काशी के घाट

काशी के घाट  

काशी के घाट आर. पी. सिंह उत्तर प्रदेश में स्थित जिला बनारस (वाराणासी) के प्राचीन नगरी काशी विश्व की प्राचीनतम नगरियों में सर्वप्रमुख है। पुराणों में काशी को भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित मंदिरों का शहर कहा जाता है। इस काशी नगरी की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिचय क्या है तथा यहां पर बने घाट किस नाम से विख्यात हैं पढ़िए इस लेख में। काशी - एक ऐतिहासिक परिचय ः-भारतवर्ष कई धर्म, कलाओं, इतिहास, दर्शन एवं मूल्यों का केन्द्रस्थल है। इस देश में हमें कई सांस्कृतिक, कलात्मक एवं ऐतिहासिक चीजें विरासत में प्राप्त है जो देश की एकता एवं भारतीयता की पहचान है। देश के प्रत्येक राज्य को अपने अलग अलग ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एव र्धािर्मकमूल्यों एवं परम्पराओं से जाना एवं पहचाना जाता है। इन्ही भारतीय राज्यों में प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश में स्थित जिला बनारस (वाराणासी) के प्राचीन नगरी काशी विश्व की प्राचीनतम नगरियों में सर्वप्रमुख है। पुराणों में काशी को भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित मंन्दिरों का शहर कहा जाता है । काशी की ऐतिहासिक एवं धार्मिक परम्परा में जैन, बौद्व एवं ब्राहमण धर्मों की समवेत परम्परा भी देखी जा सकती है। पुराणों में काशी या वाराणसी का समान अर्थों मे ंउल्लेख है जो असि एवं वरुणा नदियों के मध्य स्थित था। छठी शताब्दी ई0 पूर्व कें जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों में सोलह (16) महाजनपदों के उल्लेख में काशी का भी एक प्रमुख जनपद के रुप में उल्लेख प्राप्त होता है। मुसलमानों एवं अंग्रेजों के शासन काल में काशी या वाराणासी का अधिकांशतः बनारस नाम से उल्लेख है जो वाराणासी का ही अपभ्रंश है। वर्तमान में वाराणसी एक जनपद या जिला है । काशी - एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिचय:- विश्व के अधिकांश प्राचीन नगर और उनकी संस्कृतियाँ समय के प्रवाह के साथ नष्ट हो गयी किन्तु काशी के धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्परा का प्रवाह वैदिककाल से आज तक उसी वेग से प्रवाहित है। हिन्दूओं के तीर्थस्थलों में चार धामों एवं सात (7) पुरियों का महत्व है। काशी की गणना सात पुरियों में की गयी है। ऐसी मान्यता है कि भारत के सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा करने में असमर्थ व्यक्ति केवल काशी यात्रा या परिेक्रमा से ही सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा का पुण्यफल पा सकता है। काशी हिन्दूओं की तरह जैनियों एवं बौद्धों का भी प्रमुख केन्द्र रहा है । जैन के 24 तीर्थंकरों में चार (4) तीर्थकरों की जन्मस्थली वाराणसी जनपद मानी गयी है। मान्यता के अनुसार ज्ञान प्राप्ति पश्चात् बुद्ध ने प्रथम धर्म उपदेश सारनाथ में दिया था। काशी की जीवन्त धार्मिक एवं सांस्कतिक चेतना ने प्राचीन काल से ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों के आचार्यों, सन्त महात्माओं एवं विदेशी यात्रियों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। काशी की धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना का केन्द्र बिन्दु एवं प्राण विन्दु गंगा धाट एवं काशी के मंन्दिर है, जहाँ भारतीय संस्कृति की पहचान प्रखर एवं जीवन्त रुप में पायी जाती है । काशी की यात्रा करने वालों प्रमुख विदेशी यात्रियों में फाहयान , ह्नेत्सांग ,अलबरुनी बर्नियर प्रमुख है, जिन्होंने तत्कालीन काशी की धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों का विवेचन प्रस्तुत किया है । उत्तर प्रदेश में स्थित जिला बनारस (वाराणासी) के प्राचीन नगरी काशी विश्व की प्राचीनतम नगरियों में सर्वप्रमुख