सफलता की गारंटी ‘‘शुभ मुहूर्त’’ पाना मुश्किल नहीं है

सफलता की गारंटी ‘‘शुभ मुहूर्त’’ पाना मुश्किल नहीं है  

संजय बुद्धिराजा
व्यूस : 68436 | जून 2011

सफलता की गारंटी ''शुभ मुहूर्त'' पाना मुश्किल नहीं है डॉ. संजय बुद्धिराजा ग्रहों की गति के अनुसार विभिन्न ग्रहों व नक्षत्रों के नये नये योग बनते बिगडते रहते हैं। अच्छे योगों की गणना कर उनका उचित समय पर जीवन में इस्तेमाल करना ही शुभ मुहूर्त पर कार्य संपन्न करना कहलाता है। अशुभ योगों में किया गया कार्य पूर्णतः सिद्ध नहीं होता। मुहूर्त शास्त्र के कुछ सरल नियमों का उल्लेख यहां किया गया है जो विभिन्न कार्यों में सफलता में सहायक हो सकता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र का प्रमुख स्तंभ है - मुहूर्त विचार। दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों के शुरू करने के शुभ व अशुभ समय को मुहूर्त का नाम दिया गया है। यह ज्योतिष में लग्न कुंडली की तरह ही महत्वपूर्ण है जो भाग्य का क्षणिक पल भी कहलाता है।

अच्छा मुहूर्त कार्य की सफलता देकर हमारे भाग्य को भी प्रभावित करता है और यदि अच्छा मुहूर्त हमारा भाग्य नहीं बदल सकता तो कार्य की सफलता के पथ को सुगम तो बना सकता है। भविष्य बदले या न बदले परंतु जीवन के प्रमुख कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किये जायें तो व्यक्ति का जीवन आनंददायक और खुशहाल बन जाता है। मुहूर्त की गणना उन लोगों के लिये भी लाभदायक हैं जो अपना जन्म-विवरण नहीं जानते। ऐसे लोग शुभ मुहूर्त की मदद से अपने प्रत्येक कार्य में सफल होते देखे गये हैं। दिन में 15 व रात के 15 मुहूर्त मिलाकर कुल 30 मुहूर्त होते हैं। शुभ मुहूर्त निकालने के लिये निम्न बातो का ध्यान रखा जाता है - नवग्रह स्थिति, नक्षत्र, वार, तिथि, मल मास, अधिक मास, शकु ्र व गरूु अस्त, अशभ्ु ा योग, भद्रा, शुभ लग्न, शुभ योग, राहू काल। शुभ मुहूर्तों में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है - गुरु-पुष्य। यदि गुरूवार को चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में हो तो इससे पूर्ण सिद्धिदायक योग बन जाता है


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। जब चतुर्दशी, सोमवार को और पूर्णिमा या अमावस्या मंगलवार को हो तो सिद्धि दायक मुहूर्त होता है। दैनिक जीवन के निम्न कार्यों के लिये सरल शुभ मुहूर्त का विचार निम्न प्रकार से किया जाना चाहिये :- 1 बच्चे का नामकरण करना :- इस कार्य के लिये 2, 3, 7, 10, 11 व 13वीं तिथियां शुभ रहती हैं। सोमवार, बुध् ावार, गुरूवार व शुक्रवार के दिन बच्चे का नामकरण किया जाना चाहिये। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा व रेवती हैं।

2. विद्याध्ययन :- बच्चे का किसी विद्यालय में प्रवेश देवशयन तिथियों में नहीं करना चाहिये। शुभ तिथियां 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13 व पूर्णिमा हैं। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार व शुक्रवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुर्नवसु, पुष्य, उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा हैं।

3. सरकारी नौकरी शुरू करना :- शुभ मुहूर्त में सरकारी नौकरी शुरू करने से बाधायें कम आती हैं व आत्मसंतुष्टि अधिक रहती है। इसके लिये नौकरी के पहले दिन का नक्षत्र हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, मृगशिरा, रेवती, चित्रा या अनुराधा होना चाहिये। तिथियों में चतुर्थी, नवमी व चर्तुदशी को छोडकर कोई भी तिथि हो सकती है। सोमवार, बुधवार, गुरूवार या शुक्रवार को सरकारी नौकरी शुरू करनी चाहिये। मुहूर्त कुंडली में गुरू सातवें भाव में हो, शनि छटे भाव में, सूर्य या मंगल तीसरे, दसवें या एकादश भाव में हो तो शुभ रहता है। जन्म राशि से 4, 8 या 12वें भाव के चंद्रमा से बचना चाहिये।

4. नया व्यापार आरम्भ करना :- रिक्ता तिथि में नहीं करना चाहिये। एग्रीमेंट कभी भी रविवार, मंगलवार या शनिवार को नहीं करना चाहिये। तिथि का क्षय भी नहीं होना चाहिये।

