हनुमान जयंती

हनुमान जयंती  

हनुमज्जयंती व्रत पं. ब्रज किशोर ब्रजवासी श्रीहनुमान जी की जयंती तिथि के विषय में दो विचारधााराएं विशेष रूप से प्रचलित हैं- चैत्र शुक्ल पूर्णमासी और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी। हनुमज्जयंती के पावन पर्व पर अंजनी नंदन श्री हनुमान जी की आराधना श्रद्धा, प्रेम और भक्तिपूर्वक करनी चाहिए। व्रत विधि: व्रती को चाहिए कि वह व्रत की पूर्व रात्रि को ब्रह्मचर्य की अवस्था में पृथ्वी पर शयन करे तथा हनुमान जी की कृपा हेतु प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में जागकर श्री राम, जानकी तथा हनुमान जी का स्मरण कर स्नानादि नित्यक्रिया से निवृŸा हो। निष्काम या सकाम, जो भी भावना मन में हो, उसी के अनुरूप संकल्प कर हनुमान जी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर सविधि गणेश गौरी आदि देवताओं के पूजनोपरांत सविधि ‘‘¬ हनुमते नमः’’ मंत्र से षोडशोपचार पूजन करें। श्री हनुमान जी के विग्रह का मंत्रोच्चार करते हुए सिंदूर से शृंगार करना चाहिए क्योंकि हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है। नैवेद्य में विशेष रूप से गुड़, भीगे या भुने चने तथा देशी घी में निर्मित बेसन के लड्डू चढ़ाएं। इस दिन वाल्मीकीय रामायण अथवा तुलसीकृत श्री रामचरित मानस के सुंदरकांड अथवा श्री हनुमान चालीसा के अखंड 108 पाठ का आयोजन करना चाहिए। साथ ही हनुमान जी के मंत्रों का जप, लीला चरित्रों का गुणगान, भजन एवं संकीर्तन करना चाहिए। पूजनोपरांत ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें। हनुमान जी की भक्ति करने वाले को बल, बुद्धि और विद्या सहज में ही प्राप्त हो जाती है। भूत-पिशाचादि भक्त के समीप नहीं आते। हनुमान जी जीवन के सभी क्लश्े ाा ंे का े दरू कर दते े ह।ंै जिस प्रकार भगवान श्री राम जी के कार्यों को पूर्ण किया उसी प्रकार भक्त के कार्यों को भी वायुनंदन पूर्ण करते हैं। हनुमान जी की महिमा का गुणगान वाणी के द्वारा किया ही नहीं जा सकता। इनकी महिमा तो अपरंपार है। इसी महिमा के कारण सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में निरंतर श्री हनुमान जी की आराधना होती रही है और होती रहेगी। हनुमान जी एकादश रुद्र के रूप में संपूर्ण लोकों में वंदनीय हैं। इनके विषय में एक सुंदर कथा इस प्रकार है। श्री रामावतार के समय ब्रह्माजी ने देवताओं को वानरों और भालुओं के रूप में धरा पर प्रकट होकर श्री राम जी की सेवा करने का आदेश दिया था। इस आज्ञा का पालन कर उस समय सभी देवता अपने-अपने अंशों से वानर और भालुओं के रूप में उत्पन्न हुए। इनमें वायु के अंश से स्वयं रुद्रावतार महावीर हनुमान जी ने जन्म लिया था। इनके पिता वानरराज केसरी और माता अंजनीदेवी थीं। जन्म के समय नन्हे शिशु को क्षुधापीड़ित देखकर माता अंजना वन से कंद, मूल, फल आदि लेने चली गईं, उधर सूर्योदय के अरुण बिम्ब को फल समझकर बालक हनुमान ने छलांग लगाई और पवन वेग से सूर्यमंडल के पास जा पहंुचे। उसी समय राहु भी सूर्य को ग्रसने के लिए सूर्य के समीप पहंुचा था। हनुमान जी ने फलप्राप्ति में अवरोध समझकर उसे धक्का दिया तो वह भयभीत होकर इंद्र के पास जा पहंुचा। देवराज इंद्र ने सृष्टि की व्यवस्था में विघ्न समझकर हनुमान पर वज्र का आघात किया, जिससे हनुमान जी की बायीं ओर की ठुड्डी (हनु) टूट गई। अपने प्रिय पुत्र पर वज्र के प्रहार से वायुदेव अत्यंत क्षुब्ध हो गए और उन्होंने अपना संचार बंद कर दिया। वायु ही प्राण का आधार है, वायु के संचरण के अभाव में समस्त प्रजा व्याकुल हो उठी। त्राहि-त्राहि व चीत्कार मच गई। ऐसी भयानक स्थिति में समस्त प्रजा को व्याकुल देख प्रजापति पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं को लेकर वहां गए, जहां वायुदेव अपने मूच्र्छित शिशु हनुमान को लेकर क्षुब्धावस्था में बैठे थे। ब्रह्माजी ने अपने हाथ के स्पर्श से शिशु हनुमान को सचेत कर दिया। उसी समय वायुदेव व शिशु हनुमान की प्रसन्नता हेतु सभी देवताओं ने शिशु हनुमान को अपने अस्त्र-शस्त्रों से अवध्य कर दिया। पितामह ने वरदान देते हुए कहा- ‘मारुत! तुम्हारा यह नन्हा पुत्र शत्रुओं के लिए भयंकर होगा। युद्ध क्षेत्र में इसे कोई पराजित नहीं कर सकेगा। रावण के साथ युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाकर यह श्री राम जी की प्रसन्नता बढ़ाएगा।’ जो कोई भी श्रद्धाभाव से हनुमान जी की सेवा आराधना करता है, उसकी मनोकामनाएं निश्चय ही पूर्ण होती हैं। उसके चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध हो जाते हैं। हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए निम्न श्लोकों का पाठ करना चाहिए। जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः। राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः।। दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्ट कर्मणः। हनूमा´्शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।। न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्। शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः।। अर्दयित्वा पुरीं लंकामभिवाद्य च मैथिलीम्। समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्।। (वा.रा. 5/42/33-36) हनुमान वाहक के पाठ से सभी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। हनुमान जी की भक्ति स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध सभी समान रूप से कर सकते हैं। भक्त की भक्तवत्सलता, श्रद्धा भाव, संबंध, समर्पण ही श्री हनुमान जी की कृपा का मूल का मंत्र है।
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hanumajjayanti vratpan. braj kishor brajvasishrihnuman ji ki jayantitithi ke vishymen do vichardhaaraen vishesh rup seprachlit hain- chaitra shukla purnamasi aurkartik krishn chaturdashi. hanumajjayantike pavan parva par anjni nandan shrihnuman ji ki aradhna shraddha, premaur bhaktipurvak karni chahie.vrat vidhi: vrati ko chahie kivah vrat ki purva ratri ko brahmacharyaki avastha men prithvi par shayan karettha hanuman ji ki kripa hetupratahkal brahmamuhurt men jagakarashri ram, janki tatha hanuman jika smaran kar snanadi nityakriyase nivriÿa ho. nishkam ya sakam,jo bhi bhavna man men ho, usi keanurup sankalp kar hanuman ji kipratima ki pratishtha kar savidhi ganeshgauri adi devtaon ke pujnoprantsvidhi ‘‘¬ hanumte namah’’ mantra seshodshopchar pujan karen. shri hanumanji ke vigrah ka mantrochchar karte huesindur se shringar karna chahie kyonkihnuman ji ko sindur ati priya hai.naivedya men vishesh rup se gur, bhigeya bhune chane tatha deshi ghi men nirmitbesan ke laddu charhaen. is dinvalmikiya ramayan athva tulsikritashri ramchrit manas ke sundrkandathva shri hanuman chalisa ke akhand108 path ka ayojan karna chahie.sath hi hanuman ji ke mantron ka jap,lila charitron ka gungan, bhajan evansankirtan karna chahie.pujnoprant brahman bhojan karakarasvayan prasad grahan karen. hanuman jiki bhakti karne vale ko bal, buddhiaur vidya sahaj men hi prapt ho jatihai. bhut-pishachadi bhakt ke samipnhin ate. hanuman ji jivan kesbhi klashe aa ne ka e daru kar date e h.nai jisaprakar bhagvan shri ram ji ke karyonko purn kiya usi prakar bhakt kekaryon ko bhi vayunandan purn karte hain.hnuman ji ki mahima ka gunganvani ke dvara kiya hi nahin jaskta. inki mahima to apranparhai. isi mahima ke karan