है। पुराणों में काशी को भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित मंदिरों का शहर कहा जाता है । गंगा एवं काशी के धाट:-काशी की धार्मिक, अध्यात्मिक एवं मानसिक चेतना का आधार गंगा है। गंगा का क्षेत्र सामान्यतः पूर्व में काशी क्षेत्र, पश्चिम में देहली विनायक, उत्तर के वरुणा नदी तथा दक्षिण के असि नदी से परिवृत माना गया है। गंगा केवल काशी में ही उतरवाहिनी है, जिसका विशेष धार्मिक महत्व है । ऐसी मान्यता है कि काशी में गंगा का दर्शन, पूजन, स्पर्श मात्र से ही व्यक्ति समस्त सुखों को प्राप्त कर लेता। काशी वासियों के लिये गंगा और उसके घाट धार्मिक आघ्यात्मिक महत्व के साथ ही पर्यटन, स्वास्थ्य तथा आनन्द की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। गंगा के किनारे स्थित घाटों की श्रंृखला भारतीय संस्कृति एवं परम्परा के समन्वयात्मक स्वरुप को उजागर करती है। काशी और गंगा का सन्दर्भ बहुत प्राचीन काल से मिलने लगता है किन्तु गंगा के घाटों का उल्लेख मौर्यकाल से मिलता है। काशी के व्यापारिक उत्कर्ष का कारण यहाँ नदी मार्ग द्वारा होने वाला व्यापार था। काशी के आचार्यों एवं विद्याथियों के दैनिक कार्यों में गंगा स्नान भी एक मुख्य कार्य था । ’’मत्स्यपुराण’’ में गंगा तट पर स्थित पाँच प्रमुख तीर्थोें का उल्लेंख है । वामनपुराण में काशीपुरी की परिक्रमा का उल्लेख है जो वर्तमान के ’पंचकोशी ’परिक्रमा के रुप में प्रसिद्ध है । श्री राम लीला, पंतगबाजी, मुक्केबाजी, दंगल एवं गंगा महोत्सव भी गंगा के घाटों पर देखी जा सकती है काशी के घाटो के अध्ययन के दृष्टिकोण से मोतीचन्द्र द्वारा सम्पादित ’’बनारस ऐन्ड इट्स घाट ’’( 1931) एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। घाटों पर स्थित कुछ प्रमुख मन्दिर है - 1. जगन्नाथ मन्दिर - अस्सी घाट के पास 2. अर्कविनायक मन्दिर - तुलसी घाट के उत्तर में 3. हनुमान मन्दिर -हनुमान घाट के पास 4. शीतला मन्दिर - शीतला घाट के पास 5. रानीभवानी मन्दिर - मर्णिकार्णिका घाट के पास 6. त्रिलांेचन महादेव मन्दिर - त्रिलोचन घाट के पास काशी के प्रमुख ऐतिहासिक घाट:- असिघाट - काशी के दक्षिणी सीमा पर गंगा एवं असि नदियों के संगम पर स्थित यह एक प्रमुख घाट है। पूर्व में इस घाट का विस्तार वर्तमान असिघाट से भदैनीघाट तक था । रीवा घाट - रीवा घाट का प्राचीन नाम लाल मिसिर घाट था। घाट एवं घाट पर विशाल महल का निर्माण पंजाब के राजा रणजीत सिंह के पुरोहित लाल मिसिर ने कराया था। वर्तमान में महल मे छात्रावास है। तुलसीघाट - यह घाट तुलसीघाट ( 16 वी 17वी का निवास स्थान था, जहाँ उन्होने रामचरितमानस लिखा तुलसीघाट पर अनेक मंदिर है तथा धार्मिक -सांस्कृतिक गतिविधि के दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण घाट है । भदैनीघाट - इस घाट की स्थिति भदैनी मुहल्ले में है इसलिए भदैनीघाट कहते हंै । आनन्दमयी घाट - यह घाट महिला तपस्विनी माता आनन्दमयी (20वीं शती की कर्मभूभि रही है।1944 में माता आनन्दमयी ने यहाँ घाट एवं घाट पर विशाल आश्रम का निर्माण करवाया । निषादराज घाट - घाट पर मुख्यतः निषाद जाति ( मल्लाह ) के लोगों का निवास होने के कारण इनका घाट का नाम निषाद राजघाट हुआ। घाट का धार्मिक सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व नहीं है । चेतसिंह घाट - ऐतिहासिक दृष्टि से काशी के घाटों मंे चेतसिंह घाट का प्रमुख स्थान है । घाट पर स्थित शिवाला महल में 1781 ई0 में राजा चेतसिंह एवं अंग्रेजों के बीच युद्व हुआ था। घाट स्थित किले में 18 वीं शती के तीन शिवमंन्दिर है । शिवालाघाट - इस घाट का विशेष धार्मिक महत्व नहीं है । किन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से 20 वीं शती के मध्य तक यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि चेतसिंह घाट पर सम्पन्न होनेवाला