5. नयी दुकान खोलना :- सफलतापूर्वक दुकान चलाने के लिये दुकान को शुभ मुहूर्त में खोलना अनिवार्य है। शुभ मुहूर्त हेतु तीनो उतरा नक्षत्र, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती में ही दुकान का उद्घाटन करना चाहिये। चंद्रमा व शुक्र के लग्न में दुकान खोलना शुभ रहता है। 2, 10 व 11वें भाव में शुभ ग्रह होने चाहियें। रिक्ता तिथियों के अतिरिक्त सभी तिथियां दुकान खोलने के लिये श्ुाभ रहती हैं। मंगलवार के अतिरिक्त किसी भी वार को दुकान खोली जा सकती है। जातक की जन्म राशि से 4, 8 या 12वें भाव में चंद्रमा भ्रमण नहीं कर रहा होना चाहिये।


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6. बच्चा गोद लेना :- विवाह के बाद हर पति-पत्नि को संतान प्राप्त करने की इच्छा होती है। यदि किन्हीं कारण् ाों से दंपति को यह सुख नहीं मिल पाता तो वे किसी बच्चे को गोद लेने जैसे पुण्य कार्य की सोचते हैं। ऐसे बच्चे भी दंपति के लिये सुख दायक सिद्ध हो तो इसके लिये बच्चे को शुभ मुहूर्त में ही गोद लेना चाहिये। इसके लिये उस समय का नक्षत्र, वार, तिथि और लग्न देखना चाहिये। पुष्य, अनुराधा व पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में बच्चा गोद लिया जाना चाहिये। तिथियों में प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी व त्रयोदशी तिथि होनी चाहिये। रविवार, मंगलवार, गुरूवार व शुक्रवार के दिन बच्चा गोद लेना शुभ माना गया है। मुहूर्त कुंडली के पांचवे, नवें व दसवें भाव में शुभ ग्रह हों तथा ये भाव बलवान हों तो बच्चा गोद लेने का समय शुभ होता है।

7. वाहन खरीदना :- स्कूटर, कारादि क्रय करने के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 व पूर्ण्ि ामा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार व शुक्रवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनो उतरा, तीनो पूर्वा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती हैं।

8. ऋण लेना :- बुधवार को किसी तरह का ऋण नहीं देना चाहिये। मंगलवार को किसी से ऋण नहीं लेना चाहिये।

9. मुकदमा दायर करना :- न्यायालय से अपने हक में न्याय पाने के लिये मुहूर्त के कुछ नियमों को ध्यान में रखना चाहिये। इसके लिये शुभ नक्षत्र इस प्रकार से हैं - स्वाती, भरणी, आश्लेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, तीनो उत्तरा। इन नक्षत्रों के दिनों में मुकदमा दायर करना चाहिये। तिथियों में प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, त्रयोदशी या पूर्णिमा होनी चाहिये। वार में सोमवार, गुरूवार या शनिवार शुभ रहते हैं।

10. नींव खोदना :- शिलान्यास करने के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 व पूर्णिमा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार व शनिवार हैं। शुभ नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, तीनो उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती हैं।

11. नये गृह प्रवेश :- नवनिर्मित घर में प्रवेश के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 व पूर्णिमा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, शुक्रवार व शनिवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, तीनो उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती हैं। कुछ विशेष मुहूर्त :- उपरोक्त लिखे कार्य-विशेष मुहूर्तों के अतिरिक्त निम्न दो प्रकार के मुहूर्त कुछ अधिक ही विशेष कहलाते हैं जिनमें शुभ नक्षत्र, तिथि या वार नहीं देखा जाता। इन विशेष मुहूर्तों में किये गये कार्य अक्सर सफल ही रहते हैं - 1. अभिजित मुहूर्त - ज्योतिष में अभिजित को 28वां नक्षत्र माना गया है। इसके स्वामी ब्रम्हा व राशि मकर हैं। दिन के अष्टम मुहूर्त को अभिजित मुहूर्त कहते हैं। इसका समय मध्याह्न से 24 मिनट पूर्व तथा मध्याह्न के 24 मिनट बाद तक माना गया है। अतः प्रत्येक दिन स्थानीय समय के लगभग 11:36 से 12:24 तक के समय को विजय या अभिजित मुहूर्त कहते हैं। इसमें किये गये सभी कार्य सफल सिद्ध होते हैं। ऐसे में लग्न शुद्धि भी देखने की आवश्यकता नहीं होती। यह विशेष काल सभी दोषों को नष्ट कर देता है।


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अभिजित नक्षत्र में जिस बालक का जन्म होता है, उसका राजा योग होता है, व्यापार में उसे हमेशा लाभ रहता है। 2. अबूझ मुहूर्त - कुछ तिथियां ऐसी होती हैं जो शुभ मुहूर्त की तरह से काम करती हैं। इस दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त निकलवाये किया जा सकता है। ऐसी कुछ तिथियां हैं - अक्षय तृतीया, नवीन संवत, फुलेरा दूज, दशहरा, राम नवमी, भड्डली नवमी, शीतला अष्टमी, बैशाखी। मुहूर्त शास्त्र के कुछ सरल नियम जो शुभ मुहूर्त को निकलवाने जैसे चक्करों से बचना चाहते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये ही नीचे कुछ सरल से नियम दिये जा रहे हैं जो विभिन्न कार्यो में सफलता दायक सिद्ध हो सकते हैं :- यात्रा के लिये रिक्ता तिथि को यात्रा नहीं करनी चाहिये। 4, 9, 14 रिक्ता तिथियां होती हैं। यदि गोचर में वार स्वामी वक्री हो तो भी यात्रा निषेध है। यदि वक्री ग्रह यात्रा लग्न से केंद्र में हो तो भी यात्रा अशुभ रहती है। विद्याध्ययन मुहूर्त में द्विस्वभाव लग्न होने पर उसकी प्राप्ति, स्थिर लग्न में मूर्खता व चर लग्न में भ्रांति होती है। विवाह के लिये 1,2,3,8,10,11 राशियों में सूर्य का गोचर शुभ रहता है।

