WhatsApp और ज्योतिष

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व्यूस : 1764 | फ़रवरी 2017

छत्तीस प्रकार के नरक हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है, इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों मंे 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्निपुराण, कठोपनिषद् जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-

1. महावीचि 2. कुंभीपाक 3. रौरव 4. मंजूष 5. अप्रतिष्ठ 6. विलेपक 7. महाप्रभ 8. जयंती 9. शाल्मलि 10. महारौरव 11. तामिस्र 12. महातामिस्र 13. असिपत्रवन 14. करम्भ बालुका 15. काकोल 16. कुड्मल 17. महाभीम 18. महावट 19. तिलपाक 20. तैलपाक 21. वज्रकपाट 22. निरुच्छवास 23. अंगारोपच्य 24. महापायी 25. महाज्वाल 26. क्रकच 27. गुड़पाक 28. क्षुरधार 29. अम्बरीष 30. वज्रकुठार 31. परिताप 32. काल सूत्र 33. कश्मल 34. उग्रगंध 35. दुर्धर 36. वज्रमहापीड उन कामों के बारे में जानिए, जिन्हें करने से नर्क जाना पड़ता है।


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1. जो कुएं, तालाब, प्याऊ और मार्ग आदि को हानि पहुंचाते हैं, ऐसे दुष्ट नरक में जाते हैं।

2. आत्महत्या, स्त्री हत्या, गर्भ हत्या, ब्रह्म हत्या, गौ हत्या करने वाला, झूठी गवाही देने वाला, कन्या को बेचने वाला, झूठ बोलने वाले लोग नर्क में जाते हैं।

3. जो लोग भगवान शिव और विष्णु का चिंतन नहीं करते, उन्हें नर्क में जाना पड़ता है।

4. ऋषियों, सतियों और वेदों की निंदा करने वाले लोग सदैव नर्क में ही जाते हैं।

5. भूख-प्यास से थक कर जो भिखारी किसी के घर जाता हो और उसे वहां से अपमानित होकर लौटना पड़े, तो ऐसे याचक (मांगने वाला) का अपमान करने वाले नरक में जाते हैं।

6. जो शराब, मांस, गीत, जुआ आदि व्यसनों में ही दिन-रात लगे रहते हैं, ऐसे लोगों को नरक ही प्राप्त होता है।

7. जो अपनी पत्नी, बच्चों, नौकरों और मेहमानों को खिलाए बिना ही खाते हैं और पितरों तथा देवताओं की पूजा छोड़ देते हैं, ऐसे लोग नरक में जाते हैं।

8. दूसरों का धन हड़पने वाले, दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले तथा दूसरों से ईष्र्या करने वाले नरक में जाते हैं।

9. जो अनाथ, गरीब, रोगी, बूढ़े और दयनीय लोगों पर दया नहीं करता, वह नरक में जाता है।

10. ब्राह्मण होकर शराब व मांस का सेवन करने वाले, ब्राह्मण की जीविका नष्ट करने वाले और दूसरों की संपत्ति का हरण करने वाले, ये सभी नर्क को ही प्राप्त होते हैं।

इन नरकों से बचने का एक मात्र हरि नाम ही सहारा है। हरि नाम जितना ले सकते हैं लें प्रेम से बोलिए ‘‘जय श्री हरि’’ ‘‘जय श्री कृष्ण‘’ Deepak Singla 9464322222 स्वर्ग और नर्क में अंतर एक संत पुरुष और ईश्वर के मध्य एक दिन बातचीत हो रही थी। संत ने ईश्वर से पूछा - “भगवन, मैं जानना चाहता हूँ कि स्वर्ग और नर्क कैसे दीखते हैं।” ईश्वर संत को दो दरवाजों तक लेकर गए। उन्होंने संत को पहला दरवाजा खोलकर दिखाया।

वहां एक बहुत बड़े कमरे के भीतर बीचों-बीच एक बड़ी टेबल रखी हुई थी। टेबल पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पकवान रखे हुए थे जिन्हें देखकर संत का मन भी उन्हें चखने के लिए लालायित हो उठा। लेकिन संत ने यह देखा कि वहां खाने के लिए बैठे लोग बहुत दुबले-पतले और बीमार लग रहे थे। ऐसा लग रहा था कि उन्होंने कई दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया था। उन सभी ने हाथों में बहुत बड़े-बड़े कांटे-चम्मच पकड़े हुए थे।

