अंक विद्या

अंक विद्या  

व्यूस : 1786 | जुलाई 2010

खगोलिय पिंड (ग्रह) भी निर्धारित ऊर्जा से गतिमान हैं। हर ग्रह से विशेष तरंग-मान की तरंगे पैदा होती हैं। ये तरंगें एक विशेष प्रकार का ऊर्जा मंडल तैयार करती हैं। इस ऊर्जा मंडल को एक अंक से जोड़ा गया है। अर्थात् हर ग्रह का प्रतिनिधित्व एक अंक करता है। जब किसी व्यक्ति का नाम, मूलांक या भाग्यांक के अनुसार रखा जाता है तो भी एक संबंध बनता है। उस नाम के उच्चारण से तरंगे पैदा होती हैं जो ग्रह विशेष से तारतम्य जोड़ती हैं।

ऐसा नाम निश्चय ही सफलता का द्योतक होगा। ग्रहों के आभामंडल स्वामी ग्रह को बल देते हैं। वे मित्र ग्रह और उनके प्रतिनिधि अंक मित्र अंक बन जाते हैं। अपने जीवन के महत्वपूर्ण कार्य और संबंध मित्र अंकों से मिला कर हम सुखद और समरसता का जीवन जी सकते हैं।

मूलतः सृष्टि से जुड़ा जीवन एक सुंदर और सरल प्रक्रिया है। सृष्टि से सामंजस्य टूट जाने पर यह विकृत हो जाता है। वर्तमान संदर्भ में मनुष्य अति व्यस्त जीवन जी रहा है। व्यस्तता के कारण वह प्रकृति के नियमों को तोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे में अंक विद्या की सहायता से वह सृष्टि से सामंजस्य जोड़ सकता है। अर्थात ब्रह्मांड से सामंजस्यता ही अंक शास्त्र का मूल सिद्धांत है।


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