ग्रहों की समय अवधि

ग्रहों की समय अवधि  

व्यूस : 5153 | दिसम्बर 2011
ग्रहों की समय अवधि पं. उमेश शर्मा ग्रहों की समय अवधि ग्रह वर्ष सूर्य 22 चन्द्र 24 मंगल 28 बुध 34 बृहस्पति 16 शुक्र 25 शनि 36 राहु 42 केतु 48 उपरोक्त तालिका से आपको यह ज्ञात होता है कि आयु के किस वर्ष में कौन सा ग्रह अपना प्रभाव दिखायेगा। उदाहरण के लिए मान लें कि किसी जातक की कुंडली में सूर्य खाना नं. 7 में स्थित है तो जातक को 22 वें वर्ष में सरकारी कामों में विघ्न व संबधित कारकत्वों के अशुभ फलों का अनुभव होगा। ऋण-पितृ ऋण-पितृ से तात्पर्य कुंडली वाले पर उसके अपने पूर्वजों के पाप का गुप्त प्रभाव होता है। कुंडली में जिस ग्रह की जड़ (अपनी राशि) में उसका दुश्मन ग्रह बैठ कर उसका फल रद्द कर रहा हो और साथ ही ग्रह खुद भी अशुभ हो रहा हो तो पितृ ऋण होगा। यही स्थिति परिवार की अन्य टेवों में प्रगट होगी। ऐसे कुंडली वाले के ग्रह चाहे कितने ही राजयोग वाले क्यों न हो जातक की योग्यता होते हुए भी असफलताओं का सामना करना पड़ता है। प्रगति देर से होती है व कई बार्र आिर्थक परेशानियों से जूझना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जातक को दो ग्रहों का उपाय करना होगा यानि एक तो उस ग्रह का उपाय करेगें जो खुद अशुभ हो गया हो और दूसरे उस ग्रह का उपाय करेंगे, जो उसके जड़ की राशि में बैठ कर उसको अशुभ कर रहा हो। पितृ ऋण को जन्म की कुंडली से देखेगें वर्षफल वाले कुंडली का इससे कोई संबंध नहीं होगा। पितृ ऋण के उपाय 40/43 दिनों के बजाय 40/43 सप्ताह का होगा, ध्यान रहे कि एक समय में दोनो ग्रहों का उपाय करना उचित न होगा क्योंकि ऐसा करने से किसी भी उपाय का फल प्राप्त न होगा। इसलिए पहले एक उपाय 40/43 दिन/सप्ताह करके फिर कुछ दिन खाली दोड़ दें, फिर उसके बाद दूसरा उपाय 40/43 दिन/सप्ताह लगातार करें। ऐसे उपाय के समय समस्त परिवार का जहां कहीं भी उनके खून का कोई रिश्तेदार यानि लड़की, पोती, बहू, बहन, दोहता, पोता, बाबा, पड़दादा अर्थ यह कि जहां तक खून का संबंध हो या हो रहा हो, सबको इसमें हिस्सा डालना सहायक ही नहीं बल्कि जरुरी होगा। कुंडली वाले के ससुराल की तरफ से रिश्तेदारों के लिए पितृ ऋण के उपाय में हिस्सेदार बनने की कोई शर्त नहीं मगर कुंडली वाले की लड़की, बहन या बहू या उनकी संतान (चाहे वह नर हो या मादा) का हिस्सा सम्मिलित करना उचित ही नहीं बल्कि आवश्यक माना गया है। ऋण पितृ की स्थिति: “घर नौवें हो ग्रह कोई बैठा, बुध बैठा जड़ साथी हो। ऋण पितर उस घर से होगा, असर ग्रह सब निष्फल हो।।” पितृ ऋण की प्रथम स्थिति जब बुध जड़ में बैठा हो: बृहस्पति हो खाना नं0 9 में और बुध हो द्वादश खाने में। सूरज हो खाना नं0 9 में और बुध हो पंचम खाने में चन्द्र हो खाना नं0 9 में और बुध हो चतुर्थ खाने में। मंगल हो खाना नं0 9 में और बुध हो लग्न या अष्टम खाने में। शुक्र हो खाना नं0 9 में और बुध हो द्वितीय या सप्तम खाने में। शनि हो खाना नं0 9 में और बुध हो दशम या एकादश खाने में। राहु हो खाना नं. 9 में और बुध हो द्वादश खाने में। केतु हो खाना नं0 9 में और बुध हो षष्ठ खाने में। “साथी ग्रह जब जड़ कोई काटे, दृष्टि मगर वह दुपाता हो। 5, 12, 2, 9 कोई मन्द, ऋण पितर बन जाता हो।।” पितृ ऋण की दूसरी स्थिति: बृहस्पति नं0 2, 3, 5, 6, 9 तथा 12वें खाने से बाहर स्थित हो और खाना नं. 