उन काँटों-चम्मचों के हैंडल २-२ फीट लंबे थे। इतने लंबे चम्मचों से खाना खाना बहुत कठिन था। संत को उनके दुर्भाग्य पर तरस आया।

ईश्वर ने संत से कहा - “आपने नर्क देख लिया।” फिर वे एक दूसरे कमरे में गए। यह कमरा भी पहले वाले कमरे जैसा ही था। वैसी ही टेबल पर उसी तरह के पकवान रखे हुए थे। वहां बैठे लोगों के हाथों में भी उतने ही बड़े कांटे-चम्मच थे लेकिन वे सभी खुश लग रहे थे और हँसी-मजाक कर रहे थे। वे सभी बहुत स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे।

संत ने ईश्वर से कहा - “भगवन, मैं कुछ समझा नहीं।” ईश्वर ने कहा - “सीधी सी बात है, स्वर्ग में सभी लोग बड़े-बड़े चम्मचों से एक दूसरे को खाना खिला देते हैं। दूसरी ओर, नर्क में लालची और लोभी लोग हैं जो सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं। Vimal Mishra 9918824372 लाल किताब के अनुसार भवन सुख मकान का सम्बन्ध स्थायी निवास से है जहाँ परिवार के लोग प्रेमपूर्वक रहते हैं। मकान का सम्बन्ध ज्योतिष में शनि से है। कंुडली में शनि सबसे धीमा ग्रह है। शनैः शनैः चले वो शनैश्चरः।

कुंडली मंे शनि उच्च या अच्छी स्थिति में हो तो व्यक्ति बार-बार मकान बनाता है। यदि नीच का हो तो मकान गिरने का खतरा रहता है। इसके साथ अन्य योग भी देखे जाते हैं। शनि की स्थिति अनुसार जानें- मकान कब बनाना चाहिए और कब नहीं?


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1- लग्न भाव में शनि होने पर जातक मकान बनाता है तो विपत्ति आती है। यदि सप्तम दशम भाव मंे कोई ग्रह न हो तो शुभ रहता है।

2-यहाँ शुभ फल दायक रहेगा उत्तम फल देगा।

3-कुत्ते पालने चाहिए तब मकान बनायें।

4-शनि के शत्रु चंद्र का घर है। अपने बनाये मकान ससुराल व ननिहाल के लिए अशुभ होते हंै।

5-सूर्य का घर होता है। मकान बनाने पर पुत्र संतति पर संकट आता है। यदि पुत्र बनवाये तो बहुत फलीभूत होता है। आवश्यक हो तो 48 वर्ष बाद बनवायें।

6-बुध का घर होता है। शनि का शत्रु है अतः मकान 36 वर्ष बाद बनवायंे। इससे पूर्व बनवाने पर कन्या पर संकट आता है।

7-बने बनाये मकान मिलेंगे। अपना घर बनायें तो पुराने घर की चैखट लगायंे।

8- मंगल का घर है। मकान बनाते ही सिर पर खतरा मंडराने लगेगा।

9- स्त्री के गर्भ में बच्चा हो तो मकान बनाना आरंभ कर दें।

10- जब तक जातक मकान खरीद न ले, बनवाये न तब बहुत उन्नति करता है। शनि किसी कारण से मन्दा या कमजोर हो तो मकान अधूरा रह जाता है।

11- 55वर्ष बाद मकान बनायें। दक्षिण-मुखी मकान हितकर नहीं होगा, गंभीर बीमारी देगा।

12-मकान बिना इच्छा के बनेंगे, जातक के लिय शुभ रहेंगे।

Alok Singh 9058823053 मंगलदोष वैदिक ज्योतिष में मंगल को लग्न, द्वितीय(दक्षिण भारत के विद्वान के अनुसार), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में दोष पूर्ण माना जाता है। इन भावों में उपस्थित मंगल वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारक कहा गया है। जन्म कुण्डली में इन पांचों भावों में मंगल के साथ जितने क्रूर ग्रह बैठे हों मंगल उतना ही दोषपूर्ण होता है जैसे दो क्रूर होने पर दोगुना, चार हों तो चार गुणा।

