वर्तमान समय में सुशिक्षित युवक-युवतियां अपने कार्यक्षेत्र में तथा इन्टरनेट द्वारा परस्पर आकर्षित होकर माता-पिता की सहमति के बिना भी विवाह कर लेते हैं। विवाह ‘विच्छेद के आंकड़ों का मुख्य कारण है विवाह पूर्व एक दूसरे की पूर्ण जानकारी न होना जिसका एक महत्वपूर्ण कारण है विवाह पूर्व जन्मकुंडलियों का ज्योतिषीय आकलन न करवाना। इस कारण नव दंपत्ति विवाहोत्तर आपसी सामंजस्य, प्रेम, शारीरिक तथा संतान सुख और समृद्धि के सटीक पूर्वानुमान से वंचित रह जाते हैं, और उनका निर्णय गलत साबित होता है। जन्मकुंडली का लग्न भाव जातक स्वयं तथा सप्तम भाव विवाह और पति/पत्नी को दर्शाता है। इन भावों में स्थित राशियां तथा उनके स्वामी परस्पर मित्र नहीं होते तथा बहुत कम कुंडलियों में अच्छा वैवाहिक सुख होता है। वास्तव में हमारे दैवज्ञ मनीषियों द्वारा बताए गये सूत्रों के अनुसार किया गया पूर्ण ज्येातिषीय कुंडली मिलान ही विवाह विच्छेद की संभावना को सीमित करने का एकमात्र सक्षम तथा सुलभ साधन है। वैवाहिक ज्योतिष सूत्र सप्तम भाव में शुभ राशि, शुभ ग्रह की स्थिति, तथा शुभ ग्रह की दृष्टि सुखी वैवाहिक जीवन को दर्शाती है। इसके विपरीत सप्तम भाव में पापी/क्रूर ग्रह (शनि, मंगल, सूर्य, राहु व केतु) की युति या दृष्टि वैवाहिक सुख का नाश दर्शाती है। युवक की कुंडली में शुक्र पत्नी का तथा युवती की कुंडली में बृहस्पति पति का, कारक होता है। अतः सप्तम भाव, सप्तमेश तथा कारक (बृहस्पति व शुक्र) का बलवान तथा दोष रहित होना सुखी वैवाहिक जीवन का द्योतक है। विपरीत स्थिति अशुभकारी होती है। पुरुष की कुंडली में अशुभ ग्रहों से पीड़ित शुक्र तथा स्त्री की कुंडली में अशुभ ग्रहों से पीड़ित बृहस्पति, मंगल तथा चंद्र वैवाहिक जीवन में सामंजस्य का अभाव एवं एक से अधिक यौन संबंधों के लिए प्रेरित करते हैं। बृहज्जातक ग्रंथ (24.1) के अनुसार उपरोक्त सूत्र पुरुष व स्त्री की कुंडली में समान रूप से प्रभावी होते हैं। जातक अलंकार ग्रंथ के अनुसार जब सप्तमेश केंद्र या त्रिकोण में स्वराशि या उच्च राशि, या शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो तो जातक का जल्दी विवाह होता है तथा पत्नी सुशील तथा दीर्घजीवी होती है। पुनश्च, फलदीपिका ग्रंथ (10.7) के अनुसार: भार्यानाशस्त्वशुभ सहितौ वीक्षितौ वार्थकामी तत्र प्राहुस्तवशुभफलदां क्रूरदृष्टिं विशेषात्। एवं पल्या अपि सति मदे चाष्टमे वास्ति दोषः सौम्यैर्दृष्टे सति शुभयुते दंपत्ति भाग्यवन्तौ।। अर्थात् ‘‘द्वितीय व सप्तम भाव में पाप ग्रह हों या यह भाव पाप दृष्ट हों तो पत्नी सुख नष्ट होता है। पापी ग्रह की स्थिति की अपेक्षा क्रूर दृष्टि विश्ेाष अशुभ मानी गई है। स्त्री की कुंडली में भी सप्तम व अष्टम भाव में पाप ग्रह योग व दृष्टि पति-सुख नाशक होती है। परंतु उपरोक्त भावों के शुभयुक्त व दृष्ट होने पर पति-पत्नी भाग्यशाली होते हैं। विवाह विच्छेदकारक ग्रह योग 1. सप्तमेश का लग्न से द्वितीयस्थ (अपनी राशि से), अष्टम, द्वितीयेश का सप्तमस्थ (अपनी राशि से षष्ठ) होना, तथा राहु या केतु का द्वितीयस्थ या सप्तमस्थ होना। 2. सप्तमस्थ राहु पर किसी पापी ग्रह की दृष्टि या दोनों की युति होना। 3. स्त्री की कुंडली के सप्तम भाव में राहु, मंगल और सूर्य में से एक या अधिक ग्रहों का स्थित होना। 