वास्तुनुकुल है दक्षिण भारत का प्राचीनतम मंदिर कैलाशनाथ

वास्तुनुकुल है दक्षिण भारत का प्राचीनतम मंदिर कैलाशनाथ  

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कैलाशनाथ केवल कांचीपुरम् ही नहीं, समूचे दक्षिण भारत का प्राचीनतम मंदिर है। इसका चूड़ा पिरामिड़ शैली का बना है, जिसके ऊपर अष्टकोणीय शिखर है। सन् 700 ई में महारानी की इच्छापूर्ति के लिए पल्लव राजा राय सिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके सामने का भाग उनके पुत्र महेन्द्र वर्मन तृतीय ने बनवाया। यहां मूल आराध्य देव शिव के चारों ओर सिंहवाहिनी देवी दुर्गा, विष्णु, सहित 58 देवी-देवता है। मूल मंदिर के निकट शिव-पार्वती की नृत्य-प्रतियोगिता के दृश्य भी बहुत मनोरम है। मंदिर में बनी मूर्तियों की नक्काशी की उत्कृष्टता पर निगाहें अटकी रह जाती है। पल्लव राजाओं की विभिन्न युद्ध-गाथाएं भी वैस-रिलीफ शैली में ग्रेनाइट पत्थर से बनी वेदी के ऊपर बेले पत्थरों से बने मंदिर कैलाशनाथ में खुदी हुई है।

दक्षिण भारत का प्राचीनतम् मंदिर होने के बाद भी यह मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में है। इसका रखरखाव भी अच्छे ढंग से किया जा रहा है। यह सब संभव हो पा रहा है मंदिर और उसके परिसर की वास्तुनुकुलाओं के कारण। भारी संख्या में सैलानियों और भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती मंदिर की वास्तुनुकुलताएं इस प्रकार है -

कैलाशानाथ मंदिर परिसर के नैऋत्य कोण में बना है और परिसर की पूर्व एवं उत्तर दिशा पूरी तरह से खुली होकर निर्माण रहित है। इस प्रकार की वास्तु स्थिति वास्तु का एक अनुपम उदाहरण है।

मंदिर का एकमात्र प्रवेश द्वार (गोपुरम्) पूर्व दिशा में वास्तुनुकुल स्थान पर है और मंदिर परिसर में आने के दो द्वार है। एक बड़ा द्वार परिसर के पूर्व आग्नेय में है जो कि, वास्तुनुकुल स्थान पर नहीं होने के कारण हमेशा बंद रहता है। जबकि, दूसरा छोटा द्वार परिसर की दक्षिण दिशा में है जहां से दर्शनार्थी आते-जाते है। यह द्वार वास्तुनुकुल स्थान पर होने के कारण लोगों को मंदिर की ओर आकर्षित करता है। इसलिए यहां दर्शनार्थियों का हमेशा तांता लगा रहता है।

मंदिर परिसर उत्तर दिशा दक्षिण दिशा की तुलना में 2 फीट नीची है और पूर्व दिशा पश्चिम दिशा की तुलना में 1 फीट नीची है और मंदिर के ईशान कोण में बहुत बड़ा तालाब है। वास्तु सिद्धांत के अनुसार जहां भी उत्तर एवं पूर्व दिशा नीची हो और ईशान कोण में भूमिगत पानी का स्रोत हो वह स्थान निश्चित प्रसिद्धि के साथ-साथ स्थायीत्व प्राप्त करता ही है जैसे, तिरूप्पती बालाजी तिरूपति, गुरूवयुर मंदिर केरला, वक्कडनाथ मंदिर, त्रिशुर, पद्नाभ स्वामी मंदिर त्रिरूअन्नतपुरम् इत्यादि।

कैलाशनाथ मंदिर परिसर की उत्तर एवं पूर्व दिशाओं की नीचाई एवं खुलापन तथा दक्षिण एवं पश्चिम दिशा की ऊंचाई एवं नैऋत्य कोण के भारी होने से आई वास्तुनुकुलताओं के कारण ही यह मंदिर सदियोें से प्रसिद्ध होने के साथ-साथ जड़त्व प्राप्त किए हुए है।



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