सभी के प्यारे-दुलारे अटल जी

सभी के प्यारे-दुलारे अटल जी  

आभा बंसल
व्यूस : 146 | फ़रवरी 2020

केवल ऊंचाई ही काफी नहीं होती, सबसे अलग-थलग परिवेश से पृथक। जरूरी यह है कि ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो।

ये उत्कृष्ट विचार हमारे माननीय आत्मीय कवि, लेखक, पूर्व पत्रकार व भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के हैं। यही नहीं उनकी अनेक कविताएं हैं जिन्हें पढ़ कर हम आत्ममंथन में डूब जाते हैं। अपने अनेक वक्तव्यों में मंैने अटल जी की इस कविता को पढ़ा है और हर बार उसके भावार्थ दिल को छूते हैं।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊंचाई ही काफी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा,
जो जितना ऊंचा,
उतना ही एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ही ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरूरी यह है कि
ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य
ठंूठ-सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊंचे कद के इंसानों की जरूरत है।

इतने ऊंचे कि आसमान को छू लें,
नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें,
किंतु इतने ऊंचे भी नहीं,
कि पांव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रूखाई कभी मत देना।

अटल जी की भाषाशैली, भाषण और उनका व्यक्तित्व सभी को बहुत प्रभावित करता है और मैं स्वयं भी उनकी बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूं। उनसे मिलने का मौका तो नहीं मिला परंतु 1975-1980 के बीच कई बार उनकी सभाओं में उपस्थित रहने का गौरव प्राप्त हुआ जहां घंटांे तक सब उनके भाषण का इंतजार करते थे। उनके भाषण सीधे दिल में उतर जाते थे और लोग चल देते थे उनके दिखाए रास्ते पर। आज की पीढ़ी के नौजवान युवक युवती उनके ओजपूर्ण भाषण सुनकर अपने अंदर विशेष ऊर्जा अनुभव करते हैं और अपनी वक्तव्य शैली में सुधार लाते हैं।


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उन्हें शब्दों का जादूगर माना गया है। विरोधी भी उनकी वाक्पटुता और तर्कों के कायल रहे हैं। 1994 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का पक्ष रखने वाले प्रतिनिधिमंडल की नुमाइंदगी अटल जी को सौंपी थी। किसी सरकार के विपक्षी नेता पर इस हद तक भरोसे को पूरी दुनिया में आश्चर्य से देखा गया था।

अपने-पराए का भेद किए बिना सच कहने का साहस उनमें था। इसमें वे तनिक भी नहीं हिचकिचाते थे। गुजरात दंगों के समय सी. एम. रहे नरेंद्र मोदी के लिए उनका बयान ‘राज धर्म का पालन करना चाहिए’ आज भी मील का पत्थर बना हुआ है।

1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण उनकी इस सोच का परिचायक था कि भारत दुनिया में किसी भी ताकत के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है। उन्होंने एक मौके पर कहा भी था कि भारत मजबूत होगा, तभी आगे जा सकता है। कोई उसे बेवजह तंग करने की जुर्रत न करे, उसके लिए हमें ऐसा कर दिखाना जरूरी है। दुनिया के कई देशों में विरोध के बावजूद उन्होंने यह कदम उठाया।

अटल जी के दिल में एक राजनेता से कहीं ज्यादा एक कवि बसता था। उनकी कविताओं का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा है। हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं; गीत नया गाता हूं ... उनकी लोकप्रिय कविताओं में से एक है। संसद से लेकर जनसभाओं तक में वे अक्सर कविता पाठ के मूड में आ जाते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद को किसी खास विचारधारा के पहरेदार के रूप में स्थापित नहीं होने दिया। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में कश्मीर से लेकर पाकिस्तान तक से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था।

अलगाववादियों से बातचीत के फैसले पर सवाल उठा कि क्या बातचीत संविधान के दायरे में होगी? तो उनका जवाब था, इंसानियत के दायरे में होगी।

रूक-रूककर लंबे अंतराल लेकर बोलना और ‘ये अच्छी बात नहीं है’ ... एक लाइन से विरोधियों को चुप कर देना ये अटल जी की सशक्त वाक्शैली के दो बड़े हथियार थे। समर्थकों से लेकर विरोधियों तक का मन मोह लेने के लिए उनके पास तीसरा बड़ा हथियार था कविताओं का। करिश्माई अंदाज में वे जब आंखें बंद कर कविता पढ़ते-पढ़ते हाथ लहराते थे, लोग मंत्रमुग्ध से उन्हें देखते रहते थे। देश में अगर किसी को सुनने के लिए लोग बेकाबू होते थे तो वे अटल जी ही थे। नेहरू-गांधी परिवार के बाद वाजपेयी ही थे, जिन्होंने अपने बूते न केवल सरकार बनाई, बल्कि संभाली और चलाई।


