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लाल-किताब पद्धति में प्रत्येक ग्रह के अपने बनावटी ग्रह माने हैं। ये बनावटी ग्रह कुछ विशेष बातों पर प्रभाव डालतें हैं। निम्न तालिका द्वारा इसे और स्पष्ट किया गया है। उपरोक्त तालिका में बताये गये बनावटी ग्रहों का उपयोग ग्रहों के अशुभ असर को दूर करने के लिए किया जाता है।

उदाहरण : मान लें कि कुंडली के खाना नं. 12 में बुध और शुक्र बैठें हैं चूंकि खाना नं. 12 में बुध अशुभ होकर स्थित है इस कारण से शुक्र के फल भी अशुभ हो रहें हों

अर्थात् पत्नी का स्वास्थ्य ठीक न हो या पति-पत्नी के आपसी संबंध ठीक न चल रहें हों तो शुक्र के बनावटी ग्रहों राहु-केतु में से राहु को, व बुध के बनावटी ग्रहों बृहस्पति+राहु में से राहु को हटा दें

अर्थात् बृहस्पति = बृहस्पति वार, राहु = आकाश का नीला रंग, पक्की शाम का समय, बुध= फिटकरी अर्थात बृहस्पतिवार की शाम को (सूर्य अस्त हो गया हो पर रात न हुई हो) नीले-थोथे का एक टुकड़ा किसी घास वाली जमीन में दबा दें तो बारहवें घर में बैठा शुक्र शुभ फल देने लगेगा। इस तरह बनावटी ग्रहों का उपाय के समय प्रयोग करना बहुत लाभदायक होगा।

उदाहरण देने का कारण केवल यही है कि पाठक अपने विचार के अनुसार बनावटी ग्रहों को ठीक ढंग से उपाय में प्रयोग कर सकें। ग्रहों का आयु पर आम प्रभाव लाल-किताब पद्धति में प्रत्येक ग्रह जातक की आयु विशेष पर अपना विशिष्ट प्रभाव देता है।

आयु विशेष में जिस ग्रह का विशेष प्रभाव हो उस ग्रह की स्थिति पर विशेष ध्यान देने पर फलित कथन और स्पष्ट हो जायेगा। कौन से वर्ष में किस ग्रह का विशेष प्रभाव होगा इसे निम्न तालिका से जाना जा सकता है। मान लें कि किसी जातक को 38 वें वर्ष का फलित देखना है तो वर्षफल के अतिरिक्त उस वर्ष के प्रभावी ग्रह शनि की स्थिति पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।


पुनर्जन्म विशेषांक  सितम्बर 2011

पुनर्जन्म की अवधारणा और उसकी प्राचीनता का इतिहास पुनर्जन्म के बारे में विविध धर्म ग्रंथों के विचार पुनर्जन्म की वास्तविकता व् सिद्धान्त परामामोविज्ञान की भूमिका पुनर्जन्म की पुष्टि करने वाली भारत तथा विदेशों में घटी सत्य घटनाएं पितृदोष की स्थिति एवं पुनर्जन्म, श्रादकर्म तथा पुनर्जन्म का पारस्परिक संबंध

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