मंगल का पाप प्रभाव अलग-अलग तरीके से पांचों भाव में दृष्टिगत होता है जैसे - लग्न भाव में मंगल लग्न भाव से व्यक्ति का शरीर, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व का विचार किया जाता है। लग्न भाव में मंगल होने से व्यक्ति उग्र एवं क्रोधी होता है। यह मंगल हठी और आक्रामक भी बनाता है। इस भाव में उपस्थित मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख स्थान पर होने से गृहस्थ सुख में कमी आती है। सप्तम दृष्टि जीवन साथी के स्थान पर होने से पति-पत्नी में विरोधाभास एवं दूरी बनी रहती है।


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अष्टम भाव पर मंगल की पूर्ण दृष्टि जीवनसाथी के लिए संकट कारक होता है। द्वितीय भाव में मंगल भावदीपिका नामक ग्रंथ में द्वितीय भावस्थ मंगल को भी मंगली दोष से पीड़ित बताया गया है। यह भाव कुटुम्ब और धन का स्थान होता है। यह मंगल परिवार और सगे संबंधियों से विरोध पैदा करता है। परिवार में तनाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां लाता है। इस भाव का मंगल पंचम भाव, अष्टम भाव एवं नवम भाव को देखता है। मंगल की इन भावों में दृष्टि से संतान पक्ष पर विपरीत प्रभाव होता है।

भाग्य का फल मंदा होता है। चतुर्थ भाव में मंगल चतुर्थ स्थान में बैठा मंगल सप्तम, दशम एवं एकादश भाव को देखता है। यह मंगल स्थायी सम्पत्ति देता है परंतु गृहस्थ जीवन को कष्टमय बना देता है। मंगल की दृष्टि जीवनसाथी के गृह में होने से वैचारिक मतभेद बना रहता है। मतभेद एवं आपसी प्रेम का अभाव होने के कारण जीवनसाथी के सुख में कमी लाता है। मंगली दोष के कारण पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ जाती हैं और दोष निवारण नहीं होने पर अलगाव भी हो सकता है।

यह मंगल जीवनसाथी को संकट में नहीं डालता है। सप्तम भाव में मंगल सप्तम भाव जीवनसाथी का घर होता है। इस भाव में बैठा मंगल वैवाहिक जीवन के लिए सर्वाधिक दोषपूर्ण माना जाता है। इस भाव में मंगली दोष होने से जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बना रहता है। जीवनसाथी उग्र एवं क्रोधी स्वभाव का होता है। यह मंगल लग्न स्थान, धन स्थान एवं कर्म स्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है। मंगल की दृष्टि के कारण आर्थिक संकट, व्यवसाय एवं रोजगार में हानि एवं दुर्घटना की संभावना बनती है। यह मंगल चारित्रिक दोष उत्पन्न करता है एवं विवाहेत्तर संबंध भी बनाता है।

संतान के संदर्भ में भी यह कष्टकारी होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव के कारण पति-पत्नी में दूरियां बढ़ती हंै जिसके कारण रिश्ते बिखरने लगते हैं। जन्मांग में अगर मंगल इस भाव में मंगली दोष से पीड़ित है तो इसका उपचार कर लेना चाहिए। अष्टम भाव में मंगल अष्टम स्थान दुख, कष्ट, संकट एवं आयु का घर होता है। इस भाव में मंगल वैवाहिक जीवन के सुख को निगल लेता है। अष्टमस्थ मंगल मानसिक पीड़ा एवं कष्ट प्रदान करने वाला होता है, जीवनसाथी के सुख में बाधक होता है। धन भाव में इसकी दृष्टि होने से धन की हानि और आर्थिक कष्ट होता है।

