वर्षफल किस समय या स्थान से बनाएं

वर्षफल किस समय या स्थान से बनाएं  

आभा बंसल
व्यूस : 455 | मई 2004

नीलकंठ ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ज्योतिष में वर्षफल बनाने और उससे फल कहने का सिद्धांत दिया। आजकल कंप्यूटर के द्वारा गणना आसान होने के कारण यह पद्धति काफी प्रचलित हो गयी है। इस पद्धति में वर्ष के प्रवेश की तारीख और समय निकाल कर उस समय की कुंडली बना ली जाती है। एक ग्रह को जो वर्ष लग्न पर सबसे अधिक असर रखता है, वर्षेश्वर का शीर्षक दे दिया जाता है।

मुंथा एक छाया ग्रह है, जो प्रतिवर्ष एक राशि चलती है, वर्ष कुंडली में इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इसमें एक वर्ष अवधि की मुद्दा एवं पात्यंश दशा की गणना भी की जाती है। इस पद्धति में ग्रहों की दृष्टियां जन्मकुंडली जैसी नहीं होती हैं। योगों में इसमें केवल शोडष योग ही प्रचलित है। घटना घटने का समय निकालने के लिए सहम की गणना दी गयी है। ग्रहों के आपसी भेद देखने के लिए त्रिपताकी चक्र बनाया जाता है।

इस पद्धति में गणना काफी विस्तार से की गयी है। लेकिन इसकी मूल गणना - वर्ष प्रवेश गणना में कई मतभेद है। वर्षमान क्या लेना चाहिए? प्राचीन पद्धति में यह मान 1 वर्ष 15 घटी 31 पल 30 विपल अर्थात 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट 36 सेकेंड, या 365.25875 लिया गया है। सायन सूर्य 365.242193 दिन अर्थात 365 दिन, 5 घंटे 48 मिनट 45.5 सेकेंड में अपना चक्कर पूरा कर लेता है और निरयण सूर्य को 365.256363 दिन अर्थात् 365 दिन 6 घंटे 9 मिनट 9.8 सेकेंड लगते हैं। हमें कौन सा वर्षमान लेना चाहिए?

दूसरी समस्या स्थान की आती है। क्या हमें जन्म स्थान को ही वर्ष स्थान के रूप में लेना चाहिए या व्यक्ति विशेष वर्ष प्रवेश के समय जिस स्थान पर हो, उस स्थान को लेना चाहिए?

इन समस्याओं के समाधान से पहले वर्ष की परिभाषा को समझना आवश्यक है। पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा कर उसी स्थान पर आ जाने को वर्ष कहते हैं। ज्योतिष में हम पृथ्वी की स्थिति तारों के सापेक्ष में देखते हैं, न कि सूर्य के सापेक्ष में। अतः हमें निरयण वर्षमान को ही मानना होगा। अतः वर्ष के लिए वर्षमान 365.256363 दिन होता है। इतने समय में निरयण सूर्य लगभग उन्ही अंश, कला, विकला पर आ जाता है।


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यदि कला-विकला में कुछ फर्क आता है, तो वह केवल पृथ्वी के उद्वेलित होने के कारण। यह वर्षमान का उपयोग लाहिरी ने अपने पंचांग में भी किया है। रमन ने भी इसी वर्षमान को लिया है। लेकिन इसको पूर्ण रूप में ठीक से न ले कर कुछ सेकेंड की गलती कर दी है, जिसके कारण 100 वर्ष में कुछ मिनटों का अंतर आ जाता है।

अब प्रश्न है वर्ष स्थान का। यह सुनने में बहुत तार्किक लगता है कि वर्ष प्रवेश के समय व्यक्ति जहां पर हो, वही वर्ष स्थान लेना चाहिए। लेकिन वर्ष प्रवेश गणना एक खगोलीय गणना है और यह हमें खगाोल शास्त्र के आधार पर ही करनी चाहिए। वर्ष की परिभाषा के अनुसार यह वह मान है, जिसमें पृथ्वी घूम कर उसी स्थान पर आ जाती है। वर्षमान के लिए स्थान का महत्व नहीं है, क्योंकि पृथ्वी को एक बिंदु मान कर यह गणना की जा रही है।