4. स्त्री की कुंडली में राहु अथवा शनि से दृष्ट सूर्य का सप्तम भाव में स्थित होना। 5. स्त्री की कुंडली में सूर्य का सप्तम भाव में होना और सप्तमेश का नीचस्थ, शत्रु राशि, अथवा त्रिक (6, 8, 12) भाव में स्थित होना। 6. सप्तमेश और द्वादशेश का परस्पर राशि विनिमय होना तथा सप्तम भाव में मंगल, राहु या शनि का स्थित होना। 7. सप्तम भाव स्थित पाप ग्रह पर षष्ठेश की दृष्टि तथा सप्तमेश का द्वादश भाव (अपनी राशि से षष्ठ) में स्थित होना। 8. सूर्य, शनि, राहु या केतु का सप्तम भाव में होना तथा सप्तमेश और द्वादशेश का त्रिक (6, 8, 12) भाव में होना। केवल गुण मिलान पर आधारित विवाह विच्छेद कुंडलियों का गुण मिलान 26.5/36 है। गण दोष है। पति की कुंडली में कलत्रकारक शुक्र पूर्ण अस्त है, और सप्तम भाव पर केतु तथा शनि की दृष्टि है, परंतु कोई शुभ प्रभाव नहीं है। यद्यपि चंद्रमा पक्षबली है, परंतु ‘केमद्रुम योग’ में है, तथा केतु से दृष्ट है जो जातक का मानसिक सुख शांति नष्ट करता है। पत्नी की कुंडली में लग्नेश चतुर्थ भाव में नीचस्थ है तथा केतु से दृष्ट है जो पारिवारिक सुख नाशक है। शनि और मंगल की सप्तम भाव पर दृष्टि है जिससे इस पर निर्बल बृहस्पति की दृष्टि अर्थहीन हो जाती है। सप्तमेश, षष्ठमेश के साथ, लग्न में है जो पति-पत्नी में विरोध दर्शाता है। नीचस्थ मंगल तथा राहु की निर्बल चतुर्थेश चंद्रमा पर दृष्टि है, जिससे जातिका गुस्सैल व शक्की है। जातिका लग्न, शुक्र व चंद्र तीनों से मंगल दोष से पीड़ित है, जबकि जातक चंद्रमा से मंगली है। अतः बली मंगल दोष का निराकरण नहीं हुआ। दोनों कुंडलियों में पंचम (संतान) भाव दूषित है। इनका विवाह नवंबर 2002 में हुआ। जातिका जनवरी 2003 से ससुराल नहीं गई। दोनों परिवारों में समझौता न हो पाने से जुलाई, 2005 में श्क्पअवतबम इल उनजनंस ंहतममउमदजश् लिया। विच्छेद के 2 साल बाद जातिका ने बिना कुंडली मिलान के विवाह किया जो फिर असफल रहा। इस संदर्भ में एक और कुंडली प्रस्तुत है। जातिका की कुंडली में केंद्र स्थानों में क्रूर ग्रह स्थित हैं। जातिका ने बिना कुंडली मिलाये 2008 में प्रेम विवाह किया, परंतु एक साल के अंदर ही पति से अलग हो गई। सप्तमेश और पति के कारक द्वितीयस्थ बृहस्पति पर राहु की दृष्टि है। सप्तम भाव पर लग्न स्थित मंगल व शनि की दृष्टि है। नीचस्थ चंद्रमा पर शनि की दृष्टि है। चतुर्थ भाव में स्थित केतु पर मंगल की दृष्टि पारिवारिक सुख का अभाव दिखलाती है। जातिका प्रबल मंगल दोष से ग्रस्त है जो उसे उग्र स्वभाव का बनाता है।


शेयर बाजाार और विवाह  अप्रैल 2016

इस बार का रिसर्च जर्नल मुख्य रूप से शेयर बाजार एवं विवाह विषय को समर्पित है। इसमें गणमान्य ज्योतिषियों द्वारा लिखित अनेक आलेखों को शामिल किया गया है। अंग्रेजी में लिखित महत्वपूर्ण आलेख हैं- मंगल-शनि एवं गुरु-राहु युति, विवाह की असफलता एवं ग्रहों की दृष्टियां, अंक ज्योतिष के द्वारा विवाह सामंजस्य का निर्धारण, वित्तीय ज्योतिष आदि। अंग्रेजी के इन महत्वपूर्ण आलेखों के अतिरिक्त हिन्दी के उल्लेखनीय आलेखों में सम्मिलित हैं- तेजी, मंदी वार व मास शकुन के द्वारा विचार, कौन ले सकता है शेयर बाजार से लाभ, कुण्डली मिलान की सार्थकता, चट शादी पट तलाक, विवाह मेलापक का बढ़ता दायरा आदि।

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