ग्र्रह युद्ध में पराजित ग्रह

ग्र्रह युद्ध में पराजित ग्रह  

जब दो ग्रह एक ही भाव में एक दूसरे के बहुत निकट होते हैं व दोनों ग्रहों की डिग्री में 10 से कम का अंतर होता है तो यह अवस्था ग्रह युद्ध की अवस्था कहलाती है। जिस ग्रह की डिग्री कम होती है वह ग्रह युद्ध में जीता हुआ माना जाता है व जिस ग्रह की डिग्री उन दोनों में अधिक हो वह ग्रह युद्ध में पराजित होता है। हमारे प्राचीन ज्योतिष के ग्रंथों में ग्रह युद्ध में पराजित ग्रह को ''खल'' की संज्ञा दी गई है। साथ ही यह भी माना गया कि इस खल ग्रह की दशा - अंतर्दशा में मनुष्यों को अत्यधिक शारीरिक व मानसिक कष्ट होता है। ग्रह युद्ध में केवल दो ग्रहों को शामिल किया जाता है अगर 3 ग्रह डिग्री में अत्यधिक समीप हो तो उन्हें भी दो-दो ग्रह करके ग्रह युद्ध में देखा जाता है। (इसे हम उदाहरण में समझेंगे)। सूर्य ग्रह युद्ध में शामिल नहीं होता क्योंकि सूर्य के साथ अगर कोई ग्रह निकटतम अंशों में हो तो वो अस्त कहलाता है। आइए देखें हमारे कुछ प्राचीन शास्त्रों का क्या मत है- फलदीपिका: मंत्रेश्वर की फलदीपिका के अनुसार खल ग्रह की दशा अत्यंत दुःख देने वाली, विदेश भ्रमण, क्रोधी बनाने वाली व मानसिक संताप देने वाली होती है। जातकाभरणम: जातकाभरणम में कहा गया है कि खल ग्रह की दशा में कष्ट, स्त्री की चिंता, अत्यंत संताप प्राप्ति, परदेश यात्रा, धनहीन और बुद्धिहीन होना कहा गया है। सर्वार्थचिंतामणि: सर्वार्थचिंतामणि के अनुसार खल ग्रह की दशा में कलह, प्रियजनों का वियोग, पिता का वियोग, शत्रुओं व चुगलखोरों द्वारा धन हानि व भूमि हानि तथा अपने खास लोगों द्वारा उसकी निंदा तथा आलोचना होती है। बृहद पराशर होराशास्त्र: खल अवस्था में स्थित ग्रह की दशा में कलह, पिता वियोग, धन नाश व प्रियजनों से निंदा होती है। इस प्रकार हमने देखा कि हमारे सभी प्राचीन ग्रंथों में खल ग्रह की दशा की निंदा की है। इस लेख के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार पराजित ग्रह की दशा खराब परिणाम देती है। हम यहां केवल उन्हीं ग्रहों की बात करेंगे जो ग्रह युद्ध में है। प्रस्तुत कुंभ लग्न की कुंडली के 12वें भाव में 3 ग्रहों की युति है। (शुक्र, मंगल व शनि) इनमें से शुक्र व मंगल ग्रह युद्ध में शामिल है। शुक्र जो कुंडली का चतुर्थेश व नवमेश है मंगल से ग्रह युद्ध में पराजित है। शुक्र जहां नवमेश होकर भाग्य व पिता का प्रतिनिधित्व करता है वहीं चतुर्थेश होकर माता, घर व सुख भाव का स्वामी है। इस ग्रह का ग्रह युद्ध में हारना माता-पिता के भाग्य व सुख की हानि दर्शाता है। मंगल पिता के भाव अर्थात नवम् से द्वितीय व सप्तम घर का मालिक होकर पिता के लिए मारकेश है वहीं चतुर्थ से भी सप्तमेश व द्वादशेश होकर अत्यंत खराब है। जातिका की राहु की महादशा 1996 से शुरु हुई। राहु में शुक्र की अंतर्दशा जातिका के लिए भयंकर परिणाम लेकर आयी। ग्रह युद्ध में हारा शुक्र शनि की युति से भी पीड़ित है। नवांश में भी शुक्र नवम से द्वितीय होकर मारक है व नवम से अष्टम में स्थित है। इस दशा में जातिका के पिता को कैंसर हो गया। जिसके चलते 3 सितंबर 2009 को उनका देहांत हो गया। माता को भी पति की मृत्यु के कारण काफी मानसिक कष्ट हुआ। खुद जातिका जो कि इकलौती संतान है के ऊपर माता की जिम्मेवारी आ गई। उम्र छोटी होने के कारण व अभी पढ़ाई पूरी न होने के कारण इन्होंने अपने घर का आधे से ज्यादा हिस्सा किराये पर देकर अपना गुजारा करने का फैसला लिया। इस प्रकार ग्रह युद्ध में हारे शुक्र की दशा ने जातिका को पिता वियोग, जातिका की माता को कष्ट व घर के सुख से भी काफी हद तक वंचित किया। नोट - 2009 में राहु केतु का गोचर भी इसी पक्ष को पीड़ित कर रहा था। यह कुंडली