रोग के कारण दाम्पत्य सुख का अभाव होता है। ज्योतिष विधान के अनुसार इस भाव में बैठा अमंगलकारी मंगल शुभ ग्रहों को भी शुभत्व देने से रोकता है। इस भाव में मंगल अगर वृष, कन्या अथवा मकर राशि का होता है तो इसकी अशुभता में कुछ कमी आती है। मकर राशि का मंगल होने से यह संतान सम्बन्धी कष्ट देता है। द्वादश भाव में मंगल कुंडली का द्वादश भाव शैय्या सुख, भोग, निद्रा, यात्रा और व्यय का स्थान होता है। इस भाव में मंगल की उपस्थिति से मंगली दोष लगता है।


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इस दोष के कारण पति-पत्नी के संबंध में प्रेम व सामंजस्य का अभाव होता है। धन की कमी के कारण पारिवारिक जीवन में परेशानियां आती हैं। व्यक्ति में काम की भावना प्रबल रहती है। अगर ग्रहों का शुभ प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति में चारित्रिक दोष भी हो सकता है। भावावेश में आकर जीवनसाथी को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। इनमें गुप्त रोग व रक्त संबंधी दोष की भी संभावना रहती है। Mukesh Kumar 9334913911 अष्टकवर्ग अष्टक वर्ग का अर्थ है किसी ग्रह को 8 स्रोतों से प्राप्त होने वाला बल। सभी जानते हैं कि जन्म राशि से 3, 6, 11 भाव में शनि का गोचर अक्सर शुभ फल देता है।

इसलिये मन में जिज्ञासा होती है कि जन्म लग्न अथवा जन्म सूर्य से शनि का त्रिषडाय गोचर क्या शुभ फल देगा या नहीं? महर्षि पराशर ने इस प्रश्न पर गंभीरता से चिंतन और शोध किया। उन्हांेने पाया कि जन्म लग्न सिर्फ चंद्रमा या सूर्य से ही प्रभावित नहीं है अपितु स्वयं अपनी जन्मकालीन स्थिति से भी प्रभावित है। उन्होंने शनि की गोचर स्थिति का अध्ययन लग्न व जन्म के सूर्य सहित बाकी 6 ग्रहांे से भी किया (राहु-केतु को छोडकर)। इस तरह किसी एक ग्रह को 8 स्रोतांे से मिलने वाली शुभाशुभता का विवरण देने वाली तालिका अष्टकवर्ग कहलाती है।

इस तरह सबसे पहले हम सूर्य के अष्टकवर्ग की बात करेंगे। यदि जन्मकालीन सूर्य अपने अष्टक वर्ग में 8 बिंदु पाये तो जातक लोक विख्यात, धनी-मानी, राजाध्यक्ष या उच्च अधिकारी होता है। सूर्य यदि अपने अष्टक वर्ग में 7 बिंदु पाए तो जातक धनी-मानी, प्रतिष्ठित उच्चाधिकारी और राजा सरीखा का होता है। सूर्य को अपने ही अष्टक वर्ग में 6 बिंदु मिलने पर जातक को स्वास्थ्य, सम्मान, सौभाग्य, सुयश, धन और वाहन सुख की प्राप्ति होती है। सूर्य को यदि अष्टकवर्ग में 5 बिंदु प्राप्त हो तो जातक विद्वजनों का संगी रह कर सुख पाता है।

उसे संतान, सुंदर वस्त्र, शिक्षा में सफलता पाने का सुख मिलता है। सूर्य अपने अष्टक वर्ग में 4 बिंदु पाए तो सामान्य सुख मिलता है। वह सुख-दुःख में समान होता है। सूर्य को अपने अष्टक वर्ग में यदि 3 बिंदु मिले तो जातक अधिक भ्रमण करने से थकान, क्लेश व कष्ट पाता है। अपने अष्टक वर्ग में मात्र दो बिंदु पाने वाला सूर्य राज कोप, राज दंड, धन हानि व मतिभ्रम से कष्ट व क्लेश देता है। अष्टक वर्ग में 1 या 0 बिंदु पाने वाला सूर्य जातक को रोग, शोक तथा व्यर्थ भ्रमण से क्लेश देता है। Payal Jha 9408478516 चंद्र ग्रह चन्द्रमा माँ का सूचक है और मन का कारक है।


