विवाह और वैवाहिक जीवन

विवाह और वैवाहिक जीवन  

विवाह के विषय में विचार करने के लिए जातक की जन्मकुंडली के सप्तम भाव का विश्लेषण करते हैं। जब विवाह संपन्न होता है तो उसके कुटुंब में वृद्धि होती है अतः जातक के द्वितीय भाव का भी विश्लेषण करते हैं। क्योंकि जातक का विवाह होता है, अतः लग्न पर विचार करते हैं। विवाह से सुख की भावना जुड़ी होती है अतः चतुर्थ, यानी सुख भाव का विश्लेषण भी करना चाहिए। विवाह होने से एक बड़ी इच्छा की पूर्ती होती है। इच्छा का भाव एकादश भाव है, उस पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस प्रकार किसी जातक का विवाह संपन्न होने में जातक के, सप्तम भाव के साथ-साथ, 1-2-4-9-11 भाव भी विवाह के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। विवाह होगा, या नहीं ?: इसका उत्तर जानने के लिए नीचे लिखे कुछ योगों पर विचार करेंगे, जो विवाह न होने के योगों में शामिल हैं: Û जिस व्यक्ति की कुंडली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं शुक्र पाप ग्रहों से युक्त हो, द्वितीयेश त्रिक स्थान में हो, उसका विवाह नहीं होता है। Û सप्तमेश एवं शुक्र निर्बल, या अस्तगत हो तथा सप्तम भाव में शनि एवं राहु हो, तो विवाह नहीं होता है। किंतु ऐसे व्यक्ति का किसी न किसी के साथ यौन संबंध अवश्य रहता है। Û लग्न, द्वितीय एवं सप्तम, इन तीनों स्थानों में पाप ग्रह हों, उनपर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो, तो व्यक्ति विधिवत विवाह नहीं करता है। Û सूर्य, चंद्रमा एवं शुक्र तीनों एक नवांश में तथा त्रिक स्थान में हांे, तो व्यक्ति विवाह नहीं करता, किंतु वह व्यभिचारी होता है। नोट: उक्त योगों का विचार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि योगकारक ग्रहों पर किसी शुभ ग्रह की दृष्ट तो नहीं है, क्योंकि इन योगों को बनाने वाले ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होने से ये योग प्रभावहीन हो जाते हैं तथा इस स्थिति में विवाह होने की संभावना बन जाती है। गोचर के अनुसार जातक का विवाह कब होगा ?: विवाह काल का निर्धारण करने में गोचर परिभ्रमण का सहयोग सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। विवाहकारक गोचरीय परिभ्रमण के समय विवाह का योग एवं दशा न होने पर भी प्रेम संबंधों की अनेक संभावनाएं होती हैं। यदि इस समय विवाह का योग भी हो एवं दशा भी हो, तो विवाह निश्चित रूप से हो जाता है। विवाहकारक दशा एवं गोचरीय परिभ्रमण की परस्पर तुलना में गोचरीय परिभ्रमण को अधिक फलदायी माना गया है। गोचर के अनुसार निम्न लिखित स्थितियों में जातक का विवाह होता है: Û लग्नेश एवं सप्तमेश, इन दोनों ग्रहों को स्पष्ट कर, इनकी राशि एवं कला आदि का योग कर लेना चाहिए। इस योगतुल्य राशि पर जब गोचरीय भ्रमण से गुरु आता है, तब जातक का विवाह होता है। Û चंद्रमा एवं सप्तमेश, इन दोनों को स्पष्ट कर, इनकी राशि आदि का योग कर लेना चाहिए। इस योगतुल्य राशि अंश पर गोचरीय गुरु के आने पर विवाह होता है। Û शुक्र से त्रिकोण में, या लग्न, अथवा सप्तम भाव में गोचरीय गुरु के जाने पर विवाह होता है। Û सप्तमेश जिस राशि एवं नवमांश में हो, उन दोनों में से जो बलवान हो, उससे त्रिकोण में गुरु आने पर विवाह होता है। Û जन्म लग्न, तृतीय, सप्तम एवं एकादश भाव में गोचरीय क्रम से गुरु के आने पर विवाह योग्य अवस्था में हो जाता है। इस प्रकार विवाह का समय का निर्णय करते समय, सर्वप्रथम विवाह में बाधक योगों का ध्यान रखते हुए, यह निश्चय करना चाहिए