इच्छित संतान

इच्छित संतान  

शुभेष शर्मन
व्यूस : 4814 | जनवरी 2012

यदि हम चाहते हैं कि हमें ऐसी संतान प्राप्त हो जो सामाजिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक अथवा सांस्कारिक व्यथा को पूरा करें अथवा जो हमें दैविक और भौतिक दोनों सुखों को दे, इसके लिए हमें हमारी संतान पद्धति के षोडष संस्कार की व्यवस्था को अपनाना पड़ेगा, वे हैं - गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म। जब इच्छित संतान का विचार हम करते हैं तो प्रश्न उठता है लड़का या लड़की ? क्या यह प्रश्न इतना ही है? मैं सोचता हूं कि इच्छित संतान के प्रश्न पर कुछ लोग ऐसा सोचते होंगे पर सभी नहीं, कुछ की सोच होगी। प्राध्यापक, प्रोफेसर या ये सब तो हो ही।


अपनी कुंडली में राजयोगों की जानकारी पाएं बृहत कुंडली रिपोर्ट में


उसके साथ में धर्म को मानने वाला, शराब नहीं पीने वाला संस्कारवान, आज्ञाकारी, कुल परंपरा को निभानेवाला आदि-आदि तो इनमें से कुछ चीजें जैसे लड़का या लड़की का प्रश्न हल किया जा सकता है। गर्भधारण के लिए शास्त्र के ज्योतिषीय सिद्धांत, नक्षत्र, तिथि, मास, पक्ष, कृष्ण या शुक्ल पक्ष आदि के संयोग से दूसरे तीसरे (तीन माह से पूर्व) औषधि प्रयोग द्वारा आयुर्वेद सिद्धांत से पुंसवन प्राप्त कर सकते हैं, पर जैसा कि पूर्व में लिखा है कि डाॅक्टर, अध्यापक अथवा सांस्कृतिक संतान के मूल में माता-पिता के संस्कार, उनका खान-पान उनका आचरण उनकी जीवन शैली और गर्भ के समय माता-पिता का व्यवहार, परिवार का वातावरण ये सब चीजें मूल कारण हैं।

यदि हम चाहते हैं कि हमें ऐसी संतान प्राप्त हो जो सामाजिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक अथवा सांस्कारिक व्यथा को पूरा करें अथवा जो हमें दैविक और भौतिक दोनों सुखों को दे, इसके लिए हमें हमारी सनातन पद्धति के षोडश संस्कार की व्यवस्था को अपनाना पड़ेगा, वे हैं - गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म आदि। इसके धारण के समय शुभ योग, तिथि, वार, नक्षत्र आदि के साथ भगवान विष्णु, सूर्य, प्रजापति, सरस्वती, अश्विनी कुमार नाम के देवताओं से प्रार्थना स्वरूप मांगा जाता है किसी भी रूप का रूपवान होना उत्तम स्वास्थ्य के बिना संभव नहीं होता, ये वीर्य के अंडज और शुक्राणुओं के स्वरूप स्थापन की प्रार्थना है।

आज के संदर्भ में जब भी पति पत्नी संतान प्राप्ति के लिए सरल साधना अवश्य करें, छः मास पूर्व भोजन की स्वच्छता, वायुमंडल की शुद्धि का ध्यान रखकर ऐच्छिक संतान का लाभ उठा सकते हैं। आयुर्वेद में सभी रसों का मूल तत्व अन्न को माना हैं अन्न से ही वीर्य रज बनने का नियम है। अन्न रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थी, मज्जा और वीर्य एवं रज का निर्माण होता है। इसके बनने की क्रिया में सामान्यतः एक से तीन मास का समय लगता है। इसका मूल कारण व्यक्ति की प्राकृतिक व्यवस्था होती है।

वात, पित्त, कफ की भिन्नता इसमें स्वच्छ भोजन, स्वच्छ वायु, जल, व्यायाम, स्वस्थ निंद्रा तथा स्वच्छ विचारधारा मानसिकता का विशेष महत्व है। गर्भाधान से पूर्व दंपत्ति का तन, मन, बुद्धि, विवेक सात्विक, संयम स्वस्थ वायु श्रद्धा भावना एवं ईश्वर अनुकंपा के प्रति आस्था ही स्वस्थ और पूर्णायु संतान के लिए वर प्रदाता है। आज के भौतिकवादी युग में भोग की प्रधानता अनाश्रुति संतान दे रही है। इसलिए गर्भपात, भूणहत्या, आचरणहीनता आदि जो कुछ प्राप्त हो रहा है, उससे अन्य श्रुति जनसंख्या ही संसार को मिल रही है, संयोग से ही महापुराण संसार में आ रहे हैं किसी प्राचीन क्रियात्मता से नहीं। गर्भाधान का मुख्य उद्देश्य है अच्छी संतान की प्राप्ति। जो सामान्य क्रिया की तुलना में योजनाबद्ध पूर्वक संस्कारपूर्वक करने से ज्यादा अच्छी रहती है।

प्रत्येक कार्य को विचारपूर्वक करने से सकारात्मक विचार की सोच पर भावी संतान जन्म लेती है। माता-पिता दोनों की सम्मिलित योजना बनाकर पूरी तैयारी करने से संस्कार संपन्न संतान प्राप्त होती है। पहले से सोच करके भावी संतान को रोगी शरीर, दुर्बल मन और कमजोर बुद्धि देने से बचा सकते हैं। गर्भाधान संस्कार की शुभता से अच्छी संतान प्राप्ति के लिए पूर्ण तैयारी करने के लिए संस्कार क्रिया की प्रधानता है। पुंसवन: गर्भाधान निश्चित हो जाने पर यह संस्कार किया जाता है। संस्कार का मूल उद्देश्य माता को मानसिक रूप से अच्छी संतान की उत्पत्ति के लिए प्रेरित करना है। गर्भाधान के पश्चात् माता की भूमिका ही महत्वपूर्ण होती है।