वर्ष पूर्ण पूरी पृथ्वी के लिए, जन्म स्थान किसी के भी लिए, उसी समय होता है। जैसे मान लीजिए किसी बच्चे का जन्म 1 जनवरी 1999 को 5.30 बजे प्रातः दिल्ली में हुआ। अन्य शिशुओं का जन्म उसी समय कलकत्ता में, लंदन में 0 बजे प्रातः एवं न्यूयाॅर्क में 31 दिसंबर 1998 सायं 7 बजे हुआ। इन चारों समय में अंतर नजर आते हैं। लेकिन पृथ्वी पर यह एक ही क्षण होगा। उन सबका अगले वर्ष का प्रवेश भी एक ही क्षण पर होगा; अर्थात 1 जनवरी 2000 को 11 घंटे 39 मिनट 9.8 सेकेंड पर भारत में (दिल्ली और कलकत्ता में) प्रातः 6 घंटे 9 मिनट 9.8 सेकेंड पर लंदन में एवं प्रातः 1 घंटे 9 मिनट 9.8 सेकेंड पर न्यूयाॅर्क में। ये तीनों समय भी पृथ्वी पर एक ही क्षण को दर्शाते हैं।

यदि दिल्ली वाला बच्चा न्यूयाॅर्क चला जाता है, तो उसका वर्ष प्रवेश 11 घंटे 39 मिनट 9.8 सेकेंड न्यूयाॅर्क में मानना ठीक नहीं होगा, क्योंकि यह समय केवल भारत का वर्ष प्रवेश दर्शा रहा है। साथ ही वर्ष प्रवेश समय 1 घंटा 9 मिनट 9.8 सेकेंड न्यूयाॅर्क समय पर न्यूयाॅर्क में हुआ, ऐसा मानना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि केवल उसका जन्म ही उसकी जीवन एवं उसकी जन्मपत्री का द्योतक है। ताजक पद्धति के रचयिता नीलकंठ ने यह कहीं नहीं माना, या संकेत दिया है कि व्यक्ति के वर्ष प्रवेश के स्थान को वर्ष स्थान मानना चाहिए। कोई भी पद्धति तभी तक ठीक फल देती है, जब तक उस पद्धति में माने गये नियम पूरे हों। यदि किसी नियम को बदल दिया जाए, तो पद्धति का पूर्ण फल देना आवश्यक नहीं।


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अतः हमें वर्ष प्रवेश केवल निरयण वर्ष प्रवेश लेना चाहिए एवं स्थान जन्म स्थान ही लेना चाहिए। वर्ष प्रवेश के समय-स्थान परिवर्तन करा कर, वर्ष लग्न बदल कर, वर्ष का भविष्य बदल देना वैज्ञानिक नहीं है।

वर्ष स्थान को बदलते समय एक भूल आम तौर पर देखी गयी है। वर्ष प्रवेश समय को, बिना मानक समय के संशोधन किये, ले लेते हैं। जैसे उपर्युक्त उदाहरण में दिल्ली में जन्मा बालक यदि प्रथम जन्म दिवस पर न्यूयाॅर्क में है, तो उसका वर्ष प्रवेश समय और स्थान क्रमशः 1 जनवरी 2000, 11 घंटे 39 मिनट 9.8 सेकेंड न्यूयाॅर्क समय तथा न्यूयाॅर्क ले लेते हैं।

इस प्रकार यह गणना समय एवं स्थान दोनों में ही गलत हो जाती है। लेकिन दोनों गलतियों के बावजूद वर्षपत्री करीब-करीब सही आ जाती है, क्योंकि विश्व में एक ही स्थानीय समय पर लग्न करीब-करीब एक ही होता है, जैसे हर स्थान पर मध्याह्न में सूर्य दशम भाव में ही होता है। चंद्रमा के अंशों में कुछ फर्क अवश्य आता है, जो दो स्थानों के मानक समय में अंतर के बराबर होता है। जो ज्योतिर्विद यह महसूस करते हैं कि हमारे वर्ष स्थान को बदलकर फलित ठीक आ रहे हैं, वे भूल से वही वर्ष पत्री देख रहे होते हैं जो वर्ष स्थान बिना बदले आती है।


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