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वैसे संसद से बाहर जनसभाओं में तो उनके भाषणों का आकर्षण दीवानगी की हद तक था। गर्मी हो या सर्दी, दिन हो या रात, धूप हो या बरसात, लोग उनका भाषण सुनने के लिए कई-कई घंटे बड़ी बेताबी से इंतजार करते थे। यही कारण है कि किसी भी जनसभा में अनेक वक्ता होने पर उनका भाषण अंत में ही रखा जाता था ताकि श्रोता उनका भाषण सुनने के लालच में अपनी जगह से हिलें ही नहीं। वाजपेयी जी जिस तरह अपने भाषण से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लेते थे, वह बड़े-बड़े फिल्मी सितारों के लिए भी ईष्र्या का विषय था।

आज भी यूट्यूब पर यदि किसी राजनेता के भाषण सर्वाधिक सुने जाते हैं तो उसका नाम है - अटल बिहारी वाजपेयी।

वाजपेयी जी की उपलब्धियां

Û 1992 - पद्म विभूषण
Û 1993 - डी लिट् (कानपुर विवि)
Û 1994 - लोकमान्य तिलक पुरस्कार
Û 1994 - श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार
Û 1994 - पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार
Û 2014 - दिसंबर में भारत रत्न से सम्मानित
Û 2015 - डी. लिट् (एम. पी. भोज मुक्त विवि)
Û 2015 - फ्रेंड्स आॅफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवाॅर्ड, (बांग्लादेश सरकार द्वारा)

अटल जी का राजनीतिक सफर

Û 1951: भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव के तौर पर काम संभाला।
Û 1957: जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वे चुनाव हार गए। मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से जीते।
Û 1962: दोबारा बलरामपुर से भारतीय जनसंघ के टिकट पर खड़े हुए, हार गए।
Û 1962-1967: राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
Û 1967: वाजपेयी फिर बलरामपुर से चुनाव में उतरे। कांग्रेस प्रत्याशी को 32 हजार वोटों से हराया। तब यह बहुत बड़ा अंतर था।
Û 1968: जनसंघ के अध्यक्ष बने। आपातकाल के खिलाफ जेपी के आंदोलन में भी खासे सक्रिय रहे। 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे। आपातकाल में जेल भी गए।
Û 1977: मोरारजी देसाई की जनता सरकार में विदेश मंत्री बने।
Û 1977: संयुक्त राष्ट्र में अटल जी ने 4 अक्तूबर, 1977 को हिंदी में संबोधन दिया। इससे पहले किसी भी भारतीय ने मातृभाषा का प्रयोग इस मंच पर नहीं किया था।
Û 1980: बीजेपी का गठन हुआ। वाजपेयी इसके संस्थापक अध्यक्ष बने। 1986 तक अध्यक्ष रहे। इस दौरान बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे।
Û 1984: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में बीजेपी को केवल दो सीटें मिली। ग्वालियर से अटल जी, युवा माधव राव सिंधिया से हार गए।
Û 1986: राज्यसभा सदस्य रहे।
Û 1990: सोमनाथ से शुरू हुई आडवाणी की ‘राम रथ यात्रा’ लालू ने बिहार में रोक ली। बीजेपी ने वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
Û 1991-96: केंद्र में नरसिम्हा राव सरकार के कार्यकाल में बीजेपी ने मंदिर मुद्दे पर राजनीतिक बढ़त हासिल की।
Û 1996: संसदीय चुनावों में वाजपेयी को पी. एम. कैंडिडेट घोषित कर चुनाव लड़ा गया। सरकार बनी पर 13 दिन में गिर गई।
Û 1998: बीजेपी फिर सत्ता में आई और वाजपेयी पीएम बने। 13 महीने बाद एआईएडीएमके ने समर्थन वापस लिया और सरकार गिर गई।
Û 1998: टीडीपी ने बाहर से समर्थन किया और केंद्र में फिर बीजेपी की सरकार आई। अटल ही पीएम थे। 11 मई 1998 को पोखरण -2 परमाणु परीक्षण किया।
Û 1999: कंधार हाइजैक के बावजूद वाजपेयी 22 अन्य लोगों के साथ दिल्ली-लाहौर बस से पाकिस्तान गए।
Û 2001: पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की। पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को आगरा शिखर सम्मेलन के लिए बुलाया। सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया।
Û 2002: गुजरात दंगों के बाद अटल जी ने गुजरात के तत्कालीन सी.एम. नरेंद्र मोदी के लिए एक ही लाइन कही, ‘राजधर्म का पालन करना चाहिए।’
Û 2003: तीसरी बार मई 2003 में वाजपेयी ने फिर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश की। दोनों देशों के रिश्ते बेहतर हुए।
Û 2004: भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष अटल जी ने पार्टी की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने कहा कि वे इसके बाद कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे। पार्टी का काम करते रहेंगे। लखनऊ से लगातार पांचवी बार चुनाव लड़े, जीते।
Û 2009: एक स्ट्रोक पड़ने के बाद लगभग शांत हो गए। उनका ज्यादतर समय टीवी देखने में जाने लगा।
Û 2014: 24 दिसंबर को (वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर से एक दिन पहले) मोदी सरकार ने अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न के लिए चुना। वह वाजपेयी जी का 90वां जन्मदिन था।
Û 2015: राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 27 मई को नई दिल्ली में अटल जी के कृष्णा मेनन मार्ग स्थित आवास पर जाकर उन्हें भारत रत्न दिया। भारत रत्न हमेशा राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में ही दिया जाता है। वाजपेयी जी के खराब स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पहली बार यह परंपरा तोड़ी गई।


