स्वास्थ्य एवं वास्तु शास्त्र

स्वास्थ्य एवं वास्तु शास्त्र  

नीरज शर्मा
व्यूस : 3556 | अकतूबर 2004

आज के इस मशीनी युग एवं एक दूसरे से आगे निकलने की अंधी प्रतिस्पर्धा ने न केवल हमारे जीवन, रहन-सहन और कार्यप्रणाली को ही असंतुलित किया है, बल्कि स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक शुद्ध वातावरण तथा पर्यावरण को भी दूषित कर दिया है। परिणामस्वरूप आज अधिसंख्य लोग किसी न किसी व्याधि से पीड़ित रहते हैं। स्वाभाविक है कि पीड़ित व्यक्ति उपचार के लिए चिकित्सकों का सहारा लेता है। आधुनिक चिकित्सक केवल व्यक्ति के द्वारा बताये गये लक्षणों तथा उसकी शारीरिक अवस्था का ही उपचार करता है।

प्रायः उसका ध्यान रोगी के रहने एवं कार्यस्थल के वातावरण, व्यवस्था तथा पर्यावरण की तरफ ज्यादा नहीं जाता है, जबकि हमारे घर का वातावरण, व्यवस्था तथा आंतरिक एवं बाह्य पर्यावरण से न सिर्फ एक व्यक्ति, बल्कि पूरा परिवार प्रभावित होता है। हमारे शास्त्रों में भी आरोग्य को जीवन के प्रमुख सुखों में पहला सुख बतलाया है: आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः सद्भिर्मनुष्यैः सह संप्रयोगः। स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः, षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्।। (महाभारत) अर्थ: नीरोगी रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, सत्पुरूशों के साथ मेल जोल होना, अपनी कमाई से जीविका चलाना और निर्भय हो कर रहना , ये छह मानव लोक के सुख हैं।

सच पूछिए तो स्वास्थ्य शरीर के बिना व्यक्ति न तो योग का आनंद ले सकता है, न भोग का। वास्तु शास्त्र हमें स्वस्थ एवं सुखी जीवन प्राप्त करने के लिए उचित वातावरण, व्यवस्था तथा पर्यावरण के विषय में सही - सही जानकारी देता है। स्वास्थ्य एवं सुखी जीवन की प्राप्ति के लिए वास्तु शास्त्र राज्य, नगर, गांव, निज आवासीय भवन का निर्माण करते समय, पंच तत्वों - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के उचित समायोजन हेतु दिशा निर्देश देता है। वास्तु शास्त्र के नियमों को ध्यान में रख कर बनायी गयी आवासीय व्यवस्था उसमें रहने वाले लोगों के जीवन को हर प्रकार से स्वस्थ, संपन्न एवं सुखी बनाने में सहायक सिद्ध होती है।

नये भवन निर्माण के लिए भी तथा पूर्व निर्मित भवन में वास्तु दोष की जांच तथा उसका निवारण बिना किसी वास्तु विशेषज्ञ के बिना कठिन है। परंतु इस लेख में हम वास्तु शास्त्र के कुछ सरल, हितकारी और सुखकारी ऐसे निर्देश एवं सुझाव प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं, जिनका अपनी आवासीय व्यवस्था में ध्यान रख कर आप अपने जीवन को और अधिक स्वस्थ एवं सुखी बना सकते हैं। भवन की स्थिति:

Û जंक्शन पर, या सड़के के अंतिम छोर पर स्थित भूखंड पर बने भवन स्वास्थ्य संबंधी कष्ट प्रदान करने वाले माने जाते हैं।

Û यदि भवन के दोनों ओर, अथवा भवन के सामने उत्तर या पूर्व दिशा में भवन से काफी ऊंची इमारत बनी हो, तो ऐसे भवन में रहना भी स्वास्थ्य संबंधी कष्ट देता है। भवन में विभिन्न कक्षों की आंतरिक व्यवस्था: Û दक्षिण में पूजा कक्ष न बनाएं।

Û पूजा स्थल के ठीक ऊपर, या नीचे, साथ-साथ, शौचालय न बनाएं।

Û रसोई आग्नेय, अथवा वायव्य भाग में ही बनाएं।

Û रसोई के अंदर चूल्हा आग्नेय कोण तथा जल व्यवस्था उत्तर, उत्तर पूर्व में करें।

Û रसोई घर में पूर्व, उत्तर, उत्तर-पूर्व में अधिक से अधिक खिड़कियां हों।

Û उत्तर-पूर्व भाग में ओवर हेड टैंक न बनाएं।

Û शौचालय, अथवा सैप्टिक टैंक उत्तर-पूर्व भाग में न बनाएं।

Û भवन के मुख्य द्वार के सामने, या दायें -बायें शौचालय न हो। भवन में बगीचे / लाॅन/वृक्षों की व्यवस्था: भवन में उतरी, पूर्वी तथा उत्तर-पूर्व भाग में लाॅन बनाएं। इनमें कम ऊंचाई वाले पौधे एवं वृक्ष लगाएं। कांटेदार (गुलाब को छोड़ कर) फलदार, दूध वाले तथा बोनसाई पौधे न लगाएं। फूलदार पौधे एवं वृक्ष अच्छे रहते हैं। बड़े पेड़, चैड़े पत्ते वाले ऊंचे वृक्ष इत्यादि केवल दक्षिण-पूर्व, अथवा पश्चिम भाग में लगाएं। फलदार वृक्ष, या अन्य वृक्ष लगाने से पहले किसी वास्तुविद् से सलाह लें। खुला स्थान/खिड़कियां: भवन में उत्तर, उत्तर-पूर्व में अधिक खुला भाग होना चाहिए। खिड़कियां एवं बरामदे भी इसी दिशा में अधिक से अधिक होने चाहिए। कुछ सामान्य बातें: Û खाना बनाते समय पूर्व दिशा में मुख होना अच्छा रहता है।

Û खाना खाते समय मुंह पर्व, या उत्तर दिशा में होना चाहिए।

Û खाने के एकदम बाद पेय पदार्थ नहीं लेना चाहिए।

Û सोते समय सिर दक्षिण, या पूर्व की तरफ रखें।

Û फर्श को साफ करते समय पानी में थोड़ा समुद्री नमक, या फिटकरी मिलाएं।

Û बीम के नीचे न बैठें एवं न सोएं।

Û घर में प्रकाश की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए।

Û घर के अंदर केवल ताजे एवं खिले हुए फूल रखें।

Û घर में आवश्यक वस्तुओं का संग्रह, मकड़ी के जाले, अव्यवस्थित सामान इत्यादि होने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां तथा अशांति बढ़ती हैं।

Û कूड़े-कचरे के ढेर/कूड़ेदान को ईशान दिशा तथा घर के मुख्य द्वार के निकट न रखें। यद्यपि आज के समय में वास्तु नियमों का पूर्णतः पालन करना कठिन है, फिर भी नियमों का श्रद्धा, विश्वास के साथ यथासंभव पालन कर के प्रकृति का आशीर्वाद एवं लाभ प्राप्त किये जा सकते हंै।

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स्वास्थ्य और उपाय विशेषांक  अकतूबर 2004


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