विवाह समय की कुंडली में सप्तम स्थान में कोई ग्रह न हो तो शुभ रहता है। विवाह मुहूर्त की कुंडली में चंद्रमा का 8वां व 12वां होना अशुभ रहता है। वक्री गुरू का 28 दिन का समय विवाह हेतु अशुभ होता है। अमावस्या का दिन विवाह के लिये ठीक नहीं है। ज्येष्ठ संतान का ज्येष्ठ मास में विवाह अशुभ होता है। कन्या विवाह के लिये गुरू का गोचर 4,8,12 भाव से अशुभ माना गया है। जन्म राशि, जन्म नक्षत्र का मुहूर्त कन्या के विवाह हेतु शुभ माना गया है। कृष्ण पक्ष की 5वीं व 10वीं तिथियां तथा शुक्लपक्ष की 7वीं व 13वीं तिथियां विवाह हेतु शुभ हैं। सोम, बुध व शुक्रवार विवाह हेतु शुभ रहते हैं। गर्भाधान के लिये बुधवार व शनिवार शुभ नहीं माने जाते क्योंकि ये दोनो दिन नपुंसक माने गये हैं। अपने जन्म नक्षत्र, जन्म तिथि, जन्म माह, ग्रहण दिन, श्राद्ध दिनों में गर्भाधान का फल अशुभ होता है।

गृहारंभ के समय सूर्य, चंद्र, गुरू व शुक्र ग्रह नीच के नहीं होने चाहियें। गृह प्रवेश मिथुन, धनु व मीन का सूर्य होने पर नहीं करना चाहिये। शुक्ल पक्ष में गृहारंभ मंगलकारी व कृष्ण पक्ष में अशुभ रहता है। शनिवार को नींव या गृहारंभ अति उतम रहता है। मंगल व रविवार को निर्माण कार्य शुरू नहीं करना चाहिये तथा नवीन गृह प्रवेश भी नहीं करना चाहिये। निर्माण कार्य का लग्न स्थिर या द्विस्वभाव होना चाहिये। मुकदमा मंगलवार को दायर नहीं करना चाहिये। शनिवार को दायर किया गया मुकदमा लंबा खिांचता है। देव प्रतिष्ठा के लिये चैत्र, फाल्गुन, बैशाख, ज्येष्ठ व माघ मास शुभ होते हैं। श्रावण मास में शिव की, आश्विन में देवी की, मार्गशीर्ष में विष्णु की प्रतिष्ठा करना शुभ है। प्रतिष्ठा में सोम, बुध, गुरू व शुक्रवार शुभ माने गये हैं। जिस देव की जो तिथि हो, उस दिन उस देव की स्थापना शुभ रहती है।


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युग तिथियां - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग जिन तिथियों का े पा्र रभ्ं ा हयु ,े उन तिथिया ें का े शभ्ु ा कार्य नहीं करने चाहियें। ये इस प्रकार से हैं :- सतयुग - कार्तिक शुक्लपक्ष की नवमी त्रेतायुग - बैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया द्वापरयुग - माघ कृष्णपक्ष की अमावस्या कलियुग - श्रावण कृष्णपक्ष की त्रयोदशी उपाय - यदि उचित मुहूर्त या शुभ योग नहीं मिल रहा हो तो निम्न उपाय कर के कार्य किया जा सकता है :- यदि तारीख तय है तो केवल उस दिन की लग्न शुद्धि करके सब अशुभ योगों का नाश किया जा सकता है। शुभ मुहूर्त न होने पर शुभ होरा/ चौघडिया का चयन कर शुभ फल प्राप्त किया जा सकता है। विवाह का उचित मुहूर्त न मिलने पर अभिजित मुहूर्त में विवाह किया जा सकता है। कार्य का प्रारंभ उसी नक्षत्र में किया जाये जिसका स्वामी ग्रह उच्च, स्व या मित्र राशिगत हो। ऐसा समय चुनना चाहिये जब जातक की अंतर्दशा का स्वामी ग्रह महादशा स्वामी से षडाष्टक या द्वादश न हो। गोचरीय चंद्रमा यदि वक्री ग्रह के नक्षत्र से गोचर कर रहे हों तो वक्री ग्रह का दानादि कर लेना चाहिये। शनि-चंद्र की युति होने पर शनि शांति करवा लेनी चाहिये। यदि कोई कार्य चल रहा हो और मध्य में राहू काल आ जाये तो कार्य रोकने की आवश्यकता नहीं है।

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