फलादेश मे ंकारक ग्रहों का महत्व

फलादेश मे ंकारक ग्रहों का महत्व  

जन्म कुण्डली के बारह भावों से भिन्न-भिन्न बातों को देखा जाता है। ज्योतिष का मूल नियम यह है कि भाव की शुभाशुभता का विचार भाव और भावेश की बलवत्ता और उस पर पड़ने वाली अन्य ग्रहों की युति एवं दृष्टि द्वारा निर्णित होता है साथ ही नित्य कारक ग्रहों से भी भाव की शुभाशुभता का विचार करते हैं। इस प्रकार भाव, भावेश और कारक इन तीनों के संयुक्त प्रभाव के फलस्वरूप भाव फल का निश्चय किया जाता है। यहां हम कारक और उनके महत्व की चर्चा करेंगे। कारक दो प्रकार के होते हैं- स्थिर कारक और चर कारक। स्थिर कारक का अर्थ यह है कि किसी भी लग्न की कुण्डली हो और कोई भी राशि जातक की हो स्थिर कारक में कोई अन्तर नहीं आता है अर्थात् स्थिर कारक ग्रह अंशादि सापेक्ष नहीं है। पितृ कारक ग्रह वह है जो सूर्य और शुक्र में बली हो अर्थात् सूर्य और शुक्र की स्थिति जातक की कुण्डली में क्या है इस पर विचारोपरान्त दोनों में जो बली सिद्ध होगा वही ग्रह पितृकारक माने जायेंगे। मातृकारक ग्रह वह है जो चन्द्रमा और शुक्र में बलवान सिद्ध होता है। इसी प्रकार मंगल ग्रह से बहन, साला, छोटे भाई का विचार किया जाता है। बुध ग्रह से चाची, गुरु से पितामह का, शुक्र से स्वामी का और शनि से पुत्र, पिता, सास-ससुर, मातामह, मातामही आदि तत्समान जनों का विचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त बारह भावों के भी कारक कहे गये हैं- लग्न अथवा प्रथम भाव का कारक सूर्य है। द्वितीय भाव का गुरु, तृतीय भाव का मंगल, चतुर्थ भाव का चंद्रमा, पंचम भाव का गुरु, छठे भाव का मंगल, सप्तम भाव का शुक्र, अष्टम भाव का शनि, नवम भाव का गुरु, दशम भाव का बुध, एकादश भाव का गुरु और द्वादश भाव का कारक शनि है इन स्थिर कारकों के बाद चर कारक का प्रसंग आता है। चर कारक ग्रह वह हैं जो जातकों के कुण्डलियों में उनके ग्रहांशों के आधार पर निर्णित होते हैं। चूंकि अलग-अलग कुण्डलियों में ग्रह के अंशादि अलग-अलग होते हैं इसलिए ये कारक भी स्थिर न होकर बदलते रहते हैं। जन्म पत्रिकाओं मंे जिस ग्रह का अंश सबसे अधिक होता है वह आत्मकारक कहलाते हैं। उससे कम अंशादि वाला ग्रह अमात्य कारक अर्थात् मंत्री, उससे कम अंशादि वाला ग्रह भातृ कारक, उससे कम अंश वाला ग्रह मातृकारक, उससे कम अंश वाला ग्रह पितृकारक, उससे न्यून अंश वाला ग्रह पुत्र कारक, उससे कम अंश वाला ग्रह ज्ञाति कारक और उससे भी कम अंश वाला ग्रह दारा कारक होता है। कुछ विद्वान मातृ कारक और पुत्र कारक ग्रह एक ही मानते हैं। चर कारक निश्चय करने में अंश से लेकर विकला तक विचार करना चाहिए। यदि ग्रह एक ही कारक के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इस स्थिति में उससे आगे वाले कारक का लोप हो जाता है। तब उस कारकत्व का निर्णय स्थिर कारक से करने का विधान शास्त्रों ने दिया है। उपरोक्त चर कारक आठ हो गए हैं परन्तु ग्रहों की संख्या रवि से शनि पर्यन्त सात ही है। अतः विद्वान राहु को भी चर कारक निर्णय में स्थान देते हैं। परन्तु राहु के कारक विचार में राहु के अंश को 30 डिग्री में से घटाकर समझना चाहिए क्योंकि राहु सदैव उल्टा चलता है।


नव वर्ष विशेषांक  जनवरी 2014

शोध पत्रिका के इस अंक में त्योहारों, होटल प्रबंधन, प्रेम विवाह, कालसर्प योग, वास्तु, फेंगशुई, अंकज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान, भारत और दुनिया के भविष्य, ग्रह और घर की बिजली, भूकंप, राज योग, स्तन कैंसर और भविष्यवाणी में कारक का महत्व जैसे विभिन्न विषयों पर शोध उन्मुख लेख हैं

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