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शास्त्र कहता है कि ‘चंद्रमा मनसो जातः’। इसकी कर्क राशि है। ’चंद्र के अशुभ होने का कारण’ सम्मानजनक स्त्रियों को कष्ट देने जैसे माता, नानी, दादी, सास एवं इनके पद के समान वाली स्त्रियों को कष्ट देने एवं किसी से द्वेषपूर्वक ली वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है। कुंडली में चंद्र अशुभ होने पर माता को किसी भी प्रकार का कष्ट या स्वास्थ्य को खतरा होता है, दूध देने वाले पशु की मृत्यु हो जाती है, स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है। घर में पानी की कमी आ जाती है या नलकूप, कुएँ आदि सूख जाते हैं।

मानसिक तनाव, मन में घबराहट, तरह-तरह की शंका मन में आती है और मन में अनिश्चित भय व शंका रहती है और सर्दी बनी रहती है। व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार बार-बार आते रहते हैं। ये करें उपाय- सोमवार का व्रत करना, माता की सेवा करना, शिव की आराधना करना, मोती धारण करना, दो मोती या दो चाँदी का टुकड़ा लेकर एक टुकड़ा पानी में बहा दें तथा दूसरे को अपने पास रखें। सोमवार को सफेद वस्तु जैसे दही, चीनी, चावल, सफेद वस्त्र, 1 जोड़ा जनेऊ, दक्षिणा के साथ दान करना और ऊँ सोम सोमाय नमः का 108 बार नित्य जाप करना श्रेयस्कर होता है।

’चन्द्रमा का पारिवारिक उपाय’ यदि कुंडली में चंद्रमा अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो परिवार में चन्द्रमा अर्थात माता या माता तुल्य लोगों का आदर सत्कार करना चाहिये। उनकी सेवा करनी चाहिये। उन्हें प्रसन्न रखना चाहिये, यदि परिवार में माता या माता तुल्य लोग आपसे संतुष्ट रहेंगे तो चन्द्रमा के अशुभ प्रभाव से आप बचे रहेंगे। चंद्र दान (दिन-सोमवार) चंद्र ग्रह की शांति हेतु मोती, चाँदी, चावल, चीनी, जल से भरा हुआ कलश, सफेद कपड़ा, दही, शंख, सफेद फूल, आदि का दान करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

Abha Kiran 9412485221 -------------- ’मानव कितने भी प्रयत्न कर ले’ ’अंधेरे में छाया’ ’बुढ़ापे में काया’ ’और’ ’अंत समय में माया’ ’किसी का साथ नहीं देती’ -------------- कर्म करो तो फल मिलता है, आज नहीं तो कल मिलता है। जितना गहरा अधिक हो कुआँ, उतना मीठा जल मिलता है। जीवन के हर कठिन प्रश्न का जीवन से ही हल मिलता है। ‘‘सदा मुस्कुराते रहिये’’ Harwansh Malik 9610739148

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शनि विशेषांक  फ़रवरी 2017

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सर्वश्रेष्ठ ज्योतिषीय पत्रिका फ्यूचर समाचार का शनि विशेषांक पाठकों में विशेष लोकप्रिय है। गत् 1 दशक में इसकी विशेष मांग बढ़ी है। इसलिए इसे हर वर्ष प्रकाशित किया जाता है। इस विशेषांक में शनि ग्रह से सम्बन्धित अनेक ज्ञानवर्धक लेख शामिल किए गये हैं, जिनमें शनि एक परिचय, संन्यास का कारक शनि, शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव, सूर्य शनि युति, शुक्र-शनि का विचित्र सम्बन्ध तथा रोग का कारक शनि इत्यादि लेख समाविष्ट हैं। इसके अतिरिक्त सामयिक चर्चा के अन्तर्गत पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों पर ज्योतिषीय परिचर्चा विशेष आकर्षण का केन्द्र है। इस विशेषांक में विराट कोहली व अनुष्का के प्रेम सम्बन्ध तथा वैलेंटाइन डे के अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों में शामिल किए गये लेख व पंचांग से सम्बन्धित जानकारी भी पाठकों के लिए उपायोगी रहेगी।

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