अन्य परिजन गर्भवती माता का तन-मन स्वस्थ रहे इस बात का प्रयास करते हैं। पुरुषत्व प्राप्ति के लिए किया जाने वाला कार्य गर्भ धारण के पश्चात् पुत्र संतान ही हो ऐसी कामना के साथ पुंसवन क्रिया का महत्व है। जिसमें समय के साथ औषधि तथा मंत्रों के प्रयोग द्वारा दूसरे तीसरे महीने में गर्भवती को नवीन वस्त्र धारण कराकर गायत्री पूजा के पश्चात् रात्री में वट वृक्ष मूल की जटा उसकी नाक में ऋचाओं के साथ सिंचित किया जाता है। पुत्र प्राप्ति हेतु सुलक्षण, वटवृक्ष, सहदेवी, विश्वदेवी की दिव्य औषधियों का मिश्रण तीन बूंद नाक में डालने का विधान है। गर्भवती उसे बाहर ना थूके इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस क्रिया के पश्चात् गर्भवती को अच्छा साहित्य, अच्छी वार्ता, अच्छी चर्चा, पारिवारिक जनों से स्नेह अथवा जिस प्रकार की संतान की अभिरुचि हो इस पर ध्यान देना चाहिए। पति-पत्नी को गोद में जल भरा कलश, नारियल रखकर पत्नी के उदर की दाहिने हाथ की अनामिका से छूते हुए कहे कि हमारे संतान गुणवान बलवान और आचारवान उत्पन्न होगी।

तत्पश्चात् कलश को देवता के सामने रख दें। जिस जिस पात्र में खीर है उस पर एक पुष्प रख कर स्त्री-पुरुष को दे दें और कहे - ”ये खीर पृथ्वी पर उत्पन्न सर्व लक्षण जीव पालक को माता के दुग्ध एवं वनस्पति का योग है। इसको ग्रहण करने से श्रेष्ठ संतान उत्पन्न करोगी।“ खीर की आहुति देकर परिवारजन आशीर्वाद दें, गर्भवती स्त्री खीर को ग्रहण करें। पुंसवन संस्कार का मुख्य उद्देश्य पुत्र संतान की प्राप्ति ही है। सीमंतोयन: यह संस्कार पुंसवन का विस्तार है। दूर देश की यात्रा न करें। समुद्र की यात्रा न करें। पति पत्नी संयम से रहें।

नाखून एवं केश ना काटें, वाद विवाद से दूर रहें, क्रोध तथा आलस्य का त्याग करें। प्राचीन काल में संस्कार के दिन घी की आहुतियां पति-पत्नी के बालों को कच्चे फलों की सम संख्या शाही के तीन रंग वाले कांटे, कुशा के तीन गुच्छों से ऊपर उठाकर - ‘ऊँ भूर्भुवः स्वः’ का दस बार उच्चारण किया जाता था। यज्ञावशिष्ट घृत की मिली हुई खिचड़ी गर्भवती को खिलायी जाती थी। इस संस्कार का समय चैथे या पांचवें मास में जब चंद्रमा किसी पुरुष नक्षत्र में होता था तब किया जाता है। गाय बछड़े की सेवा और स्पर्श भी करना श्रेष्ठ पुत्र दाता होता है।


अपनी कुंडली में राजयोगों की जानकारी पाएं बृहत कुंडली रिपोर्ट में


जातकर्म संस्कार: कुछ शास्त्रों के अनुसार यह कर्म बालक के जन्म से पूर्व किया जाता था कि आज इसे नामकरण संस्कार से जाना जाता या किया जाता है। बालक के जन्मोपरांत यह संस्कार दस दिन की शुद्धि के साथ किया जाता है। बालक के जन्म समय नक्षत्र के अनुरूप उसका श्रेष्ठ नामकरण करने का विधान है। उस समय गोमूत्र गंगाजल पान के साथ हवन ग्रह शान्त्यर्थ किया जाता है।

सूर्य पूजन के साथ जल कूप कुल देवताओं का समारोह पूर्वक पूजन किया जाता है। बालक की दीर्घायु के लिए नांदी श्राद्ध पितृपूजन एवं दान मान किया जाता है। ब्राह्मण भोजन के साथ प्रीति भोजन का आयोजन उत्सव मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पुत्र जन्मोत्सव का यही समृद्धिशाली प्रयोजन है। अशीश और मंत्र शक्ति से दैनिक दिनचर्या में पुत्रार्थियों को माता-पिता वृद्धजनों तथा सिद्धपुरुषों एवं देवताओं का चरण वंदन करके आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। भगवान के वंश वर्णित ‘श्री हरिवंश पुराण’ का विधिवत श्रवण-पठन भी पुत्र प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय है।

श्री संतान गोपाल स्तोत्र एवं श्री देवकी सुत गोविन्द, वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्णं, त्वामहं शरणं गतः।। का सवा लाख मंत्र जाप भी श्रेष्ठ पुत्र का दाता है। श्री दुर्गा सप्तशती एवं अन्य मंत्र भी शास्त्रों में अनुष्ठानपूर्वक किये जाने पर श्रेष्ठ एवं इच्छित संतान प्रदान करते हैं।

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

योजनापूर्वक इच्छित संतान विशेषांक  जनवरी 2012

futuresamachar-magazine

शोध पत्रिका के इस अंक में अधिकतर आलेख योजनापूर्वक इच्छित संतान प्राप्ति के महत्वपूर्ण विषय पर हैं।

सब्सक्राइब


.