जा का प्रवाह निर्बाध गति से नहीं हो पाने के कारण स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से घर के सदस्यों को दो-चार होना पड़ता है। b- गृहस्वामी को व्यापार में नुकसान c- घर के सदस्यों के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना d- पुत्र संतति का अभाव एवं नुकसान e- गर्भधारण में संकट 7. दक्षिण: दक्षिण दिशा में भी टंकी की स्थापना को वैकल्पिक तौर पर अधिमान्यता दी गई है लेकिन टंकी का आकार छोटा होना चाहिए तथा किसी भी प्रकार से यहां पानी का रिसाव नहीं होना चाहिए। पानी का पाइप यहां से उत्तर एवं उत्तर-पूर्व की दिशा की ओर जाना चाहिए। पानी की टंकी को हमेशा स्लैब के ऊपर रखें। इसके प्रतिष्ठापन में थोड़ी भी चूक होने पर घर के वासियों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है: a- घर में कन्या संतान की बहुतायत b- अनावश्यक विवाद एवं लड़ाई-झगड़े c- दुर्घटना की आशंका d- चोरी का भय e- आत्महत्या की भावना विकसित होना 8. दक्षिण-पूर्व: दक्षिण-पूर्व दिशा में ओवरहेड पानी की टंकी सर्वथा वर्जित है। यह अत्यंत अशुभ, नुकसानदायक एवं परेशानी का कारक है। दक्षिण-पूर्व दिशा अग्नि का कोण है तथा किसी भी परिस्थिति में आग एवं पानी का मेल संभव नहीं है। आग एवं पानी को हमेशा एक-दूसरे से दूर रहना चाहिए। आग्नेय कोण में पानी की टंकी होने से निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है: a- आग लगने से धन-जन की हानि b- दुर्घटना से घर के सदस्य की मौत c- असामयिक मृत्यु d- महिलाओं के गर्भधारण में परेशानी e- गृहस्वामी पर ऋण का बोझ f- अकारण विवाद एवं मुकदमे g- अकारण धन हानि 9. ब्रह्म स्थान: ब्रह्म स्थान में टंकी का होना अत्यंत अशुभ फलदायी होता है। ब्रह्म स्थान ब्रह्मा का स्थान माना जाता है। यदि ब्रह्मा के ऊपर बोझ पड़ेगा तो कैसे घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रह सकती है। यहां टंकी होने पर ऐसी परिस्थितियां बन जाएंगी कि लोगों का घर में रहना दूभर हो जाएगा तथा उन्हें बाध्य होकर घर छोड़ना पड़ेगा। ब्रह्म स्थान में पानी की टंकी अवस्थित होने पर लोगों को निम्नलिखित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है: a- घर के लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां b- सदस्यों को हृदयाघात एवं पक्षाघात का खतरा c- अकारण विवाद एवं मुकदमे d- ऋण ग्रस्तता e- घर के सदस्यों के बीच आपसी लड़ाई-झगड़े f- संतान हीनता g- अकारण अपमान तथा मान-प्रतिष्ठा में कमी पानी की टंकी के प्रतिष्ठापन से जुड़ी कुछ आवश्यक बातें a- पानी की टंकी के लिए सबसे उपयुक्त स्थान दक्षिण-पश्चिम (र्नैत्य) दिशा है। विकल्प के रूप में पश्चिम अथवा उत्तर-पश्चिम दिशा में भी कुछ शर्तों के साथ पानी की टंकी का प्रतिष्ठापन किया जा सकता है। b- र्नैत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में टंकी सबसे ऊपरी स्लैब से ऊपर होना चाहिए। c- यद्यपि कि उत्तर-पूर्व कोना जल तत्व को प्रदर्शित करता है किंतु फिर भी यहां पानी की टंकी उपयुक्त नहीं है क्योंकि यह दिशा एवं यह क्षेत्र हल्का एवं नीचा होना चाहिए। d- दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में ओवरहेड टैंक सर्वथा वर्जित है। यहां पानी की टंकी रखना बिल्कुल मना है। e- पश्चिम दिशा चूंकि वरूण देव को समर्पित है और वे वर्षा के देवता हैं, अतः यहां पानी की टंकी रखने में कोई हर्ज नहीं किंतु कुछ सावधानियां बरतनी आवश्यक हैं। f- वायव्य कोण में टंकी लगाने में हर्ज नहीं है किंतु इस दिशा में टंकी होने से पानी जल्दी-जल्दी समाप्त हो जाता है और बार-बार टंकी भरने की आवश्यकता होती है। g- ब्रह्म स्थान में पानी की टंकी लगाना बिल्कुल मना है। h- जहां तक हो सके प्लास्टिक की टंकी न लगायें। यदि लगाना बाध्यता हो तो नीले अथवा काले रंग की टंकी लगायें क्योंकि गहरा रंग सूर्य की किरणों का अवशोषण करता है। i- विभिन्न कार्यों के लिए अलग टैंक हों तो अच्छा है। पीने एवं खाना बनाने के लिए एक टंकी हो तथा टायलेट एवं बाथरूम आदि के लिए दूसरी टंकी। यदि अपरिहार्य कारणों से पानी की टंकी गलत स्थान व दिशा में लग ही गई हो तथा उसे स्थानांतरित करना बिल्कुल संभव न हो तो वैसी परिस्थिति में निम्नांकित उपाय करके इसके दोषों का शमन किया जा सकता है: a- टंकी के ढक्कन को लाल रंग से रंग दें। इससे काफी हद तक दोष का परिहार हो जाता है। b- भूमि के अंदर कोने पर जहां टंकी अवस्थित है वहां 4 अथवा 9 मल्टियर पिरामिड स्थापित करें। c- मकान के मुख्य द्वार पर तथा टंकी पर स्वास्तिक का चिह्न बनाएं। d- घर में समय-समय पर सुंदर कांड का पाठ करें। e- घर के उत्तरी क्षेत्र में मनी प्लान्ट लगाएं। f- घर के ईशान कोण को हमेशा साफ-सुथरा एवं सुंदर रखें। इस क्षेत्र में पानी के स्रोत जैसे- फिश एक्वेरियम, फिशपाॅट, फाउन्टेन आदि लगाएं। g- घर में धातु का कछुआ व मूर्ति ईशान्य कोण में स्थापित करने से वास्तु दोष में कमी आती है। h- घर में उड़ान भरते पक्षी की तस्वीर रखना भी लाभप्रद होता है।



संकटमोचक हनुमान विशेषांक  आगस्त 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के संकटमोचक हनुमान विशेषांक में राम भक्त हनुमान के प्राकट्य की कथा, उपदेश, पूजन विधि, ऐश्वर्यदायी साधना के विभिन्न सूत्र, उनके विभिन्न स्वरूप, विभिन्न रूपों की पूजा से दुःख निवारण, प्रमुख तीर्थ स्थलों का परिचय, पूजा साधना के प्रभाव, चक्र आदि ज्ञानवर्धक आलेख सम्मिलित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड की त्रासदी, कृष्ण जन्माष्टमी व्रत, श्रावण में क्यों बढ़ जाता है शिव पूजा का महत्व, अंक ज्योतिष के रहस्य, सत्यकथा, पुरूषोत्तम श्री कृष्ण की अमृतवाणी, त्रिक भावों में ग्रहों का फल एवं उपाय, भुखंड वास्तु व सम्मोहन उपचार तथा धार्मिक क्रिया कलाप का वैज्ञानिक महत्व और ऊर्जा क्षेत्र बढाने के साधन व विवादित वास्तु इत्यादि रोचक आलेख भी पत्रिका की शोभा बढ़ाते हैं।

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