ज्योतिष एवं स्वास्थ्य

ज्योतिष एवं स्वास्थ्य  

राजेंद्र कुमार मिश्र
व्यूस : 4073 | अकतूबर 2004

स्वास्थ्य शब्द मूलतः सु $ अवस्था से व्युत्पत्तित है: अर्थात् शरीर के अंग-अवयवों की सु (सुंदर, या शुभ) अवस्था। ज्योतिष के व्याख्याता ऋषियों एवं आकाशीय पिंड वेत्ताओं ने एकमत से ”यत् ब्रह्मांडे तत् पिंडे“ की अवधारणा को प्रमाणित किया है। व्यावहारिक रूप से भी मानव शरीर में ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव स्पष्टतः अनुभूत होता है। जन्मकालिक ग्रह स्थिति शरीर के समस्त तंत्रों को आजीवन प्रभावित करती है। जिस प्रकार प्रत्येक राशि के तीन द्रेष्काण ;10°़10°़10°त्र30°द्ध होते हैं, उसी प्रकार शरीर के समस्त बाह्य अंगों में तीन-तीन वर्गीकरण परिलक्षित होते हैं। इन्हीं द्रेष्काणों में कारक, या अकारक ग्रहों की स्थिति शरीर के संबंधित अंगों एवं उनके कार्यों को सबल, या निर्बल करती है।

प्रत्येक ग्रह अपने स्थितिक क्षेत्र में, गुण धर्म के अनुसार, अवशिष्ट पदार्थ (कार्बन) अवश्य छोड़ता है। तभी तो ‘शरीरम् व्याधि मंदिरम्’ के अनुसार कोई भी शरीर पूर्ण स्वस्थ नहीं होता। विशेष ग्रहों की विशेष भावों में स्थिति रोग उत्पत्ति का कारण बनती है। ग्रह इस प्रकार की मनोवृत्ति जातक को देते हैं कि वह स्वयं रोग मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।


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कुछ अनुभूत उदाहरण निम्न है:

Û जिन जातकों के गुरु छठे, या आठवें भाव में स्थित होते हैं, उनमें पर्याप्त मात्रा में जल पीने की अनिच्छा रहती है और यही मनोवृत्ति उन्हें मूत्र रोग तक पहुंचा देती है।

Û दूसरे, छठे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में स्थित शुक्र जातक को मिष्ठान्न प्रेमी बना कर मधुमेह प्रदान कर देता है।

Û चैथे, छठे, सातवें एवं दशम् भाव में स्थित राहु जातक को अनियमित एवं असंतुलित भोजनचर्या के लिए प्रेरित करते हैं और उदर रोग देते हैं।

Û चतुर्थ एवं दशम भाव में स्थित शनि जातक को भोजन से रूठने की प्रवृत्ति देते हैं और जातक वायु विकार से संक्रमित हो जाता है।

Û द्वितीय एवं अष्टम भाव में स्थित सूर्य, जातक को उग्र वाणी एवं मानसिक उद्वेग दे कर, रक्तचाप उत्पन्न करता है।

Û द्वादशस्थ सूर्य, जातक को अनुपयुक्त शरीर संचालन, शयन करने की अवैज्ञानिक शारीरिक अवस्था रखने की प्रेरणा दे कर, मेरुदंड विकार एवं आधा शीशी रोग (माइग्रेन) देता है।

Û अष्टमस्थ चंद्र, अनियमित स्नानादि दिनचर्या दे कर, जातक के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता नष्ट करते हैं और कफ, जुकाम, नजला (इसनोफीलिया) एलर्जी इत्यादि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। किंतु कुछ विशेष ग्रह स्थितियां, बिना किसी उत्प्रेरक प्रवृत्ति के भी, रोगकारक सिद्ध होती हैं।

Û धन स्थान पर पाप ग्रह हो , धनाधीश पापयुत त्रिक स्थान में, नीच, या अस्तगत हो, तो जातक को मुख का रोग अवश्य होता है।

Û यदि धनाधीश एवं गुरु दोनों निर्बल स्थिति में हों, साथ ही दोनों त्रिक भाव में हों, तो वाक् दोष (वाणी आदि में) होता है।

Û इसी प्रकार द्वितीयेश एवं शुक्र ये दोनों, निर्बल हो कर, 6, 8, 12 भावों में हों, तो जातक नेत्र रोगी होता है।

Û द्वितीयेश राहु के साथ 6वें भाव में हो, या राहु जिस राशि में हो उसके स्वामी से युक्त हो, तो दंत रोग होता है।