satyayug,tretayug, dvapryug aur kaliyug mennirantar shri hanuman ji ki aradhnahoti rahi hai aur hoti rahegi. hanumanji ekadash rudra ke rup men sanpurnalokon men vandniya hain. inke vishay menek sundar katha is prakar hai.shri ramavtar ke samay brahmaji nedevtaon ko vanron aur bhaluon kerup men dhara par prakat hokar shri ramji ki seva karne ka adesh diyatha. is agya ka palan kar usasamay sabhi devta apne-apne anshonse vanar aur bhaluon ke rup menutpann hue.inmen vayu ke ansh se svayan rudravtarmhavir hanuman ji ne janm liyatha. inke pita vanrraj kesriaur mata anjnidevi thin. janmake samay nanhe shishu ko kshudhapiritdekhakar mata anjna van se kand,mul, fal adi lene chali gain, udhrsuryoday ke arun bimb ko falasamajhakar balak hanuman ne chalanglgai aur pavan veg se suryamandlke pas ja pahanuche. usi samay rahubhi surya ko grasne ke lie surya kesmip pahanucha tha.hnuman ji ne falaprapti men avrodhasamajhakar use dhakka diya to vahbhybhit hokar indra ke pas ja pahanucha.devraj indra ne srishti ki vyavasthamen vighn samajhakar hanuman par vajraka aghat kiya, jisse hanumanji ki bayin or ki thuddi (hanu)tut gai. apne priya putra par vajra keprahar se vayudev atyant kshubdh ho gaeaur unhonne apna sanchar band kardiya. vayu hi pran ka adhar hai,vayu ke sancharan ke abhav men samastapraja vyakul ho uthi. trahi-trahiv chitkar mach gai. aisi bhayanakasthiti men samast praja ko vyakuldekh prajapti pitamah brahma sabhidevtaon ko lekar vahan gae, jahanvayudev apne muchrchit shishu hanumanko lekar kshubdhavastha men baithe the.brahmaji ne apne hath ke sparsh seshishu hanuman ko sachet kar diya.usi samay vayudev v shishu hanumanki prasannata hetu sabhi devtaon neshishu hanuman ko apne astra-shastronse avadhya kar diya. pitamah nevrdan dete hue kaha- ‘marut!tumhara yah nanha putra shatruon kelie bhayankar hoga. yuddh kshetra menise koi parajit nahin kar sakega.ravan ke sath yuddh men adbhutprakram dikhakar yah shri ram jiki prasannata barhaega.’jo koi bhi shraddhabhav se hanuman jiki seva aradhna karta hai, uskimnokamnaen nishchay hi purn hotihain. uske charon purusharth (dharm, arth,kam, moksha) siddh ho jate hain.hnuman ji ki kripa prapti ke lienimn shlokon ka path karna chahie.jayatyatiblo ramo lakshmanashch mahablah.raja jayti sugrivo raghvenabhipalitah..daso'han koslendrasya ramasyaklisht karmanah.hnuma´shatrusainyanan nihanta marutatmajah..n ravanasahasran me yuddhe pratiblan bhavet.shilabhishch prahrtah padpaishch sahasrashah..ardayitva purin lankambhivadya ch maithilim.samriddhartho gamishyami mishtan sarvarakshasam..(va.ra. 5/42/33-36)hanuman vahak ke path se sabhi piraendur ho jati hain. hanuman ji kibhakti stri, purush, balak, vriddh sabhisman rup se kar sakte hain.bhakt ki bhaktavatsalata, shraddha bhav,sanbandh, samarpan hi shri hanuman ji kikripa ka mul ka mantra hai.
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चार धाम विशेषांक   अप्रैल 2007

चार धाम विशेषांक के एक अंक में संपूर्ण भारत दर्शन किया जा सकता है.? क्यों प्रसिद्द हैं चारधाम? चारधाम की यात्रा क्यों करनी चाहिए? शक्तिपीठों की शक्ति का रहस्य, शिव धाम एवं द्वादश ज्योतिर्लिंग, राम, कृष्ण, तिरुपति, बालाजी, ज्वालाजी, वैष्णों देवी आदि स्थलों की महिमा

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