बुढ़वा मंगल मेला इस क्षेत्र तक फैला था। हनुमान घाट-इस घाट पर नागा साध् ाुओं का जूना अखाड़ा है। इसी में 18 वीं शती ई0 का हनुमान मंदिर है। इसका प्राचीन नाम रामेश्वर घाट था। हरिश्चन्द्र घाट- यह घाट काशी के प्रमुख श्मशान घाटों में से एक है। घाट के नामकरण के संदर्भ में मान्यता है कि अयोध्या के राजा एवं सत्य के प्रतिक हरिश्चन्द्र सत्य की रक्षा के लिए इसी घाट पर बिके थे। केदारघाट- घाट पर केदारेश्वर शिव का प्रसिद्ध मन्दिर होने के कारण इसका नाम केदार घाट हुआ। इस घाट का पक्का निर्माण 18 वीं शती में कुमारस्वामी मठ द्वारा कराया गया। ऐसी मान्यता है कि यहाॅ पर स्नान करने से समस्त पाप का नाश हो जाता है। पान्डेयघाट- इस घाट का निर्माण 19 वीं शती के प्रारम्भ में सारण (बिहार) निवासी बबुआ पान्डेय ने कराया था, जिससे इसका नाम पान्डेय घाट है। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है। अहिल्याबाईघाट- मुन्शी घाट के उ0 सीमा से लगे इस घाट तथा घाट स्थित विशाल महल का निर्माण 1785 ई0 में इन्दौर (मध्य प्रदेश) की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। शीतलााघाट- शीतलाघाट पर शीतलादेवी का प्रसिद्ध मन्दिर है जिससे घाट का नामकरण है। दशाश्वमेघ घाट के बाद स्नानार्थियों एवं तीर्थ यात्रियों की ज्यादा भीड़ इसी घाट पर होती है। दशाश्वमेघ घाट- धार्मिक-सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह काशी का प्रसिद्ध घाट है। परम्परानुसार ब्रह्मा द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने के बाद से इसका नाम दशाश्वमेघ हुआ। सड़क मार्ग से जुड़े घाटों में भी यह प्रमुख है जो नगर के मुख्य बाजार मार्ग से जुड़ा है। प्रयाग घाट- दशाश्वमेघ के उत्तरी भाग मंे स्थित प्रयाग घाट का निर्माण पोटिया (बंगाल) की महारानी 19 वीं शती में कराया था। काशीखन्ड के आधार पर इस घाट पर प्रयाग तीर्थ की स्थिति मानी गयी है। ललितादेवी घाट- घाट के सामने गंगा में ललिता तीर्थ एवं घाट के ऊपर ललितादेवी का मंदिर होने से इसका नाम ललिताघाट है। मर्णिकर्णिका घाट- यह घाट काशी के पाॅच प्रमुख एवं प्राचीनतम तीर्थों एवं घाटों में एक है। घाट पर स्थित मर्णिकर्णिका कुण्ड एवं उससे जुड़ी कथा के कारण ही इसका नाम मर्णिकर्णिका घाट पड़ा। पार्वती का कर्णमणि गिरने से भी नाम मर्णिकर्णिका पडा । संकठा घाट- घाट के समीप संकठा देवी के प्रसिद्व मन्दिर के कारण इस घाट का नाम पड़ा। वर्तमान में घाट पक्का एवं स्वच्छ है। रामघाट- रामघाट के सामने गंगा में रामतीर्थ तथा घाट पर राम पंचायतन मंदिर है जिससे इसका नाम रामघाट पड़ा। इसके अलावा काशी के प्रमुख घाटों में ग्वालियर घाट, बालाजी घाट, पंचगंगा घाट, दुर्गाघाट, ब्रह्मघाट, लालघाट, गायघाट, बद्रीनारायण घाट, त्रिलोचनघाट, गोलाघाट, प्रहलाद घाट, रानीघाट, राजघाट, आदिकेश्व घाट, प्रमुख है। यद्यपि काशी एवं गंगा तट के घाटों का सम्बन्ध प्राचीन है। किन्तु घाटों का ऐतिहासिक विकास क्रम एवं उससे सम्बन्धित धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का उल्लेख मौर्यकाल से हमें मिलने लगता है। गंगा तट के घाटों पर एक ओर भारत की समूची प्राचीन परम्परा अपनी संपूर्णता एवं विविधता में सुरक्षित है वहीं दूसरी ओर यहां के लोगों कीे जीवन शैली में आधुनिकता का प्रभाव भी दिखायी देता है। इस दृष्टिकोण से घाटों एवं गंगा में होने वाले प्रदूषण से बचाव के लिए लोगों में स्वच्छता एवं सुन्दरता की मानसिक जागरूकता विकसित करने की आवश्यकता है। मर्णिकर्णिका घाट काशी के पाॅच प्रमुख एवं प्राचीनतम तीर्थों एवं घाटों में एक है। घाट पर स्थित मर्णिकर्णिका कुण्ड एवं उससे जुड़ी कथा के कारण ही इसका नाम मर्णिकर्णिका घाट पड़ा। पार्वती का कर्णमणि गिरने से भी नाम मर्णिकर्णिका पडा।



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