कि व्यक्ति का विवाह किस अवस्था में होगा। बाल्यावस्था, युवावस्था, या वृद्धावस्था में होगा, यह निर्णय मुख्यतः योगों के आधार पर ही करना चाहिए। इसके पश्चात् उस अवस्था में विवाह के कारक की दशा का विचार करना चाहिए तथा अंत में गोचरीय क्रम से गुरु का संचार देख कर विवाह के समय का निर्धारण कर सकते हैं। क्या दूसरा विवाह होगा ?: जिस जातक की कुंडली में, चाहे वह स्त्री हो, या पुरुष, निम्न लिखित योगों में से कोई एक योग पड़ा हो, उसके जीवन में दो विवाह होते हैं: Û सप्तमेश नीच राशि में हो तथा सप्तम स्थान में पाप ग्रह हो, तो व्यक्ति का जीवन में दो बार विवाह होता है। Û सप्तमेश, या द्वितीयेश निर्बल हों तथा उनपर पाप प्रभाव हो, तो उस व्यक्ति का विवाह दो बार होता है। क्या पहली पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह होगा?: एक पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरे विवाह के योग निम्न लिखित है: Û द्वितीयेश एवं सप्तमेश, ये दोनों ग्रह शुभ ग्रहों से युत, या दृष्ट हों, तो इस योग में पैदा होने वाले जातक की दो जीवित पत्नियां होती हैं। Û सप्तम स्थान में मंगल, शुक्र, या अपनी मित्र राशि में चंद्रमा तथा अष्टम स्थान में लग्नेश होने पर, इस योग के प्रभाववश, व्यक्ति की दो जीवित पत्नियां होती हैं। जातक के विवाह योग संबंधी नियम: Û यदि जन्मपत्रिका में शुक्र स्वगृही, या कन्या राशि में हो, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में सप्तमेश लग्नस्थ हो, या सप्तमेश, शुभ ग्रह से युक्त हो कर, लाभ स्थान में स्थित हो, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में द्वितीयेश और सप्तमेश 1, 4, 5, 7, 9, 10 भाव में हों, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में लग्नेश लग्नस्थ हो, या सप्तम भाव में हो, सप्तमेश, या लग्नेश द्वितीय भाव में हो, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में मंगल एवं सूर्य के नवांश में बुध, गुरु गये हों, या सप्तम भाव में गुरु का नवांश हो, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्पत्रिका में सप्तम और द्वितीय भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तथा द्वितीयेश और सप्तमेश शुभ राशि में हों, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में लग्नेश कर्म स्थान में हो और बलवान बुध से युक्त हो तथा सप्तमेश और चंद्रमा तृतीय भाव में हों, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपित्रका में गुरु अपने मित्र के नवांश में हो, तो विवाह योग बनता है। Û जन्मपत्रिका में सप्तम भाव में चंद्रमा, या शुक्र, अथवा दोनों के रहने से विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो, या सप्तमेश, शुभ ग्रह से युक्त हो कर, 2, या 7, या 8 में हो, तो विवाह योग बनता है। Û यदि जन्मपत्रिका में अष्टमेश पहले, या सातवें भाव में हो तथा लग्नेश लग्न में हो, या छठे भाव में हो, सप्तमेश शुभ ग्रह से युक्त, या नीच राशि में गया हो एवं शुक्र नीच, शत्रु और अस्तगत राशि का हो, तो विवाह का योग बनता है। विवाह की आयु के निर्धारण संबंधी नियम: Û सप्तमेश शुभ ग्रह की राशि में हो, शुक्र स्वग्रही, या उच्च राशि में हो, तो 5वें, या 9वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û सप्तम भाव में सूर्य हो और सप्तमेश शुक्र के साथ हो, तो प्रायः 7वें, या 11वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û शुक्र द्वितीय भाव में और सप्तमेश 11वें में हो, तो 10वें, या 16वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û शुक्र लग्न से कंेद्र में हो, लग्नेश शनि की राशि में हो, तो 11वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û लग्न से केंद्र में शुक्र और शुक्र से 7वें में शनि हो, तो 12वें, या 19वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û चंद्रमा से 7वें शुक्र और शुक्र से 7वें में शनि हो, तो 18वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û द्वितीयेश 11वें और लग्नेश 10वें में हो, तो 15वें वर्ष में विवाह होता है। Û द्वितीयेश 11वें भाव में और लाभेश द्वितीय भाव में हो, तो 13वें वर्ष में विवाह का योग होता है। Û अष्टम भाव से 7वें शुक्र और अष्टमेश मंगल से युक्त हो, तो 22वें, या 27वें वर्ष में विवाह होता है। Û लग्नेश यदि सप्तमेश के नवमांश में हो और सप्तमेश 12वें भाव में हो, तो 23वें, या 26वें वर्ष में विवाह होता है। Û यदि अष्टमेश सप्तम भाव में, लग्न के नवमांश में, शुक्र से युत हो, तो 25, या 33 वर्ष में विवाह होता है। Û नवम भाव से 9वें में शुक्र हो, उन दोनों में से किसी एक में राहु हो, तो 31, या 33 वर्ष में विवाह होता है। Û भाग्य भाव से 7वें शुक्र और शुक्र से 7 वें सप्तमेश हो, तो 30, या 27 वर्ष में विवाह होता है। सप्तम भाव से संबंधित फल विचार: Û यदि सप्तमेश अपनी राशि, या उच्च में हो, तो उस जातक के लिए स्त्री का सुख पूर्ण होता है। Û सप्तमेश यदि छठे, आठवें, बारहवें स्थान में हो, तो उसकी स्त्री रोगी होती है। परंतु सप्तमेश यदि अपनी उच्च राशि में, या स्वगृही हो तो दोष नहीं होता है। Û कहीं भी सप्तमेश पाप ग्रहों से युक्त हो, तो स्त्री मृत्यु का कारक होती है। Û सप्तम भाव में शुक्र हो, तो जातक अति कामातुर होता है। Û सप्तमेश शुभ ग्रह से युक्त और बलवान हो, तो जातक धनी, मानी और सुखी होता है। इसके विपरीत यदि सप्तमेश नीच, या शत्रु राशि में हो, तो जातक की स्त्री रोगी होती है और उसकी बहुत सी स्त्रियां होती हैं। Û सप्तमेश शनि, या शुक्र की राशि में हो, उसपर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, तो जातक बहुत स्त्रियों वाला होता है। यदि सप्तमेश अपने उच्च में हो, तो निश्चय ही बहुत सी स्त्रियों वाला होता है। Û सप्तम भाव में सूर्य हो, तो स्त्री बंध्या होती है। सप्तम भाव में चंद्रमा हो, तो पत्नी राशि के स्वभाव सदृश स्वभाव वाली होती है। सप्तम भाव में मंगल हो, तो रजस्वला और बंध्या स्त्री का संग होता है। गुरु सप्तम भाव में हो, तो ब्राह्मणी, गर्भिणी का संग होता है। शनि, राहु, या केतु सप्तम भाव में हो, तो नीच जाति, या रजस्वला का संग होता है। Û यदि बारहवें, सातवें भाव में पाप ग्रह, पांचवंें में पाप ग्रह हो, तो जातक स्त्री के बस में होता है। Û सप्तम भाव, या सप्तमेश मंगल, बुध हो, तो स्त्री वेश्या, या परपुरूषगामिनी होती है। Û सप्तमेश अपने उच्च में हो, सप्तम में शुभ ग्रह हो, लग्नेश, बली हो कर, सप्तम में हो, तो उसकी स्त्री सब सद्गुणों से संपन्न, पुत्र-पौत्रादि से युक्त होती है। Û सप्तम भाव, या सप्तमेश पाप ग्रह से युक्त हो तथा निर्बल हो, तो स्त्री का नाश होता है। Û सप्तमेश, निर्बल हो कर, 6, 8, 12 भाव, या नीच भाव में हो, तो भी स्त्री का नाश होता है। Û सप्तम भाव में चंद्रमा और सप्तमेश 12 वें भाव में हो, स्त्रीकारक निर्बल हो, तो उस मनुष्य को स्त्री का सुख नहीं मिलता है।त


परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010

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