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लाल किताब ( दृष्टियां)

लाल किताब ( दृष्टियां)  

लाल किताब (दृच्च्टियां) पाठ-4 पं. उमेश शर्मा अ. लाल-किताब पद्धति में ग्रहों या भाव की दृष्टि प्राचीन ज्योतिष के दृष्टि सिद्धान्तों से कुछ भिन्न हैं। जैसे- एक-सात घर, चौथे दसवें, पूर्ण दृष्टि होती है। पांच-नौ, तीन-ग्यारह, आधी दृष्टि होती है॥ आठ-छह, दो-बारह बैठे, नज़र चौथाई रखते हैं। केतु, राहु, बुध की नाली, लेख जुदा ही रखतें है॥ इसमें दृष्टि की शक्ति की मात्र का वर्णन है। इसे और स्पष्ट रुप से समझने के लिए आगे दिए गये उदाहरणों को देखें। शुरु हो कर दूसरे भाव में समाप्त होता है। यह तीर बताता है कि किस भाव में स्थित ग्रह का प्रभाव कौन से भाव में स्थित ग्रह पर कितनी मात्रा में हो रहा है। तीर की पूंछ वाले भाव में स्थित ग्रह नोक वाले हिस्से वाले भाव में अपनी मित्रता या शत्रुता के अनुसार अपना असर मिला देगा परन्तु नोक वाले हिस्से के भाव वाला ग्रह पूॅंछ वाले हिस्से में अपना असर नहीे भेज सकता। इस प्रकार से- 1. प्रथम भाव 100 : दृष्टि से देखता है सप्तम भाव को। 2. चतुर्थ भाव 100 : दृष्टि से देखता है दशम भाव को। 3. तृतीय भाव 50 : दृष्टि से देखता है नवम व एकादश भाव को। 4. पंचम भाव 50 : दृष्टि से देखता है नवम भाव को। 5. द्वितीय भाव 25 : दृष्टि से देखता है षष्ठ भाव को। 6. षष्ठ भाव 25 : दृष्टि से देखता है द्वादश भाव को। 7. अष्टम भाव 25 : दृष्टि से देखता है द्वादश भाव को अ.100 : की दृष्टि की हालत में 2 ग्रह एक-दूसरे के ज्यादा नज़दीक या एक ही हो जाते हैं या मिल जाते हैं। ब. 50 : पर इनके बीच का फासला 1/2 हो जाता है या दोनो की आधी ताकत आपस में मिल जाती है। स. 25 : में इनके बीच का फासला 3/4 हो जाता है और 1/4 ताकत ही आपस में मिल पाती है। विशेष नियम : घर उल्टा आठ-दूजे होवे, न देखे पांच ग्यारह घर। बुध बारह-छह, नौ-तीन मारे, शनि छह से दूसरा घर॥ इसका अर्थ यह है कि अ. अष्टम भाव उल्टा देख कर भाव नं. 2 में अपना 100: प्रभाव डालता है। ब. बुध अगर बारहवें भाव में हो तो वह अपना प्रभाव छठे भाव में भी डालता है। स. बुध अगर नवम भाव में हो तो वह अपना प्रभाव तृतीय भाव में भी डालता है। द. शनि अगर छठे भाव में हो तो वह अपना प्रभाव दूसरे भाव में भी डालता है। साधारणतः कुण्डली के सप्तम, नवम, दशम, एकादश एवं द्वादश भाव और इनमें स्थित ग्रह अपनी दृष्टि नहीं रखते। य. दृष्टि के समय कुण्डली के भावों में 1-2-3 आदि के क्रम से पहले भावों के ग्रह अपने बाद के भावों में स्थित ग्रहों से मित्रता-शत्रुता करता व देखता हुआ कहलाता है सिवाय भाव नं0 8 में स्थित ग्रह के जो उल्टी दृष्टि से भाव नं0 2 को देखता है। उदाहरण : उपरोक्त उदाहरण में सूर्य को कहेगें कि वह शनि से पहले घरों का है। बृहस्पति को मंगल से पहले घर का कहेगें। अब मंगल से सूर्य, बृह., शनि हर एक या तीनों ही गिनती में तो जरुर पहले नम्बर पर है मगर मंगल से पहले भावों के ग्रह का उद्देश्य सिर्फ बृहस्पति से होगा या मंगल अब बृह. के बाद के घरों का ग्रह है। एक ही भाव का ग्रह जब दो और भावों को देखे जैसे भाव नं0 3 में स्थित ग्रह भाव नं0 9 और 11 में स्थित ग्रहों को देखेगा अब भाव नं0 9 और 11 में स्थित ग्रह भाव नं0 3 में स्थित ग्रह के बाद के ग्रह माने जायेंगे। पहले भाव में स्थित ग्रह (भाव नं0 1 से भाव नं. 6 तक के भावों को पहले तथा 7-12 तक के भावों को बाद के भाव कहा जायगा) अपने से बाद के भावों में स्थित ग्रह में अपना प्रभाव मिलाया करतें हैं सिवाय अष्टम भाव में स्थित ग्रह के जो दूसरे भाव में स्थित ग्रहों पर अपना प्रभाव डालते हैं अर्थात जब ग्रह बाद के भावों में स्थित है तो पहले भावों में स्थित ग्रहों में अपना प्रभाव नही डाल सकता। उदाहरण के लिए जब बोलें कि चंद्र दुश्मनी करता है शुक्र से तो इसका तात्पर्य यह है कि चन्द्र शुक्र से पहले भावों में है। ''शुक्र से तो इसका तात्पर्य यह है कि चन्द्र शुक्र से पहले भावों में है।

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