Û 6 वें गुरु 9, 12 में चंद्र हो तो कुष्ठ रोग होता है। अष्टमेश अपने नवांश में राहुयुत 12 में, 4 में हो, तो प्रमेह एवं गठिया रोग होते हैं। सूर्य से चंद्र 12 हों, तो जल भय होता है। शनि-चंद्र छठें हों, तो रक्त कुष्ठ होता है।

षष्ठेश स्वगृही, या लग्न में, अथवा अष्टम में हों, तो शरीर में व्रण अधिक हुआ करते हैं। इसी प्रकार पिता आदि के भावों के स्वामी भी षष्ठेश के साथ हों, तो उन्हें भी व्रण से क्लेश होता है। विशेष: यदि लग्नेश षष्ठेश सूर्य से युक्त हो, तो ज्वर से पीड़ा होती है, चंद्र युक्त हो, तो जलज गंड रोग, भौम युक्त हो, तो गुलन रोग, युद्ध से, या शस्त्र व्रण से, या विस्फोट आदि से पीड़ा होगी। बुध युक्त हो, तो मानसिक रोग, शुक्र हो, तो स्त्री द्वारा रोगोत्पत्ति, शनियुत हो, तो वायु विकार, राहु-केतु के साथ हो, तो सर्प-चोर-अग्नि एवं वायु विकार से क्लेश होता है, गुरु युत हो, तो जातक निरोगी होता है।

कुछ विशेष रोग एवं उनके कारक ग्रह एवं ज्योतिषीय उपचार इस प्रकार हैं: सूर्य रोग: ज्वर, त्वचा रोग, रक्तचाप, पित्त विकार उपचार: सूर्याध एवं आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ चंद्र रोग: कफ, शीत, नेत्र रेाग, श्वास उपचार: चंद्रार्ध, पलाश समिधा का हवन, चाक्षुसी पाठ बुध रोग: आधासीसी, श्वास, दमा, त्वचा रोग, मानसिक विकार उपचार: अपामार्ग (लटजीरा) एवं घी का हवन गुरु रोग: पित्त प्रकोप, गुर्दे की निर्बलता, मूत्र रोग, कर्ण रोग उपचार: पीले कपड़े में हल्दी की साबुत गांठ, पूजा कर के, दाहिनी भुजा में बांध लें। शुक्र रोग: गुप्त रोग, मधुमेह, कफ विकार उपचार: गूलर की लकड़ी एवं घी का समिधा हवन शनि रोग: वात विकार, जोड़ों का दर्द, पित्ताशय की पथरी उपचार: शमी की चार अंगुल की लकड़ी, काले कपड़े में, शनिवार की रात में, बांह में बांध लें। शनिवार को प्रातः शमी की 10 पत्तियां दूध में भिगो दें। 1 घटी (24 मिनट) बाद पत्ती छान कर दूध पी लें। जोड़ों के दर्द में शनिवार की रात में, ‘¬ शनैश्चराय नमः’ कहते हुए, शमी पत्र एवं शतावरी भिगो कर रख दें। दूसरे दिन प्रातः वही तेल पीड़ित स्थान पर लगाएं एवं पुनः ‘¬ शनैश्चराय नमः’ का जप करें। मंगल नीच राशि: निम्न रक्तचाप, रक्ताल्पता (एनीमिया) मंगल-राहुयुत: कुष्ठ, एक्जिमा मंगल-राहुयुत कर्क राशिस्थ: हृदय रोग मंगल उच्च राशि: उच्च रक्तचाप, स्थूलता उपचार: खैर की लकड़ी एवं घी का समिधा हवन। प्राणायाम मंगलवार को नया लाल वस्त्र ओढ़ कर, बहते जल, नदी, या समुद्र के किनारे बैठ कर, ‘¬ मंगलाय नमः’का 108 या 1008 जप करें। जप के बाद लाल वस्त्र जल में प्रवाहित कर दें।


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राहु रोग: उदर रोग उपचार: गंगा जल में जल एवं दूर्वा डाल कर, प्रातः, सर्वप्रथम पिएं। जल पीते समय ‘¬ राहवे नमः’ का छह बार जप करें। केतु रोग: राजक्षमा, मूर्छा (मिर्गी) उपचार: गंगा जल में जड़सहित कुश डुबो कर पिएं और ‘¬ केतवे नमः’ का छः बार जप करें।

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स्वास्थ्य और उपाय विशेषांक  अकतूबर 2004


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