एक ऐसे जातक की है जिनका पंचमेश ग्रह युद्ध में हारा है। मिथुन लग्न की कुंडली में शुक्र पंचमेश व द्वादशेश होकर तृतीय भाव में षष्टेश व एकादशेश मंगल के साथ ग्रह युद्ध में है व मंगल से ग्रह युद्ध में पराजित है। कुंडली के पंचम भाव में अष्टमेश शनि स्थित है। नवांश में भी पंचम भाव राहु केतु अक्ष में है व पंचमेश अष्टम में है। पंचम भाव पीड़ित है। मंगल पंचम भाव के लिए द्वितीयेश व सप्तमेश होकर प्रबल मारक है। इस जातक की गुरु में शुक्र की अंतर्दशा दिसंबर 2005 से शुरु हुई जो अगस्त 2008 तक चली। इस दशा में जातक के दोनों बच्चों को ”आयरन डिपोजिशन“ की भयंकर बिमारी हुई। जिसका अभी तक पूरे विश्व में कोई इलाज नहीं है। पुत्री जीवन की अंतिम सांसे ले रही है वहीं छोटा पुत्र भी शीघ्रता से मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। अपने बच्चों के इलाज के लिए ये कई देशों के चक्कर भी लगा चुके हैं शुक्र यहां द्वादशेश भी है। अपने सामने बच्चों को इस स्थिति में देखने से ज्यादा कष्ट और क्या हो सकता है। इस प्रकार ग्रह युद्ध में हारे पंचमेश की अंतर्दशा ने जहां इनके बच्चों को मृत्यु तुल्य कष्ट दिया वहीं इन्हें भी व्यर्थ का परदेश गमन व पैसे को हानि दी। इनका खुद का जन्म ”खल ग्रह“ की महादशा में हुआ। इन्हें बचपन में माता का सुख नहीं मिला। पिता ने 3 शादियां की व ये सौतेली मां के व्यवहार से हमेशा परेशान रहे। प्रस्तुत मीन लग्न की कुंडली में पंचम भाव पूरी तरह पीड़ित है। राहु केतु अक्ष में है साथ ही द्वादशेश शनि से दृष्ट है। पंचमेश चंद्र अष्टमेश व तृतीयेश शुक्र से ग्रह युद्ध में हारा है। यहां पर चंद्र बुध के साथ भी ग्रह युद्ध में शामिल है। वह बुध से ग्रह युद्ध में जीता है। चंद्र पर 4 ग्रहों का प्रभाव है नवांश में भी लग्न व पंचम भाव पीड़ित है। जब जातक की सूर्य में चंद्र की अंतर्दशा आयी जो कि अगस्त 2009 से थी तो जातक पूरी तरह पागल हो गया। उसकी पढ़ाई छूट गई। डाॅक्टरों ने उसे पागलखाने भेजने की सलाह दी। चंद्र पंचमेश व मन का कारक होकर पीड़ित है वहीं बुध बुद्धि का कारक होकर पीड़ित है। नवांश में भी चंद्र व बुध दोनों लग्न में राहु केतु अक्ष में है व मंगल से दृष्ट है। इस प्रकार ”खल ग्रह“ की अंतर्दशा ने जातक को मानसिक परेशानी, घर वालों को संताप व पैसों का अत्याधिक खर्चा कराया। अभी जातक उसी हालत में है सूर्य के बाद अगली महादशा इसी पीड़ित चंद्र की होगी। इस प्रकार हमने देखा कि शास्त्रों में कही बातों के अनुरुप खल ग्रह की दशा बहुत ही प्रतिकूल परिणाम देती है। ये निम्न बातों पर निर्भर करते हैं। Û ग्रह युद्ध में हारा ग्रह कुंडली के किन भावों का स्वामी है (उनसे संबंधित खराब परिणाम) Û महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह ग्रह युद्ध में किस ग्रह से हारा है वो कुंडली के किस भाव का स्वामी है। Û ग्रह युद्ध में शामिल ग्रहों का कुंडली में आपसी संबंध कैसा है। Û अन्य ग्रहों की दृष्टि, युति आदि का संबंध। पाप ग्रहों का संबंध - अत्यधिक कष्ट शुभ ग्रहों का संबंध - कष्ट में न्यूनता Û खल ग्रह की दशा उम्र के किस पड़ाव में आती है उसका प्रभाव (देश, काल, पात्र) उदाहरण: युवा लड़के की कुंडली में खल पंचमेश -पागलपन। बड़ी उम्र के व्यक्ति का खल पंचमेश - बच्चों को कष्ट व मानसिक परेशानी। Û ग्रहों के नैसर्गिक कारकत्वों में भी कमी आती है। इन दशाओं व अंतर्दशाओं में अगर गोचर भी प्रतिकूल हो तो अत्यधिक खराब परिणाम दे सकता है।


नव वर्ष विशेषांक  जनवरी 2011

शोध पत्रिका के इस अंक में स्वप्न विश्लेषण, हस्ताक्षर विश्लेषण, ज्योतिष, अंकविज्ञान व वास्तु पर शोध उन्मुख लेख शामिल हैं।

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