2 में शनि (पापी ग्रह हो कर ), अथवा खाना नं0 5 में शुक्र, अथवा खाना नं0 9 में बुध या खाना नं0 12 में राहु या खाना नं0 3, 6 में बुध, शुक्र या शनि स्थित हो। (पितृ ऋण) सूर्य खाना नं0 1 और 11 से बाहर स्थित हो और खाना नं0 5 में शुक्र या पापी ग्रह स्थित हो। (जाती ऋण) चंद्र खाना नं0 4 से बाहर स्थित हो और खाना नं0 4 में केतु स्थित हो। (मातृ ऋण) शुक्र खाना नं0 1, 8 से बाहर स्थित हो और खाना नं0 2-7 में सूर्य, चन्द्र व राहु में से कोई एक या एक से ज्यादा हों। (स्त्री ऋण) मंगल खाना नं0 7 से बाहर और खाना नं0 1-8 में बुध, केतु हो। (रिश्तेदारी का ऋण) बुध खाना नं0 2-12 से बाहर हो और खाना नं0 3-6 में चन्द्र हो। (बहन का ऋण) शनि खाना नं0 3-4 से बाहर और खाना नं0 10-11 में सूर्य,चन्द्र मंगल हो। (जालिमाना ऋण) राहु हो खाना नं0 6 से बाहर और खाना नं0 12 में सूर्य शुक्र व मंगल हो। (अजन्में का ऋण) केतु हो खाना नं0 2 से बाहर और खाना नं0 6 में चन्द्र, मंगल हो। (दरगााही ऋण) इसके साथ साथ खाना नं0 9 भी अशुभ हो तो ही पितृ ऋण होगा। ध्यान रहे कि पितृ ऋण हमेशा जन्मकुंडली से देखा जायेगा न कि वर्ष कुंडली से। इस प्रकार ऋण पितृ की तीन शर्तें होंगी: कुंडली के नवम खाना में कोई भी ग्रह स्थित हो और उसकी राशि में बुध बैठ जाए। किसी ग्रह की राशि में उसके शत्रु ग्रह बैठ जाऐं और शत्रु ग्रहों पर उस राशि के स्वामी का कोई प्रभाव न हो यानी ग्रह का अपनी राशि में स्थित ग्रहों से युति व दृष्टि संबंध न हो। बृहस्पति के पक्के घरों ( खाना नं0 2, 5, 9, 12 ) में उसके शत्रु ग्रह (बुध, शुक्र) बैठे हों। पितृ ऋण को दूर करने के लिए एक तो उस ग्रह का उपाय करेगें जो खुद अशुभ हो रहा हो और दूसरे उसका जो उसकी जड़ यानी राशि में बैठ कर उसको अशुभ कर रहा हो। उपाय: पितृ ऋण का उपाय परिवार के सभी सदस्यों पर असर डालता है, अतः उसे 40-43 दिन के बजाय 40-43 सप्ताह करना चाहिए और उपाय के लिए खानदान के प्रत्येक व्यक्ति जहां तक खून का संबंध हो हिस्सा लेना चाहिए और और जो हिस्सा न दे सके तो उसके हिस्से का दस गुना ज्यादा स्वयं डाल दें। बृहस्पति- अगर पितृ ऋण बृहस्पति का हो तो खानदान के प्रत्येक सदस्य से (जहां तक खून का संबंध हो) एक समान पैसे लेकर एक ही दिन में मन्दिर में दान करना। सूर्य- खानदान के प्रत्येक सदस्य से (जहां तक खून का संबंध हो) एक समान पैसे लेकर एक ही दिन में मन्दिर में यज्ञ कराना। चंद्र- खानदान के प्रत्येक सदस्य से (जहां तक खून का संबंध हो) एक समान चांदी लेकर एक ही दिन में चलते पानी में बहा दी जायें। शुक्र- 100 गायों को जो कि अंगहीन न हों को कुल खानदान के (जहां तक खून का संबंध हो) इकट्ठे किये गये पैसों से एक ही दिन में खाना खिलाया जाय। मंगल- खानदान के प्रत्येक सदस्य से (जहां तक खून का संबंध हो) बराबर बराबर पैसे लेकर इकट्ठे करके किसी वैद्य को मुफ्त दवाई बांटनें के लिए देना। (उस पैसे से मेडीकल कैम्प लगाना) बुध- खानदान के प्रत्येक सदस्य (जहां तक खुन का संबंध हो) से पीले रंग की कौड़ी लेकर एक जगह इक्कठी करके जला दें और राख नदी में बहा दें। शनि- कुल खानदान (जहां तक खून का संबंध हो) के इक्ट्ठे किये गये धन से सौे अलग अलग जगह की मछलियों को एक ही दिन खाना खिलायें या उस धन से 100 मजदूरों को एक दिन में खाना खिलाया जाये। राहु- कुल खानदान(जहां तक खून का संबंध हो) के प्रत्येक सदस्य से एक एक नारियल ले कर इक्ट्ठे एक ही दिन में चलते पानी में प्रवाह करना।

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