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कुंडली विश्लेषण

जन-जन के प्यारे अटल जी का जन्म 25 दिसंबर 1924 के दिन मध्यप्रदेश राज्य के ग्वालियर जिले में हुआ। अटल जी की कुंडली तुला लग्न की है और लग्नेश शुक्र द्वितीय भाव में नीचस्थ चंद्र के साथ स्थित है। लग्नेश शुक्र का केंद्र स्वामी चंद्र के साथ होना राजयोग का निर्माण कर रहा है। सप्तमेश मंगल अपने भाव से बारहवें भाव में है, जिन्हें राहु की पंचम दृष्टि प्राप्त हो रही है। यह योग आजीवन अविवाहित रहने का संकेत दे रहा है। वाणी भाव में शुक्र-चंद्र का एक साथ होना कवित्व, संवेदनशीलता और रचनात्मक कार्यों में रूचि देता है। दूसरे और तीसरे भाव में पांच ग्रह हैं और तीसरे भाव पर शनि एवं राहु की दृष्टि है। इसके चलते इनके चार भाई और तीन बहनें रहीं। कर्म भाव में राहु व्यक्ति को सदैव उच्च स्तर का राजनेता और नीतिकुशल वक्ता बनाता है। अष्टमेश शुक्र अपने भाव को देख अप्रत्याशित घटनाओं के घटित होने की ओर इशारा दे रही है।

ज्योतिष शास्त्र के द्वारा वाजपेयी जी का जन्म मघा नक्षत्र, तुला लग्न व वृश्चिक राशि में हुआ। लग्न में उच्चस्थ शनि शश योग बना रहा है। पंचमहापुरूष योगों की श्रेणी में आने वाले इस योग ने अटल जी को उच्च पद पर आसीन किया, दूर दृष्टि और गहरी सोच दी। आमजन के अटल जी पसंदीदा नेता बने और काफी प्रसिद्धि भी इन्हें हासिल हुई। अपनी कर्मठता और कर्तव्यनिष्ठा के लिए इन्हें विशेष रूप से जाना गया। शनि की बली अवस्था में इन्हें दुख और तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ा। दशमेश चंद्र का त्रिकोणेश शुक्र के साथ होना इन्हें उच्च पद, राजकीय सम्मान और विश्व भर में लोकप्रियता देता रहा।

भाग्येश एवं लग्नेश ने इन्हें भारत रत्न जैसे श्रेष्ठतम नागरिक सम्मान से अलंकृत किया। आयेश सूर्य की अंतर्दशा में इन्हें सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया। दूसरे भाव में शुक्र-चंद्र का मंगल की वृश्चिक राशि होने के फलस्वस्वरूप इनकी वाणी में ओज, अदम्य साहस, उत्साह और जोश सदैव देखा गया। राजनीतिकारक ग्रह राहु कर्म भाव में हैं, इसीलिए इन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य राजनीति को बनाया और संपूर्ण जीवन जन सेवा करते हुए व्यतीत किया।

आम जन के लिए चतुर्थ भाव का विचार किया जाता है। इनके चतुर्थ भाव में केतु स्थित हैं और चतुर्थेश शनि बली अवस्था में लग्न भाव में है अर्थात सेवा इनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग रहा है। अटल जी का जीवन शनि, राहु और चंद्रमा के इई-गिर्द घूमता रहा है।

अटल जी की जन्मपत्री में 2003 जून से गुरु की महादशा शुरू हुई। गुरु महादशा के शुरू होने के साथ ही इनके करियर में अवनति का समय शुरू हो गया। गुरु ग्रह इनके लिए तीसरे और छठे भाव के स्वामी होने के कारण अकारक ग्रह हैं। गुरु स्वयं भी तीसरे भाव में ही स्थित हैं। सूर्य एवं बुध से अंशों में निकटतम होने के कारण अस्त अवस्था में भी हैं। साथ ही अर्धपापकर्तरी योग में होने के कारण अपने पूर्ण फल देने में असमर्थ हैं।

शनि इनके लिए चतुर्थ और पंचम भाव के स्वामी होकर योगकारक ग्रह हैं, लग्न में उच्चस्थ हैं। राहु महादशा में शनि की अंतर्दशा अवधि (10/11/1990 से लेकर 21/06/1991) में इन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ। 1992 में इन्हें पदम् विभूषण से सम्मानित किया गया। उस समय राहु/शनि दशा प्रभावी थी।

16 अगस्त 2018 को अटल जी एक लंबी अवधि तक बीमार रहने के बाद परम सत्ता में लीन हो गए। मृत्यु के समय इनकी कुंडली में गुरु-राहु-शुक्र की प्रत्यंतर दशा चल रही थी। शनि साढ़ेसाती तीसरी बार इनकी जन्मराशि पर प्रभावी थी। तीसरी साढ़ेसाती मृत्युतुल्य कष्ट अथवा मृत्युदायक होती है। 

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