फल निर्णय में नक्षत्र की भूमिका महत्वपूर्ण

फल निर्णय में नक्षत्र की भूमिका महत्वपूर्ण  

फल निर्णय में नक्षत्र की भूमिका महत्वपूर्ण राकेश गोयल अधिकांश ज्योतिषी कुंडली में स्थित ग्रह एवं उनके अधिष्ठित भाव या राशि के आधार पर ही फल कथन कर देते हैं, जबकि ग्रह किस नक्षत्र में अवस्थित हैं, इसका अध्ययन-विश्लेषण करना भी जरूरी है। अशुभ भाव में स्थित ग्रह यदि अनुकूल नक्षत्र में स्थित हो तो जातक को शुभफल भी दे सकता है ! ज्योतिष को वेदों की आंखें कहा गया है और यह ज्योतिर्विदों पर निर्भर करता है कि वे किसी जन्म पत्रिका का विश्लेषण किस प्रकार करते हैं, और क्या फलादेश करते हैं। ज्योतिष ज्ञान का महासागर है, जिसमें जो जितना गहरे जाता है उतना ही अमूल्य खजाना पाता है। ज्योतिष में हर राशि, दृष्टि, ग्रह, अंश, चरण, भाव, योग और नक्षत्र का अपना महत्व होता है। अधिकांश ज्योतिर्विद नक्षत्र को खास महत्व नहीं देते हैं जबकि नक्षत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि शुभ ग्रह अशुभ भावों में होते हुए भी अनुकूल नक्षत्रों में हों तो जातक को सफलता प्राप्त हो सकती है। यहां प्रस्तुत उदाहरण कुंडली के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि नक्षत्र भी किसी व्यक्ति का जीवन बदल सकते हैं। उक्त जातक का जन्म दिनांक 28. 08.1981 को सांय 7ः30 बजे अजमेर में हुआ। अब जातक की कुंडली का अध्ययन करें। जातक का लग्न कुंभ है। लग्न का स्वामी शनि अष्टम भाव में स्थित है। सुख भाव (चतुर्थ) एवं भाग्य भाव (नवम)् का स्वामी शुक्र भी अष्टम में है। लाभ भाव (एकादश) एवं धन स्थान, कुटुंब (द्वितीय) भाव का स्वामी गुरु भी अष्टम में शुक्र व शनि के साथ स्थित है। पराक्रम (तृतीय) एवं राज्य (दशम) भाव का स्वामी मंगल नीच का होकर षष्ठ भाव में है। स्वयं षष्ठेश चंद्र अपनी राशि में मंगल व राहु के साथ स्थित है। साथ ही विद्या भाव, संतान भाव (पंचम) एवं मृत्यु भाव (अष्टम) का स्वामी बुध सप्तम भाव में सूर्य के साथ तथा जाया भाव (सप्तम) का स्वामी सूर्य स्वयं सप्तम भाव में बुध के साथ स्थित है। केतु व्यय भाव (द्वादश) में मकर राशि में स्थित है। उक्त कुंडली एवं उसमें स्थित ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करें तो पाएंगे कि कंुडली नेष्टतम हैं, क्योंकि ज्योतिष के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार जिस कुंडली में लग्न, धन, पराक्रम, सुख, विद्या, संतान, रोग, विवाद, पत्नी, मृत्यु, भाग्य, व्यापार, नौकरी एवं लाभ के स्वामी ही षष्ठ या अष्टम भाव में स्थित हों वह अच्छी कुंडली नहीं होती। ऐसा जातक भाग्यहीन होता है। लेकिन इस कुंडली का गूढ़ अध्ययन करें तो विपरीत स्थिति सामने आती है। ऊपर दी हुई निरयण ग्रह स्पष्ट सारणी पर नजर डालें तो पाएंगे कि कुंडली के अनुसार लग्नेश शनि, जो अष्टम भाव में स्थित है, वस्तुतः हस्त नक्षत्र के द्वितीय चरण में मौजूद है। सुखेश एवं भाग्येश शुक्र तथा लाभेश एवं धनेश गुरु अष्टम भाव में हस्त नक्षत्र के तीसरे चरण में हैं अर्थात् गुरु, शुक्र एवं शनि तीनों अष्टम भाव में हस्त नक्षत्र में हैं। दूसरी तरफ षष्ठ भाव में पराक्रमेश एवं राज्येश मंगल पुष्य नक्षत्र के प्रथम चरण में, षष्ठेश षष्ठ भाव में अश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में, राहु षष्ठ भाव में पुष्य नक्षत्र के द्वितीय चरण में, पंचमेश एवं अष्टमेश बुध सप्तम भाव मे