मिड लाइफ क्राइसिस

मिड लाइफ क्राइसिस  

मिडलाइफ क्राइसिस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इलियट जैक्स ने 1965 में किया। वास्तव में चालीस की उम्र को जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया है। यहां पहुंचकर व्यक्ति को झटका सा लगता है। ऐसा होने का एक कारण इस समय में अचानक माता-पिता की मृत्यु होना या दुख का कोई अन्य कारण जैसे बेरोजगारी या रोजगार में संतोष की कमी भी हो सकती है। इस अवस्था में उसे महसूस होता है कि उसकी युवावस्था उसके हाथ से फिसली जा रही है। उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। उसका मन उसे किसी और दिशा में ले जाना चाहता है पर सामाजिक जीवन का यथार्थ उसे वैसा करने से रोकता है। मनोवैज्ञानिक इस अवस्था को मिड लाइफ क्राइसिस कहते हैं। आम तौर पर पुरुष में इसकी शुरूआत 42-43 वर्ष में होती है जबकि महिलाओं में यह 44-45 के बाद आती है। औरतों में यह बहुत जल्दी खत्म भी हो जाती है लेकिन पुरूषों में देर तक बनी रहती है। पुरूषों के भीतर अचानक वही भाव जाग जाता है जो किशोरावस्था में हुआ करता है। इसकी एक वजह तो हार्मौनल बदलाव है। इस समय व्यक्ति को लगता है कि उसकी आधी जिंदगी बीत चुकी है। वह शेष जिंदगी अपने मुताबिक जीना चाहता है। इसलिए पुरूष अपनी फिटनेस, पहनावे आदि पर अधिक ध्यान देने लगते हैं। उनमें जवान दिखने की इच्छा उत्पन्न होने लगती है। वे अपनी जिंदगी के खालीपन को भरने के लिए एक्साइटमेंट लाना चाहते हैं। इसलिए वे फिर से रोमांस और प्यार खोजने लग जाते हैं जिससे उनकी जिंदगी थोड़ी चटपटी बन सके।’ दरअसल इस समय तक दांपत्य जीवन कई तरह के दबावों के कारण नीरस होने लगता है। अगर पति-पत्नी सचेत रहकर इसका समाधान निकालने हेतु प्रयास न करें तो उनका जीवन असहज हो जाता है। महिलाएं आम तौर पर खुद को कई चीजों में इन्वाल्व कर लेती हैं लेकिन पुरूष कामयाबी न मिलने के कारण हताश हो जाते हैं। इस उम्र तक रोजी-रोटी के लिए संघर्ष या संतान के करियर की चिंता से काफी हद तक मुक्ति मिल जाती है। ऐसे में व्यक्ति अचानक खालीपन महसूस करता है और जीवन में कुछ बदलाव चाहता है। बहरहाल कुछ लोग समय रहते संभल जाते हैं और अपने जीवन का कोई लक्ष्य निर्धारित कर उसे हासिल करने में लग जाते हैं। हालांकि कुछ लोग 60 वर्ष तक इसी अवस्था में रहते हैं। मिड लाइफ क्राइसिस के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं- (मिडलाईफ क्राइसिस ग्रस्त लोगों की भावनाएं) - - एक अन्जान मंजिल की तलाश - लक्ष्य प्राप्ति न होने के कारण मन के अंदर गहरी निराशा की भावना। - अधिक सफल सहकर्मियों के मध्य अपमानित होने का भय। - एकान्तवास करने या किसी समकक्ष व्यक्ति के साथ अधिक समय बिताने की आवश्यकता। (मिड लाईफ क्राइसिस ग्रस्त लोगों का व्यवहार) - - नशा करना या एल्काहलिक होना। - मोटरबाइक, नौका, कपड़े, खेलकूद, स्पोर्टस कार, ज्यूलरी, गैजेट व टाटू आदि पर असाधारण रूप से अपव्यय करना। - अपनी कमियों के लिए गमगीन रहना। - अपने बच्चों पर खेल-कूद, शिक्षा व कला आदि क्षेत्र में उम्दा प्रदर्शन करने के लिए आवश्यकता से अधिक दबाव बनाना। - युवा लोगों से मित्रता करना। मनोचिकित्सकों के अनुसार मिड लाइफ क्राइसिस के निदान में अधिक ऊर्जा व समय लग सकता है लेकिन जीवन शैली में समय रहते कुछ परिवर्तन करने से आशातीत लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बशर्ते ऐसे परिवर्तन जिनसे मानसिक तनाव निश्चित रूप से कम होता है कम अवस्था में ही कर दिए जाने चाहिए। अपने मित्रों या मनोचिकित्सक से अपनी इच्छाओं व महत्वाकांक्षाओं के बारे में चर्चा करें व अपने उद्देश्यों व जीवन की महत्वाकांक्षाओं का पुनर्मूल्यांकन करें। जीवन की अवस्था को खुले मन से स्वीकारें। नियमित रूप से व्यायाम करें व पौष्टिक आहार लें। व्यायाम करने से तनाव कम होगा तथा संतुलित आहार के सेवन व मादक वस्तुओं के परहेज से नींद व आराम अच्छे से हो जाएगा। ज्योतिष शास्त्रानुसार मिड लाइफ क्राइसिस का प्रभाव अधिकतर उन लोगों की जिंदगी पर अधिक होता है जिनकी कुंडली में शुक्र ग्रह अधिक सक्रिय होता है। 42 वर्ष की अवस्था वह होती है जब आपकी कुंडली में राहु ग्रह का प्रभाव अपने चरम पर होता है। यदि यह कुंडली में अशुभ हो तो यह आपके जीवन में भय और भ्रम का वातावरण स्थापित कर देता है किंतु यदि यह ग्रह बली होकर 3, 6, या 11 भावों में हो तो व्यक्ति मिड लाइफ क्राइसिस के दुष्प्रभाव से शीघ्र ही उबर जाता है तथा यदि गुरु ग्रह भी शुभ हो तो ऐसा जातक अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित कर लेता है तथा निरंतर उस ओर बढ़ने लगता है।


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