अचला एवं सुस्थिरा लक्ष्मी का पूजन

अचला एवं सुस्थिरा लक्ष्मी का पूजन  

मां लक्ष्मी की आराधना के अनेक रूप हैं। धन की कामना करने वाले अनेक अवसरों पर उनकी पूजा और आराधना करते हैं। परंतु दीपावली की रात्रि को मां लक्ष्मी की आराधना का विशेष प्रसंग मिलता है। मां लक्ष्मी की आराधना के कई मंत्र हैं। कुछ लोग मां लक्ष्मी की उपासना उनके बैठे रूप में करने को कहते हैं ताकि मां लक्ष्मी आयेंगी तो स्थिर रूप से आराधना करने वाले के यहां निवास करेंगी। अभी मां लक्ष्मी जहां हंै वहां से क्या वह खिसक-खिसक कर आयेंगी? अगर कहीं दूसरी जगह से आती हैं तो वहां से खड़ा होना भी अपेक्षित है। जरा विचार कीजिए ‘लक्ष्मी’ ने किसके यहां हमेशा निवास किया है। राजा-महराजा इसके उदाहरण हैं। कभी राजा थे और आज खाक हो गये हैं। उनका बड़ा-बड़ा भव्य महल खंडहर हो चुका है। लक्ष्मी का स्वभाव ही चंचला है। ईमानदारी से प्राप्त धन का अपने लिए सदुपयोग एवं दानादि करने से लक्ष्मी की स्थिर प्राप्ति होती है। दीपावली की रात्रि को स्थिर या द्विस्वभाव मुहूर्त में बैठने से पूर्व धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, माला, गंगाजल आदि का प्रबंध कर लें जिससे बार-बार आसन से उठना न पड़े। जल लेकर स्वयं को एवं आसन को पवित्र करें। सामने लाल वस्त्र को लकड़ी के पीठे पर या ताम्रपत्र पर रखकर मां लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्ति को विराजमान करें। हाथ में पुष्प लेकर आवाहन करें और मन में धारण करें कि माता लक्ष्मी का वास मूर्ति में हो गया है। फिर हाथ के पुष्प को मा की मूर्ति के समक्ष रख दें। संभव हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन करें अन्यथा पंचोपचार विधि से स्नान, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। घी का दीपक मां के समक्ष रखें जो रात्रि-पर्यन्त जलता रहे। फिर कमलगट्टे की माला से मां का कोई मंत्र पांच या ग्यारह माला जपें। अंत में मां की आरती करें। रात्रि में उस दीपावली को पवित्रता से रहंे। सच्ची श्रद्धा और विश्वास से किया गया लक्ष्मी-पूजन आपके जीवन को सुख और शांति प्रदान करेगा। प्राप्त समृद्धि का सदुपयोग करें। शुद्ध और पवित्र जीवन जीने का प्रयास करें।



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