मघा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में तथा केतु द्वादश भाव में उŸाराषाढ़ा नक्षत्र के चतुर्थ चरण में मौजूद हैं। इस तरह अष्टम स्थान में मौजूद तीनों ग्रह हस्त नक्षत्र में हैं। हस्त नक्षत्र चंद्र का नक्षत्र है और ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार सूर्य व चंद्र को अष्टम भाव का दोष नहीं लगता है, इसलिए तीनों ग्रह गुरु, शुक्र एवं शनि अष्टम भाव में होते हुए भी प्रभावहीन नहीं हुए। षष्ठ भाव में मौजूद तीनों ग्रह क्रमशः अश्लेषा एवं पुष्य नक्षत्र में हैं। अश्लेषा बुध का एवं पुष्य शनि का नक्षत्र है। बुध एवं शनि में परस्पर मित्रता है। फलस्वरूप षष्ठ स्थान में मौजूद तीनों ग्रह भी मित्रक्षेत्री होने के कारण पाप प्रभाव में नहीं है, इसलिए शुभत्व प्रदान कर रहे हैं। सूर्य सप्तम भाव में केतु के मघा नक्षत्र में तथा केतु द्वादश भाव में सूर्य के उŸाराषाढ़ा नक्षत्र में है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार ग्रहों का राशि परिवर्तन योग होता है, उसी प्रकार, सूर्य और केतु का नक्षत्र परिवर्तन योग हुआ, इसलिए दोनों ग्रहों मंे गहरा संबंध होने के कारण ये भी शुभ स्थिति में आ गए। बुध सूर्य के उŸारा फाल्गुनी नक्षत्र में सूर्य के साथ ही स्थित है, इसलिए वह शुभता प्रदायक है। जातक का जन्म बुध की महादशा में हुआ, फिर केतु की महादशा चली और वर्तमान में शुक्र की महादशा चल रही है। जातक की ये तीनों दशाएं बहुत ही अच्छी एवं शुभता प्रदान करने वाली रहीं। नक्षत्रों के इन चैंकाने वाले तथ्यों के फलस्वरूप नेष्टतम होते हुए भी कुंडली अजमेर के एक उच्च और कुलीन घराने में जन्मे जातक का लालन-पालन राजसी ठाट-बाट के साथ हुआ। आज यह जातक देश की एक श्रेष्ठ कंपनी की विदेश शाखा में साफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्य कर रहा है। इस तरह किसी कुंडली के सही विश्लेषण के लिए नक्षत्रों का अध्ययन करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि उसमें स्थित ग्रहों का, क्योंकि फल निर्धारण में उनकी भूमिका भी अहम होती है। निरयण ग्रह स्पष्ट ग्रह राशि अंश दिशा नक्षत्र पद राशि स्वामी नक्षत्र स्वामी लग्न कुंभ 24ः26ः32 25 पूर्वा भाद्रापद 2 शनि गुरु सूर्य सिंह 11ः34ः48 10 माघ 4 सूर्य केतु चंद्र कर्क 28ः53ः37 09 अश्लेषा 4 चंद्र बुध मंगल कर्क 03ः31ः53 मार्गी 08 पुष्य 1 चंद्र शनि बुध सिंह 27ः53ः47 मार्गी 12 उŸारा फाल्गुनी 1 सूर्य सूर्य गुरु कन्या 17ः24ः20 मार्गी 13 हस्त 3 बुध चंद्र शुक्र कन्या 18ः18ः58 मार्गी 13 हस्त 3 बुध चंद्र शनि कन्या 14ः40ः21 मार्गी 13 हस्त 2 बुध चंद्र राहु कर्क 07ः53ः24 वक्री 08 पुष्य 2 चंद्र शनि केतु मकर 07ः53ः24 वक्री 21 उŸाराषाढ़ा 4 शनि सूर्य यूरेनस वृश्चिक 02ः44ः25 मार्गी 16 विशाखा 4 मंगल गुरु नेपट्यून वृश्चिक 28ः28ः42 वक्री 18 ज्येष्ठा 4 मंगल बुध प्लूटो कन्या 28ः50ः32 मार्गी 14 चित्रा 2 बुध मंगल राहु व केतु के स्पष्ट मान दिए गए हैं।



व्रत कथा विशेषांक   नवेम्बर 2008

सोमवार से शनिवार तक किये जाने वाले व्रत कथाएँ एवं उनका महत्व, व्रत एवं कथा करने की पूजन विधि एवं दिशा निर्देश, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, होली आदि जैसे वर्ष भर में होने वाले सभी विशेष व्रत कथाएँ और उनका महत्व, व्रत एवं कथाओं के करने से मिलने वाले लाभ

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