जौ जौ इथोपिया और दक्षिण् ाी उŸारी एशिया में 10,000 से भी अधिक वर्षों से उगाया जाता रहा है। उसी समय से जौ का भोजन में और मदिरा बनाने में इस्तेमाल किया जाता रहा है। जौ का पानी दवा के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है। यूनान में जौ खेल कूद करने वालों के लिए एक जरूरी आहार के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। वहां जौ से रोटी भी बनाई जाती थी, क्योंकि उस समय गेहूं बहुत महंगा होता था। रोमन साम्राज्य और चीन में भी इसे अति महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। सोलहवीं शताब्दी में स्पेन मूल के लोगों ने इसे दक्षिणी अमेरिका और अंग्रेजों ने अमेरिका में लाकर उगाना शुरू किया। विश्व में सबसे अधिक जौ उगाने वाले देश कनाडा, अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस तथा स्पेन हैं। पोषण की दृष्टि से जौ में कार्बोज तथा प्रोटीन तो होते ही हैं, नियासिन, खनिज सोलेनियम, तांबा, फास्फोरस, स्वास्थ्यवर्धक रेशे आदि भी समुचित मात्रा में रहते हैं। केवल एक कप पकाया हुआ जौ 54.4ः रेशे, 52ः होलोनियम, 37.5ः अमिनो अम्ल ट्रिप्टोफेन, 32ः तांबा और 26ः फास्फोरस हमें देता है। इसमें पाए जाने वाले रेशे मल का आयतन बढ़ाकर कब्ज से बचाते हैं तथा भोजन में मौजूद दूषित पदार्थों को भी जल्दी आंत से बाहर कर आंत के कैंसर के खतरे को भी कम करते हैं। ये रेशे कब्ज से होने वाली बीमारियों हर्निया तथा बवासीर और नासूर जैसे रोगों से भी बचाते हैं। जौ में पाए जाने वाले रेशे से आंत के जीवाणु प्रोप्योनिक अम्ल का उत्पादन करते हैं। यही प्रोप्योनिक अम्ल जिगर में बनने वाली चर्बी और कोलेस्ट्राॅल का उत्पादन कम करता है। यही नहीं, जौ में पाया जाने वाला बीटा ग्लुकेन (ठपजं ळसनबंद) भी कोलेस्ट्राॅल कम करता है। यह पिŸााम्ल के साथ मिलकर उसे आंत से दोबारा रक्त में नहीं आने देता। इन कारणों से जौ उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी है। जो हृदय रोग, मोटापे, मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। वे रोगी भी, जो आइ.बी.एस. (प्ततपजंइसम ठवूमस ैलदकतवउम) रोग के रहते कभी कब्ज और कभी दस्त जैसे रोगों से परेशान रहते हैं, जौ के नियमित सेवन से लाभ पाते हैं। जौ खाते रहने से पिŸा की थैली में बनने वाली पथरी का खतरा बहुत कम हो जाता है। जौ में समुचित मात्रा में पाया जाने वाला सेलेनियम, मनुष्य के शरीर में पाए जाने वाले एन्टीआॅक्सिडेंट (।दजपवगपकंदज) एन्जाइम ग्लुटाथियाॅन पेराॅक्सीडेंट (ळसनजंजीपवदम च्मतवगपकंदज) में प्रयुक्त किया जाता है ।यही एन्जाइम कै ंसर से बचाव करता है। सेलेनियम विटामिन ई के साथ दूसरी एन्टीआॅक्सिडेंट प्रक्रियाओं में प्रयुक्त किया जाता है। इन्हीं प्रभावों के कारण जौ अन्य रोगों दमा, गठिया, आथ्र्राइटिस (।तजीतपजपे) और हृदय रोग में अति लाभकारी है। जा ै म े ंएक पदार्थ जिस े लिग्ने न(च्संदज स्पहदंद) कहा जाता है प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह लिग्नेन आंत में स्थित कीटाणुओं द्वारा एन्टेरोलेक्टोन नामक पदार्थ में परिवर्तित कर दिया जाता है। यही एन्टेरोलेक्टोन हार्मोन आश्रित छाती कैंसर और ऐसे ही अन्य हार्मोन आश्रित कैंसरों से मानव की रक्षा करता है। जौ से मिलने वाला तांबा रूमेटाॅइड आथ्र्राइटिस नामक रोग के लक्षण कम करने में सहायक होता है। यह खनिज एन्टीआॅक्सिडेंट एन्जाइम सुपरआॅक्साइड डिसम्युटेज ;ैनचमतवगपकम क्पेउनजंेमद्ध के प्रभावी साथी की तरह काम करता है। लाइसिल आॅक्सिडेज नामक एन्जाइम के लिए भी तांबे का भोजन में रहना जरूरी है। इससे जोड़ों और रक्त धमनियों मंे लचीलापन बना रहता है। इसमें पाया जानेवाला फास्फोरस हमारी खरबों कोशिकाओं और नाड़ी कोशिकाओं की दीवार बनाने में काम आता है। इसी से शरीर में ऊर्जा के लिए ए.टी.पी. (।ण्ज्ण्च्ण्) भी बनता है। जौ में पाया जाने वाला नियासिन रक्त में कोलेस्ट्राॅल और खराब प्रोटीन, लाईपोप्रोटीन ए ;स्पचवचतवजमपद ;ंद्धद्ध को कम करने में सहायक होता है। एक कप जौ से प्रतिदिन की जरूरत का 20ः तक नियासिन मिल सकता है। यह नियासिन स्क्स् को आॅक्सीकृत होने से भी बचाता है और प्लेटलेट को इकट्ठा होने से भी रोकता है। मधुमेह रोगियों के लिए जौ: बेल्ट्सविले ;ठमसजेअपससमद्ध में एक अनुसंधान प्रयोगशाला में हुए अनुसंधान के अनुसार रक्त में ग्लूकोज अन्य अनाजों चावल, गेहूं आदि की तुलना में जौ से 59 से 65 प्रतिशत तक कम बढ़ता है। केवल यही नहीं, जौ के भोजन के बाद पैंक्रियाज द्वारा होने वाले इन्सुलिन का स्राव गेहूं, और चावल के मुकाबले 44 से 56 प्रतिशत तक कम होता है। भारतीय मूल के तथा अन्य एशियाई लोगों में ज्यादातर मधुमेह रोगियों के रक्त में ज्यादा इन्सुलिन रहता है। इस दृष्टि से जौ का सेवन, इस रोग (मधुमेह) के दिनानुदिन हो रहे विस्तार को कम करेगा और निकट भविष्य में भारत विश्व की मधुमेह राजधानी बनने से बच जाएगा। पानी में घुलनशील, वसा में घुलनशील और न घुलने वाले सभी एन्टीआॅक्सिडेंट जौ में पाए जाते हैं। ये हैं विटामिन ई, टोकोट्राइओनोल, सेलेनियम, फिनोलिक अम्ल और फायटिक अम्ल। जौ को अंकुरित करके, कच्चा या भाप द्वारा पकाकर, सलाद के साथ या फिर दाल के साथ, या मटर, हरी सब्जियां आदि डालकर पुलाव के तौर पर खाया जा सकता है। इसका मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग तथा जोड़ों के दर्द से ग्रस्त बच्चों, बड़ांे तथा बूढ़ों और गर्भवती महिलाओं सभी के लिए आटे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।



पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  नवेम्बर 2006

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