नैऋृत्य में दोष-जीवन में असंतोष

नैऋृत्य में दोष-जीवन में असंतोष  

जून माह के स्थापित एक विश्वप्रसिद्ध उद्योगपति ने पंडित जी को वास्तु परीक्षण के लिए आमंत्रित किया। वह अपना कारपोरेट आॅफिस लंदन के एक विशिष्ट व्यावसायिक भवन में स्थानांतरित करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि पहले वह आॅफिस किसी ने लीज पर लिया हुआ था जो कि आगे किराये पर दे रखा था पर वह चला नहीं और काफी समय से बंद पडा था। उन्होंने बताया कि किसी फैंग शुई एक्सपर्ट को बुलाकर उसका वास्तु परीक्षण भी कराया जा चुका था। कुछ सुधार भी किये जैसे कि दक्षिण-पश्चिम में बना द्वार बंद करके उत्तर-पश्चिम में बनवाया गया। परन्तु मालिक को अपेक्षित लाभ नहीं हुआ। अब उनका विचार उस संपŸिा को खरीदकर, वास्तु/ फैंग शुई अनुरूप सुधार करके काम में लेने का था यदि खरीदना उचित हो तो बताएं। वास्तु परीक्षण करने पर पाए गए वास्तु दोष: Û भवन के दक्षिण-पश्चिम भाग में दरवाजा था तथा कोना कटा हुआ था जो कि मालिक को उस जगह से दूर रखता है तथा आर्थिक हानि का कारण होता है। केवल दरवाजा बन्द करने से लाभ नहीं होता क्योंकि ऊर्जा जमीन से लगकर साठ प्रतिशत चलती है। Û उŸार-पूर्व में शौचालय बना था जो कि सभी ओर से विकास में बाधक होता है मानसिक तनाव उत्पन्न करता है तथा उचित निर्णय लेने नहीं देता। Û उŸार में पेन्ट्री थी जो कि वैचारिक मतभेद तथा आय से अधिक खर्च का कारण होती है। Û उŸार में सर्वर रूम भी बना था जो कि धन-हानि एवं आपसी मनमुटाव का कारण होता है। सुझावः Û दक्षिण-पश्चिम के द्वार को बन्द करके दीवार बनाने को कहा तथा कटे हुए भाग को ठीक करने की सलाह दी गई और वहां भारी गमले, अलमारी इत्यादि रखने को कहा। Û उŸार-पूर्व के कोने में बने शौचालय को पेन्ट्री के स्थान पर स्थानांतरित करने को कहा गया। Û उŸार में बनी पेन्ट्री को पूर्व में बनाने को कहा गया। Û सर्वर रुम को उतर-पश्चिम में स्थानांतरित कराया गया तथा मुख्य द्वार को पश्चिम की ओर करने को कहा गया। पं. जी का निर्णय था कि यदि उपरोक्त सुझाव कार्यान्वित हो सके तो चारों तरफ से खुला यह आफिस पूर्व की ओर ढ़लान व पूर्व दिशा में दक्षिण से उत्तर में बहती नदी के कारण भारी लाभ व विकास करवा सकता है।


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